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                <title>Political Awareness - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Political Awareness RSS Feed</description>
                
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                <title>पार्टियों की टूट व टूटता भरोसा: लोकतंत्र में सबसे बड़ा नुकसान यही है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181509/the-biggest-loss-in-democracy-is-the-breakdown-of-parties"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया जाता है - "सिद्धांतों से समझौता", "जनता के हित में फैसला"। लेकिन नतीजा एक ही निकलता है - वोटर का भरोसा टूटना।</p><p style="text-align:justify;"><br />टूट क्यों रही हैं पार्टियां? इस पर हमारी सोच वही है जो लगभग सभी की होती है। सत्ता और पद का गणित- पार्टी टूटने का 80% कारण विधायकों और सांसदों की टिकट और मंत्री पद की भूख है। जब हाईकमान टिकट काटता है या किसी और को आगे बढ़ाता है, तो नाराज नेता दूसरी पार्टी या नई पार्टी बना लेते हैं। परिवारवाद और हाईकमान कल्चर-<br />कई क्षेत्रीय पार्टियां एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जब दूसरी पीढ़ी तैयार होती है, तो पुराने नेता खुद को साइडलाइन महसूस करते हैं और बगावत करते हैं।</p><p style="text-align:justify;"><br />विचारधारा का कमजोर होना- पहले पार्टियों की पहचान किसी विचारधारा से होती थी। अब ज्यादातर पार्टियां "पावर ब्लॉक" बन गई हैं। विचारधारा बदलते देर नहीं लगती, क्योंकि एजेंडा सत्ता है। वोटर का भरोसा कैसे टूटता है?- जब तुमने 2019 में किसी पार्टी को वोट दिया था, तुमने उसके घोषणापत्र, नेता और विचारधारा पर भरोसा किया था। 2023 में वही विधायक दूसरी पार्टी में चला जाए और 2024 में तीसरी पार्टी में, तो सवाल उठता है। मैंने वोट किसको दिया था? व्यक्ति को, सिंबल को, या पार्टी को?</p><p style="text-align:justify;"><br />क्या मेरा वोट मायने रखता है? अगर चुनाव के बाद गठबंधन बदल जाए तो जनादेश का मतलब क्या रहा? सब एक जैसे हैं- ये सनक नहीं, टूटे भरोसे की उपज है। 2023 के कर्नाटक और महाराष्ट्र चुनाव के बाद CSDS के सर्वे में 47% लोगों ने कहा कि "दलबदल से लोकतंत्र कमजोर होता है"। इसका असर कहां दिखता है? चुनावी राजनीति पर- लोग अब स्थानीय उम्मीदवार देखने लगे हैं, पार्टी नहीं। "पार्टी कोई भी हो, मेरा काम करे" वाला ट्रेंड बढ़ रहा है। नीति निर्माण पर- सरकारें अस्थिर हो जाती हैं। 5 साल का प्लान 2 साल में बदल जाता है क्योंकि गठबंधन बदल गया। युवा राजनीति से दूर हो रहे हैं- कॉलेज चुनावों में भी भागीदारी घट रही है। युवाओं को लगता है कि राजनीति सिर्फ सौदेबाजी है। नोटा का बढ़ना- 2019 के बाद से कई सीटों पर नोटा को मिले वोट 2-3% तक पहुंच गए हैं। ये विरोध का साइलेंट तरीका है।</p><p style="text-align:justify;"><br />               दलबदल कानून कहां फेल हुआ?- 1985 में 52वां संविधान संशोधन लाकर दलबदल विरोधी कानून बनाया गया। मकसद था कि विधायक पार्टी न बदलें। लेकिन कानून में एक खामी छोड़ दी गई - अगर 2/3 विधायक साथ छोड़ दें तो वो "विलय" कहलाता है और अयोग्यता नहीं लगती। इसी खामी का फायदा लेकर महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश में सरकारें गिरीं। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि स्पीकर का फैसला समय पर नहीं आता, जिससे कानून का मकसद ही खत्म हो जाता है। क्या हो सकता है समाधान?- 2/3 वाली छूट हटाओ- अगर पार्टी टूटती है तो सबको अयोग्य ठहराओ। फिर जनता के पास जाओ और दोबारा चुनाव लड़ो।</p><p style="text-align:justify;"><br />फंडिंग में पारदर्शिता-  चुनाव आयोग को हर लेन-देन का हिसाब मिले ताकि नेताओं को खरीद-फरोख्त न हो सके। आंतरिक लोकतंत्र-  पार्टियों में चुनाव हों, युवा और कार्यकर्ताओं की सुनवाई हो। जब अंदर लोकतंत्र होगा तो बाहर टूट कम होगी। वोटर एजुकेशन-  लोगों को समझाना होगा कि वोट सिंबल को जाता है, व्यक्ति को नहीं। ये बात स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई जाए। स्थानीय मुद्दों पर वोट-  लोग अब पानी, सड़क, स्कूल को देखकर वोट कर रहे हैं, न कि बड़े नेता के नाम पर। सोशल मीडिया पर जवाबदेही- विधायक अगर पाला बदलता है तो अगले 6 महीने तक ट्रोल होता है। ये डर कुछ हद तक काम कर रहा है। नए विकल्प की तलाश AAP जैसे दल इसी भरोसे के संकट से पैदा हुए। पार्टियों का टूटना लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन जब हर 2 साल में गठबंधन और दल बदल जाएं, तो जनता को लगता है कि उसका वोट सिर्फ सत्ता का सीढ़ी है।</p><p style="text-align:justify;"><br />लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है, ये भरोसे का कॉन्ट्रैक्ट है। जब पार्टियां उस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ती हैं, तो नुकसान वोटर को होता है। और एक बार भरोसा टूट जाए, तो उसे दोबारा जोड़ने में 10 साल लग जाते हैं।<br />अगली बार जब कोई नेता पाला बदले, तो सवाल पूछो: "तुम पार्टी बदले, मेरी समस्या बदली क्या?"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 20:39:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>बनारस की अजगरा विधान सभा सीट जहां से  कभी कोई स्थानीय नेता विधायक नहीं बन पाया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> बनारस जिला में एक अजगरा विधान सभा क्षेत्र है पहले यह सैद पुर विधान सभा के नाम पर पहचाना जाता था जबकि इस विधान सभा में अस्सी प्रतिशत वोट चोला पुर ब्लाक का था ।पर कभी भी इस सैद पुर विधान सभा क्षेत्र से चोला पुर ब्लाक का कोई नेता वह किसी भी दल का रहा हो विधायक नहीं बना बस एक बार सपा की सरकार में धरहरा से मुलायम सिंह के बहुत प्रिय राजनाथ यादव उप चुनाव जीते थे।फिर आज तक कोई नहीं दुसरा स्थानीय नेता चुनाव जीत पाया ।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">नये परिसीमन में सैदपुर को बाहर करकेपूर्ण</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177410/ajgra-assembly-seat-of-banaras-from-where-no-local-leader"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/rajneeti1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> बनारस जिला में एक अजगरा विधान सभा क्षेत्र है पहले यह सैद पुर विधान सभा के नाम पर पहचाना जाता था जबकि इस विधान सभा में अस्सी प्रतिशत वोट चोला पुर ब्लाक का था ।पर कभी भी इस सैद पुर विधान सभा क्षेत्र से चोला पुर ब्लाक का कोई नेता वह किसी भी दल का रहा हो विधायक नहीं बना बस एक बार सपा की सरकार में धरहरा से मुलायम सिंह के बहुत प्रिय राजनाथ यादव उप चुनाव जीते थे।फिर आज तक कोई नहीं दुसरा स्थानीय नेता चुनाव जीत पाया ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नये परिसीमन में सैदपुर को बाहर करकेपूर्ण रूप से बनारस जिले के मतदाताओं का विधानसभा अजगरा बना दिया गया और आरक्षित हैं।फिर भी कोई चोलापुर ब्लाक का मूल विधायक नहीं बन पाया है । नहीं इस ब्लाक का को को ई नेता सांसद भी बन पाया । यह विधान सभा चन्दौली संसदीय क्षेत्र में है।चन्दौली क्षेत्र में आने से पहले यह केराकत क्षेत्र में था ।चन्दौली क्षेत्र में दोबारा सांसद महेन्द्र पाण्डेय बने पर वह भी मूल पुर से बाहरी गाजीपुर जिले  से है । पर बनारस में मकान बना लिया वहीं रहते हैं।पर मूल तो नहीं है जिस कारण से विकास से उपेक्षित रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज अजगरा विधान सभा में विधायक टी राम जो कभी मायावती के खास थे।  तब वह बहुजन समाज से एकबार बने विधायक मूल पुर से केराकत के है उनके काल में भी विधान सभा में कुछ नहीं हुआ एक बार सोनकर जी शहर बनारस से जाकर विधायक बन गये तब भी कुछ नहीं हुआ।आज  बहुजनसमाज से भाजपा में  आये टी राम यानि त्रिभुवनराम विधायक हैं । पर अजगार विधानसभा में कोई कारखाना नहीं  कोई उघोग नहीं लगा पाते हैं। बस यहां की जनता का वोट लेकर मौज में है ।जगरा विधानसभा में ढंग की सड़क नहीं नहीं चोलापुर में हास्पिटल सही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जो बस साधारण मरीज का ईलाज करता है बाकी सबको शहर में भेज देता है।विधायकबस बुलाने पर पार्टी के कार्यक्रम में देखें जाते हैं इसी अजगरा विधान सभा क्षेत्र का यह दूर्भाग्य है कि यहां की जनता कभी अपनों को भोजन नहीं देती है यानि चुनाव नहीं जितने देती न जाने किस विवेक से वह हमेशा बाहरी लोगो के साथ ही खड़ा होती है जो जनता को ठग रहे हे । अगर स्थानीय विधायक रहता तो उस पर जनता का दबाव भी होता और जन हित में कार्य भी होता पर यह बहुत बड़ी विडम्बना है कि जब से अजगरा विधान सभा अस्तित्व में आया है तभी से बाहरी ही विधायक बन रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अजगरा के मतदाताओं को यह सोचना चाहिए क्यों बाहरी लोगो पर भरोसा इतना करते हैं । अपनी जमीन को  किसी और को क्यों दे रहे हैं ।क्या जनता अपने जमीर को बेच देती है या अजगरा विधान सभा में मूल अजगरा विधानसभा में कोई नेता नहीं जिस पर विश्वास नहीं और बाहरी पर एतबार हो जाता है।अब समय आ रहा है अजगरा विधानसभा के लोग जागरूक बने और अंजगरा विधानसभा के मूल निवासी को अपना विधायक चुने बाहरी हटाओ अपने को गले लगाओ की निती पर चलेंगे तभी विधान सभा के हर पंचायत गांव का विकास होगा कुछ उघोग लगेंगे ।नहीं तो बाहर के लोग आपका बनाया भोजन करके आपको ही गाली देंगे की मूर्खो को मूर्ख बनाकर सत्ता का आनन्द लेते हैं । और क्षेत्र में कोई विशेष विकास नहीं होता है। जनता बस सड़क या पंचायत भवन नहीं </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब 2027नजदीक आ रहा है तो गांव के मन्दिर को कुछ विधायक जी धन देते हैं उसी पर विधायक का चरण चुम्बक बने कर जय कारा लगाते हैं।  स्वागत करते रहते है ।कभी कोई उघोग नहीं मांगा न लगा विधान सभा में कि विधानसभा के लड़कों को रोजगार मिले ।हिमाचल का एक विधान सभा क्षेत्र भारत में बहुत प्रसिद्ध है नाम हरोली है जहां का विधायक स्थानीय है उस विधान सभा क्षेत्र में केन्द्रीय विद्यालय के साथ ट्रिपल आई आई टीसरकारी महाविद्यालय है तो उघोगा की भर मार है स्थानीय युवाओं के साथ प्रदेश व देश के लोगों को नौकरी मिली है।क्या अजगरा विधानसभा में ऐसा हो सकता है क्यों नहीं अजगरा विधानसभा में सरकारी महाविद्यालय खुला ।अगर स्थानीय विधायक होगा तो अपने लोगों के बारे में सोचेगा ‌उघोग सरकारी और निजी क्षेत्र में लायेगा पर सोच बदलें जनता अपने पर विश्वास कर अपनों को विधायक बनाये।नहीं तो उधार के सिन।दूर से अजगरा कभी सुहागन का दर्जा नहीं पायेगा।वह बस उधार वाला ही कहा जायेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब 2027नजदीक आ रहा है।चुनाव होगा ही अभी नया परिसीमन होगा नहीं तो अजगरा विधानसभा सुरक्षित विधान सभा सीट ही रहेगा या जनता चुनाव आयोग को एक मुहिम चला कर पत्र भेजे की इस विधानसभा को अब ओपेन सामान्य वर्ग के लिए किया जाये जिससे सामान्य वर्ग भी चुनाव लड सके।पर अब पुनः ,वाले वहीं पुतिन कब तक बाहरी लोगों का पैर धोयेगे आजगरा के मतदाता।क्या कोई अपना नहीं जो क्षेत्र की क्विज विधानसभा में उठा सकें क्षेत्र में उघोग लगे युवाओं कि पलायन रोका जाये नशे से मुक्ति इन युवाओं को मिल सके।इस बार अंगारा विधानसभा के लोग तय कर लें अपनी धरा पर अब बाहरी नहीं चाहे किसी भी दल का हो</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:00:55 +0530</pubDate>
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