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                <title>अरविंद रावल - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>अरविंद रावल RSS Feed</description>
                
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                <title>राजनीतिक हस्तक्षेप से परे हो - छात्रसंघ चुनाव</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में विश्वविद्यालयों में होने वाले छात्रसंघ चुनावों का इतिहास स्वतंत्रता पूर्व काल से जुड़ा हुआ है। उस दौर में छात्र संगठनों ने न केवल विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। स्वतंत्रता के बाद देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव नियमित रूप से आयोजित होने लगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूलों और कॉलेजों के छात्रसंघ चुनावों ने देश को अनेक कुशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरदर्शी और जनप्रिय नेता दिए हैं। ऐसे अनेक जनप्रतिनिधि छात्र राजनीति से निकलकर लोकसभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्यसभा तथा केंद्र एवं राज्य</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183622/be-beyond-political-interference-student-union-elections"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/orig_49_1659309656.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में विश्वविद्यालयों में होने वाले छात्रसंघ चुनावों का इतिहास स्वतंत्रता पूर्व काल से जुड़ा हुआ है। उस दौर में छात्र संगठनों ने न केवल विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। स्वतंत्रता के बाद देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों में प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव नियमित रूप से आयोजित होने लगे।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निस्संदेह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूलों और कॉलेजों के छात्रसंघ चुनावों ने देश को अनेक कुशल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूरदर्शी और जनप्रिय नेता दिए हैं। ऐसे अनेक जनप्रतिनिधि छात्र राजनीति से निकलकर लोकसभा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्यसभा तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के महत्वपूर्ण पदों तक पहुँचे और राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक विश्वविद्यालयों में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक छात्रसंघ चुनाव लोकतांत्रिक मूल्यों और छात्र हितों के प्रतीक बने रहे। उनकी सकारात्मक गूँज गाँवों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कस्बों और महानगरों तक सुनाई देती थी। किंतु समय के साथ राजनीति के बढ़ते दखल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनबल और बाहुबल के प्रभाव ने छात्रसंघ चुनावों की गरिमा को प्रभावित किया। परिणामस्वरूप अनेक राज्यों में ये चुनाव हिंसक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विवादास्पद और अत्यधिक खर्चीले होते चले गए।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान सहित कई राज्यों में छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध लगाने के पीछे मुख्य कारण छात्र गुटों के बीच बढ़ती हिंसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविद्यालय परिसरों में भय का वातावरण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छात्रों एवं प्राध्यापकों को धमकाना तथा गंभीर आपराधिक घटनाएँ रहीं। यही कारण है कि कई राज्यों में आज भी प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनावों पर प्रतिबंध लागू है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विपरीत दिल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाणा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में राज्य सरकारों एवं विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा निर्धारित कड़े नियमों के अंतर्गत आज भी प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव सफलतापूर्वक संपन्न कराए जाते हैं। वहीं कुछ राज्यों में चुनाव केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय राजनीति का इतिहास इस बात का साक्षी है कि लगभग प्रत्येक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दल में ऐसे अनेक नेता हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की और आगे चलकर देश एवं राज्यों के नेतृत्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राज्यों में विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनाव स्वस्थ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शांतिपूर्ण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्ष और लोकतांत्रिक वातावरण में संपन्न कराए जाएँ। इसके लिए राज्य सरकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विश्वविद्यालय प्रशासन तथा सभी राजनीतिक दलों को दलगत हितों से ऊपर उठकर सकारात्मक पहल करनी होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">छात्रसंघ चुनाव राजनीतिक हस्तक्षेप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">धनबल और बाहुबल से मुक्त होकर केवल छात्रों के जनसमर्थन और लोकप्रियता के आधार पर संपन्न होने चाहिए। यही व्यवस्था लोकतंत्र की वास्तविक भावना को मजबूत करेगी और विद्यार्थियों में नेतृत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तरदायित्व तथा राष्ट्र निर्माण की भावना विकसित करेगी। यदि युवा पीढ़ी को छात्र जीवन से ही लोकतांत्रिक मूल्यों का व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भविष्य में देश को अधिक संवेदनशील</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सक्षम और उत्तरदायी नेतृत्व प्राप्त होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 21:50:51 +0530</pubDate>
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                <title>आग उगलती भीषण गर्मी में प्यासे कंठों की कौन सुने दास्तां</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के कई राज्यों में इस समय भीषण और भयावह गर्मी का प्रकोप जारी है। हर वर्ष तापमान अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए नई ऊंचाइयां छू रहा है। आसमान से बरसती आग ने मानो समस्त जीव-जंतुओं के कंठ सूखा दिए हैं। यह बढ़ती हुई भीषण गर्मी कहीं न कहीं मानव द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति-विनाश का परिणाम है। इसी के चलते जल के प्राकृतिक स्रोत समाप्त हो रहे हैं और भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जंगलों के अंधाधुंध विनाश के कारण अनेक प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे मूक वन्यजीवों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177391/who-will-listen-to-the-tales-of-thirsty-throats-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/download2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के कई राज्यों में इस समय भीषण और भयावह गर्मी का प्रकोप जारी है। हर वर्ष तापमान अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए नई ऊंचाइयां छू रहा है। आसमान से बरसती आग ने मानो समस्त जीव-जंतुओं के कंठ सूखा दिए हैं। यह बढ़ती हुई भीषण गर्मी कहीं न कहीं मानव द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति-विनाश का परिणाम है। इसी के चलते जल के प्राकृतिक स्रोत समाप्त हो रहे हैं और भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जंगलों के अंधाधुंध विनाश के कारण अनेक प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे मूक वन्यजीवों के जीवन पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। पानी प्रकृति के समस्त जीवों की मूलभूत और अनिवार्य आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन विडंबना यह है कि जब यही आवश्यकता पूरी नहीं हो पा रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जीवों के अस्तित्व पर संकट गहराना स्वाभाविक है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्वीकार करना होगा कि आजादी के साढ़े सात दशक बाद भी देश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को पेयजल के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में यह कल्पना करना कठिन नहीं कि वन्यजीव अपनी प्यास बुझाने के लिए कितनी कठिनाइयों का सामना करते होंगे। मानव जीवन के लिए शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने हेतु केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष अनेक प्रयास करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी स्तर पर ये प्रयास अभी भी अपर्याप्त सिद्ध हो रहे हैं। विशेषकर सुदूर ग्रामीण अंचलों में पेयजल व्यवस्था को और सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए सरकार की ‘नल-जल योजना’ एक महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी पहल है। बावजूद इसके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई स्थानों पर जिला प्रशासन की उदासीनता के कारण इन योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। अनेक गाँवों में बनी पानी की टंकियाँ केवल दिखावा बनकर रह गई हैं। ये टंकियाँ प्यासे कंठों को राहत देने के बजाय व्यवस्था की खामियों का प्रतीक बनती जा रही हैं।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पानी हर जीव की मूलभूत आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यदि इसी आवश्यकता की पूर्ति में कमी रह जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह न केवल गंभीर लापरवाही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अक्षम्य अपराध के समान है। भीषण गर्मी में जब लोग घर से बाहर निकलने से बचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब ग्रामीण क्षेत्रों के लोग मीलों दूर से पानी लाने को विवश होते हैं। जल संकट के कारण मूक पशु-पक्षियों का जीवन बचाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति-विनाश के चलते बढ़ती गर्मी और अस्तित्व बचाने के लिए भटकते वन्यजीव—ये दोनों ही हमारी सामूहिक जिम्मेदारी हैं। ऐसे में सरकार और समाज को मिलकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के अंतिम छोर तक मानव और वन्य प्राणियों के लिए पेयजल की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। यदि इस दिशा में ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ कार्य किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो देश के हर कोने में सभी जीवों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित जल उपलब्ध कराया जा सकता है। अन्यथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर वर्ष की भाँति आग उगलती गर्मी में प्यासे मूक प्राणियों की दास्तां अधूरी ही रह जाएगी।</span></p><p style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:28:37 +0530</pubDate>
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