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                <title>ग्रामीण भारत - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>ग्रामीण भारत RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी हर काम से नहीं हटती पीछे</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong>महराजगंज/रायबरेली:</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जहां बढ़ती उम्र के साथ अधिकांश लोग दूसरों के सहारे जीवन व्यतीत करने लगते हैं, वहीं विकासखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी अपनी मेहनत, आत्मनिर्भरता और अदम्य जीवटता से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी दिनचर्या किसी युवा महिला से कम नहीं है। घर के लगभग सभी काम वह स्वयं करती हैं और अपनी सक्रिय जीवनशैली से यह साबित कर रही हैं कि, इच्छाशक्ति मजबूत हो तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">        </div>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181678/purbin-an-elderly-mother-of-more-than-90-years-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260619-wa0383.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">
<blockquote class="format1"><strong>महराजगंज/रायबरेली:</strong></blockquote>
</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जहां बढ़ती उम्र के साथ अधिकांश लोग दूसरों के सहारे जीवन व्यतीत करने लगते हैं, वहीं विकासखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायत सुल्तानपुर निवासी 90 वर्ष से अधिक आयु की बुजुर्ग मां पुरबिन आज भी अपनी मेहनत, आत्मनिर्भरता और अदम्य जीवटता से नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी दिनचर्या किसी युवा महिला से कम नहीं है। घर के लगभग सभी काम वह स्वयं करती हैं और अपनी सक्रिय जीवनशैली से यह साबित कर रही हैं कि, इच्छाशक्ति मजबूत हो तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">      आपको बता दें कि, मां पुरबिन का परिवार भरा-पूरा है। उनके एक पुत्र संतलाल लोधी हैं, जो वर्तमान में ग्राम प्रधान हैं, जबकि उनकी दो बेटियां विवाह के बाद अपने-अपने परिवारों में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही हैं। परिवार में बहू, दो नाती, दो नातिन और दो पनाती भी हैं। परिवार के सभी सदस्य उनका सम्मान करते हैं और उनकी देखभाल के लिए तत्पर रहते हैं, फिर भी मां पुरबिन आत्मनिर्भर जीवन जीना ही पसंद करती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">         बुजुर्ग मां पुरबिन की एक विशेष इच्छा भी है। वह चाहती हैं कि, अपने जीवनकाल में अपने एक अविवाहित नाती का विवाह अपनी आंखों से देखें। यही इच्छा उनके जीवन में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">         उम्र बढ़ने के बावजूद उनकी दिनचर्या आज भी बेहद सक्रिय है। वह घर में झाड़ू लगाने से लेकर भोजन बनाने तक के सभी कार्य स्वयं करती हैं। पशुओं की देखभाल, गाय-भैंस का दूध निकालना, खैलर चलाकर मट्ठा तैयार करना, गोबर उठाना, चावल साफ करना तथा अपने हाथों से आटा गूंधकर मिट्टी के चूल्हे पर रोटियां बनाना उनके रोजमर्रा के कार्यों में शामिल है। उम्र के प्रभाव से उनकी कमर भले ही झुक गई हो, लेकिन उनके हौसले और कार्य करने की क्षमता में आज भी कोई कमी दिखाई नहीं देती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        ग्रामीण परिवेश में सादगीपूर्ण जीवन, नियमित शारीरिक श्रम और अनुशासित दिनचर्या को ही वह अपनी अच्छी सेहत का राज मानती हैं। उनका कहना है कि, शरीर को स्वस्थ और सक्रिय बनाए रखने के लिए लगातार काम करना जरूरी है। यही कारण है कि, परिवार के मना करने के बावजूद वह स्वयं अपने काम करना पसंद करती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        मां पुरबिन बताती हैं कि, उनका बेटा ग्राम प्रधान होने के नाते उन्हें आराम करने की सलाह देता है, लेकिन वह मानती हैं कि, निष्क्रियता शरीर को कमजोर बना देती है। इसलिए वह अपने दैनिक कार्यों को ही व्यायाम और स्वास्थ्य का आधार मानती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        आज के समय में, जब कम उम्र में ही लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, मां पुरबिन की जीवनशैली समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश लेकर आती है। उनकी मेहनत, अनुशासन और आत्मनिर्भरता यह सिखाती है कि, नियमित श्रम, सकारात्मक सोच और सक्रिय जीवनशैली इंसान को लंबे समय तक स्वस्थ, सक्षम और आत्मविश्वासी बनाए रख सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">        मां पुरबिन की यह प्रेरणादायी कहानी न केवल ग्रामीण महिलाओं के लिए बल्कि हर आयु वर्ग के लोगों के लिए एक मिसाल है। उनकी जीवटता और कर्मशीलता को देखकर सहज ही कहा जा सकता है कि, उम्र भले ही 90 पार कर जाए, लेकिन हौसले जवान हों तो जीवन की रफ्तार कभी नहीं थमती।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टेक्नोलॉजी</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>लाइफस्टाइल</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 22:17:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>समझाइश और सख्ती से बदली तस्वीर अमरावती के नशामुक्त गांवों ने दिखाया नया रास्ता</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महाराष्ट्र </strong>के अमरावती जिले के गांवों से निकली यह कहानी केवल एक बदलाव की नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्जागरण की कहानी है। कभी शराबखोरी के लिए बदनाम रहे ये गांव आज अनुशासन, आत्मसम्मान और जागरूकता के प्रतीक बन गए हैं। मेलबाट क्षेत्र से शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे 19 गांवों को नशामुक्त बना चुका है और अब यही गांव आसपास के 20 गांवों को भी इस दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया बल्कि वर्षों की मेहनत, धैर्य और सामूहिक संकल्प का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इन गांवों का अतीत बेहद कठिन था। शराब यहां केवल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178068/the-picture-changed-through-persuasion-and-strictness-drug-free-villages"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महाराष्ट्र </strong>के अमरावती जिले के गांवों से निकली यह कहानी केवल एक बदलाव की नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्जागरण की कहानी है। कभी शराबखोरी के लिए बदनाम रहे ये गांव आज अनुशासन, आत्मसम्मान और जागरूकता के प्रतीक बन गए हैं। मेलबाट क्षेत्र से शुरू हुआ यह अभियान धीरे-धीरे 19 गांवों को नशामुक्त बना चुका है और अब यही गांव आसपास के 20 गांवों को भी इस दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया बल्कि वर्षों की मेहनत, धैर्य और सामूहिक संकल्प का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन गांवों का अतीत बेहद कठिन था। शराब यहां केवल एक आदत नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुकी थी। पुरुष अपनी मेहनत की कमाई शराब में खर्च कर देते थे, जिससे परिवार आर्थिक संकट में फंस जाते थे। घरों में झगड़े होते थे, महिलाओं को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था और बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया था। सामाजिक स्तर पर भी इन गांवों की छवि खराब हो चुकी थी। रिश्तेदार तक शादी-ब्याह जैसे कार्यक्रमों में इन्हें बुलाने से कतराते थे। यह सामाजिक बहिष्कार धीरे-धीरे लोगों के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने लगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्थिति को बदलने के लिए आदिवासी पंचायत, समाजसेवकों, ग्रामीणों और पुलिस ने मिलकर प्रयास शुरू किए। गांवों में लगातार बैठकें आयोजित की गईं। लोगों को समझाया गया कि नशा उनके शरीर, परिवार और भविष्य के लिए कितना घातक है। शुरुआत में इन प्रयासों का विरोध हुआ। कई लोग अपनी आदत छोड़ने को तैयार नहीं थे, लेकिन समझाइश का सिलसिला रुका नहीं। धीरे-धीरे लोगों की सोच में बदलाव आने लगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब केवल समझाने से बात नहीं बनी तो पंचायत ने सख्ती का रास्ता अपनाया। गांव में शराब पीने वाले और शराब परोसने वाले दोनों पर पांच हजार रुपये का जुर्माना तय किया गया। यह नियम सभी पर समान रूप से लागू किया गया और इसका कड़ाई से पालन किया गया। इस निर्णय ने लोगों को झकझोर दिया। शुरुआत में लोग डर के कारण शराब से दूर रहने लगे, लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने इसके सकारात्मक परिणाम देखे, यह बदलाव उनकी आदत बन गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लगातार सात वर्षों तक चले इस अभियान ने आखिरकार सफलता दिलाई। 19 गांव पूरी तरह नशामुक्त हो गए। यह उपलब्धि केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक बन गई। गांवों में नियमित बैठकों का आयोजन जारी रहा जिससे लोगों को लगातार जागरूक किया जाता रहा। यह निरंतर प्रयास ही इस सफलता की असली ताकत बना।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नशा छोड़ने के बाद इन गांवों में सबसे बड़ा बदलाव सामाजिक सम्मान के रूप में देखने को मिला। जिन लोगों को पहले समाज में तिरस्कार झेलना पड़ता था, उन्हें अब सम्मान के साथ स्वीकार किया जाने लगा। शादी-ब्याह और अन्य सामाजिक कार्यक्रमों में उन्हें बुलाया जाने लगा। यह बदलाव उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक स्तर पर भी बड़ा परिवर्तन आया। पहले जो पैसा शराब में बर्बाद होता था, अब वही पैसा घर के सुधार, बच्चों की पढ़ाई और बचत में खर्च होने लगा। टूटे-फूटे घरों की जगह पक्के मकान बनने लगे। कई लोगों ने छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू किए। कोई किराना दुकान चलाने लगा तो कोई दूध बेचने लगा। इससे गांवों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बदलाव का सबसे सकारात्मक असर महिलाओं और बच्चों पर पड़ा। पहले महिलाएं आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान रहती थीं, लेकिन अब उनके जीवन में स्थिरता आई है। उनके हाथ में पैसे बचने लगे हैं और वे परिवार के निर्णयों में सक्रिय भूमिका निभाने लगी हैं। बच्चों को बेहतर शिक्षा मिलने लगी है। जो बच्चे पहले स्कूल नहीं जा पाते थे, अब वे शहरों में पढ़ाई कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरी कहानी का सबसे प्रेरणादायक पहलू यह है कि जो लोग कभी शराब के आदी थे, वही अब नशामुक्ति के सबसे बड़े प्रचारक बन गए हैं। उन्होंने अपनी गलतियों से सीख ली और अब वे दूसरों को उसी रास्ते पर चलने से रोकने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने टीम बनाकर आसपास के 20 गांवों में जागरूकता अभियान शुरू किया है। वे गांव-गांव जाकर लोगों को बताते हैं कि शराब किस तरह शरीर और परिवार को नुकसान पहुंचाती है और कैसे इससे बाहर निकलकर जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनकी बातों का असर इसलिए ज्यादा होता है क्योंकि वे खुद इस अनुभव से गुजर चुके हैं। वे लोगों को केवल सलाह नहीं देते बल्कि अपनी जीवन कहानी साझा करते हैं। यह सच्चाई लोगों को गहराई से प्रभावित करती है और उन्हें सोचने पर मजबूर करती है। आज यह पहल एक जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। लोग एक-दूसरे को प्रेरित कर रहे हैं और नशामुक्ति को अपनी जिम्मेदारी मान रहे हैं। यह सामूहिक जागरूकता ही इस सफलता की सबसे बड़ी वजह है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में नशे की समस्या एक गंभीर चुनौती है। हर साल हजारों लोग शराब और तंबाकू के कारण अपनी जान गंवाते हैं। इसके बावजूद लोग इस खतरे को नजरअंदाज करते रहते हैं। ऐसे में अमरावती के गांवों की यह पहल एक नई दिशा दिखाती है। यह साबित करती है कि अगर समाज जागरूक हो जाए और मिलकर प्रयास करे तो किसी भी बुराई को खत्म किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;">समझाइश और सख्ती का संतुलित मेल इस सफलता की कुंजी रहा है। केवल कानून से बदलाव संभव नहीं होता और केवल समझाने से भी हर बार परिणाम नहीं मिलता। जब दोनों का सही संतुलन बनाया जाता है तब स्थायी परिवर्तन संभव होता है। अमरावती के गांवों ने यही कर दिखाया है।</div>
<div style="text-align:justify;">आज जब ये गांव दूसरे गांवों को नशामुक्त करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं तो यह स्पष्ट है कि यह पहल केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगी। यह धीरे-धीरे एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकती है। अगर देश के अन्य हिस्सों में भी इसी तरह के प्रयास किए जाएं तो नशामुक्त भारत का सपना साकार हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;">अमरावती की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि बदलाव बाहर से नहीं बल्कि भीतर से आता है। जब समाज खुद अपने दोषों को पहचानकर उन्हें सुधारने का प्रयास करता है तो कोई भी समस्या बड़ी नहीं रहती। यह केवल नशामुक्ति की कहानी नहीं बल्कि आत्मसम्मान, एकता और बेहतर भविष्य की दिशा में उठाए गए मजबूत कदम की कहानी है।</div>
<div style="text-align:justify;">        <strong>*कांतिलाल मांडोत*</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 16:19:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>आग उगलती भीषण गर्मी में प्यासे कंठों की कौन सुने दास्तां</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के कई राज्यों में इस समय भीषण और भयावह गर्मी का प्रकोप जारी है। हर वर्ष तापमान अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए नई ऊंचाइयां छू रहा है। आसमान से बरसती आग ने मानो समस्त जीव-जंतुओं के कंठ सूखा दिए हैं। यह बढ़ती हुई भीषण गर्मी कहीं न कहीं मानव द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति-विनाश का परिणाम है। इसी के चलते जल के प्राकृतिक स्रोत समाप्त हो रहे हैं और भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जंगलों के अंधाधुंध विनाश के कारण अनेक प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे मूक वन्यजीवों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177391/who-will-listen-to-the-tales-of-thirsty-throats-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/download2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश के कई राज्यों में इस समय भीषण और भयावह गर्मी का प्रकोप जारी है। हर वर्ष तापमान अपने पुराने रिकॉर्ड तोड़ते हुए नई ऊंचाइयां छू रहा है। आसमान से बरसती आग ने मानो समस्त जीव-जंतुओं के कंठ सूखा दिए हैं। यह बढ़ती हुई भीषण गर्मी कहीं न कहीं मानव द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन और प्रकृति-विनाश का परिणाम है। इसी के चलते जल के प्राकृतिक स्रोत समाप्त हो रहे हैं और भूजल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जंगलों के अंधाधुंध विनाश के कारण अनेक प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे मूक वन्यजीवों के जीवन पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है। पानी प्रकृति के समस्त जीवों की मूलभूत और अनिवार्य आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन विडंबना यह है कि जब यही आवश्यकता पूरी नहीं हो पा रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जीवों के अस्तित्व पर संकट गहराना स्वाभाविक है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्वीकार करना होगा कि आजादी के साढ़े सात दशक बाद भी देश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को पेयजल के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में यह कल्पना करना कठिन नहीं कि वन्यजीव अपनी प्यास बुझाने के लिए कितनी कठिनाइयों का सामना करते होंगे। मानव जीवन के लिए शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने हेतु केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष अनेक प्रयास करती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी स्तर पर ये प्रयास अभी भी अपर्याप्त सिद्ध हो रहे हैं। विशेषकर सुदूर ग्रामीण अंचलों में पेयजल व्यवस्था को और सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए सरकार की ‘नल-जल योजना’ एक महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी पहल है। बावजूद इसके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई स्थानों पर जिला प्रशासन की उदासीनता के कारण इन योजनाओं का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। अनेक गाँवों में बनी पानी की टंकियाँ केवल दिखावा बनकर रह गई हैं। ये टंकियाँ प्यासे कंठों को राहत देने के बजाय व्यवस्था की खामियों का प्रतीक बनती जा रही हैं।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">पानी हर जीव की मूलभूत आवश्यकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और यदि इसी आवश्यकता की पूर्ति में कमी रह जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह न केवल गंभीर लापरवाही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अक्षम्य अपराध के समान है। भीषण गर्मी में जब लोग घर से बाहर निकलने से बचते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब ग्रामीण क्षेत्रों के लोग मीलों दूर से पानी लाने को विवश होते हैं। जल संकट के कारण मूक पशु-पक्षियों का जीवन बचाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति-विनाश के चलते बढ़ती गर्मी और अस्तित्व बचाने के लिए भटकते वन्यजीव—ये दोनों ही हमारी सामूहिक जिम्मेदारी हैं। ऐसे में सरकार और समाज को मिलकर सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के अंतिम छोर तक मानव और वन्य प्राणियों के लिए पेयजल की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी। यदि इस दिशा में ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ कार्य किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो देश के हर कोने में सभी जीवों के लिए पर्याप्त और सुरक्षित जल उपलब्ध कराया जा सकता है। अन्यथा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर वर्ष की भाँति आग उगलती गर्मी में प्यासे मूक प्राणियों की दास्तां अधूरी ही रह जाएगी।</span></p><p style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:28:37 +0530</pubDate>
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