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                <title>राज्यसभा सांसद - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>राज्यसभा सांसद RSS Feed</description>
                
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                <title>टूटती तृणमूल कांग्रेस और ममता: संगठनात्मक कमजोरी और जनविश्वास का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p>पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीन दशक से छाई तृणमूल कांग्रेस आज अंदरूनी दरारों और संगठनात्मक टूटन के दौर से गुजर रही है। 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चे को उखाड़ फेंकने वाली पार्टी अब खुद अपने ही वजन तले डगमगा रही दिखती है। तृणमूल की सबसे बड़ी समस्या बन गई है नेताओं की लगातार नाराजगी और दल-बदल। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी कई विधायक, सांसद और जिला स्तर के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों में चले गए। शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, राजीव बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं का जाना संगठन में भरोसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181935/disintegrating-trinamool-congress-and-mamta-organizational-weakness-and-crisis-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(4).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p>पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीन दशक से छाई तृणमूल कांग्रेस आज अंदरूनी दरारों और संगठनात्मक टूटन के दौर से गुजर रही है। 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चे को उखाड़ फेंकने वाली पार्टी अब खुद अपने ही वजन तले डगमगा रही दिखती है। तृणमूल की सबसे बड़ी समस्या बन गई है नेताओं की लगातार नाराजगी और दल-बदल। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी कई विधायक, सांसद और जिला स्तर के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों में चले गए। शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, राजीव बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं का जाना संगठन में भरोसे की कमी को दर्शाता है। नीचे के स्तर पर भी ब्लॉक और पंचायत स्तर पर गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है।</p>
<p><br />नियोग, कोयला, गोरू तस्करी और राशन घोटाले जैसे मामलों में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के नाम सामने आए। ED और CBI की कार्रवाई ने संगठन की साख को नुकसान पहुंचाया। आम लोगों में यह धारणा मजबूत हुई है कि सत्ता के साथ भ्रष्टाचार भी जड़ें जमा चुका है। इससे जमीनी कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं और मतदाता का एक हिस्सा विकल्प तलाश रहा है।<br />                  टीएमसी आज भी पूरी तरह ममता बनर्जी के व्यक्तित्व पर टिकी है। पार्टी का ढांचा संस्थागत कम, परिवार और करीबी नेताओं के इर्द-गिर्द ज्यादा केंद्रित है। अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद ने भी पुराने नेताओं में असहजता पैदा की है। जब कोई संगठन एक व्यक्ति पर निर्भर हो जाता है, तो उस व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और राजनीतिक रणनीति ही पार्टी का भविष्य तय करने लगती है। फिलहाल ताजा खबर यह है कि टीएमसी एक और बड़ी टूट की कगार पर खड़ी है और यह निश्चित हो गया है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब टीएमसी को उभरने का मौका शायद ही मिल सके। कल सोमवार को नई दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में ममता बनर्जी उपस्थित नज़र आईं तो वहीं दावा है कि उनकी पार्टी के 20 सांसदो ने बगावत कर दी है। सूचना है कि पार्टी के कई सांसद भाजपा नेताओं से मिलकर बगावत की रणनीति बना रहे थे।</p>
<p>केन्द्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर सोमवार को ही टीएमसी के कई सांसदों ने मुलाकात के बाद अलग गुट बनाने का दावा किया है। पता चला है कि इस बैठक में टीएमसी के पांच सांसद मौजूद रहे। इनमें शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी, जगदीश बसुनिया, कालिपद सोरेन व अनूप चक्रवर्ती शामिल हैं। टीएमसी के लोकसभा में 28 व राज्यसभा में 12 सांसद हैं। सूत्र बताते हैं कि बागी सांसदों ने रविवार को एक बैठक की थी, और उसी वक्त अलग गुट बनाने का ऐलान कर टीएमसी को झटका दिया जाने पर विचार हुआ है।</p>
<p>जब विधायक दल में टूट हुई थी तो सांसदों के बग़ावत की चर्चाओं ने तूल पकड़ लिया था। ऐसा बताया जा रहा है कि बाग़ी सांसद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के भी संपर्क में हैं और बहुत ही जल्द एक नये गुट का ऐलान हो सकता है। टीएमसी की सांसद काकोली घोष ने दावा किया है कि बागी सांसदों ने एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है और लोकसभा स्पीकर को अपने फैसले से अवगत करा दिया है। कोई भी पार्टी जब चुनाव हारती है तब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है</p>
<p>अपनी पार्टी को टूट से बचाने की क्यों कि हर कोई सत्ता के लड्डू खाना चाहता है, बेकार में विपक्ष में अब कोई बैठना नहीं चाहता है। इसके लिए केंद्र में कांग्रेस में टूट, दिल्ली में आप में टूट उत्तर प्रदेश में सपा में टूट और महाराष्ट्र का उदाहरण देखा जा सकता है। यही संकट अब इस समय टीएमसी के ऊपर मंडरा रहा है। अब देखना यह है कि ममता बनर्जी अपनी पार्टी को टूटने से कितना बचा पातीं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:45:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रयागराज में पेपर लीक मुद्दे पर छात्रों से संवाद के दौरान हंगामा, सांसद संजय सिंह और एडीएम सिटी में नोंकझोंक।</title>
                                    <description><![CDATA[<p><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>स्वतंत्र प्रभात रिपोर्ट सरस सिंह </strong></span></p>
<p>प्रयागराज। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद एवं उत्तर प्रदेश प्रभारी संजय सिंह के प्रयागराज दौरे के दौरान सर्किट हाउस सभागार में उस समय हंगामे की स्थिति उत्पन्न हो गई, जब पेपर लीक और प्रतियोगी छात्रों की समस्याओं को लेकर आयोजित संवाद कार्यक्रम को प्रशासन ने बिना अनुमति आयोजित होने का हवाला देते हुए रोकने का प्रयास किया। इस दौरान सांसद संजय सिंह और एडीएम सिटी के बीच तीखी नोंकझोंक भी देखने को मिली।</p>
<p>जानकारी के अनुसार, राज्यसभा सांसद संजय सिंह  प्रयागराज पहुंचे थे। यहां उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180479/uproar-during-interaction-with-students-on-paper-leak-issue-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260601-wa0238.jpg" alt=""></a><br /><p><span style="color:rgb(224,62,45);"><strong>स्वतंत्र प्रभात रिपोर्ट सरस सिंह </strong></span></p>
<p>प्रयागराज। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद एवं उत्तर प्रदेश प्रभारी संजय सिंह के प्रयागराज दौरे के दौरान सर्किट हाउस सभागार में उस समय हंगामे की स्थिति उत्पन्न हो गई, जब पेपर लीक और प्रतियोगी छात्रों की समस्याओं को लेकर आयोजित संवाद कार्यक्रम को प्रशासन ने बिना अनुमति आयोजित होने का हवाला देते हुए रोकने का प्रयास किया। इस दौरान सांसद संजय सिंह और एडीएम सिटी के बीच तीखी नोंकझोंक भी देखने को मिली।</p>
<p>जानकारी के अनुसार, राज्यसभा सांसद संजय सिंह  प्रयागराज पहुंचे थे। यहां उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामलों, भर्ती प्रक्रियाओं में हो रही देरी तथा छात्रों की विभिन्न समस्याओं को लेकर प्रतियोगी छात्रों से संवाद कार्यक्रम आयोजित किया था। यह कार्यक्रम सर्किट हाउस सभागार में प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले रखा गया था।</p>
<p>कार्यक्रम शुरू होने से पहले मौके पर पहुंचे एडीएम सिटी सत्यम मिश्रा तथा डीसीपी सिटी मनीष कुमार शांडिल्य ने आयोजकों से कार्यक्रम की अनुमति संबंधी जानकारी मांगी। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना था कि सर्किट हाउस परिसर में इस प्रकार के सार्वजनिक संवाद कार्यक्रम के लिए पूर्व अनुमति आवश्यक है। इसी बात को लेकर अधिकारियों और सांसद संजय सिंह के बीच बहस शुरू हो गई।</p>
<p>प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुछ समय तक दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक होती रही। सांसद संजय सिंह ने प्रशासन पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगाया, जबकि अधिकारियों ने नियमों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का पालन कराने की बात कही। इस घटनाक्रम के दौरान सभागार में मौजूद छात्रों और समर्थकों में भी हलचल का माहौल बना रहा।</p>
<p>हालांकि विवाद के बावजूद कार्यक्रम आयोजित हुआ और सांसद संजय सिंह ने प्रतियोगी छात्रों से विस्तार से बातचीत की। छात्रों ने भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, पेपर लीक की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई, लंबित भर्तियों को जल्द पूरा करने तथा युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। सांसद ने छात्रों की समस्याओं को संसद और सरकार के समक्ष उठाने का आश्वासन दिया।</p>
<p>इस अवसर पर कांग्रेस के पूर्व विधायक अनुग्रह नारायण सिंह तथा हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के के राय भी मौजूद रहे। उन्होंने भी छात्रों की मांगों का समर्थन करते हुए निष्पक्ष एवं पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया की आवश्यकता पर बल दिया।</p>
<p>कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में प्रतियोगी छात्र उपस्थित रहे। छात्रों ने कहा कि लगातार हो रहे पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं से युवाओं का भविष्य प्रभावित हो रहा है। उन्होंने सरकार से दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई और भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार की मांग की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 20:06:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[दया शंकर त्रिपाठी ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों की सदस्यता रद्द होगी? आप का बड़ा दावा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> क्या राघव चड्ढा समेत उन सभी 7 सांसदों की सदस्यता रद्द होगी जिन्होंने आम आदमी पार्टी छोड़कर खुद को बीजेपी में विलय कर लिया है? कम से कम आम आदमी पार्टी ने तो यही दावा करते हुए राज्यसभा चेयरमैन से लिखित में अनुरोध किया है कि इन सभी सातों सदस्यों की सदस्यता रद्द की जाए। इसने कहा है कि संविधान के विशेषज्ञों का यही कहना है और संविधान की 10वीं अनुसूची में भी ऐसा ही लिखा है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आप के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने इस मामले में रविवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस की। इसमें उन्होंने कहा, 'संविधान के कई</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177431/aaps-big-claim-is-that-membership-of-7-mps-including"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(1)13.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> क्या राघव चड्ढा समेत उन सभी 7 सांसदों की सदस्यता रद्द होगी जिन्होंने आम आदमी पार्टी छोड़कर खुद को बीजेपी में विलय कर लिया है? कम से कम आम आदमी पार्टी ने तो यही दावा करते हुए राज्यसभा चेयरमैन से लिखित में अनुरोध किया है कि इन सभी सातों सदस्यों की सदस्यता रद्द की जाए। इसने कहा है कि संविधान के विशेषज्ञों का यही कहना है और संविधान की 10वीं अनुसूची में भी ऐसा ही लिखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आप के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने इस मामले में रविवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस की। इसमें उन्होंने कहा, 'संविधान के कई जानकारों, देश के वरिष्ठ अधिवक्ता व संविधान के विशेषज्ञ कपिल सिब्बल और पीडीटी आचार्य ने साफ़ कर दिया है कि आप को तोड़कर बीजेपी में विलय करने का फ़ैसला लेने वाले सात लोगों की सदस्यता ख़त्म होगी। ये बहुत साफ़ तौर पर है।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संजय सिंह ने कहा कि कपिल सिब्बल जैसे संविधान के जानकारों की राय लेकर राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति को एक याचिका भेजी है जिसमें संविधान की 10वीं अनुसूची के मुताबिक इन सातों सदस्यों की सदस्यता रद्द की जाए, इसके बारे में अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि सभापति महोदय से मांग की है कि इसकी जल्द से जल्द सुनवाई करके अपनी ओर से न्यायपूर्ण फैसला दें। संविधान की 10वीं अनुसूची में भी साफ़ तौर पर लिखा गया है कि इस तरह की किसी भी तोड़फोड़ की इजाजत भारत का संविधान नहीं देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आप के पूर्व राज्‍यसभा उपनेता राघव चड्ढा ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐलान किया कि पार्टी के 10 में से 7 राज्‍यसभा सांसद पार्टी छोड़ रहे हैं और बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि यह संख्या दो-तिहाई से ज्यादा है, इसलिए वे एंटी-डिफेक्शन कानून यानी दलबदल विरोधी कानून से बच सकते हैं।बागी सांसदों में राघव चड्ढा के अलावा अशोक मित्तल, संदीप पाठक, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी, हरभजन सिंह और स्वाति मालीवाल हैं। इनमें से राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक शुक्रवार को ही बीजेपी में शामिल हो गए। स्वाति मालीवाल ने शनिवार को बीजेपी जॉइन करने की पुष्टि की।आप के इन सात सांसदों की बगावत के बाद अब आप के पास राज्‍यसभा में सिर्फ 3 सांसद बचे हैं- संजय सिंह, एनडी गुप्ता और बलवीर सिंह सीचेवाल।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन सात सांसदों की बगावत पर आप के वरिष्ठ नेता और राज्‍यसभा सांसद संजय सिंह ने पहले ही कहा था, 'यह गैरकानूनी, गलत, असंवैधानिक और संसदीय नियमों के खिलाफ है। हम इनकी पूरी सदस्यता समाप्त करने की मांग करेंगे।'संजय सिंह ने कहा है कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने का समय मांग रहे हैं और वे पंजाब से चुने गए 6 बागी सांसदों को वापस बुलाने की मांग करेंगे। हालांकि, संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।वरिष्ठ वकील और संविधान के विशेषज्ञ कपिल सिब्बल ने एचटी से कहा कि पार्टी खुद पहले मर्जर का फैसला नहीं ले ले तब तक कोई भी खुद से मर्जर नहीं कर सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पार्टी स्तर पर रेजॉल्यूशन पास करना ज़रूरी है। पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचार्य ने एचटी से कहा कि ये 7 सांसद अयोग्यता से बच नहीं सकते। हालाँकि, सांसदों को वापस बुलाने यानी हटाने के अधिकार पर पूर्व पंजाब एडवोकेट जनरल अशोक अग्रवाल ने साफ़ किया कि 'राइट टू रिकॉल' यानी वोटर द्वारा सांसद को बीच में हटाने का अधिकार संविधान में कहीं नहीं है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:32:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आप में सियासी भूचाल दलबदल कानून के घेरे में 7 राज्यसभा सांसदों का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है जिसने संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी है। आम आदमी पार्टी में आई इस बड़ी टूट ने न केवल पार्टी के आंतरिक हालात को उजागर किया है बल्कि दलबदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता और उसकी सीमाओं पर भी नई बहस छेड़ दी है। राज्यसभा के कई सांसदों द्वारा पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा के बाद अब यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या ये सांसद अपनी सदस्यता बनाए रख पाएंगे या उन्हें अयोग्य घोषित किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177385/political-turmoil-in-aap-future-of-7-rajya-sabha-mps"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/indian-politics-defection-crisis-jaychand-mirjafar-analysis.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है जिसने संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी है। आम आदमी पार्टी में आई इस बड़ी टूट ने न केवल पार्टी के आंतरिक हालात को उजागर किया है बल्कि दलबदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता और उसकी सीमाओं पर भी नई बहस छेड़ दी है। राज्यसभा के कई सांसदों द्वारा पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा के बाद अब यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या ये सांसद अपनी सदस्यता बनाए रख पाएंगे या उन्हें अयोग्य घोषित किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे मामले के केंद्र में हैं राघव चड्ढा जिनके साथ कई अन्य सांसदों ने भी पार्टी छोड़ने का दावा किया है। इनके साथ संदीप पाठक अशोक मित्तल विक्रम साहनी हरभजन सिंह स्वाति मालीवाल और नरेंद्र गुप्ता जैसे नामों का भी उल्लेख किया जा रहा है। इन सभी के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने आम आदमी पार्टी से अलग होकर भाजपा का रुख किया है। इस दावे ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गरमा दिया है।</div>
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<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर संजय सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन को याचिका सौंपकर इन सात सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की है। उनका कहना है कि इन सांसदों ने संविधान की दसवीं अनुसूची का स्पष्ट उल्लंघन किया है जो दलबदल को रोकने के लिए बनाई गई थी।</div>
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<div style="text-align:justify;">भारत में दलबदल विरोधी कानून जिसे दसवीं अनुसूची के नाम से जाना जाता है वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दलों में स्थिरता बनाए रखना और निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए पार्टी बदलने की प्रवृत्ति को रोकना था। इस कानून के तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">इस कानून में एक और महत्वपूर्ण प्रावधान है जो पार्टी व्हिप से जुड़ा हुआ है। यदि कोई सांसद सदन में अपनी पार्टी के निर्देशों के खिलाफ वोट करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है तो भी उसे अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है। इस नियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पार्टी अनुशासन बना रहे और सरकार या विपक्ष की रणनीति प्रभावित न हो।</div>
<div style="text-align:justify;">निर्दलीय सदस्यों के लिए भी इस कानून में स्पष्ट नियम हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है तो उसे तुरंत अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि मतदाता जिस स्वतंत्र उम्मीदवार को चुनते हैं वह बाद में किसी दल का हिस्सा बनकर उनकी अपेक्षाओं के साथ समझौता न करे।</div>
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<div style="text-align:justify;">हालांकि इस कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है जिसे विलय का प्रावधान कहा जाता है। इसके अनुसार यदि किसी दल के दो तिहाई या उससे अधिक सदस्य एक साथ किसी अन्य दल में शामिल हो जाते हैं तो इसे दलबदल नहीं बल्कि वैध विलय माना जाता है और ऐसे सदस्यों को अयोग्यता से छूट मिल जाती है। यही वह बिंदु है जिस पर इस पूरे मामले का भविष्य काफी हद तक निर्भर करेगा।</div>
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<div style="text-align:justify;">अब सवाल यह है कि क्या आम आदमी पार्टी के इन सांसदों की संख्या दो तिहाई के आंकड़े तक पहुंचती है या नहीं। यदि यह संख्या पूरी होती है तो ये सांसद अपनी सदस्यता बचा सकते हैं अन्यथा इन्हें अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि दोनों पक्ष अपने अपने दावे कर रहे हैं और राजनीतिक गणित तेजी से बदल रहा है।इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार राज्यसभा के सभापति के पास होता है। वर्तमान में यह जिम्मेदारी उपराष्ट्रपति के पास है जो इस मामले की सुनवाई करेंगे और तथ्यों के आधार पर फैसला देंगे। उनका निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण होगा क्योंकि वही तय करेगा कि संबंधित सांसद संसद में बने रहेंगे या नहीं।</div>
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<div style="text-align:justify;">हालांकि यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सभापति का निर्णय अंतिम होने के बावजूद न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि दलबदल से जुड़े मामलों में सभापति के फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। इसका मतलब है कि यदि किसी पक्ष को निर्णय से असंतोष होता है तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक पार्टी तक सीमित नहीं है बल्कि इसका प्रभाव पूरे देश की राजनीति पर पड़ेगा। यदि बड़ी संख्या में सांसद दलबदल कर बिना अयोग्यता के बच जाते हैं तो यह अन्य दलों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। वहीं यदि कड़ी कार्रवाई होती है तो यह संदेश जाएगा कि दलबदल कानून अभी भी प्रभावी है और उसका उल्लंघन करने पर सख्त परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दलबदल विरोधी कानून अपने उद्देश्य को पूरी तरह से पूरा कर पा रहा है या इसमें सुधार की आवश्यकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून का उपयोग कई बार राजनीतिक हथियार के रूप में भी किया जाता है जिससे विधायकों और सांसदों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति प्रभावित होती है। वहीं दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जाता है कि यदि यह कानून न हो तो राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है और सरकारें गिरने का खतरा बना रह सकता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच यह टकराव आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। दोनों पक्ष अपने अपने तर्कों के साथ जनता और संवैधानिक संस्थाओं के सामने अपनी बात रखेंगे। इस पूरे मामले पर देश की नजर बनी हुई है क्योंकि यह केवल सात सांसदों का मुद्दा नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती से जुड़ा हुआ प्रश्न है।</div>
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<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि दलबदल कानून भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि इसका उपयोग निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो ताकि लोकतंत्र की मूल भावना बनी रहे। आने वाले समय में सभापति का निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत देगा और यह तय करेगा कि राजनीति में दल बदल की प्रवृत्ति पर कितना नियंत्रण संभव है।</div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:18:42 +0530</pubDate>
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