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                <title>Tenth Schedule - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Tenth Schedule RSS Feed</description>
                
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                <title>पार्टियों की टूट व टूटता भरोसा: लोकतंत्र में सबसे बड़ा नुकसान यही है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181509/the-biggest-loss-in-democracy-is-the-breakdown-of-parties"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया जाता है - "सिद्धांतों से समझौता", "जनता के हित में फैसला"। लेकिन नतीजा एक ही निकलता है - वोटर का भरोसा टूटना।</p><p style="text-align:justify;"><br />टूट क्यों रही हैं पार्टियां? इस पर हमारी सोच वही है जो लगभग सभी की होती है। सत्ता और पद का गणित- पार्टी टूटने का 80% कारण विधायकों और सांसदों की टिकट और मंत्री पद की भूख है। जब हाईकमान टिकट काटता है या किसी और को आगे बढ़ाता है, तो नाराज नेता दूसरी पार्टी या नई पार्टी बना लेते हैं। परिवारवाद और हाईकमान कल्चर-<br />कई क्षेत्रीय पार्टियां एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जब दूसरी पीढ़ी तैयार होती है, तो पुराने नेता खुद को साइडलाइन महसूस करते हैं और बगावत करते हैं।</p><p style="text-align:justify;"><br />विचारधारा का कमजोर होना- पहले पार्टियों की पहचान किसी विचारधारा से होती थी। अब ज्यादातर पार्टियां "पावर ब्लॉक" बन गई हैं। विचारधारा बदलते देर नहीं लगती, क्योंकि एजेंडा सत्ता है। वोटर का भरोसा कैसे टूटता है?- जब तुमने 2019 में किसी पार्टी को वोट दिया था, तुमने उसके घोषणापत्र, नेता और विचारधारा पर भरोसा किया था। 2023 में वही विधायक दूसरी पार्टी में चला जाए और 2024 में तीसरी पार्टी में, तो सवाल उठता है। मैंने वोट किसको दिया था? व्यक्ति को, सिंबल को, या पार्टी को?</p><p style="text-align:justify;"><br />क्या मेरा वोट मायने रखता है? अगर चुनाव के बाद गठबंधन बदल जाए तो जनादेश का मतलब क्या रहा? सब एक जैसे हैं- ये सनक नहीं, टूटे भरोसे की उपज है। 2023 के कर्नाटक और महाराष्ट्र चुनाव के बाद CSDS के सर्वे में 47% लोगों ने कहा कि "दलबदल से लोकतंत्र कमजोर होता है"। इसका असर कहां दिखता है? चुनावी राजनीति पर- लोग अब स्थानीय उम्मीदवार देखने लगे हैं, पार्टी नहीं। "पार्टी कोई भी हो, मेरा काम करे" वाला ट्रेंड बढ़ रहा है। नीति निर्माण पर- सरकारें अस्थिर हो जाती हैं। 5 साल का प्लान 2 साल में बदल जाता है क्योंकि गठबंधन बदल गया। युवा राजनीति से दूर हो रहे हैं- कॉलेज चुनावों में भी भागीदारी घट रही है। युवाओं को लगता है कि राजनीति सिर्फ सौदेबाजी है। नोटा का बढ़ना- 2019 के बाद से कई सीटों पर नोटा को मिले वोट 2-3% तक पहुंच गए हैं। ये विरोध का साइलेंट तरीका है।</p><p style="text-align:justify;"><br />               दलबदल कानून कहां फेल हुआ?- 1985 में 52वां संविधान संशोधन लाकर दलबदल विरोधी कानून बनाया गया। मकसद था कि विधायक पार्टी न बदलें। लेकिन कानून में एक खामी छोड़ दी गई - अगर 2/3 विधायक साथ छोड़ दें तो वो "विलय" कहलाता है और अयोग्यता नहीं लगती। इसी खामी का फायदा लेकर महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश में सरकारें गिरीं। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि स्पीकर का फैसला समय पर नहीं आता, जिससे कानून का मकसद ही खत्म हो जाता है। क्या हो सकता है समाधान?- 2/3 वाली छूट हटाओ- अगर पार्टी टूटती है तो सबको अयोग्य ठहराओ। फिर जनता के पास जाओ और दोबारा चुनाव लड़ो।</p><p style="text-align:justify;"><br />फंडिंग में पारदर्शिता-  चुनाव आयोग को हर लेन-देन का हिसाब मिले ताकि नेताओं को खरीद-फरोख्त न हो सके। आंतरिक लोकतंत्र-  पार्टियों में चुनाव हों, युवा और कार्यकर्ताओं की सुनवाई हो। जब अंदर लोकतंत्र होगा तो बाहर टूट कम होगी। वोटर एजुकेशन-  लोगों को समझाना होगा कि वोट सिंबल को जाता है, व्यक्ति को नहीं। ये बात स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई जाए। स्थानीय मुद्दों पर वोट-  लोग अब पानी, सड़क, स्कूल को देखकर वोट कर रहे हैं, न कि बड़े नेता के नाम पर। सोशल मीडिया पर जवाबदेही- विधायक अगर पाला बदलता है तो अगले 6 महीने तक ट्रोल होता है। ये डर कुछ हद तक काम कर रहा है। नए विकल्प की तलाश AAP जैसे दल इसी भरोसे के संकट से पैदा हुए। पार्टियों का टूटना लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन जब हर 2 साल में गठबंधन और दल बदल जाएं, तो जनता को लगता है कि उसका वोट सिर्फ सत्ता का सीढ़ी है।</p><p style="text-align:justify;"><br />लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है, ये भरोसे का कॉन्ट्रैक्ट है। जब पार्टियां उस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ती हैं, तो नुकसान वोटर को होता है। और एक बार भरोसा टूट जाए, तो उसे दोबारा जोड़ने में 10 साल लग जाते हैं।<br />अगली बार जब कोई नेता पाला बदले, तो सवाल पूछो: "तुम पार्टी बदले, मेरी समस्या बदली क्या?"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 20:39:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों की सदस्यता रद्द होगी? आप का बड़ा दावा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> क्या राघव चड्ढा समेत उन सभी 7 सांसदों की सदस्यता रद्द होगी जिन्होंने आम आदमी पार्टी छोड़कर खुद को बीजेपी में विलय कर लिया है? कम से कम आम आदमी पार्टी ने तो यही दावा करते हुए राज्यसभा चेयरमैन से लिखित में अनुरोध किया है कि इन सभी सातों सदस्यों की सदस्यता रद्द की जाए। इसने कहा है कि संविधान के विशेषज्ञों का यही कहना है और संविधान की 10वीं अनुसूची में भी ऐसा ही लिखा है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आप के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने इस मामले में रविवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस की। इसमें उन्होंने कहा, 'संविधान के कई</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177431/aaps-big-claim-is-that-membership-of-7-mps-including"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(1)13.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> क्या राघव चड्ढा समेत उन सभी 7 सांसदों की सदस्यता रद्द होगी जिन्होंने आम आदमी पार्टी छोड़कर खुद को बीजेपी में विलय कर लिया है? कम से कम आम आदमी पार्टी ने तो यही दावा करते हुए राज्यसभा चेयरमैन से लिखित में अनुरोध किया है कि इन सभी सातों सदस्यों की सदस्यता रद्द की जाए। इसने कहा है कि संविधान के विशेषज्ञों का यही कहना है और संविधान की 10वीं अनुसूची में भी ऐसा ही लिखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आप के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने इस मामले में रविवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस की। इसमें उन्होंने कहा, 'संविधान के कई जानकारों, देश के वरिष्ठ अधिवक्ता व संविधान के विशेषज्ञ कपिल सिब्बल और पीडीटी आचार्य ने साफ़ कर दिया है कि आप को तोड़कर बीजेपी में विलय करने का फ़ैसला लेने वाले सात लोगों की सदस्यता ख़त्म होगी। ये बहुत साफ़ तौर पर है।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संजय सिंह ने कहा कि कपिल सिब्बल जैसे संविधान के जानकारों की राय लेकर राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति को एक याचिका भेजी है जिसमें संविधान की 10वीं अनुसूची के मुताबिक इन सातों सदस्यों की सदस्यता रद्द की जाए, इसके बारे में अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि सभापति महोदय से मांग की है कि इसकी जल्द से जल्द सुनवाई करके अपनी ओर से न्यायपूर्ण फैसला दें। संविधान की 10वीं अनुसूची में भी साफ़ तौर पर लिखा गया है कि इस तरह की किसी भी तोड़फोड़ की इजाजत भारत का संविधान नहीं देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आप के पूर्व राज्‍यसभा उपनेता राघव चड्ढा ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐलान किया कि पार्टी के 10 में से 7 राज्‍यसभा सांसद पार्टी छोड़ रहे हैं और बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि यह संख्या दो-तिहाई से ज्यादा है, इसलिए वे एंटी-डिफेक्शन कानून यानी दलबदल विरोधी कानून से बच सकते हैं।बागी सांसदों में राघव चड्ढा के अलावा अशोक मित्तल, संदीप पाठक, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी, हरभजन सिंह और स्वाति मालीवाल हैं। इनमें से राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक शुक्रवार को ही बीजेपी में शामिल हो गए। स्वाति मालीवाल ने शनिवार को बीजेपी जॉइन करने की पुष्टि की।आप के इन सात सांसदों की बगावत के बाद अब आप के पास राज्‍यसभा में सिर्फ 3 सांसद बचे हैं- संजय सिंह, एनडी गुप्ता और बलवीर सिंह सीचेवाल।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन सात सांसदों की बगावत पर आप के वरिष्ठ नेता और राज्‍यसभा सांसद संजय सिंह ने पहले ही कहा था, 'यह गैरकानूनी, गलत, असंवैधानिक और संसदीय नियमों के खिलाफ है। हम इनकी पूरी सदस्यता समाप्त करने की मांग करेंगे।'संजय सिंह ने कहा है कि पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने का समय मांग रहे हैं और वे पंजाब से चुने गए 6 बागी सांसदों को वापस बुलाने की मांग करेंगे। हालांकि, संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।वरिष्ठ वकील और संविधान के विशेषज्ञ कपिल सिब्बल ने एचटी से कहा कि पार्टी खुद पहले मर्जर का फैसला नहीं ले ले तब तक कोई भी खुद से मर्जर नहीं कर सकता।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पार्टी स्तर पर रेजॉल्यूशन पास करना ज़रूरी है। पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचार्य ने एचटी से कहा कि ये 7 सांसद अयोग्यता से बच नहीं सकते। हालाँकि, सांसदों को वापस बुलाने यानी हटाने के अधिकार पर पूर्व पंजाब एडवोकेट जनरल अशोक अग्रवाल ने साफ़ किया कि 'राइट टू रिकॉल' यानी वोटर द्वारा सांसद को बीच में हटाने का अधिकार संविधान में कहीं नहीं है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 18:32:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आप में सियासी भूचाल दलबदल कानून के घेरे में 7 राज्यसभा सांसदों का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है जिसने संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी है। आम आदमी पार्टी में आई इस बड़ी टूट ने न केवल पार्टी के आंतरिक हालात को उजागर किया है बल्कि दलबदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता और उसकी सीमाओं पर भी नई बहस छेड़ दी है। राज्यसभा के कई सांसदों द्वारा पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा के बाद अब यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या ये सांसद अपनी सदस्यता बनाए रख पाएंगे या उन्हें अयोग्य घोषित किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177385/political-turmoil-in-aap-future-of-7-rajya-sabha-mps"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/indian-politics-defection-crisis-jaychand-mirjafar-analysis.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है जिसने संसद से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हलचल मचा दी है। आम आदमी पार्टी में आई इस बड़ी टूट ने न केवल पार्टी के आंतरिक हालात को उजागर किया है बल्कि दलबदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता और उसकी सीमाओं पर भी नई बहस छेड़ दी है। राज्यसभा के कई सांसदों द्वारा पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की घोषणा के बाद अब यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या ये सांसद अपनी सदस्यता बनाए रख पाएंगे या उन्हें अयोग्य घोषित किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे मामले के केंद्र में हैं राघव चड्ढा जिनके साथ कई अन्य सांसदों ने भी पार्टी छोड़ने का दावा किया है। इनके साथ संदीप पाठक अशोक मित्तल विक्रम साहनी हरभजन सिंह स्वाति मालीवाल और नरेंद्र गुप्ता जैसे नामों का भी उल्लेख किया जा रहा है। इन सभी के बारे में कहा जा रहा है कि उन्होंने आम आदमी पार्टी से अलग होकर भाजपा का रुख किया है। इस दावे ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गरमा दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर संजय सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने राज्यसभा के सभापति और देश के उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन को याचिका सौंपकर इन सात सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की है। उनका कहना है कि इन सांसदों ने संविधान की दसवीं अनुसूची का स्पष्ट उल्लंघन किया है जो दलबदल को रोकने के लिए बनाई गई थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में दलबदल विरोधी कानून जिसे दसवीं अनुसूची के नाम से जाना जाता है वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए लागू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दलों में स्थिरता बनाए रखना और निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए पार्टी बदलने की प्रवृत्ति को रोकना था। इस कानून के तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस कानून में एक और महत्वपूर्ण प्रावधान है जो पार्टी व्हिप से जुड़ा हुआ है। यदि कोई सांसद सदन में अपनी पार्टी के निर्देशों के खिलाफ वोट करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है तो भी उसे अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है। इस नियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पार्टी अनुशासन बना रहे और सरकार या विपक्ष की रणनीति प्रभावित न हो।</div>
<div style="text-align:justify;">निर्दलीय सदस्यों के लिए भी इस कानून में स्पष्ट नियम हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि कोई निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है तो उसे तुरंत अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इससे यह सुनिश्चित किया जाता है कि मतदाता जिस स्वतंत्र उम्मीदवार को चुनते हैं वह बाद में किसी दल का हिस्सा बनकर उनकी अपेक्षाओं के साथ समझौता न करे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इस कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी है जिसे विलय का प्रावधान कहा जाता है। इसके अनुसार यदि किसी दल के दो तिहाई या उससे अधिक सदस्य एक साथ किसी अन्य दल में शामिल हो जाते हैं तो इसे दलबदल नहीं बल्कि वैध विलय माना जाता है और ऐसे सदस्यों को अयोग्यता से छूट मिल जाती है। यही वह बिंदु है जिस पर इस पूरे मामले का भविष्य काफी हद तक निर्भर करेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सवाल यह है कि क्या आम आदमी पार्टी के इन सांसदों की संख्या दो तिहाई के आंकड़े तक पहुंचती है या नहीं। यदि यह संख्या पूरी होती है तो ये सांसद अपनी सदस्यता बचा सकते हैं अन्यथा इन्हें अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि दोनों पक्ष अपने अपने दावे कर रहे हैं और राजनीतिक गणित तेजी से बदल रहा है।इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार राज्यसभा के सभापति के पास होता है। वर्तमान में यह जिम्मेदारी उपराष्ट्रपति के पास है जो इस मामले की सुनवाई करेंगे और तथ्यों के आधार पर फैसला देंगे। उनका निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण होगा क्योंकि वही तय करेगा कि संबंधित सांसद संसद में बने रहेंगे या नहीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि यह भी ध्यान देने वाली बात है कि सभापति का निर्णय अंतिम होने के बावजूद न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि दलबदल से जुड़े मामलों में सभापति के फैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। इसका मतलब है कि यदि किसी पक्ष को निर्णय से असंतोष होता है तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक पार्टी तक सीमित नहीं है बल्कि इसका प्रभाव पूरे देश की राजनीति पर पड़ेगा। यदि बड़ी संख्या में सांसद दलबदल कर बिना अयोग्यता के बच जाते हैं तो यह अन्य दलों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। वहीं यदि कड़ी कार्रवाई होती है तो यह संदेश जाएगा कि दलबदल कानून अभी भी प्रभावी है और उसका उल्लंघन करने पर सख्त परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दलबदल विरोधी कानून अपने उद्देश्य को पूरी तरह से पूरा कर पा रहा है या इसमें सुधार की आवश्यकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस कानून का उपयोग कई बार राजनीतिक हथियार के रूप में भी किया जाता है जिससे विधायकों और सांसदों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति प्रभावित होती है। वहीं दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जाता है कि यदि यह कानून न हो तो राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है और सरकारें गिरने का खतरा बना रह सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच यह टकराव आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। दोनों पक्ष अपने अपने तर्कों के साथ जनता और संवैधानिक संस्थाओं के सामने अपनी बात रखेंगे। इस पूरे मामले पर देश की नजर बनी हुई है क्योंकि यह केवल सात सांसदों का मुद्दा नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती से जुड़ा हुआ प्रश्न है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि दलबदल कानून भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि इसका उपयोग निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो ताकि लोकतंत्र की मूल भावना बनी रहे। आने वाले समय में सभापति का निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत देगा और यह तय करेगा कि राजनीति में दल बदल की प्रवृत्ति पर कितना नियंत्रण संभव है।</div>
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<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 17:18:42 +0530</pubDate>
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