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                <title>Public Trust - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Public Trust RSS Feed</description>
                
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                <title>पार्टियों की टूट व टूटता भरोसा: लोकतंत्र में सबसे बड़ा नुकसान यही है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181509/the-biggest-loss-in-democracy-is-the-breakdown-of-parties"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया जाता है - "सिद्धांतों से समझौता", "जनता के हित में फैसला"। लेकिन नतीजा एक ही निकलता है - वोटर का भरोसा टूटना।</p><p style="text-align:justify;"><br />टूट क्यों रही हैं पार्टियां? इस पर हमारी सोच वही है जो लगभग सभी की होती है। सत्ता और पद का गणित- पार्टी टूटने का 80% कारण विधायकों और सांसदों की टिकट और मंत्री पद की भूख है। जब हाईकमान टिकट काटता है या किसी और को आगे बढ़ाता है, तो नाराज नेता दूसरी पार्टी या नई पार्टी बना लेते हैं। परिवारवाद और हाईकमान कल्चर-<br />कई क्षेत्रीय पार्टियां एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जब दूसरी पीढ़ी तैयार होती है, तो पुराने नेता खुद को साइडलाइन महसूस करते हैं और बगावत करते हैं।</p><p style="text-align:justify;"><br />विचारधारा का कमजोर होना- पहले पार्टियों की पहचान किसी विचारधारा से होती थी। अब ज्यादातर पार्टियां "पावर ब्लॉक" बन गई हैं। विचारधारा बदलते देर नहीं लगती, क्योंकि एजेंडा सत्ता है। वोटर का भरोसा कैसे टूटता है?- जब तुमने 2019 में किसी पार्टी को वोट दिया था, तुमने उसके घोषणापत्र, नेता और विचारधारा पर भरोसा किया था। 2023 में वही विधायक दूसरी पार्टी में चला जाए और 2024 में तीसरी पार्टी में, तो सवाल उठता है। मैंने वोट किसको दिया था? व्यक्ति को, सिंबल को, या पार्टी को?</p><p style="text-align:justify;"><br />क्या मेरा वोट मायने रखता है? अगर चुनाव के बाद गठबंधन बदल जाए तो जनादेश का मतलब क्या रहा? सब एक जैसे हैं- ये सनक नहीं, टूटे भरोसे की उपज है। 2023 के कर्नाटक और महाराष्ट्र चुनाव के बाद CSDS के सर्वे में 47% लोगों ने कहा कि "दलबदल से लोकतंत्र कमजोर होता है"। इसका असर कहां दिखता है? चुनावी राजनीति पर- लोग अब स्थानीय उम्मीदवार देखने लगे हैं, पार्टी नहीं। "पार्टी कोई भी हो, मेरा काम करे" वाला ट्रेंड बढ़ रहा है। नीति निर्माण पर- सरकारें अस्थिर हो जाती हैं। 5 साल का प्लान 2 साल में बदल जाता है क्योंकि गठबंधन बदल गया। युवा राजनीति से दूर हो रहे हैं- कॉलेज चुनावों में भी भागीदारी घट रही है। युवाओं को लगता है कि राजनीति सिर्फ सौदेबाजी है। नोटा का बढ़ना- 2019 के बाद से कई सीटों पर नोटा को मिले वोट 2-3% तक पहुंच गए हैं। ये विरोध का साइलेंट तरीका है।</p><p style="text-align:justify;"><br />               दलबदल कानून कहां फेल हुआ?- 1985 में 52वां संविधान संशोधन लाकर दलबदल विरोधी कानून बनाया गया। मकसद था कि विधायक पार्टी न बदलें। लेकिन कानून में एक खामी छोड़ दी गई - अगर 2/3 विधायक साथ छोड़ दें तो वो "विलय" कहलाता है और अयोग्यता नहीं लगती। इसी खामी का फायदा लेकर महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश में सरकारें गिरीं। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि स्पीकर का फैसला समय पर नहीं आता, जिससे कानून का मकसद ही खत्म हो जाता है। क्या हो सकता है समाधान?- 2/3 वाली छूट हटाओ- अगर पार्टी टूटती है तो सबको अयोग्य ठहराओ। फिर जनता के पास जाओ और दोबारा चुनाव लड़ो।</p><p style="text-align:justify;"><br />फंडिंग में पारदर्शिता-  चुनाव आयोग को हर लेन-देन का हिसाब मिले ताकि नेताओं को खरीद-फरोख्त न हो सके। आंतरिक लोकतंत्र-  पार्टियों में चुनाव हों, युवा और कार्यकर्ताओं की सुनवाई हो। जब अंदर लोकतंत्र होगा तो बाहर टूट कम होगी। वोटर एजुकेशन-  लोगों को समझाना होगा कि वोट सिंबल को जाता है, व्यक्ति को नहीं। ये बात स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई जाए। स्थानीय मुद्दों पर वोट-  लोग अब पानी, सड़क, स्कूल को देखकर वोट कर रहे हैं, न कि बड़े नेता के नाम पर। सोशल मीडिया पर जवाबदेही- विधायक अगर पाला बदलता है तो अगले 6 महीने तक ट्रोल होता है। ये डर कुछ हद तक काम कर रहा है। नए विकल्प की तलाश AAP जैसे दल इसी भरोसे के संकट से पैदा हुए। पार्टियों का टूटना लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन जब हर 2 साल में गठबंधन और दल बदल जाएं, तो जनता को लगता है कि उसका वोट सिर्फ सत्ता का सीढ़ी है।</p><p style="text-align:justify;"><br />लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है, ये भरोसे का कॉन्ट्रैक्ट है। जब पार्टियां उस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ती हैं, तो नुकसान वोटर को होता है। और एक बार भरोसा टूट जाए, तो उसे दोबारा जोड़ने में 10 साल लग जाते हैं।<br />अगली बार जब कोई नेता पाला बदले, तो सवाल पूछो: "तुम पार्टी बदले, मेरी समस्या बदली क्या?"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 20:39:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अमोढ़ा पुलिस चौकी बनी शोपीस, ताले में कैद जनता की सुरक्षा</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती।</strong> बस्ती जिले के छावनी थाना क्षेत्र स्थित अमोढ़ा पुलिस चौकी की कार्यशैली को लेकर स्थानीय ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि अमोढ़ा पुलिस चौकी अधिकांश समय बंद रहती है और चौकी पर न तो चौकी प्रभारी धर्मेंद्र प्रजापति मौजूद रहते हैं और न ही अन्य पुलिसकर्मी दिखाई देते हैं।ग्रामीणों का कहना है कि किसी भी समस्या, विवाद या शिकायत के लिए जब लोग चौकी पहुंचते हैं तो वहां ताला लटका मिलता है। इससे लोगों को मजबूर होकर छावनी थाने का चक्कर लगाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की बर्बादी</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181481/amodha-police-post-became-a-showpiece-for-the-safety-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260618-wa0102.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती।</strong> बस्ती जिले के छावनी थाना क्षेत्र स्थित अमोढ़ा पुलिस चौकी की कार्यशैली को लेकर स्थानीय ग्रामीणों में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि अमोढ़ा पुलिस चौकी अधिकांश समय बंद रहती है और चौकी पर न तो चौकी प्रभारी धर्मेंद्र प्रजापति मौजूद रहते हैं और न ही अन्य पुलिसकर्मी दिखाई देते हैं।ग्रामीणों का कहना है कि किसी भी समस्या, विवाद या शिकायत के लिए जब लोग चौकी पहुंचते हैं तो वहां ताला लटका मिलता है। इससे लोगों को मजबूर होकर छावनी थाने का चक्कर लगाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की बर्बादी होती है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि चौकी पर तैनात पुलिसकर्मी अधिकतर समय थाने पर ही रहते हैं और चौकी केवल नाम मात्र की बनकर रह गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ग्रामीणों ने कहा कि सरकार ने जनता की सुरक्षा और त्वरित सहायता के लिए लाखों रुपये खर्च कर पुलिस चौकी का निर्माण कराया था, लेकिन जब चौकी पर पुलिसकर्मी मौजूद ही नहीं रहते तो इसका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। लोगों का कहना है कि यदि चौकी हमेशा बंद ही रहनी है तो उसके निर्माण का क्या औचित्य है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्षेत्रवासियों ने पुलिस विभाग के उच्च अधिकारियों से मामले की जांच कर चौकी की नियमित कार्यप्रणाली सुनिश्चित कराने की मांग की है। उनका कहना है कि चौकी पर पुलिसकर्मियों की नियमित उपस्थिति से क्षेत्र में कानून व्यवस्था बेहतर होगी और आम जनता को तत्काल सहायता मिल सकेगी।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 19:58:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रिश्वतखोरी के आरोप में परसरामपुर थाने के तीन पुलिसकर्मी निलंबित</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती में पुलिस विभाग की छवि को प्रभावित करने वाले मामले में पुलिस अधीक्षक ने बड़ी कार्रवाई करते हुए थाना परसरामपुर में तैनात तीन पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। निलंबित किए गए कर्मियों में मुख्य आरक्षी जगत नारायण यादव, आरक्षी आनंद यादव तथा आरक्षी बृजभूषण सिंह शामिल हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">पुलिस अधीक्षक कार्यालय से जारी प्रेस नोट के अनुसार इन पुलिसकर्मियों के कार्य एवं व्यवहार को लेकर क्षेत्र के लोगों द्वारा लगातार शिकायतें प्राप्त हो रही थीं। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि संबंधित कर्मियों का आचरण आम जनता के प्रति संतोषजनक नहीं है, जिससे पुलिस विभाग की</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181473/three-policemen-of-parasrampur-police-station-suspended-on-bribery-charges"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/img-20260617-wa0104.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती में पुलिस विभाग की छवि को प्रभावित करने वाले मामले में पुलिस अधीक्षक ने बड़ी कार्रवाई करते हुए थाना परसरामपुर में तैनात तीन पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। निलंबित किए गए कर्मियों में मुख्य आरक्षी जगत नारायण यादव, आरक्षी आनंद यादव तथा आरक्षी बृजभूषण सिंह शामिल हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुलिस अधीक्षक कार्यालय से जारी प्रेस नोट के अनुसार इन पुलिसकर्मियों के कार्य एवं व्यवहार को लेकर क्षेत्र के लोगों द्वारा लगातार शिकायतें प्राप्त हो रही थीं। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि संबंधित कर्मियों का आचरण आम जनता के प्रति संतोषजनक नहीं है, जिससे पुलिस विभाग की साख और जनविश्वास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मामले ने उस समय गंभीर रूप ले लिया जब उक्त पुलिसकर्मियों का एक वीडियो पुलिस प्रशासन के संज्ञान में आया। वीडियो में उन्हें सार्वजनिक स्थान पर कथित रूप से उत्कोच (रिश्वत) लेते हुए देखा गया। वीडियो सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर मामले की जांच कराई गई, जिसके उपरांत प्रथम दृष्टया आरोपों को गंभीर मानते हुए पुलिस अधीक्षक ने तत्काल कार्रवाई का निर्णय लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुलिस अधीक्षक ने तीनों पुलिसकर्मियों को निलंबित करते हुए उनके विरुद्ध विभागीय जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि जांच निष्पक्ष एवं पारदर्शी ढंग से कराई जाएगी तथा दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुलिस विभाग ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता तथा जनविश्वास को ठेस पहुंचाने वाले किसी भी कृत्य के प्रति विभाग की नीति शून्य सहिष्णुता की है। ऐसे मामलों में किसी भी स्तर पर लापरवाही या पक्षपात नहीं बरता जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह कार्रवाई जनपद में पुलिस व्यवस्था को अधिक जवाबदेह एवं पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 19:47:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दल बदल की राजनीति और जनविश्वास का प्रश्न ईमानदारी से चलने वाले दल की निरंतर उन्नति और भ्रष्टाचार में डूबे दल की अनिवार्य गिरावट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी बहुदलीय व्यवस्था है जहां अनेक विचारधाराएं अनेक नेतृत्व और अनेक सामाजिक आकांक्षाएं एक साथ विकसित होती हैं, परंतु पिछले कुछ वर्षों में एक अलग ही प्रवृत्ति तेजी से उभरती दिखाई दी है जिसे आम भाषा में दल बदल या राजनीतिक टूटफूट कहा जाता है ।यह केवल व्यक्तियों का एक दल से दूसरे दल में जाना भर नहीं है ,बल्कि यह उस गहरे राजनीतिक और नैतिक संकट का संकेत भी है जो कई दलों के भीतर पनप रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जब हम देश के विभिन्न राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर हुए घटनाक्रमों को देखते हैं</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177280/politics-of-defection-and-the-question-of-public-trust-continuous"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/thumb_9083_1024_768_0_0_crop.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी बहुदलीय व्यवस्था है जहां अनेक विचारधाराएं अनेक नेतृत्व और अनेक सामाजिक आकांक्षाएं एक साथ विकसित होती हैं, परंतु पिछले कुछ वर्षों में एक अलग ही प्रवृत्ति तेजी से उभरती दिखाई दी है जिसे आम भाषा में दल बदल या राजनीतिक टूटफूट कहा जाता है ।यह केवल व्यक्तियों का एक दल से दूसरे दल में जाना भर नहीं है ,बल्कि यह उस गहरे राजनीतिक और नैतिक संकट का संकेत भी है जो कई दलों के भीतर पनप रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जब हम देश के विभिन्न राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर हुए घटनाक्रमों को देखते हैं तो एक पैटर्न स्पष्ट दिखाई देता है ।कई क्षेत्रीय दल और राष्ट्रीय दल अपने ही नेताओं और विधायकों को संभालने में असफल रहे हैं। जिसके परिणामस्वरूप उनके भीतर असंतोष बढ़ा और वह असंतोष अंततः टूट के रूप में सामने आया ।इस प्रक्रिया में एक दल मजबूत होता गया और अन्य दल कमजोर होते गए यह केवल संख्या का खेल नहीं है, बल्कि यह भरोसे और विश्वसनीयता का प्रश्न भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">लोकतंत्र में जनता केवल नारों या वादों पर भरोसा नहीं करती बल्कि वह यह भी देखती है कि कोई दल अपने सिद्धांतों पर कितना टिकता है और अपने नेताओं को कितनी ईमानदारी से आगे बढ़ाता है जब किसी दल के भीतर पारदर्शिता की कमी होती है या नेतृत्व अपने स्वार्थ में उलझ जाता है तो वहां असंतोष जन्म लेता है। यही असंतोष धीरे धीरे विद्रोह में बदलता है और अंततः दल टूट जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पिछले वर्षों में कई राज्यों में हुए राजनीतिक घटनाक्रम इस बात के उदाहरण हैं जहां विधायकों और सांसदों ने अपने ही दल को छोड़कर दूसरे दल का दामन थाम लिया। इन घटनाओं के पीछे केवल सत्ता का आकर्षण नहीं था बल्कि कई बार यह आरोप भी लगे कि मूल विचारधारा से भटकाव हुआ है और नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं और जनता के विश्वास को तोड़ा है। जब ऐसी स्थिति बनती है तो दल के भीतर का ढांचा कमजोर पड़ जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह भी सत्य है कि जिस दल ने अपने संगठन को मजबूत रखा अनुशासन बनाए रखा और कार्यकर्ताओं के बीच विश्वास कायम किया वह लगातार आगे बढ़ता गया संगठन की मजबूती किसी भी राजनीतिक दल की रीढ़ होती है। जब यह रीढ़ मजबूत होती है तो बाहरी आघात भी उसे ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा पाते इसके विपरीत जब संगठन भीतर से ही खोखला हो जाता है तो छोटी सी चुनौती भी उसे हिला देती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राजनीतिक दलों की सफलता केवल चुनाव जीतने में नहीं होती बल्कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि वे जनता के बीच कितनी विश्वसनीयता बनाए रखते हैं ।यदि कोई दल ईमानदारी से काम करता है पारदर्शिता रखता है और अपने वादों को निभाने का प्रयास करता है तो जनता उसे बार बार अवसर देती है यह प्रक्रिया धीरे धीरे उस दल को और मजबूत बनाती है और उसकी उन्नति निरंतर होती रहती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसके विपरीत यदि कोई दल भ्रष्टाचार में डूब जाता है नेताओं पर आरोप लगते हैं और जनता के मुद्दों से दूरी बढ़ती जाती है तो उसकी गिरावट निश्चित हो जाती है ।इतिहास इस बात का गवाह है कि ऐसे दल चाहे कुछ समय के लिए सत्ता में रहे हों लेकिन अंततः उन्हें जनता ने नकार दिया जनता की नजर में विश्वास सबसे बड़ी पूंजी होती है और जब यह पूंजी खत्म हो जाती है तो कोई भी रणनीति उस दल को बचा नहीं सकती।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में यह भी देखने को मिला है कि जब किसी दल के कई नेता एक साथ इस्तीफा देते हैं या दूसरे दल में शामिल होते हैं तो वह केवल संख्या का नुकसान नहीं होता बल्कि वह उस दल की साख पर भी चोट होती है ।जनता के मन में यह प्रश्न उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि इतने बड़े स्तर पर असंतोष पैदा हो जाता है।उस दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">राजनीति में विचारधारा का महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। जब कोई दल अपनी मूल विचारधारा से भटकता है और केवल सत्ता प्राप्ति को लक्ष्य बना लेता है तो उसके भीतर की एकता कमजोर पड़ने लगती है कार्यकर्ता स्वयं को असहज महसूस करते हैं और धीरे धीरे दूरी बनाने लगते हैं यही दूरी आगे चलकर टूट का कारण बनती है। इसलिए यह आवश्यक है कि हर दल अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहे और समय समय पर आत्ममंथन करता रहे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">संगठन में लोकतंत्र भी उतना ही जरूरी है यदि निर्णय लेने की प्रक्रिया में केवल कुछ लोगों का वर्चस्व हो और अन्य नेताओं को नजरअंदाज किया जाए तो असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। एक स्वस्थ दल वही होता है जहां संवाद होता है जहां असहमति को भी स्थान मिलता है और जहां सभी को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है ऐसे दल लंबे समय तक टिके रहते हैं और निरंतर प्रगति करते हैं</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में जनता भी पहले से अधिक जागरूक हो चुकी है वह केवल चुनावी वादों से प्रभावित नहीं होती बल्कि वह यह भी देखती है कि कौन सा दल वास्तव में उसके हित में काम कर रहा है कौन सा दल केवल दिखावे की राजनीति कर रहा है और कौन सा दल ईमानदारी से शासन चला रहा है। यह जागरूकता लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है, क्योंकि इससे राजनीतिक दलों पर भी दबाव बनता है कि वे बेहतर काम करें।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दल बदल की राजनीति को केवल नकारात्मक दृष्टि से देखना भी पूरी तरह उचित नहीं है कई बार यह बदलाव उन नेताओं के लिए एक अवसर भी होता है जो अपने पुराने दल में उपेक्षित महसूस कर रहे थे या जिनकी विचारधारा को वहां स्थान नहीं मिल रहा था लेकिन जब यह प्रक्रिया बहुत अधिक होने लगे और बार बार होने लगे तो यह लोकतंत्र की स्थिरता के लिए चुनौती बन जाती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह भी जरूरी है कि राजनीतिक दल अपने भीतर नैतिक मूल्यों को मजबूत करें भ्रष्टाचार के आरोप किसी भी दल के लिए सबसे बड़ा खतरा होते हैं क्योंकि ये आरोप सीधे जनता के विश्वास को प्रभावित करते हैं यदि कोई दल पारदर्शिता बनाए रखता है और गलत कार्यों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करता है तो वह अपने विश्वास को बनाए रख सकता है इसके विपरीत यदि आरोपों को नजरअंदाज किया जाए या उन्हें दबाने का प्रयास किया जाए तो स्थिति और खराब हो जाती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अंत में यह कहा जा सकता है कि राजनीति में स्थायी सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें ईमानदारी अनुशासन पारदर्शिता और जनता के प्रति समर्पण की आवश्यकता होती है, जो दल इन मूल्यों को अपनाते हैं वे धीरे धीरे मजबूत होते जाते हैं और उनकी उन्नति निरंतर होती रहती है वहीं जो दल इन मूल्यों से दूर हो जाते हैं और भ्रष्टाचार में डूब जाते हैं उनकी गिरावट तय होती है</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसलिए आज के समय में हर राजनीतिक दल के लिए यह आवश्यक है कि वह आत्ममंथन करे अपने संगठन को मजबूत बनाए और जनता के विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दे क्योंकि अंततः लोकतंत्र में वही दल सफल होता है जो जनता के दिल में जगह बनाता है और यह स्थान केवल ईमानदारी और सेवा भाव से ही प्राप्त किया जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 17:39:01 +0530</pubDate>
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