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                <title>भारतीय परंपरा - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>भारतीय परंपरा RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>विश्व योग दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा विशाल योग कार्यक्रम का आयोजन</title>
                                    <description><![CDATA[<p><br /></p><blockquote class="format1"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लखनऊ</span></strong>,  </blockquote><p><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व योग दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर भाग के महाराजा सुहेलदेव नगर द्वारा श्रीराम शाखा पर भव्य योग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम श्रीराम अकैडमी इंटर कॉलेज परिसर में संपन्न हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें समाज के सैकड़ों नागरिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघ के स्वयंसेवकों एवं पदाधिकारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं श्रीराम अकैडमी इंटर कॉलेज के प्रबंधक</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रवण मिश्रा</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत पुनः विश्व गुरु बनने की दिशा में अग्रसर है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि भारत की प्राचीन योग परंपरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग चिकित्सा एवं योग</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181921/rashtriya-swayamsevak-sangh-organizes-huge-yoga-program-on-world-yoga"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/whatsapp-image-2026-06-21-at-15.08.50-(1)-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p><br /></p><blockquote class="format1"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">लखनऊ</span></strong>,  </blockquote><p><span lang="hi" xml:lang="hi">विश्व योग दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उत्तर भाग के महाराजा सुहेलदेव नगर द्वारा श्रीराम शाखा पर भव्य योग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम श्रीराम अकैडमी इंटर कॉलेज परिसर में संपन्न हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें समाज के सैकड़ों नागरिकों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संघ के स्वयंसेवकों एवं पदाधिकारियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं श्रीराम अकैडमी इंटर कॉलेज के प्रबंधक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रवण मिश्रा</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत पुनः विश्व गुरु बनने की दिशा में अग्रसर है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि भारत की प्राचीन योग परंपरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योग चिकित्सा एवं योग पद्धति को आज पूरा विश्व अपना रहा है। उन्होंने कहा कि विश्वभर के लोग भारतीय सनातन संस्कृति और उसकी परंपराओं को जानने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समझने और अपनाने के लिए उत्सुक हैं।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-06/whatsapp-image-2026-06-21-at-15.08.50-(1)-(1).jpeg" alt="विश्व योग दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा विशाल योग कार्यक्रम का आयोजन" width="1080" height="810"></img></span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में समाज को संगठित रहने की आवश्यकता है और योग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध हो रहा है। योग से तन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मन और मस्तिष्क स्वस्थ रहते हैं तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक इस कार्य को कुशलतापूर्वक समाज तक पहुंचा रहे हैं।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-06/whatsapp-image-2026-06-21-at-15.08.50.jpeg" alt="विश्व योग दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा विशाल योग कार्यक्रम का आयोजन" width="1080" height="810"></img></span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह जिला बौद्धिक प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">त्रियुगी नाथ</span></strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नगर संघ चालक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संतोष</span></strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सह नगर संघ चालक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">श्यामू</span></strong>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाग सद्भाव संयोजक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सुधीर</span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तथा नगर समरसता प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विनोद</span></strong><strong><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।</span></p><p><span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यक्रम में नगर समरसता प्रमुख</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">विनोद </span></strong><span lang="hi" xml:lang="hi">ने उपस्थित सभी आगंतुकों को विभिन्न योगासन एवं प्राणायाम का अभ्यास कराया तथा योग के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यक्रम का समापन स्वस्थ एवं जागरूक समाज के निर्माण के संकल्प के साथ हुआ।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>सांस्कृतिक और धार्मिक</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 16:20:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राजा रवि वर्मा के चित्रों में जीवित गौरवशाली भारतीय परंपरा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय चित्रकला के गौरवशाली इतिहास में राजा रवि वर्मा एक ऐसे युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हैं जिन्होंने अपनी कूची और रंगों के माध्यम से भारतीय संस्कृति को एक नई पहचान और वैश्विक गरिमा प्रदान की। 29 अप्रैल 1848 को केरल के किलिमनूर नामक छोटे से गांव में जन्मे इस महान कलाकार ने उस समय कला की साधना प्रारंभ की जब वह केवल राजदरबारों की दीवारों और प्राचीन मंदिरों के गर्भगृहों तक ही सीमित थी। रवि वर्मा का जन्म एक ऐसे कुलीन परिवार में हुआ था जहाँ कला, साहित्य और संस्कृति का संगम पहले से ही विद्यमान था</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177488/glorious-indian-tradition-alive-in-the-paintings-of-raja-ravi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/untitled-1-1682749007.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय चित्रकला के गौरवशाली इतिहास में राजा रवि वर्मा एक ऐसे युगपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हैं जिन्होंने अपनी कूची और रंगों के माध्यम से भारतीय संस्कृति को एक नई पहचान और वैश्विक गरिमा प्रदान की। 29 अप्रैल 1848 को केरल के किलिमनूर नामक छोटे से गांव में जन्मे इस महान कलाकार ने उस समय कला की साधना प्रारंभ की जब वह केवल राजदरबारों की दीवारों और प्राचीन मंदिरों के गर्भगृहों तक ही सीमित थी। रवि वर्मा का जन्म एक ऐसे कुलीन परिवार में हुआ था जहाँ कला, साहित्य और संस्कृति का संगम पहले से ही विद्यमान था और इसी वातावरण ने उनकी अंतर्निहित प्रतिभा को पल्लवित होने का सुअवसर प्रदान किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बचपन से ही उनके हाथों में रंगों और रेखाओं का जो जादू था उसे उनके परिवार ने शीघ्र ही पहचान लिया और उन्हें कला के क्षेत्र में निरंतर प्रोत्साहित किया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा के साथ ही चित्रकला का अभ्यास निरंतर चलता रहा और शीघ्र ही उनकी ख्याति त्रावणकोर के महाराजा तक पहुँच गई। महाराजा के संरक्षण ने रवि वर्मा के जीवन को एक निर्णायक मोड़ दिया जहाँ उन्हें न केवल संसाधन उपलब्ध हुए बल्कि वैश्विक कला की बारीकियों को समझने का अवसर भी प्राप्त हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उस दौर में भारत में तैल चित्रकला की प्रविधि बहुत कम प्रचलित थी और भारतीय कलाकार मुख्य रूप से पारंपरिक शैलियों में ही कार्य कर रहे थे। रवि वर्मा ने यूरोपीय शैली की यथार्थवादी कला का गहराई से अध्ययन किया और उसे भारतीय विषयों के साथ समाहित करने का साहसिक प्रयास किया। उन्होंने अपनी कला में पाश्चात्य प्रविधि और भारतीय आत्मा का जो संगम किया उसने चित्रकला के इतिहास में एक नवीन अध्याय जोड़ दिया। उनकी कला की सबसे विलक्षण विशेषता यह थी कि उन्होंने भारतीय पौराणिक कथाओं के पात्रों को मानवीय संवेदनाओं के साथ जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के जो पात्र अब तक केवल कल्पनाओं या पांडुलिपियों के विवरणों तक ही सीमित थे वे रवि वर्मा के चित्रों में हाड़-मांस के मनुष्य की तरह जीवंत होकर सामने आए। उनके द्वारा चित्रित राम, सीता, कृष्ण, द्रौपदी और शकुंतला के चित्रों में भावनाओं की जो गहराई और चेहरों पर जो भाव विद्यमान थे उन्होंने जनमानस के हृदय को स्पर्श किया। विशेष रूप से देवी लक्ष्मी और सरस्वती के जो स्वरूप उन्होंने अपनी तूलिका से गढ़े वे आज भी करोड़ों भारतीय घरों के पूजा स्थलों में श्रद्धा के साथ देखे जा सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रवि वर्मा की कला का एक महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय स्त्री के सौंदर्य और उसकी गरिमा का चित्रण था। उनके चित्रों में स्त्रियां केवल सौंदर्य का प्रतीक मात्र नहीं थीं बल्कि वे भावनात्मक रूप से अत्यंत सशक्त और गरिमापूर्ण दिखाई देती थीं। उन्होंने भारतीय नारी को एक ऐसे आदर्श रूप में प्रस्तुत किया जिसमें सौम्यता, शक्ति और मर्यादा का अद्भुत संतुलन था। उनके द्वारा चित्रित साड़ी पहने हुए स्त्रियों के चित्रों ने न केवल भारतीय वेशभूषा को एक वैश्विक पहचान दी बल्कि वह भारतीय नारीत्व की एक शाश्वत छवि बन गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके चित्रों में रंगों का चयन और वस्त्रों की सिलवटों का सूक्ष्म चित्रण इतना यथार्थवादी था कि दर्शक उन चित्रों के साथ एक आत्मीय जुड़ाव महसूस करने लगता था। उनकी कला में केवल बाहरी सौंदर्य ही नहीं बल्कि पात्रों की मानसिक अवस्था और उनके अंतर्द्वंद्व को भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। शकुंतला का अपने पैर से कांटा निकालने का बहाना करके पीछे मुड़कर देखना हो या दमयंती का हंस से संवाद, हर चित्र एक पूरी कहानी स्वयं में समेटे हुए था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय चित्रकला को महलों से निकालकर झोपड़ियों तक पहुँचाने का श्रेय भी निर्विवाद रूप से राजा रवि वर्मा को ही जाता है। वर्ष 1894 में उन्होंने मुंबई में एक शिलामुद्रणालय अर्थात लिथोग्राफी प्रेस की स्थापना करके एक क्रांतिकारी कदम उठाया। इस प्रेस के माध्यम से उनके चित्रों की हजारों प्रतियां छपने लगीं और बहुत ही कम मूल्य पर सामान्य लोगों के लिए उपलब्ध होने लगीं। इससे पहले कला केवल धनी वर्ग और शासकों के विलास का साधन समझी जाती थी परंतु रवि वर्मा ने अपनी इस दूरदर्शिता से कला का लोकतंत्रीकरण कर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके द्वारा बनाए गए चित्र कैलेंडरों और पोस्टरों के रूप में प्रत्येक घर की शोभा बनने लगे। इसी माध्यम से भारतीय देवी-देवताओं की एक निश्चित छवि जनमानस के मस्तिष्क में स्थायी रूप से अंकित हो गई। यह उनकी कला का ही प्रभाव था कि उस समय के साधारण भारतीय भी अपनी संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों के साथ गर्व से जुड़ सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रवि वर्मा की सफलता केवल भारत तक ही सीमित नहीं रही बल्कि उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी भारतीय कला का परचम लहराया। वर्ष 1873 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में उन्हें पुरस्कृत किया गया जिससे उनकी ख्याति विश्वव्यापी हो गई। इसके पश्चात उन्हें भारत की विभिन्न रियासतों जैसे बड़ौदा, मैसूर और उदयपुर के राजाओं का निमंत्रण और संरक्षण प्राप्त हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने देश के विभिन्न अंचलों की व्यापक यात्राएं कीं और वहां की विविधतापूर्ण संस्कृति, वेशभूषा और जनजीवन को अपनी कला में स्थान दिया। उनकी इन यात्राओं ने उनकी कला को और अधिक समृद्ध और समावेशी बनाया। हालांकि उनकी इस पाश्चात्य शैली की कुछ पारंपरिक कलाकारों ने आलोचना भी की और इसे भारतीयता के विरुद्ध बताया परंतु समय ने सिद्ध किया कि रवि वर्मा ने वास्तव में भारतीय कला को आधुनिकता के साथ जोड़कर उसे नया जीवन प्रदान किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनकी कला में छाया और प्रकाश का जो प्रयोग था वह अद्वितीय था। उन्होंने चित्रों में गहराई पैदा करने के लिए जिस सूक्ष्मता से कार्य किया वह आज भी कला के विद्यार्थियों के लिए शोध का विषय है। उनके चित्रों के रंगों में एक ऐसी चमक और स्थायित्व था जो दशकों बाद भी धूमिल नहीं हुआ। वे केवल एक चित्रकार ही नहीं थे बल्कि भारतीय संस्कृति के एक ऐसे दूत थे जिन्होंने विदेशी शासन के दौर में भी भारतीय मूल्यों को गौरव के साथ स्थापित किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">2 अक्टूबर 1906 को इस महान विभूति का निधन हो गया लेकिन वे अपनी कला के रूप में आज भी अमर हैं। उनकी विरासत आज भी भारतीय चित्रकारों को प्रेरित करती है और उनके बनाए चित्र आज भी विश्व के प्रतिष्ठित संग्रहालयों में सुरक्षित रखे गए हैं। रवि वर्मा का जीवन हमें सिखाता है कि प्रतिभा और समर्पण के माध्यम से सीमाओं को तोड़ा जा सकता है और कला के जरिए समाज में एक व्यापक वैचारिक परिवर्तन लाया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजा रवि वर्मा ने कला को केवल मनोरंजन का साधन न मानकर उसे राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम बनाया। उनके चित्रों ने उस कालखंड में भारतीयों के भीतर अपनी परंपराओं के प्रति स्वाभिमान जगाने का कार्य किया जब पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव चरम पर था। उनकी सबसे बड़ी देन यही है कि उन्होंने आम आदमी की आंखों को कला परखने की दृष्टि दी और कला को जन सामान्य की भावना का अभिन्न अंग बना दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज भी जब हम किसी पौराणिक आख्यान की कल्पना करते हैं तो हमारे मन में अनायास ही वही रूप उभरते हैं जिन्हें रवि वर्मा ने अपनी कल्पना से साकार किया था। भारतीय कला के इतिहास में उनका नाम सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ के रूप में स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा और आने वाली पीढ़ियां उनके कार्यों से निरंतर प्रेरणा प्राप्त करती रहेंगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 17:41:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>त्याग और समर्पण की देवी - माँ जानकी</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ई0 प्रभात किशोर</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जनहितकारी भयहारी ।,अतुलित छबि भारी मुनि-मनहारी जनकदुलारी सुकुमारी ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सुन्दर सिंहासन तेहिं पर आसन कोटि हुताशन द्युतिकारी ।, सिर छत्र बिराजै सखि संग भाजै निज-निज कारज करधारी ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सुर सिद्ध सुजाना हनै निशाना चढ़े बिमाना समुदाई।, बरसहिं बहुफूला मंगल मूला अनुकूला सिया गुन गाई ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">दम्पति अनुरागेउ प्रेम सुपागेउ यह सुख लायउं मनलाई।, अस्तुति सिय केरी प्रेमलतेरी बरनि सुचेरी सिर नाई ।। </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में जानकी नवमी या सीता नवमी का काफी महत्व है। जनक नंदिनी और भगवान राम की अद्र्धांगिनी मां सीता का प्रकटीकरण वैशाख मास के शुक्ल पक्ष</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177278/goddess-of-sacrifice-and-dedication-maa-janaki"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/sita-navami-730_1682620129.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ई0 प्रभात किशोर</strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जनहितकारी भयहारी ।,अतुलित छबि भारी मुनि-मनहारी जनकदुलारी सुकुमारी ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सुन्दर सिंहासन तेहिं पर आसन कोटि हुताशन द्युतिकारी ।, सिर छत्र बिराजै सखि संग भाजै निज-निज कारज करधारी ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सुर सिद्ध सुजाना हनै निशाना चढ़े बिमाना समुदाई।, बरसहिं बहुफूला मंगल मूला अनुकूला सिया गुन गाई ।।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">दम्पति अनुरागेउ प्रेम सुपागेउ यह सुख लायउं मनलाई।, अस्तुति सिय केरी प्रेमलतेरी बरनि सुचेरी सिर नाई ।। </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में जानकी नवमी या सीता नवमी का काफी महत्व है। जनक नंदिनी और भगवान राम की अद्र्धांगिनी मां सीता का प्रकटीकरण वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। यह शुभ दिवस रामनवमी के ठीक एक माह बाद पड़ता है और पूरे देश में धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जाता है।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">माँ सीता मिथिला के राजा (जिसे विदेह भी कहा जाता है) राजा जनक की दत्तक पुत्री थी, इसलिए उन्हें जानकी या जनक नंदिनी के नाम से भी संबोधित किया जाता है। सनातन धर्म की पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार राजा जनक बिहार के वर्तमान सीतामढ़ी में एक यज्ञ अनुष्ठान के दौरान भूमि की जुताई कर रहे थे। इस दौरान उन्हें खेत के गड्ढे में एक सोने के घड़े में एक बच्ची मिली, जिसे निःसंतान राजा ने दिव्य उपहार स्वरूप अपनी प्यारी बेटी के रूप में अपना लिया। श्री राम भगवान विष्णु के अवतार थे और माँ सीता को उनकी पत्नी देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है। भूमि के गर्भ से प्रकट होने के कारण उन्हें भूमिजा भी कहा जाता है।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">प्रभु श्री राम और मां सीता को एक आदर्श युगल माना जाता है। हालाँकि उनके सांसारिक मार्ग में अनेकानेक बाधाएँ आईं, लेकिन अपने संबंधों को लेकर वे सदैव अटल रहे। माँ सीता का चरित्र मानव जगत में एक आदर्श महिला का प्रतीक है और लगभग सभी परिवारों में यह आकांक्षा रहती है कि उनके यहां बेटी, जीवनसाथी, बहू, भाभी या माँ के रूप में देवी सीता जैसी कन्या हो। वे अपने समर्पण, ईमानदारी, साहस, पवित्रता और आत्म-बलिदान के लिए जानी जाती हैं। वे एक राजकुमारी थी, लेकिन वनवास गमन में पतिव्रता स्त्री की भांति उन्होने अपने पति का साथ दिया। वह लक्ष्मण और हनुमान को अपने भाई और पुत्र के रूप में प्यार करती थी। उन्होंने छद्म साधु वेशधारी रावण को भिक्षा देकर गरीबों और संतों की मदद करने की परंपरा का पालन किया। अपहरण के दौरान वानरों के बीच अपने आभूषण फेंककर उन्होने बुद्धिमत्ता का परिचय दिया, जो बाद में श्री राम-सेना को अपहरण मार्ग का पता लगाने में सहायक सिद्ध हुआ। अपहरण के बाद, उन्होने रावण को अपने कुकर्मों के कारण उसके वंश के सर्वनाश की चेतावनी भी दी।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">गर्भावस्था के दौरान सीता अपने अलगाव या अनौपचारिक तलाक से अप्रसन्न एवं कुंठित थीं, परन्तु उन्होने इस विकट परिस्थिति का साहसपूर्वक सामना किया । उन्होने अपने बच्चों को जन्म देने और उन्हें सभी गुणों से लैस करने का निर्णय किया। अपनी मानव जीवनयात्रा के अंतिम दौर में वे एक एकल माँ के रूप में रहीं। उन्होने स्वयं को पीड़ित नहीं माना और समान अधिकारों की मांग के लिए अयोध्या वापस नहीं गई। वे राजा एवं पति के बीच भूमिका चुनने में श्री राम के आंतरिक द्वंद को समझती थी। उन्होंने राजा जनक के परिवार की प्यारी बेटी, दशरथ के परिवार की बहू, प्रभु राम की पत्नी और अंत में महाराज लव एवं कुश की माँ के रूप में अपने कर्तव्यों का सम्यक निर्वहन किया। जब लव और कुश को अयोध्या की प्रजा और पिता राम ने स्वीकार कर लिया, तो माता के रूप में उनकी अंतिम भूमिका भी पूर्ण हो गई और वह इस क्रूर जगत, जहां पवित्रता हेतु महिलाओं से प्रमाण की आवश्यकता होती है, से मुक्ति पाने के लिए धरती माता के गर्भ में वापस लौट आईं।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">जानकी नवमी के शुभ दिवस पर, विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सफल जीवन के लिए उपवास रखती हैं और आशीर्वाद हेतु श्री राम और मां सीता की पूजा-अर्चना करती हैं। राम, सीता और लक्ष्मण  के साथ-साथ धरती माता का प्रतिनिधित्व करने वाले हल की भी पूजा का विधान है। भक्तजन ऋग्वेद 4.57.6 के सीता श्लोक का जाप कर उनकी वंदना करते हैं- ‘‘<em>अर्वाची सुभगे भवः सीते वंदामहे त्वा । यथा नः सुभगास्सि यथाः नः सुफलास्सि</em> ।।‘‘  (हे मां सीते, हमें दर्शन दीजिए । हम आपके समक्ष शीश झुकाते हैं। हे रिद्धि-सिद्धि की सर्वोच्च देवी, कृपया अपनी दया और उदारता दिखाएं और हमारे लिए शुभ फलप्राप्ति के अग्रदूत बनें )।</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> माँ सीता, उनका चरित्र और संघर्षमय जीवन भारतीय उपमहाद्वीप की समृद्ध संस्कृति का अभिन्न अंग है। ऐसी मान्यता है कि जानकी नवमी पर पूजा-अनुष्ठान और व्रत करने से विनय, मातृत्व, त्याग और समर्पण जैसे गुणों की प्राप्ति होती है और एक सुखी और समृद्ध वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sun, 26 Apr 2026 17:35:05 +0530</pubDate>
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