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                <title>Indian Legal System - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Indian Legal System RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>लंबित मुकदमे : न्याय में देरी की भारी कीमत</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्यायपालिका मानी जाती है। संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय का अधिकार देता है। लेकिन जब किसी व्यक्ति का मुकदमा वर्षों या दशकों तक अदालतों में लंबित रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह अधिकार केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाता है। भारत में करोड़ों मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार (</span>08<span lang="hi" xml:lang="hi">  दिसंबर </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi">  तक): सुप्रीम कोर्ट: </span>90,897<span lang="hi" xml:lang="hi">  मामले लंबित</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च न्यायालय: </span>63,63,406<span lang="hi" xml:lang="hi">  मामले लंबित जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय: </span>4,84,57,343<span lang="hi" xml:lang="hi">  मामले लंबित कुल लंबित मामले: लगभग </span>5.49<span lang="hi" xml:lang="hi">  करोड़</span>5,48,11,646)</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184248/pending-cases-are-a-heavy-cost-for-delaying-justice"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas16.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्यायपालिका मानी जाती है। संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय का अधिकार देता है। लेकिन जब किसी व्यक्ति का मुकदमा वर्षों या दशकों तक अदालतों में लंबित रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह अधिकार केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाता है। भारत में करोड़ों मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार (</span>08<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिसंबर </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक): सुप्रीम कोर्ट: </span>90,897<span lang="hi" xml:lang="hi"> मामले लंबित</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च न्यायालय: </span>63,63,406<span lang="hi" xml:lang="hi"> मामले लंबित जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय: </span>4,84,57,343<span lang="hi" xml:lang="hi"> मामले लंबित कुल लंबित मामले: लगभग </span>5.49<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ (</span>5,48,11,646)<span lang="hi" xml:lang="hi">।  इन लंबित मामलों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव केवल पीड़ित पक्ष पर ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन आरोपियों पर भी पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका अपराध अभी तक अदालत में सिद्ध नहीं हुआ है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">"<span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक अपराध सिद्ध न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक व्यक्ति निर्दोष है" – भारतीय न्याय व्यवस्था का यह मूल सिद्धांत व्यवहार में कई बार कमजोर पड़ जाता है। वर्षों तक मुकदमे झेलने वाला आरोपी सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक और मानसिक रूप से ऐसी सजा भुगतता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कई बार अदालत द्वारा दी जाने वाली वास्तविक सजा से भी अधिक कठोर साबित होती है। लंबित मुकदमों का बढ़ता बोझ- देश की विभिन्न अदालतों में करोड़ों मामले वर्षों से लंबित हैं। जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं— न्यायाधीशों के हजारों पद रिक्त होना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुकदमों की लगातार बढ़ती संख्या। बार-बार स्थगन  मिलना। पुलिस जांच और चार्जशीट दाखिल करने में देरी। गवाहों का समय पर उपस्थित न होना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक तकनीक का सीमित उपयोग। इन कारणों से न्याय की प्रक्रिया लंबी होती चली जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरोपी की सबसे बड़ी पीड़ा- जब किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके जीवन में अनेक कठिनाइयाँ एक साथ आ जाती हैं। यदि उसे गिरफ्तार कर लिया जाए तो उसे जेल में समय बिताना पड़ सकता है। जमानत मिलने के बाद भी उसकी परेशानियाँ समाप्त नहीं होतीं। आरोपी को बार-बार अदालत में पेश होना पड़ता है। हर तारीख पर नौकरी या व्यवसाय छोड़कर अदालत जाना पड़ता है। कई बार मुकदमे की सुनवाई आगे नहीं बढ़ती और केवल अगली तारीख मिल जाती है। यह प्रक्रिया वर्षों तक चलती रहती है। सामाजिक बदनामी समाज में किसी व्यक्ति पर मुकदमा दर्ज होने मात्र से उसकी छवि प्रभावित हो जाती है। भले ही बाद में अदालत उसे पूरी तरह निर्दोष घोषित कर दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उस पर लगा आरोप लोगों की स्मृति में बना रहता है। ऐसे व्यक्ति को नौकरी मिलने में कठिनाई होती है। कई सरकारी नौकरियों में लंबित मुकदमे भी परेशानी का कारण बन जाते हैं। परिवार को भी सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। आर्थिक नुकसान- लंबे मुकदमों की सबसे बड़ी मार आर्थिक होती है। वकीलों की फीस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत आने-जाने का खर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दस्तावेजों पर होने वाला खर्च</span>,</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">काम-धंधे में नुकसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी छूटने का खतरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई परिवार मुकदमे लड़ते-लड़ते आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। मानसिक तनाव- वर्षों तक मुकदमा झेलने वाला व्यक्ति लगातार तनाव में रहता है। उसे हर समय फैसले की चिंता सताती रहती है। परिवार के सदस्यों पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। कई मामलों में मानसिक अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य समस्याएँ और पारिवारिक विवाद बढ़ जाते हैं। यदि अंत में आरोपी निर्दोष निकले तो</span>?0<span lang="hi" xml:lang="hi">यह सबसे गंभीर प्रश्न है। कई बार अदालत वर्षों बाद आरोपी को यह कहते हुए बरी कर देती है कि उसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। उसके जीवन के कई वर्ष बीत चुके होते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो चुकी होती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक नुकसान हो चुका होता है। मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ चुकी होती है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि व्यक्ति निर्दोष था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके खोए हुए वर्षों की भरपाई कौन करेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ित पक्ष भी प्रभावित- न्याय में देरी केवल आरोपी के लिए ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पीड़ित के लिए भी कष्टदायक होती है। पीड़ित वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करता है। गवाह कमजोर पड़ जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं और कई बार न्याय का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। सुधार की आवश्यकता- न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई सुधार आवश्यक हैं— न्यायाधीशों के रिक्त पदों को शीघ्र भरना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई अदालतों की स्थापना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ई-कोर्ट और डिजिटल सुनवाई का विस्तार</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">अनावश्यक स्थगन पर सख्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस जांच की गुणवत्ता में सुधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटे मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष अदालतें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैकल्पिक विवाद समाधान (</span>ADR) <span lang="hi" xml:lang="hi">को बढ़ावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गवाह संरक्षण प्रणाली को मजबूत करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय में देरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय से वंचित करना अंग्रेज़ी की प्रसिद्ध उक्ति है—"</span>Justice delayed is justice denied." <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात न्याय में देरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय से वंचित करने के समान है। यह बात आरोपी और पीड़ित—दोनों पर समान रूप से लागू होती है। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक मुकदमा झेलना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह भी न्याय से वंचित है। यदि पीड़ित को वर्षों तक निर्णय का इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके साथ भी न्याय अधूरा रह जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्यायपालिका पर जनता का विश्वास आज भी मजबूत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बढ़ते लंबित मुकदमे इस विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं। न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर मिलना भी उतना ही आवश्यक है। अदालतों में लंबित मामलों को कम करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक का अधिक उपयोग करना और मुकदमों के त्वरित निस्तारण की प्रभावी व्यवस्था करना समय की मांग है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता तभी मानी जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक आरोपी बनकर न जीए और पीड़ित को न्याय के लिए अनंत प्रतीक्षा न करनी पड़े। न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल फैसला सुनाना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 19:55:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिरासत में मौत और पुलिसिया हिंसा के मामलों में अभियोजन मंजूरी जरूरी नहीं: ।मध्य प्रदेश हाईकोर्ट।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181536/prosecution-sanction-is-not-necessary-in-cases-of-custodial-death"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas6.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज </span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा के मामलों में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (</span>CrPC) <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 197 के तहत पूर्व सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने दो पुलिस आरक्षकों की याचिका खारिज करते हुए कहा कि ऐसे कृत्यों का सरकारी कर्तव्य के निर्वहन से कोई उचित संबंध नहीं माना जा सकता। जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ इंदौर में वर्ष 2015 में हुई एक युवक की कथित हिरासत मौत से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता पुलिसकर्मियों ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ अभियोजन चलाने से पहले सरकार की मंजूरी आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि कथित घटनाएं उनके आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़ी हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामले के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखने वाले 24 वर्षीय पंकज वैष्णव को 19 दिसंबर 2015 को स्कूटर चोरी के मामले में पूछताछ के लिए इंदौर के एमआईजी थाने लाया गया। उसी रात उसकी पुलिस हिरासत में मौत हो गई। पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">घटना के बाद </span>CrPC <span lang="hi" xml:lang="hi">की धारा 176 के तहत स्वतंत्र जांच कराई गई। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की गई जांच में निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला आपराधिक मानव वध का प्रतीत होता है।इसके बाद दो आरक्षकों और एक थाना प्रभारी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अवैध निरुद्ध करने और झूठे साक्ष्य देने सहित विभिन्न आरोपों में आरोपपत्र दायर किया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 197 के संरक्षण का लाभ तभी मिल सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब आरोपित कृत्य और सरकारी कर्तव्य के निर्वहन के बीच स्पष्ट और उचित संबंध हो। लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा कोई संबंध नहीं पाया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">यह ऐसा मामला नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें पुलिसकर्मी किसी हिंसक भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे और बल प्रयोग करते हुए अपनी सीमा से आगे बढ़ गए हों। यहां आरोपित बल प्रयोग उस समय किया गया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब मृतक पुलिस हिरासत में था और थाने के नियंत्रण में था। ऐसी स्थिति में बल प्रयोग या शारीरिक हमला करने का कोई औचित्य नहीं था।”</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> </p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने कहा कि कानून पुलिस को कुछ विशेष परिस्थितियों में बल प्रयोग की अनुमति देता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे हिंसक भीड़ को तितर-बितर करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गिरफ्तारी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें कहा गया कि हिरासत में हिंसा और मौत सभ्य समाज में सबसे गंभीर अपराधों में से हैं तथा यह व्यक्ति के मूल मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरक्षकों की पुनरीक्षण याचिका खारिज की और स्पष्ट किया कि हिरासत में मौत या पुलिसिया हिंसा जैसे मामलों में धारा 197 के तहत अभियोजन मंजूरी का संरक्षण उपलब्ध नहीं होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 13:57:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गृहिणियों को राष्ट्र निर्माता मानकर सुप्रीम कोर्ट ने रचा सामाजिक न्याय का नया अध्याय</title>
                                    <description><![CDATA[<div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181065/supreme-court-created-a-new-chapter-of-social-justice-by"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/4.jpg" alt=""></a><br /><div>भारतीय समाज में गृहिणी का स्थान हमेशा से परिवार की धुरी के रूप में रहा है। वह घर की व्यवस्था संभालती है बच्चों का पालन-पोषण करती है बुजुर्गों की देखभाल करती है और परिवार को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करती है। इसके बावजूद उसके श्रम को लंबे समय तक आर्थिक मूल्यांकन से बाहर रखा गया। घर के भीतर किए जाने वाले अनगिनत कार्यों को कर्तव्य और जिम्मेदारी का नाम देकर उनकी वास्तविक कीमत को नजरअंदाज किया जाता रहा। ऐसे समय में सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि सामाजिक चेतना को नई दिशा देने वाला भी है। सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाली गृहिणियों के मुआवजे को लेकर सर्वोच्च अदालत ने जो मानक निर्धारित किया है वह महिलाओं के सम्मान और न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता दोनों का प्रतीक है।</div>
<div>अदृश्य श्रम को मिली प्रतिष्ठा</div>
<div> </div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि गृहिणियों के काम का मूल्य कम से कम 30 हजार रुपए प्रतिमाह माना जाना चाहिए और इसी आधार पर मुआवजे की गणना की जानी चाहिए। अदालत ने यह भी माना कि गृहिणियां केवल परिवार का हिस्सा नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की महत्वपूर्ण शक्ति हैं। यह टिप्पणी अपने आप में ऐतिहासिक है क्योंकि पहली बार इतने स्पष्ट और प्रभावशाली शब्दों में गृहिणियों की भूमिका को राष्ट्रीय विकास से जोड़ा गया है।</div>
<div> </div>
<div>दरअसल किसी भी समाज की प्रगति का आधार मजबूत परिवार होता है और मजबूत परिवार का आधार अक्सर एक समर्पित महिला होती है। वह बिना किसी वेतन और अवकाश के चौबीसों घंटे कार्य करती है। उसकी मेहनत का कोई हिसाब नहीं रखा जाता और उसके योगदान को आर्थिक आंकड़ों में नहीं मापा जाता। सुप्रीम कोर्ट ने इस वास्तविकता को स्वीकार कर महिलाओं के अदृश्य श्रम को वह सम्मान दिया है जिसकी मांग लंबे समय से की जा रही थी।</div>
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<div>पुरानी सोच को बदलने वाला निर्णय है।अब तक सड़क दुर्घटना मामलों में गृहिणियों की आय का अनुमान अक्सर कुशल मजदूर की मजदूरी के आधार पर लगाया जाता था। यह व्यवस्था न केवल अव्यावहारिक थी बल्कि महिलाओं के योगदान को कम करके आंकने वाली भी थी। अदालत ने इस सोच को खारिज करते हुए कहा कि घरेलू कार्यों को सामान्य मजदूरी के पैमाने पर नहीं तौला जा सकता</div>
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<div>यह निर्णय इस बात की स्वीकारोक्ति है कि घर संभालना एक पूर्णकालिक और बहुआयामी जिम्मेदारी है। गृहिणी एक साथ प्रबंधक शिक्षक मार्गदर्शक परिचारिका और परिवार की भावनात्मक शक्ति के रूप में कार्य करती है। इसलिए उसके योगदान की तुलना किसी एक पेशे या मजदूरी से नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यापक दृष्टिकोण को अपनाकर न्याय की नई परिभाषा प्रस्तुत की है।</div>
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<div>महिला सम्मान की दिशा में बड़ा कदम कहा जा सकता है।</div>
<div>यह फैसला केवल मुआवजे की राशि बढ़ाने का मामला नहीं है बल्कि महिलाओं के सम्मान को कानूनी मान्यता देने का प्रयास भी है। भारतीय समाज में आज भी अनेक महिलाएं अपने कार्यों के लिए सामाजिक सराहना तो पाती हैं लेकिन आर्थिक पहचान नहीं मिलती। अदालत ने इस स्थिति को बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है।</div>
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<div>जब देश की सर्वोच्च अदालत किसी गृहिणी को राष्ट्र निर्माता कहती है तब यह संदेश केवल न्यायालय की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज तक पहुंचता है। इससे महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना मजबूत होती है और यह स्वीकार किया जाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल कार्यालयों और उद्योगों में नहीं बल्कि घरों के भीतर भी होता है।</div>
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<div>न्याय प्रणाली का  संवेदनशील उदाहरण है और इस फैसले की सबसे बड़ी विशेषता न्यायपालिका की संवेदनशीलता है। अदालत ने कहा कि मुआवजा तय करते समय केवल महिला की आय को आधार नहीं बनाया जा सकता। उसकी उम्र शिक्षा कौशल पारिवारिक जिम्मेदारियां और आर्थिक परिस्थितियां भी ध्यान में रखी जानी चाहिए। यह दृष्टिकोण बताता है कि न्यायालय जीवन की वास्तविकताओं को समझते हुए निर्णय दे रहा है</div>
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<div>कई बार दुर्घटना में गृहिणी की मृत्यु के बाद परिवार केवल एक सदस्य को नहीं खोता बल्कि पूरे परिवार की व्यवस्था प्रभावित हो जाती है। बच्चों का भविष्य बुजुर्गों की देखभाल और घर की स्थिरता पर गहरा असर पड़ता है। अदालत ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए भावनात्मक और पारिवारिक क्षति को भी मुआवजे का हिस्सा माना है। यह न्याय की मानवीय और व्यावहारिक व्याख्या है।</div>
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<div>त्वरित न्याय के प्रति प्रतिबद्धता</div>
<div>सुप्रीम कोर्ट ने केवल मुआवजे की गणना का नया आधार निर्धारित नहीं किया बल्कि न्याय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों की निगरानी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश स्वयं करें और दावों का निपटारा एक वर्ष के भीतर किया जाए।</div>
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<div>भारतीय न्याय व्यवस्था में लंबित मामलों की समस्या लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। दुर्घटना पीड़ित परिवार अक्सर वर्षों तक मुआवजे की प्रतीक्षा करते रहते हैं। ऐसे में अदालत का यह निर्देश न्याय को समयबद्ध और पीड़ित केंद्रित बनाने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि सर्वोच्च न्यायालय केवल सिद्धांतों की बात नहीं कर रहा बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करना चाहता है</div>
<div>न्यायपालिका की प्रगतिशील सोच</div>
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<div>सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की प्रगतिशील और दूरदर्शी सोच का परिचायक है। अदालत ने यह समझा कि बदलते समय में महिलाओं की भूमिका को पुराने मानकों से नहीं आंका जा सकता। आज महिलाओं का योगदान केवल आर्थिक कमाई तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक और पारिवारिक संरचना को मजबूत बनाने में भी उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।</div>
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<div>इस निर्णय ने यह संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति का मूल्य केवल उसकी वेतन पर्ची से नहीं तय किया जा सकता। समाज के लिए किए गए उसके योगदान को भी समान महत्व मिलना चाहिए। गृहिणियों के मामले में यह संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि उनका अधिकांश श्रम घर की चारदीवारी के भीतर ही रह जाता है।</div>
<div>सामाजिक बदलाव की नई शुरुआत शुरू हो चुका है।</div>
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<div>यह फैसला भविष्य में व्यापक सामाजिक बदलाव का आधार बन सकता है। इससे महिलाओं के घरेलू कार्यों के आर्थिक महत्व पर नई चर्चा शुरू होगी। नीति निर्माण के स्तर पर भी घरेलू श्रम को लेकर गंभीर विचार हो सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे करोड़ों गृहिणियों को यह एहसास होगा कि उनके कार्यों को देश की सर्वोच्च अदालत ने सम्मान और मान्यता दी है</div>
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<div>समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि घर का काम स्वाभाविक जिम्मेदारी है और उसका कोई आर्थिक मूल्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा को चुनौती देते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि घरेलू श्रम भी उतना ही मूल्यवान है जितना किसी अन्य पेशे में किया जाने वाला कार्य। यह विचार महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में सहायक होगा</div>
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<div>न्याय और सम्मान का ऐतिहासिक संगम देखने को मिला है।सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसने गृहिणियों के अदृश्य श्रम को पहचान दी है महिलाओं के सम्मान को नई ऊंचाई प्रदान की है और दुर्घटना पीड़ित परिवारों को अधिक न्यायपूर्ण राहत सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त किया है</div>
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<div>यह फैसला बताता है कि न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति भी है। महिलाओं को राष्ट्र निर्माता का दर्जा देकर सर्वोच्च अदालत ने न्याय और संवेदनशीलता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। यह निर्णय आने वाले वर्षों में महिला सम्मान सामाजिक न्याय और मानवीय न्यायशास्त्र के एक आदर्श उदाहरण के रूप में याद किया जाएगा। भारत की न्याय प्रणाली ने इस फैसले के माध्यम से यह सिद्ध कर दिया है कि सच्चा न्याय वही है जो समाज के सबसे अनदेखे और उपेक्षित योगदान को भी सम्मानपूर्वक पहचान दे सके।</div>
<div>     <strong>   *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:01:28 +0530</pubDate>
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                <title>डीएनए टेस्ट में पिता न होने पर भरण-पोषण नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने मां की अपील खारिज की</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा है कि यदि डीएनए परीक्षण से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा वैवाहिक संबंध के दौरान जन्मा हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने मां द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। </div>
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<div style="text-align:justify;">पक्षकारों की शादी 2016 में हुई थी। बाद में विवाद उत्पन्न होने पर महिला ने घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत अपने और बच्चे के</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177023/no-maintenance-if-father-is-not-found-in-dna-test"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/untitled-design-2026-04-22t211803.878.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कहा है कि यदि डीएनए परीक्षण से यह साबित हो जाए कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा वैवाहिक संबंध के दौरान जन्मा हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने मां द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पक्षकारों की शादी 2016 में हुई थी। बाद में विवाद उत्पन्न होने पर महिला ने घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत अपने और बच्चे के लिए अंतरिम भरण-पोषण की मांग की।  सुनवाई के दौरान पति की मांग पर डीएनए परीक्षण कराया गया, जिसमें यह सामने आया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है। इसके आधार पर ट्रायल कोर्ट ने बच्चे के लिए भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया, जिसे अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्यतः कानून के तहत विवाह के दौरान जन्मे बच्चे को वैध माना जाता है, लेकिन जब डीएनए टेस्ट जैसी वैज्ञानिक जांच से पितृत्व स्पष्ट रूप से खारिज हो जाए और उस रिपोर्ट को चुनौती भी न दी गई हो, तो ऐसे साक्ष्य को प्राथमिकता दी जाएगी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, कोर्ट ने बच्चे के कल्याण को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश दिया कि वह बच्चे की स्थिति—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण—का आकलन करे और आवश्यक होने पर सहायता सुनिश्चित करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के मामलों में जैविक संबंध महत्वपूर्ण है और वैज्ञानिक साक्ष्य के सामने पारंपरिक कानूनी धारणा टिक नहीं सकती। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 22:14:40 +0530</pubDate>
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