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                <title>Water Conservation India - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Water Conservation India RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>जल संरक्षण अब सिर्फ परियोजना नहीं, राष्ट्रीय संस्कार बनना चाहिए</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right">  <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का जल संकट नदियों में घटते प्रवाह से अधिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी नीतियों में घटती दूरदृष्टि का संकट है। विडंबना यह है कि जिस देश ने वर्षा को उत्सव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नदी को जीवन और तालाब को गांव की धड़कन माना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही आज पानी को विशाल परियोजनाओं और टैंकरों के बीच खोज रहा है। स्थिति चिंताजनक है। विश्व की लगभग </span>18 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत आबादी का भार उठाने वाला भारत विश्व के केवल </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत नवीकरणीय मीठे जल संसाधनों पर निर्भर है। मानसून की अनिश्चितता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूजल का अंधाधुंध दोहन और अनियोजित शहरी विस्तार इस संकट को और</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184182/water-conservation-should-no-longer-be-just-a-project-but"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/11-17.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"> <strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का जल संकट नदियों में घटते प्रवाह से अधिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी नीतियों में घटती दूरदृष्टि का संकट है। विडंबना यह है कि जिस देश ने वर्षा को उत्सव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नदी को जीवन और तालाब को गांव की धड़कन माना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही आज पानी को विशाल परियोजनाओं और टैंकरों के बीच खोज रहा है। स्थिति चिंताजनक है। विश्व की लगभग </span>18 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत आबादी का भार उठाने वाला भारत विश्व के केवल </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत नवीकरणीय मीठे जल संसाधनों पर निर्भर है। मानसून की अनिश्चितता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूजल का अंधाधुंध दोहन और अनियोजित शहरी विस्तार इस संकट को और गहरा रहे हैं। ऐसे समय में बहस यह नहीं होनी चाहिए कि समाधान नदियों को जोड़ने में है या वर्षा जल संचयन में। असली प्रश्न यह है कि क्या जल केवल उपभोग की वस्तु बना रहेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या हम उसे राष्ट्रीय अस्तित्व का आधार मानकर उसकी हर बूंद का सम्मान करना सीखेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जल प्रबंधन की सफलता के महत्वपूर्ण पैमानों में नदी जोड़ो परियोजनाएं भी शामिल हैं। </span>₹44,605 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केन-बेतवा लिंक परियोजना</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की पहली अंतर-बेसिन नदी जोड़ने की पहल है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो बुंदेलखंड जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्र के लिए नई उम्मीद बनी है। वर्ष </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में इसका निर्माण तेजी से चल रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पन्ना और छतरपुर में विस्थापन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुनर्वास और आदिवासी अधिकारों को लेकर विवाद जारी हैं। यह याद दिलाता है कि विकास केवल इंजीनियरिंग का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक विश्वास का भी विषय है। केन का जल बेतवा तक पहुंचाने की योजना जितनी आकर्षक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतना ही गंभीर प्रश्न नदी के प्राकृतिक प्रवाह</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वन्यजीवों और मिट्टी की उर्वरता पर उसके प्रभाव का है। यही चिंता चेनाब-बीस टनल और नर्मदा-सोन लिंक जैसी परियोजनाओं पर भी लागू होती है। यदि ये योजनाएं स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप नहीं बढ़ीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो जल संकट का समाधान करते-करते प्रकृति के लिए नया संकट खड़ा कर देंगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा जल संचयन को वर्षों तक सहायक उपाय मानकर उसकी वास्तविक शक्ति को कम आंका गया। जबकि सच यह है कि आसमान से गिरने वाली हर बूंद पूरे समाज की पूंजी है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">कैच द रेन</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">अभियान के तहत देशभर में हजारों रिचार्ज संरचनाएं बनीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन दिल्ली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुणे और गोवा जैसे शहरों में रखरखाव के अभाव में अनेक प्रणालियां निष्क्रिय हैं। इससे स्पष्ट है कि संकट संसाधनों का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संरक्षण की जिम्मेदारी का है। यदि हर नया भवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़क</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">औद्योगिक क्षेत्र और सार्वजनिक परिसर वर्षा जल संचयन से जुड़ जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भूजल पुनर्भरण में अभूतपूर्व वृद्धि हो सकती है। यह व्यवस्था बड़े बांधों की तुलना में कम लागत वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकेंद्रीकृत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम जोखिम वाली</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समुदाय आधारित और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल है। भारत की जल सुरक्षा केवल नदियों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा की हर बूंद से भी तय होगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाधान किसी एक विकल्प में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों के संतुलित समन्वय में है। बड़ी नदी जोड़ो परियोजनियां वहां काम करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां जल का क्षेत्रीय असंतुलन है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं वर्षा जल संचयन हर गांव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर खेत और हर मोहल्ले को अपनी जलधारा बनाने का आधार बने। राजस्थान के जोहड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिलनाडु की एरी प्रणाली और गुजरात के चेकडैम वर्षों से सिद्ध कर रहे हैं कि स्थानीय परंपरा और आधुनिक तकनीक का मेल ही स्थायी जल प्रबंधन की कुंजी है। इसके साथ फसल चक्र में बदलाव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिक पानी मांगने वाली फसलों का पुनर्मूल्यांकन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार तथा भूजल के अंधाधुंध दोहन पर कठोर नियंत्रण भी अनिवार्य है। अब जल प्रबंधन का लक्ष्य केवल आपूर्ति बढ़ाना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">डिमांड मैनेजमेंट</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">होना चाहिए। क्योंकि बचाई गई हर बूंद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई उपलब्ध कराई गई हर बूंद जितनी ही मूल्यवान होती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जल का प्रश्न अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आर्थिक संतुलन और सामाजिक न्याय का भी विषय है। एक ओर शहरों में पानी की फिजूलखर्ची है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर गांव जीवन की मूल आवश्यकता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह असमानता स्वीकार्य नहीं हो सकती। इसलिए उद्योगों को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वॉटर पॉजिटिव</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बनना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि वे जितना जल उपयोग करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे अधिक संरक्षण और भूजल पुनर्भरण में योगदान दें। स्कूलों और महाविद्यालयों में कार्यात्मक वर्षा जल संचयन व्यवस्था केवल औपचारिकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिवार्यता बने। किसानों को</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इन-सिटू जल संचयन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के लिए प्रोत्साहित किया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि खेत ही वर्षा का पहला जलाशय बनें। जल संरक्षण तभी सफल होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब नीति और नागरिक समान जिम्मेदारी निभाएंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जल संकट का स्थायी समाधान नीतियों से पहले सोच बदलने में है। हमने पानी को प्रकृति का उपहार तो माना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उसके संरक्षण को अपना दायित्व नहीं समझा। अब यह दृष्टि बदलनी होगी। जल संरक्षण किसी मंत्रालय का कार्यक्रम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्रीय संस्कार बनना चाहिए। हर नागरिक अपनी छत को जलग्रहण क्षेत्र</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपनी भूमि को पुनर्भरण क्षेत्र और अपनी जीवनशैली को संरक्षण का माध्यम बनाए। सरकारें बांध</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नहरें और योजनाएं बना सकती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन यदि समाज पानी को केवल उपभोग की वस्तु मानता रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई भी परियोजना स्थायी परिणाम नहीं दे सकेगी। जल का भविष्य फाइलों में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरिक चेतना में सुरक्षित होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का जल भविष्य किसी एक महायोजना से सुरक्षित नहीं होगा। नदियों को जोड़ना क्षेत्रीय असंतुलन वाले क्षेत्रों में आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वर्षा की हर बूंद को धरती तक पहुँचाना राष्ट्रीय जल नीति की आधारशिला बनना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वही सबसे भरोसेमंद और सुलभ जल स्रोत है। इसलिए वर्षा जल संचयन को सहायक उपाय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राष्ट्रीय जल नीति की केंद्रीय रणनीति बनाया जाना चाहिए। बड़े नदी लिंक देश की मुख्य जलधाराएं बनें और वर्षा जल संचयन हर गांव</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर शहर और हर खेत की जीवनरेखा। भारत को यह स्वीकार करना होगा कि</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जल विकास का साधन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकास की सीमा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यदि आज हमने दूरदृष्टि दिखाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आने वाली पीढ़ियां हमें केवल विशाल परियोजनाओं के लिए नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हर बूंद को राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी मानने वाले विवेक के लिए याद रखेंगी। तभी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>"<span lang="hi" xml:lang="hi">जल है तो कल है"</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत की स्थायी राष्ट्रीय नीति बनेगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 22:02:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खबर को संज्ञान में लेते हुए नहर में छोड़ा गया पानी पशु पक्षी करो ग्रामीण क्षेत्र में अब नहीं होगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले में भीषण गर्मी और पानी की किल्लत के बीच सरयू नहर चार में पानी लंबे समय से सूखी नहरों और जलस्रोतों के कारण प्यास से बेहाल बेजुबान पशु-पक्षियों को अब पानी उपलब्ध हो सकेगा वहीं किसानों की सूखती फसलों को भी जीवनदान मिलने की उम्मीद जगी है जंगली जानवरों को अब पानी की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं जाना पड़ेगा  ऐसे में जंगली सूअर और जंगली नीलगाय जैसे जानवरों के लिए पानी की सुविधा उपलब्ध हो गई है लेकिन कुछ नारे अभी भी सुखी चल रही है</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">रजवाहा की नहर जो भ दावल से गुजर रही</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177956/taking-cognizance-of-the-news-water-released-into-the-canal"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260502-wa0062.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले में भीषण गर्मी और पानी की किल्लत के बीच सरयू नहर चार में पानी लंबे समय से सूखी नहरों और जलस्रोतों के कारण प्यास से बेहाल बेजुबान पशु-पक्षियों को अब पानी उपलब्ध हो सकेगा वहीं किसानों की सूखती फसलों को भी जीवनदान मिलने की उम्मीद जगी है जंगली जानवरों को अब पानी की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं जाना पड़ेगा  ऐसे में जंगली सूअर और जंगली नीलगाय जैसे जानवरों के लिए पानी की सुविधा उपलब्ध हो गई है लेकिन कुछ नारे अभी भी सुखी चल रही है</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रजवाहा की नहर जो भ दावल से गुजर रही है अभी तक सूखी हुई है छोटे-छोटेमाइनर पानी अगर छोड़ जाए और कुछ पानी सूखी हुई मनोरमा नदी में छोड़ जाए जिससे मनोरमा के आसपास रहने वाले जंगली जानवर पानी की तलाश में भटकना न पड़े मनोरमा नदी कहीं-कहीं हो गई है जिसका कारण है बरसों से सफाई न होना पानी दूषित होकर के रह गया है जिसको पीने से जानवर को मारने की आसान क्या है</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">छोटे मिनारो का पानी मनोरमा में छोड़ जाए जिससे वह नदी स्वच्छ और निर्मल हो जाए पानी आने से गन्ना किसानों को ज्यादा फायदा मिला है जिसमें किसने की सिंचाई में कोई बाधा नहीं आ सकती है ऐसे मौके पर छोटे मिनारो में भी पानी छोड़ा जाए इसके लिए जिला अधिकारी और सिंचाई विभाग के अधिकारियों के बीच सुदामा से वार्ताहुई थी लेकिन अभी तक उसे पर पहल नहीं किया गया ग्रामीणों का मांग की छोटे महीना में पानी छोड़ा जाए तथा नदियों में भी पानी नहरों का गिराया जाए जिससे नदी पानी छोड़ा जाए।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 22:13:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जलवायु अनुकूलन खेती आज के समय कि मांग - नसीम अंसारी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रतापगढ़।</strong> पृथ्वी दिवस सप्ताह के अवसर पर प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जन-जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से शनिवार को स्वयंसेवी संस्था तरुण चेतना द्वारा ग्राम रामपुर बेला में पृथ्वी दिवस समारोह उत्साहपूर्वक मनाया गया।इस अवसर पर 'तरुण चेतना' के निदेशक नसीम अंसारी ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में पृथ्वी को बचाना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी अनिवार्यता बन गई है।अंसारी ने जलवायु-स्मार्ट कृषि पर जोर देते हुए बताया कि यह पद्धति एक एकीकृत दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य बदलते मौसम में कृषि उत्पादकता बढ़ाना, जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177247/climate-adaptation-farming-is-the-need-of-the-hour-%E2%80%93"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260425-wa00641.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रतापगढ़।</strong> पृथ्वी दिवस सप्ताह के अवसर पर प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जन-जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से शनिवार को स्वयंसेवी संस्था तरुण चेतना द्वारा ग्राम रामपुर बेला में पृथ्वी दिवस समारोह उत्साहपूर्वक मनाया गया।इस अवसर पर 'तरुण चेतना' के निदेशक नसीम अंसारी ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए कहा कि बढ़ते प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के दौर में पृथ्वी को बचाना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी अनिवार्यता बन गई है।अंसारी ने जलवायु-स्मार्ट कृषि पर जोर देते हुए बताया कि यह पद्धति एक एकीकृत दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य बदलते मौसम में कृषि उत्पादकता बढ़ाना, जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन विकसित करना और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में पृथ्वी संरक्षण पर प्रकाश डालते हुए संस्था के उप निदेशक श्याम शंकर शुक्ला ने कहा कि वैज्ञानिक और प्राकृतिक खेती के माध्यम से हम मिट्टी की उर्वरता बनाए रख सकते हैं और जल संरक्षण को बढ़ावा दे सकते हैं। इससे पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलेगी।संस्था के उप निदेशक श्याम शंकर शुक्ला ने पृथ्वी संरक्षण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वर्षा जल संचयन और पानी की बर्बादी रोकने के तरीकों पर चर्चा करते हुए एकल उपयोग वाले प्लास्टिक का पूरी तरह बहिष्कार करने की अपील की। इस अवसर पर ग्राम प्रधान शिवकुमारी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ग्राम स्तर पर छोटे-छोटे प्रयासों से बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने ग्रामीणों से स्वच्छता और हरियाली बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाने का आग्रह किया। इसी क्रम में समाजसेवी रामआसरे वर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक होना चाहिए और अपने दैनिक जीवन में ऐसे कार्य करने चाहिए जो प्रकृति के अनुकूल हों। इस मौके पर तरुण चेतना के अभियान समन्वयक हुश्नारा बानो ने कहा कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ वातावरण छोड़ना हमारा नैतिक कर्तव्य है।कार्यक्रम का संचालन बाल अधिकार परियोजना के कोऑर्डिनेटर रजनीश कुमार द्वारा किया गया। कार्यक्रम में कलावती, संस्था के सह-निदेशक हकीम अंसारी, शोभावती मौर्या, सावित्री देवी, बृजलाल वर्मा सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 18:12:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>भारतीय रेलवे ने 2025-26 में 81 लाख 59 हजार पेड़ लगाए</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>रेलवे की ज़मीन पर 109 तालाब, जलाशय और आर्द्रभूमि का जीर्णोद्धार 909 मेगावाट सौर ऊर्जा और 103 मेगावाट  अतिरिक्त 3,300 मेगावाट परियोजनाओं के लिए समझौता किया गया। इसके अतिरिक्त, रेलवे पटरियों के किनारे वृक्षारोपण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधने में मदद करती हैं, जिससे कटाव कम होता है और भूस्खलन को रोका जा सकता है, खासकर पहाड़ी और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में। वनस्पति आवरण सतही अपवाह को नियंत्रित करता है और जल अवशोषण को बढ़ाता है, जिससे पटरियों के अस्थिर होने का खतरा कम</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177017/indian-railways-planted-81-lakh-59-thousand-trees-in-2025-26"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/indian-railway_650_022515010444.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>रेलवे की ज़मीन पर 109 तालाब, जलाशय और आर्द्रभूमि का जीर्णोद्धार 909 मेगावाट सौर ऊर्जा और 103 मेगावाट  अतिरिक्त 3,300 मेगावाट परियोजनाओं के लिए समझौता किया गया। इसके अतिरिक्त, रेलवे पटरियों के किनारे वृक्षारोपण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधने में मदद करती हैं, जिससे कटाव कम होता है और भूस्खलन को रोका जा सकता है, खासकर पहाड़ी और अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में। वनस्पति आवरण सतही अपवाह को नियंत्रित करता है और जल अवशोषण को बढ़ाता है, जिससे पटरियों के अस्थिर होने का खतरा कम होता है। प्रकृति-आधारित ये उपाय न केवल रेलवे संपत्तियों की रक्षा करते हैं बल्कि यात्रियों के लिए सुरक्षित और अधिक विश्वसनीय यात्राएं भी सुनिश्चित करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>जल: संचयन, पुनर्चक्रण, लेखापरीक्षा, पुनर्स्थापन</strong></div>
<div style="text-align:justify;">जल संकट हमारी सदी के सबसे बड़े संकटों में से एक है। भारतीय रेलवे, जो सैकड़ों धुलाई लाइनें, रखरखाव डिपो, खानपान सुविधाएं और यात्री सुविधाएं संचालित करता है और प्रतिदिन लाखों लीटर जल की खपत करता है, ने अपने सभी क्षेत्रों में जल उपयोग को कम करने के लिए सुनियोजित और ठोस कदम उठाए हैं। यह दृष्टिकोण व्यापक है: अपवाह में बह जाने से पहले वर्षा जल का संचयन करना, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण करके उसे गैर-पेय उपयोग में लाना, जल खपत की लेखापरीक्षा करके अपशिष्ट की पहचान करना और रेलवे भूमि के भीतर दूषित जल निकायों का पुनर्स्थापन करना।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>छतों पर वर्षा जल संचयन (आरडब्ल्यूएच): जहां बारिश हो रही है, वहीं उसे इकट्ठा करना</strong></div>
<div style="text-align:justify;">2016-17 से भारतीय रेलवे ने सभी रेलवे जोन में कुल 8,313 छतों पर वर्षा जल संचयन (आरडब्ल्यूएच) संरचनाएं स्थापित की हैं। अकेले पिछले दो वर्षों में 2,915 नई संरचनाएं चालू की गईं, जिनमें 2024-25 में जल संचय जन भागीदारी (जेएसजेबी) अभियान के तहत स्थापित 1,215 इकाइयां शामिल हैं, जो राष्ट्रीय जल संरक्षण मिशनों के साथ सक्रिय समन्वय को रेखांकित करती हैं। दक्षिण मध्य रेलवे 3,128 आरडब्ल्यूएच संरचनाएं स्थापित करके इस पहल में सबसे आगे है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय रेलवे का वर्षा जल संचयन अवसंरचना दोहरे उद्देश्य की पूर्ति करता है, जो विशेष रूप से भीषण मौसम की घटनाओं के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। स्टेशनों और यार्डों पर स्थापित छत पर लगे जल संचयन तंत्र मानसूनी जल को एकत्रित और प्रवाहित करते हैं, जिससे एक ओर प्लेटफार्मों और आस-पास की पटरियों पर जलभराव को रोका जा सकता है, वहीं दूसरी ओर भूमिगत जलभंडारों का पुनर्भरण होता है। राजस्थान के जल संकटग्रस्त क्षेत्रों या दक्कन के वर्षा-छाया क्षेत्रों में, ये प्रणालियाँ परिचालन के लिए जीवन रेखा हैं। एकत्रित जल स्टेशनों की सुविधाओं जैसे शौचालयों, सफाई और बागवानी में उपयोग किया जाता है, जिससे टैंकर आपूर्ति और नगरपालिका जल कनेक्शनों पर निर्भरता कम हो जाती है, जो अक्सर दूरस्थ स्टेशनों पर अनुपलब्ध या अविश्वसनीय होते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>जल पुनर्चक्रण संयंत्र</strong></div>
<div style="text-align:justify;">सभी ज़ोन में, भारतीय रेलवे ने कुल 185 जल पुनर्चक्रण संयंत्र (डब्ल्यूआरपी) चालू किए हैं। 2015-16 से पहले मौजूद 21 संयंत्रों के आधार से, चालू करने की प्रक्रिया निरंतर जारी रही है, और पिछला वित्तीय वर्ष अब तक का सबसे मजबूत वर्ष रहा है जिसमें 26 नए संयंत्र चालू किए गए हैं। उत्तरी रेलवे 27 संयंत्रों के साथ सभी ज़ोन में सबसे आगे है, उसके बाद मध्य रेलवे (21) और दक्षिणी रेलवे (20) का स्थान है। ये संयंत्र कोच धोने और यार्ड संचालन से निकलने वाले अपशिष्ट जल का उपचार करके उसे गैर-पेय उपयोगों जैसे स्टेशन सफाई, बागवानी और औद्योगिक प्रक्रियाओं में पुन: उपयोग के लिए तैयार करते हैं, जिससे दुर्लभ जलभंडारों और नगरपालिका प्रणालियों से ताजे पानी की निकासी कम होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">2025-26 में अब तक 310 लेखापरीक्षाएँ दर्ज की जा चुकी हैं, जो किसी एक वर्ष में सबसे अधिक हैं। दक्षिण मध्य रेलवे 442 लेखापरीक्षाओं के साथ सबसे आगे है, उसके बाद उत्तरी रेलवे (323) और पश्चिमी रेलवे (216) का स्थान आता है। इन लेखापरीक्षाओं के माध्यम से जल खपत के प्रमुख क्षेत्रों, पाइप रिसावों और प्रणाली की कमियों की पहचान की जाती है, जिससे जागरूकता को लक्षित बचत में परिवर्तित किया जा सके। मापन का अनुशासन सार्थक संरक्षण की नींव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय रेलवे ने 2024-25 में 2016-17 की तुलना में 178 करोड़ लीटर डीजल की बचत की, जो 62% की बचत है, जिससे कच्चे तेल पर आयात निर्भरता कम हो गई है। पश्चिम एशिया संकट के बीच यह भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता को सीधे तौर पर कम करता है। डीजल से घरेलू स्तर पर उत्पादित बिजली की ओर धीरे-धीरे बढ़ते हुए, जो नवीकरणीय स्रोतों से अधिकाधिक प्राप्त की जा रही है, रेलवे ने वैश्विक तेल बाजार की अस्थिरता से अपने संचालन को प्रभावी ढंग से अलग कर लिया है। विद्युत कर्षण (इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन) को बायोडीजल जैसे विकल्पों की तुलना में कहीं अधिक लागत प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल पाया गया है, जिससे यह न केवल एक पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है, बल्कि आर्थिक रूप से भी जिम्मेदार विकल्प है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>बायो-टॉयलेट: रेल पर पर्यावरण-अनुकूल स्वच्छता</strong></div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय रेलवे ने 2014 से यात्री डिब्बों में 3.66 लाख से अधिक बायो-टॉयलेट लगाकर पर्यावरण स्थिरता और यात्री स्वच्छता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस पहल ने रेलवे ट्रैक पर मानव मल के सीधे निर्वहन को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया है, जिससे स्वच्छ स्टेशन, बेहतर स्वच्छता और लाखों यात्रियों के लिए अधिक स्वच्छ यात्रा अनुभव सुनिश्चित हुआ है। बायो-टॉयलेट प्रणाली सूक्ष्मजीव क्रिया पर आधारित स्वदेशी तकनीक का उपयोग करके मानव मल को पानी और गैसों में विघटित करती है, जिससे पर्यावरणीय प्रदूषण और दुर्गंध में काफी कमी आती है और पूरे नेटवर्क में स्वच्छता बनी रहती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह पहल मिट्टी और ट्रैक के संदूषण को रोककर, रेलवे संपत्तियों के क्षरण को कम करके और पर्यावरण-अनुकूल अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा देकर पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रत्यक्ष उत्सर्जन को शून्य करके और टिकाऊ स्वच्छता प्रथाओं का समर्थन करके, भारतीय रेलवे यात्रियों के आराम को बेहतर बनाते हुए स्वच्छ पारिस्थितिकी तंत्र और हरित भविष्य में योगदान दे रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>नवीकरणीय ऊर्जा: सूर्य और पवन से भविष्य को शक्ति प्रदान करना</strong></div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय रेलवे ने नवीकरणीय ऊर्जा को अपनी दीर्घकालिक परिचालन रणनीति का आधार बनाया है। दिसंबर 2025 तक, पूरे नेटवर्क में लगभग 909 मेगावाट के सौर ऊर्जा संयंत्र और 103 मेगावाट के पवन ऊर्जा संयंत्र चालू हो चुके हैं। पहले से चालू संयंत्रों के अलावा, रेलवे ने राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के डेवलपर्स के साथ सौर, पवन और हाइब्रिड चौबीसों घंटे (आरटीसी) व्यवस्थाओं सहित 3,300 मेगावाट की अतिरिक्त नवीकरणीय क्षमता के लिए समझौते किए हैं, जिससे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने के लिए स्वच्छ ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। यह दीर्घकालिक, स्थिर मूल्य वाली हरित खरीद की ओर एक सुनियोजित बदलाव को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>एलईडी प्रकाश व्यवस्था: एक कुशल रूप से प्रकाशित नेटवर्क</strong></div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय रेलवे ने अपने कार्यालयों, रेलवे स्टेशनों, सेवा भवनों और आवासीय कॉलोनियों में 100% एलईडी प्रकाश व्यवस्था स्थापित कर ली है। यह एक व्यापक परिवर्तन है जो दूरस्थ स्टेशनों से लेकर देश के सबसे बड़े जंक्शनों तक हजारों स्थानों तक फैला हुआ है। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 22:04:23 +0530</pubDate>
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