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                <title> swatantra vichar - Swatantra Prabhat</title>
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                <description> swatantra vichar RSS Feed</description>
                
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                <title>मेक्सिको का शॉक: भारत के निर्यात पर टैरिफ़ की आग</title>
                                    <description><![CDATA[<h5 class="MsoNormal" align="center"><strong>[<span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ संकट वहाँ अवसर: भारत का मेक्सिको व्यापार युद्ध</span>]</strong></h5>
<h5 class="MsoNormal" align="center"><strong>[<span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनौती मिली: भारत और मेक्सिको का व्यापार मोड़</span>]</strong></h5>
<p class="MsoNormal">10 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिसंबर </span>2025, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तारीख एशियाई व्यापार इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज हो गई है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मेक्सिको की सीनेट ने तेजी से उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी कल्पना पहले असंभव लग रही थी—गैर-एफटीए</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एशियाई देशों से आयात पर ऊंची टैरिफ दीवार। यह नियम </span>1 <span lang="hi" xml:lang="hi">जनवरी </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">से लागू होगा और </span>1,400 <span lang="hi" xml:lang="hi">से अधिक उत्पादों को प्रभावित करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अधिकांश पर टैरिफ </span>35 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कुछ प्रमुख</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/163223/mexicos-shock-tariff-fire-on-indias-exports"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/800x450_1955819-mexico-imposes-50-percent-tariff.webp" alt=""></a><br /><h5 class="MsoNormal" align="center"><strong>[<span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ संकट वहाँ अवसर: भारत का मेक्सिको व्यापार युद्ध</span>]</strong></h5>
<h5 class="MsoNormal" align="center"><strong>[<span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनौती मिली: भारत और मेक्सिको का व्यापार मोड़</span>]</strong></h5>
<p class="MsoNormal">10 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिसंबर </span>2025, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह तारीख एशियाई व्यापार इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज हो गई है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मेक्सिको की सीनेट ने तेजी से उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसकी कल्पना पहले असंभव लग रही थी—गैर-एफटीए</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एशियाई देशों से आयात पर ऊंची टैरिफ दीवार। यह नियम </span>1 <span lang="hi" xml:lang="hi">जनवरी </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">से लागू होगा और </span>1,400 <span lang="hi" xml:lang="hi">से अधिक उत्पादों को प्रभावित करेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अधिकांश पर टैरिफ </span>35 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कुछ प्रमुख सेक्टरों (जैसे ऑटोमोबाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ ऑटो पार्ट्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टील और टेक्सटाइल) पर यह </span>50 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक पहुंच सकती है। ऑटोमोबाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टेक्सटाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मशीनरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्टील और प्लास्टिक—ये सभी प्रमुख सेक्टर इस नए बदलाव की चपेट में हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के लिए इस फैसले की मार सबसे गहरी है। न कोई एफटीए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कोई प्राथमिकता आधारित सुरक्षा—भारत मेक्सिको की नजर में पूरी तरह असुरक्षित खड़ा है। </span>2024–25 <span lang="hi" xml:lang="hi">में भारत ने मेक्सिको को लगभग </span>5.3–5.7 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलियन डॉलर का निर्यात किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अकेले ऑटोमोबाइल सेक्टर की हिस्सेदारी लगभग </span>1 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलियन डॉलर तक पहुंचती है। मेक्सिको भारत का तीसरा सबसे बड़ा कार निर्यात बाजार है। अब वोल्क्सवैगन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ह्युंडई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मारुति और निसान जैसी कंपनियों के वाहनों पर लगने वाली ड्यूटी वर्तमान </span>20 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत से बढ़कर कुछ मामलों में </span>50 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक पहुंच सकती है (हालांकि अधिकांश उत्पादों पर </span>35 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत की सीमा)।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सिर्फ आंकड़ों का मामला नहीं—यह रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सप्लाई चेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवेश और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर मंडराता गहरा संकट है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है: क्या यह हार का संकेत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या भारत के लिए रणनीति बदलकर व्यापार के नए युग की शुरुआत करने का मौका</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">सच्चाई यह है कि मेक्सिको का यह फैसला अचानक नहीं उभरा। इसके पीछे अमेरिकी दबाव की छाया साफ दिखती है। डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और यूएसएमसीए</span> (<span lang="hi" xml:lang="hi">यूनाइटेड स्टेट्स-मेक्सिको-कनाडा एग्रीमेंट</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">की नज़दीकी समीक्षा ने मेक्सिको को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहाँ अमेरिका की नाराज़गी मोल लेना उसके लिए महंगा पड़ सकता है। चीन से आने वाले लगभग </span>130 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलियन डॉलर के आयात पर अमेरिकी चेतावनियाँ लंबे समय से जारी थीं। निशाना भले चीन था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन प्रभाव की आग की लपटें भारत तक भी पहुँच गईं—अनचाही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बेहद तीखी।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">मेक्सिको की सरकार इस फैसले को घरेलू उद्योगों की ढाल बताने की कोशिश कर रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन असल इरादा कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देता है—अमेरिका को साधने का। चीन को रोकने की अमेरिकी मुहिम में अब भारत जैसे देशों के हित भी अनचाहे नुकसान झेल रहे हैं। भारतीय ऑटो उद्योग पहले ही एसआईएएम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>(<span lang="hi" xml:lang="hi">सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफ़ैक्चरर्स</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">के ज़रिये मौजूदा स्थिति बनाए रखने की मांग उठा चुका था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर अब टैरिफ़ की इस लहर को थाम पाना लगभग नामुमकिन हो गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">नुकसान का स्वरूप वाकई गंभीर है। ऑटो निर्यात में लगभग </span>1 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलियन डॉलर की चोट का अनुमान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कुल निर्यात में </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में </span>15-25 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक की गिरावट संभव है (हालिया ट्रेंड्स के आधार पर)।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरात</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तमिलनाडु और महाराष्ट्र के ऑटो क्लस्टर्स पर इसका सीधा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारी असर दिखेगा। टेक्सटाइल सेक्टर में </span>35 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक की टैरिफ सूरत और कोयंबटूर जैसे केंद्रों को प्रभावित करेगी। स्टील और प्लास्टिक में जेएसडब्ल्यू</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसी कंपनियां लगभग </span>300 <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलियन डॉलर तक का कारोबार गंवा सकती हैं। अनुमान है कि </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में कुल निर्यात </span>15 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>25 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक गिर सकता है—एक ऐसा झटका जो पूरे व्यापार ढांचे को हिला देगा।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेक्सिको भी इस निर्णय से पूरी तरह सुरक्षित नहीं। इतने भारी टैरिफ़ वहां की उत्पादन लागत को </span>10–15 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं और घरेलू महंगाई का जोखिम भी तेज़ी से उभर सकता है। फिर भी भारत के लिए यह संकट अवसर का एक नया दरवाजा खोल सकता है। इतिहास गवाही देता है कि बड़े झटकों ने कई बार भारत को मजबूत बनाया है। </span>2018 <span lang="hi" xml:lang="hi">में अमेरिकी स्टील टैरिफ के बाद भारत ने अपनी क्षमताएं बढ़ाईं और आत्मनिर्भरता की दिशा में नई गति पकड़ी। आज पीएलआई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्कीमों के कारण ऑटो क्षेत्र में रिकॉर्ड निवेश हो चुका है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब भारत के सामने स्पष्ट राह है—डिप्लोमेसी और व्यापारिक रणनीति को नए सिरे से धार देना। भारत–मेक्सिको एफटीए</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को अब शीर्ष प्राथमिकता बनाना होगा। यदि पूर्ण एफटीए</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तुरंत संभव न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कम से कम पीटीए (प्रीफ़रेन्शियल ट्रेड एग्रीमेंट)</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के ज़रिये कुछ महत्वपूर्ण सेक्टरों को राहत दी जा सकती है। लैटिन अमेरिका में फिलहाल भारत का व्यापार केवल </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत है—इसे दोगुना करने का समय आ चुका है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">बाज़ार विविधीकरण आज भारत की सबसे तत्काल और निर्णायक जरूरत बन चुका है। मेक्सिको पर निर्भर निर्यात का एक बड़ा हिस्सा अफ्रीका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आसियान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ब्राज़ील और चिली जैसे उभरते बाज़ारों में सहज रूप से स्थानांतरित किया जा सकता है। इससे न केवल जोखिम कम होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नए अवसरों के लिए दरवाजे भी खुलेंगे। चीनी सप्लाई चेन से बाहर निकलने की कोशिश कर रही वैश्विक कंपनियों—फॉक्सकॉन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एप्पल और कई अन्य—को भारत में और बड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेज़ और स्थायी निवेश अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं। ईवी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सोलर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेमीकंडक्टर और हाई-टेक कंपोनेंट्स में भारत अगले दशक की सबसे तेज़ उभरती शक्ति बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">पीएलआई</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्कीम को अब ऑटो कंपोनेंट्स से आगे बढ़ाकर ईवी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पार्ट्स</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैटरी सिस्टम और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स की दिशा में और मजबूत आधार दिया जा सकता है। निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए सब्सिडी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">टैक्स रिफंड और फास्ट-ट्रैक मंजूरी तंत्र बेहद आवश्यक हैं। और यदि जरूरत पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भारत डब्ल्यूटीओ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के मंच पर भी इस टैरिफ को चुनौती दे सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि यह संरक्षणवाद की चरम सीमा को दर्शाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बावजूद भविष्य में अवसरों की संभावनाएं कहीं अधिक उज्ज्वल दिखती हैं। लैटिन अमेरिका में </span>200 <span lang="hi" xml:lang="hi">से अधिक भारतीय कंपनियां पहले से काम कर रही हैं—आईटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फार्मा और ऑटो उद्योगों में लगभग </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलियन डॉलर के निवेश के साथ। यदि भारत सुविचारित रणनीति अपनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो </span>2030 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक भारत–मेक्सिको व्यापार </span>20 <span lang="hi" xml:lang="hi">बिलियन डॉलर के पार पहुँच सकता है। वैकल्पिक बाजारों में </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत वृद्धि ही लगभग </span>500 <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलियन डॉलर का अतिरिक्त लाभ दे सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह टैरिफ़ तूफ़ान भारत को रोकने नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि जगाने आया है। वही राष्ट्र बड़ी छलांग लगाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो संकट की राख में अवसरों की चिंगारी पहचान लेते हैं। भारत के पास नवाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक कूटनीति और वैश्विक साझेदारी—तीनों की सशक्त शक्ति मौजूद है। इस चुनौती का सीधा सामना करके भारत न सिर्फ मेक्सिको की बाधा को पीछे छोड़ेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वैश्विक व्यापार की नई धुरी बनकर उभरेगा। भारत सिर्फ एक निर्यातक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय व्यापार का अनुभवी योद्धा है। और इस बार भी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लड़ाई कठिन जरूर है—पर परिणाम विजय के ही पक्ष में खड़े हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”,</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Dec 2025 18:18:35 +0530</pubDate>
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                <title>मानव अधिकार दिवस : सभ्यता के नैतिक विवेक का दर्पण</title>
                                    <description><![CDATA[<p><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हर वर्ष </span>10 <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">दिसंबर को दुनिया मानवता के उस मूल्य को याद करती है जो किसी भी राष्ट्र</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">धर्म या शासन की सीमाओं से परे है—मानवाधिकार। यह दिन कैलेंडर की एक साधारण तारीख नहीं</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि उस आत्मा का उत्सव है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है। यह हमें याद दिलाता है कि सभ्यता का विकास केवल तकनीकी प्रगति से नहीं</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि इस बात से मापा जाता है कि हम सामाजिक</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आर्थिक और राजनीतिक रूप से सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। मानव अधिकार दिवस हमें हमारे सामूहिक विवेक से यह प्रश्न पूछने का</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/163019/human-rights-day-is-a-mirror-of-the-moral-conscience"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-12/human-rights-day.webp" alt=""></a><br /><p><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हर वर्ष </span>10 <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">दिसंबर को दुनिया मानवता के उस मूल्य को याद करती है जो किसी भी राष्ट्र</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">धर्म या शासन की सीमाओं से परे है—मानवाधिकार। यह दिन कैलेंडर की एक साधारण तारीख नहीं</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि उस आत्मा का उत्सव है जो मनुष्य को मनुष्य बनाती है। यह हमें याद दिलाता है कि सभ्यता का विकास केवल तकनीकी प्रगति से नहीं</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि इस बात से मापा जाता है कि हम सामाजिक</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आर्थिक और राजनीतिक रूप से सबसे कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। मानव अधिकार दिवस हमें हमारे सामूहिक विवेक से यह प्रश्न पूछने का अवसर देता है कि क्या सचमुच हम उस दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ हर मनुष्य गरिमा</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सम्मान और स्वतंत्रता के साथ जी सके।</span></p>
<p><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका ने दुनिया को भीतर तक झकझोर दिया था। जब नस्ल</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">धर्म और विचार के आधार पर मनुष्यों का निर्मम संहार हुआ</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">तब मानवता ने महसूस किया कि सभ्यता का ढांचा कितनी आसानी से ध्वस्त हो सकता है। इसी ऐतिहासिक चेतना ने </span>1948 <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">में संयुक्त राष्ट्र महासभा को ‘मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा’ अपनाने के लिए प्रेरित किया</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिसने पहली बार यह स्पष्ट किया कि मनुष्य के अधिकार राज्य की इच्छा नहीं हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि जन्मसिद्ध हैं—वे मनुष्य होने के कारण स्वतः प्राप्त हैं। इस घोषणा का पहला वाक्य—</span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सभी</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मनुष्य</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जन्म</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">से</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">स्वतंत्र</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">समान</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गरिमा</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">एवं</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अधिकारों</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अधिकारी</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">—आज</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">भी</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">नैतिकता</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सबसे</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">स्पष्ट</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">सार्वभौमिक</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">घोषणापत्र</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">है।</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">यह</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अंतःकरण</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वह</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आवाज़</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">है</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जो</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">किसी</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">एक</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">देश</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">या</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">संस्कृति</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">नहीं</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि पूरी मानवता की है।</span></p>
<p><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">भारत ने</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">स्वतंत्रता के तत्काल बाद</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इन सिद्धांतों को अपने संविधान में समाहित करके एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। संविधान के मौलिक अधिकार नागरिकों को समानता</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जीवन और स्वतंत्रता</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">धार्मिक स्वतंत्रता और शोषण से मुक्ति का आश्वासन देते हैं। यह न केवल राजनीतिक दस्तावेज़ है</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि हमारे लोकतंत्र का नैतिक आधार भी है। </span>1993 <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना इसी प्रतिबद्धता की निरंतरता है</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जिसका उद्देश्य राज्य की नीतियों और कार्यवाहियों से उत्पन्न होने वाले किसी भी अन्याय की निगरानी करना है। यह आयोग उन नागरिकों की आवाज़ बनने का प्रयास करता है जो शक्ति-संरचनाओं में हाशिए पर छूट जाते हैं।</span></p>
<p><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">परंतु मानव अधिकार का अर्थ केवल विधिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह किसी वर्ग को दिया गया उपकार भी नहीं है। यह मनुष्य की गरिमा का वह बुनियादी सिद्धांत है जो बताता है कि किसी व्यक्ति के साथ किया गया अन्याय केवल उसके विरुद्ध नहीं</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि पूरी मानवता के विरुद्ध अपराध है। महात्मा गांधी ने कहा था कि </span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">किसी</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">एक</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मनुष्य</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">का</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अपमान</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">समूची मानवता का अपमान है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">यही</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">व्यापकता</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">संवेदनशीलता</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मानवाधिकारों</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">की</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आत्मा</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">है</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">। जहाँ गरिमा का हनन होता है—चाहे वह जाति के आधार पर भेदभाव हो</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">लिंग असमानता</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">धार्मिक उत्पीड़न</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">श्रम का शोषण</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">या अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध—वहाँ मानवाधिकार खतरे में पड़ जाते हैं।</span></p>
<p><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आज का समय इन अधिकारों को नए प्रकार की चुनौतियों के बीच परखता है। युद्ध और आतंकवाद ने दुनिया के कई हिस्सों में नागरिक जीवन को अस्थिर कर रखा है। मध्य पूर्व और अफ्रीका के संघर्षों के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए हैं और मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। एशिया के कई देशों में राजनीतिक असहमति पर अंकुश और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरे बढ़ रहे हैं। लोकतांत्रिक देशों में भी निगरानी प्रणालियों</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डेटा-संग्रह और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के विस्तार ने निजता के अधिकार पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। वही तकनीक</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जो विकास का साधन हो सकती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कई बार नियंत्रण का साधन बनकर सामने आती है। संयुक्त राष्ट्र का </span>2025 <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">का थीम—</span><span lang="hi" xml:lang="hi">“</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डिजिटल</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">समानता</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मानव</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">गरिमा</span><span lang="hi" xml:lang="hi">”</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">—विश्व</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">समुदाय</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">को</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">चेतावनी</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">देता</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">है</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">कि</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">तकनीकी</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">प्रगति</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">यदि</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मानवीय</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मूल्यों</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">के</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">साथ</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">संयोजित</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">न</span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">हो</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">तो वह नई असमानताओं को जन्म दे सकती है।</span></p>
<p><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में मानव अधिकार विमर्श और भी जटिल हो जाता है। जाति</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">लिंग</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वर्ग और धर्म के आधार पर भेदभाव की ऐतिहासिक परंपराएँ आज भी सामाजिक व्यवहार में दिखाई देती हैं। दलित</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">आदिवासी</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">महिला और अल्पसंख्यक समुदायों को कई बार अपने अधिकारों के लिए अत्यधिक संघर्ष करना पड़ता है। न्यायपालिका और मीडिया कई मामलों में आवाज़ उठाते हैं</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज का स्वास्थ्य केवल संस्थानों पर निर्भर नहीं हो सकता। सामाजिक चेतना और नागरिक संवेदनशीलता उतनी ही आवश्यक है। जब तक समाज अपने भीतर निहित असमानताओं को स्वीकार करके उन्हें मिटाने का प्रयास नहीं करेगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">तब तक मानवाधिकार केवल कानूनी वाक्यों तक सीमित रह जाएँगे।</span></p>
<p><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मानव अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संबंध भी उतना ही अनिवार्य है। अक्सर यह गलतफहमी रहती है कि मानवाधिकार केवल अधिकारों की माँग का दस्तावेज़ है। परंतु किसी समाज में अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब नागरिक स्वयं दूसरों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील हों। संविधान के मौलिक कर्तव्य इसी संतुलन की ओर संकेत करते हैं। अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के पूरक हैं</span>; <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जहाँ अधिकारों की अनदेखी अत्याचार को जन्म देती है</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वहीं कर्तव्यों की उपेक्षा अव्यवस्था पैदा करती है।</span></p>
<p>21<span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वीं सदी ने मानवाधिकारों के दायरे को और विस्तृत कर दिया है। स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">जलवायु न्याय</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">इंटरनेट पहुँच</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">डेटा सुरक्षा</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">और लैंगिक विविधता की मान्यता—ये सभी नए आयाम हैं जिनके बिना आधुनिक समाज में समता और सम्मान की कल्पना अधूरी है। जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित वे समुदाय हैं जिनके पास संसाधन और राजनीतिक शक्ति सबसे कम है। इस संदर्भ में जलवायु न्याय एक वैश्विक नैतिक ज़रूरत</span> <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">के रूप में उभर रहा है। इसी प्रकार डिजिटल अधिकारों की लड़ाई यह सुनिश्चित करती है कि तकनीक मानव को नियंत्रित करने का औज़ार न बने</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि उसकी स्वतंत्रता और अवसरों का विस्तार करे।</span></p>
<p><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मानव अधिकार दिवस इसलिए महज एक स्मृति-दिवस नहीं</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि भविष्य की जिम्मेदारी का दिन है। यह हमें याद दिलाता है कि दुनिया की वास्तविक प्रगति इस बात में नहीं है कि हमने कितने बड़े बाँध या कितनी तेज़ मशीनें बनाई हैं</span>; <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">बल्कि इसमें है कि हमारे समाज में सबसे कमजोर व्यक्ति कितनी गरिमा के साथ जीवन जी रहा है। जब दुनिया का हर मनुष्य भय</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">अपमान और भेदभाव से मुक्त होकर जी सकेगा</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">तभी मानव अधिकार दिवस की भावना सचमुच साकार होगी। मानवता की असली कसौटी यही है कि हम अपने भीतर और अपने समाज में कितनी दया</span>, <span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">न्याय और समानता को जगह देते हैं। यही विवेक हमारी सभ्यता का भविष्य सुनिश्चित करेगा।</span></p>
<p><strong><span lang="hi" style="font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">महेन्द्र</span><span lang="hi" style="font-size:12pt;color:#2d2d2d;" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" style="font-size:12pt;font-family:'Arial Unicode MS', 'sans-serif';color:#2d2d2d;" xml:lang="hi">तिवारी</span></span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 09 Dec 2025 17:21:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
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                <title>अफगानिस्तान- पाकिस्तान संघर्ष के सियासी रंग, भारत अमेरिकी प्रभाव के दूरगामी परिणाम।</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारतीय उपमहाद्वीप का यह त्रिकोण भारत, अफगानिस्तान और पाकिस्तान एशिया की भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील और जटिल क्षेत्र है। यह केवल सीमाओं का नहीं बल्कि सभ्यताओं, संस्कृतियों और विचारधाराओं का संगम है। तीनों देशों के रिश्ते प्राचीन इतिहास से लेकर आधुनिक काल तक निरंतर बदलते रहे हैं। कभी यह सांस्कृतिक सेतु रहा, तो कभी वैचारिक युद्ध का मैदान। और आज, यह क्षेत्र वैश्विक शक्तियों, विशेषकर अमेरिका और ब्रिटेन के प्रभावों से भी गहराई से प्रभावित है।</p>
<p>अफगानिस्तान भारत की सांस्कृतिक परिधि का हिस्सा रहा है। गांधार, तक्षशिला, बामियान जैसे नाम इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि भारत की बौद्ध</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/159476/political-colors-of-afghanistan-pakistan-conflict-and-far-reaching-consequences-of-indo-american"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-11/अफगानिस्तान--पाकिस्तान-संघर्ष-के-सियासी-रंग,-भारत-अमेरिकी-प्रभाव-के-दूरगामी-परिणाम.jpg" alt=""></a><br /><p>भारतीय उपमहाद्वीप का यह त्रिकोण भारत, अफगानिस्तान और पाकिस्तान एशिया की भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील और जटिल क्षेत्र है। यह केवल सीमाओं का नहीं बल्कि सभ्यताओं, संस्कृतियों और विचारधाराओं का संगम है। तीनों देशों के रिश्ते प्राचीन इतिहास से लेकर आधुनिक काल तक निरंतर बदलते रहे हैं। कभी यह सांस्कृतिक सेतु रहा, तो कभी वैचारिक युद्ध का मैदान। और आज, यह क्षेत्र वैश्विक शक्तियों, विशेषकर अमेरिका और ब्रिटेन के प्रभावों से भी गहराई से प्रभावित है।</p>
<p>अफगानिस्तान भारत की सांस्कृतिक परिधि का हिस्सा रहा है। गांधार, तक्षशिला, बामियान जैसे नाम इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि भारत की बौद्ध और वैदिक परंपराएं सिंधु से काबुल तक प्रवाहित होती थीं। सम्राट अशोक के शिलालेख आज भी कंधार में मिलते हैं, और कुषाण काल की कला भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव की साक्षी है। परंतु समय के साथ जब तुर्क और मुगल आक्रमणों के लिए यही अफगानिस्तान मार्ग बना, तो यह सांस्कृतिक सेतु धीरे-धीरे संघर्ष की भूमि में बदल गया। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने इस भूगोल को अपनी सामरिक राजनीति का केंद्र बना लिया। उन्नीसवीं सदी के <em>“ग्रेट गेम”</em> में अफगानिस्तान रूस और ब्रिटेन के बीच बफर स्टेट घोषित हुआ, और 1893 में खींची गई <em>दुर्रान रेखा</em> ने पश्तून समुदाय को दो हिस्सों में बाँट दिया। यह सीमा आज भी अफगान-पाक संबंधों की सबसे बड़ी दरार है।</p>
<p>1947 में भारत के विभाजन ने इस त्रिकोण को निर्णायक रूप से बदल दिया। अफगानिस्तान ने पाकिस्तान को प्रारंभ में मान्यता नहीं दी क्योंकि उसे अपने पश्तून क्षेत्रों की चिंता थी। वहीं भारत ने अफगानिस्तान के साथ अपने ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों को बनाए रखा। पर ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा छोड़ी गई विभाजन की रेखाएँ दोनों के बीच अविश्वास के बीज बो गईं, जिनका असर आज तक है। इसके बाद शीतयुद्ध के काल में यह त्रिकोण वैश्विक शक्ति-संघर्ष का रणक्षेत्र बन गया। 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान प्रवेश के साथ अमेरिका ने पाकिस्तान को “फ्रंटलाइन स्टेट” बनाकर अफगान मुजाहिदीनों को हथियार और प्रशिक्षण दिया।</p>
<p>पाकिस्तान की आई.एस.आई. को अमेरिकी डॉलर और सऊदी समर्थन मिला, जिससे आतंकवाद की वह संस्कृति पैदा हुई जिसने पूरे क्षेत्र को झुलसा दिया। भारत, जो सोवियत संघ का घनिष्ठ सहयोगी था, ने उस समय अफगानिस्तान की समाजवादी सरकार का समर्थन किया। इस प्रकार भारत-पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता को एक नया आयाम मिला, और अफगानिस्तान की धरती शीतयुद्ध की प्रयोगशाला बन गई।</p>
<p>1989 में सोवियत सेनाओं की वापसी और उसके बाद की अस्थिरता ने पाकिस्तान को अल्पकालिक सामरिक लाभ तो दिया, पर दीर्घकाल में वही आग उसकी सीमाओं के भीतर फैल गई। 1990 के दशक में अमेरिका के समर्थन से पनपा तालिबान शासन पाकिस्तान के प्रभाव में तो आया, पर उसने अफगान समाज को मध्ययुगीन अंधकार में धकेल दिया। फिर 2001 में <em>9/11</em> के हमलों ने अमेरिका को एक बार फिर अफगानिस्तान खींच लिया। अमेरिका ने तालिबान शासन को समाप्त कर लोकतांत्रिक सरकार स्थापित की, और इस बार भारत को पुनर्निर्माण में सहयोग का अवसर मिला।</p>
<p>भारत ने अफगानिस्तान में सड़कों, स्कूलों, अस्पतालों, और संसद भवन का निर्माण कर वहाँ के जनमानस में विश्वास अर्जित किया। यह भारत की <em>सॉफ्ट पावर</em> का सबसे प्रभावी प्रदर्शन था। परंतु अमेरिकी नीति दोधारी तलवार साबित हुई। वह विकास के बजाय आतंकवाद को समाप्त करने पर केंद्रित रही, और उसकी दृष्टि अफगान समाज की आंतरिक संरचना को समझने में असफल रही। पाकिस्तान ने अमेरिका को सहयोगी बनाकर अरबों डॉलर प्राप्त किए, पर उसी दौरान उसने तालिबान को भी गुप्त समर्थन दिया। यह द्वंद्व 2021 में अमेरिकी वापसी के साथ उजागर हो गया, जब तालिबान पुनः सत्ता में लौट आया।</p>
<p>अमेरिका की यह वापसी न केवल अफगानिस्तान के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए अनिश्चितता की वापसी थी। पाकिस्तान को लगा था कि नया तालिबान शासन उसके अनुकूल होगा, पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के बढ़ते हमलों ने उसकी नीति को उलझन में डाल दिया। अब पाकिस्तान उसी आतंकवाद का शिकार है, जिसे उसने कभी रणनीतिक संपत्ति कहा था। भारत ने इस दौर में अत्यंत संयम और व्यावहारिकता दिखाई। उसने तालिबान शासन को औपचारिक मान्यता नहीं दी, पर मानवीय सहायता जारी रखी। भारत जानता है कि अफगानिस्तान की अस्थिरता का सीधा प्रभाव उसकी सुरक्षा पर पड़ेगा—विशेषतः कश्मीर और सीमा पार आतंकवाद के रूप में।</p>
<p>इस परिस्थिति में भारत का उद्देश्य विकास और स्थायित्व को प्राथमिकता देना है, न कि सत्ता परिवर्तन में हस्तक्षेप करना। दूसरी ओर, अमेरिका अब प्रत्यक्ष उपस्थिति के बजाय ‘नियंत्रित अस्थिरता’ की नीति अपनाए हुए है ताकि वह चीन और रूस के बढ़ते प्रभाव को सीमित रख सके। यही कारण है कि अफगानिस्तान आज भी वैश्विक शक्ति-संतुलन का केंद्र बना हुआ है।</p>
<p>ब्रिटिश औपनिवेशिक मानसिकता और उसकी छोड़ी हुई राजनीतिक रेखाएँ अब भी इस त्रिकोण की दिशा निर्धारित करती हैं। पाकिस्तान की सैन्य और नौकरशाही संरचना ब्रिटिश शासन की ही उपज है, जिसमें धर्म को राजनीति का औजार बनाया गया। वहीं अफगानिस्तान की आंतरिक अस्थिरता, ब्रिटिश और बाद में अमेरिकी प्रयोगों की देन है। भारत इस त्रिकोण में एकमात्र ऐसा देश है जिसने बिना किसी औपनिवेशिक मानसिकता के, केवल विकास और सांस्कृतिक संवाद की नीति अपनाई। वह न तो पश्चिम की कठपुतली बना, न किसी सामरिक गठबंधन का मोहरा।</p>
<p>वर्तमान में जब पाकिस्तान आर्थिक संकट और राजनीतिक अराजकता से जूझ रहा है, अफगानिस्तान तालिबान शासन के कठोर धार्मिक नियंत्रण में है, और अमेरिका इस पूरे क्षेत्र को अपने वैश्विक हितों की दृष्टि से देख रहा है, तब भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह शांति और विकास के माध्यम से इस क्षेत्र में स्थायित्व का संतुलन बनाए। भारत की कूटनीति आज “रणनीतिक स्वायत्तता” की दिशा में है—न तो शीतयुद्ध की गुटनिरपेक्षता, न ही किसी महाशक्ति की अधीनता।</p>
<p><br />यह त्रिकोणीय रिश्ता इतिहास की दृष्टि से जितना पुराना है, उतना ही जटिल भी। इसमें विश्वास और भय, संस्कृति और सत्ता, विकास और आतंकवाद—सब साथ-साथ चलते हैं। यदि तीनों देश यह समझ लें कि स्थायित्व और समृद्धि का मार्ग पारस्परिक सम्मान और सहयोग से ही निकलेगा, तो दक्षिण एशिया विश्व की नई शांति-भूमि बन सकता है। पर यह तभी संभव है जब पाकिस्तान अपनी “रणनीतिक गहराई” की नीति त्यागे, अफगानिस्तान अपने नागरिकों के लिए स्थिर शासन दे, अमेरिका अपने सामरिक प्रयोगों से पीछे हटे, और भारत अपने नेतृत्व को विकास और संवाद के माध्यम से सार्थक बनाए। तब यह त्रिकोण संघर्ष का नहीं, सहयोग का प्रतीक बनेगा और इतिहास का यह भू-भाग एक बार फिर सभ्यता, करुणा और स्थायित्व की भूमि कहलाएगा।</p>
<p><br /><strong>संजीव ठाकुर, चिंतक, लेखक, वरिष्ठ पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Nov 2025 18:27:36 +0530</pubDate>
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                <title>तो यह है 'विश्व गुरु' भारत में इंसानी जान की क़ीमत ?</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>सत्ता, गोदी मीडिया व 'अंधभक्तों' की जमाअत संयुक्त रूप से भारत को विश्वगुरु साबित करने के लिये एड़ी चोटी का ज़ोर लगाये हुये है। 7 नवंबर 2024 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 'ज्ञान' व उसकी विचारधारा को भारतीय शिक्षा से जोड़ने का अथक प्रयास करने वाले,शिक्षा बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक दीनानाथ बत्रा का 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे एक राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था विद्या भारती के महासचिव भी थे। बत्रा ने अपना सारा जीवन इसी तरह की बातों को सही साबित करने की कोशिशों में खपा दिया कि हवाई जहाज़ का अविष्कार राइट ब्रदर्स ने नहीं</strong></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/146645/so-this-is-vishwa-guru-the-value-of-human-life"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-11/तो-यह-है-&#039;विश्व-गुरु&#039;-भारत-में-इंसानी-जान-की-क़ीमत.jpeg" alt=""></a><br /><div><strong>सत्ता, गोदी मीडिया व 'अंधभक्तों' की जमाअत संयुक्त रूप से भारत को विश्वगुरु साबित करने के लिये एड़ी चोटी का ज़ोर लगाये हुये है। 7 नवंबर 2024 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 'ज्ञान' व उसकी विचारधारा को भारतीय शिक्षा से जोड़ने का अथक प्रयास करने वाले,शिक्षा बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक दीनानाथ बत्रा का 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे एक राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्था विद्या भारती के महासचिव भी थे। बत्रा ने अपना सारा जीवन इसी तरह की बातों को सही साबित करने की कोशिशों में खपा दिया कि हवाई जहाज़ का अविष्कार राइट ब्रदर्स ने नहीं किया बल्कि यह भारतीय पौराणिक काल की उपलब्धि थी। इसी तरह टेलीविज़न के अविष्कार को वे वर्तमान आधुनिक विज्ञान की देन नहीं मानते थे बल्कि इसे महाभारतकाल के पहले की भारतीय खोज बताते थे। ऐसे सैकड़ों विज्ञान सम्मत बातों पर उनके निजी विचार भले ही विश्व स्वीकार्य हों या न हों परन्तु भारत को कथित तौर से 'विश्वगुरु' साबित करने के दिशा में ही एक उठाये गये क़दम थे। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>परन्तु भारत को पुनः विश्वगुरु के रूप में विश्व में स्थापित करने की इन्हीं कोशिशों के बीच शायद हम यह भूल जाते हैं कि विश्व का नेतृत्व करने की आकांक्षा रखने वाले हमारे देश के अपने नागरिकों की जान माल आख़िर कितनी सुरक्षित है ? और दशकों से इंसानी जान से खिलवाड़ करने वाली ऐसी कमज़ोर कड़ियों से निपटने का हमने अब तक क्या उपाय किया है ? कोई उपाय किया भी है या नहीं ? या सत्ता इस बात को ही अंगीकार कर चुकी है कि बिना सुरक्षित उपायों  के ही जब जनता को आसानी से मूर्ख बनाया जा सके तो ऐसे किसी उपायों की ज़रुरत ही क्या है ? मिसाल के तौर पर बोरवेल में बच्चों के गिरने की देश में कितनी घटनाएं हो चुकीं। कहीं जांबाज़ सहायता कर्मियों ने अपने अथक प्रयासों से बच्चे को बोरवेल से बाहर निकाल कर उन्हें बचाया तो कई जगह बच्चों को बचा पाना संभव नहीं हो सका। परन्तु ऐसे ख़बरों का सिलसिला आज भी थमा नहीं है। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>कहीं मेन होल टूटने या उसका ढक्कन न होने के कारण होने वाली दुर्घटनाओं के कारण लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है तो कभी इसी मेन </strong><strong>होल</strong><strong> की सफ़ाई करते समय कोई सफ़ाई कर्मचारी ज़हरीली गैस के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठता है। जगह जगह सड़कों पर बने गड्ढे दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। सांड़,गाय व आवारा कुत्ते तो देश के किसी न किसी भाग में रोज़ाना राहगीरों की जान लेते ही रहते हैं। इन्हीं आवारा पशुओं के कारण अनेक दुर्घटनाएं होती रहती हैं। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>कभी कभी तो ट्रेन हादसों की भी झड़ी सी लग जाती है। कभी 30 अक्टूबर 2022 की गुजरात के मोरबी नामक शहर के मच्छु नदी में बने मोरबी पुल टूटने जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित होती है जिसमें 141 लोगों की नदी मन बह जाने से मौत हो जाती है। तो कभी अस्पतालों में यहाँ तक कि बच्चों के अस्पतालों में आग लग जाती है जिसमें जीवित शिशु झुलस कर मर जाते हैं। ऑक्सीजन की कमी या अभाव से भी लोगों के मरने की ख़बरें आती ही रही हैं। ऐसे और भी अनेक कारणों से 'विश्वगुरु' देश के वासी स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करते। </strong></div>
<div>
<div> </div>
<div><strong>इंसान की जान से खिलवाड़ करने वाली सरकारी लापरवाही की ऐसी ही एक दिल दहलाने वाली घटना पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बरेली के निकट फ़रीदपुर - बदायूं मार्ग पर स्थित राम गंगा नदी पर निर्माणाधीन एक पुल पर हुई। इस निर्माणाधीन पुल का रास्ता किसी अवरोध या संकेत के माध्यम से बंद नहीं किया गया था। उधर गूगल मैप ने भी इसी आधे अधूरे पुल का मार्ग बताया। उसी मार्ग पर शादी से लौट रहे तीन दोस्त अपनी बुलेरो गाड़ी से पूरी रफ़्तार से इसी विश्वास से चल पड़े कि चूँकि पुल का मार्ग खुला है और गूगल मैप भी यह रास्ता सुझा रहा है लिहाज़ा मार्ग चालू ही होगा। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>परन्तु वह अर्धनिर्मित पुल हवा में लटका हुआ था। नतीजतन तेज़ रफ़्तार बुलैरो नदी में जा गिरी जिससे तीनों दोस्तों की मौक़े पर ही मौत हो गयी और वाहन के भी चीथड़े उड़ गये। इस हादसे के बाद अब जानकारी मिल रही है कि रामगंगा नदी पर पिछले साल सितंबर में संपर्क मार्ग बह जाने के बाद से ही यह पुल अर्धनिर्मित अवस्था में ही पड़ा हुआ है। अब यह भी बताया जा रहा है कि लोक निर्माण विभाग ने रामगंगा नदी पर निर्माणाधीन पुल से पहले किसी तरह का बैरियर या अवरोध नहीं लगाया था। इस हादसे का ज़िम्मेदार पुल निर्माण करने वाली कंपनी, इसके ठेकेदार व  प्रशासन की लापरवाही को भी बताया जा रहा है। </strong></div>
<div> </div>
<div><strong>वाहनों को पुल पर आने से रोकने के लिए लोगों को सावधान करने की  ग़रज़ से यहां कोई बोर्ड, संकेत या सूचना नहीं लगाई गई है अथवा किसी तरह का अवरोध नहीं लगाया गया था। यहाँ तक कि संबंधित विभाग ने गूगल मैप पर रूट में बदलाव भी नहीं करवाया था। अर्थात यह पुल अर्धनिर्मित है इस बात की जानकारी गूगल पर अपडेट नहीं थी। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मामले में लोक निर्माण विभाग के चार लोगों के ख़िलाफ़ नामज़द मुक़दमा दर्ज हुआ है। पुलिस को दी गई तहरीर में गूगल मैप्स के क्षेत्रीय प्रबंधक को भी ज़िम्मेदार माना गया है। इसी तहरीर में आरोप है कि -लोक निर्माण विभाग के इन अधिकारियों ने जानबूझकर पुल के दोनों किनारों पर मज़बूत बैरिकेडिंग, बैरियर या रिफ़्लेक्टर बोर्ड नहीं लगवाए, न ही रोड के कटे होने की सूचना के बोर्ड आदि लगवाए गए।</strong></div>
<div> </div>
<div><strong>बरेली में हुये इस हादसे के बाद जब खोजी पत्रकारों ने दूर दराज़ के ही नहीं बल्कि राजधानी दिल्ली के कई ऐसे पुल व फ़्लाई ओवर व एक्सप्रेस वे ढूंढ निकाले जो इसी तरह के हादसों को न्यौता देते हैं। इनमें भी कई जगह वाहनों को रोकने के लिये कोई संकेत या अवरोध नहीं है,कहीं पुलों पर गड्ढे हैं। आज़ादपुर,पंजाबी बाग़,रजौरी गार्डन,मयूर विहार जैसे भीड़ भरे और जाम लगने वाले ऐसे इलाक़ों में भी प्रशासनिक लापरवाहियां सर चढ़ कर बोल रही हैं। सच पूछिये तो इन लपवाहियों के पीछे भी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ग़ैर जवाबदेही ही मुख्य कारण है। इसलिये भले ही हम गगन चुंबी धार्मिक नारों की आवाज़ों में डूबकर स्वयं को कितना ही महान क्यों न समझने लगें और धर्म रुपी अफ़ीम की चाशनी में डूबकर विश्व गुरु बनने के सपने लेते रहें परन्तु हक़ीक़त में तो यही है 'विश्व गुरु' भारत में इंसानी जान की क़ीमत ? </strong></div>
<div> </div>
<div><span style="font-size:large;"><strong>निर्मल रानी</strong></span></div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 Nov 2024 16:27:57 +0530</pubDate>
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                <title>ताली और थाली बजाने का दिन है आज</title>
                                    <description><![CDATA[<p>जम्मू-काश्मीर में 16  अक्टूबर 2024 को चुनी हुई सरकार का गठन होने जा रहा है ,इसके बारह घंटे पहले वहां  से राष्ट्रपति शासन का समापन भी हो गया,इसीलिए बुधवार 16 अक्टूबर की तारीख उसी तरह से इतिहास में दर्ज की जाएगी जिस तरह इस सूबे को तीन टुकड़ों में बाँटने की तारीख दर्ज की गयी थी। जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्र बहाली के इस मौके पर स्थानीय जनता के साथ ही पूरे देश को ताली और थाली बजाकर अपनी ख़ुशी का इजहार करना चाहिए।</p>
<p>दरसल जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र बहाली के लिए ताली और थाली बजाने का आव्हान करना तो माननीय प्रधानमंत्री श्री</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/145544/today-is-the-day-of-clapping-and-banging-plates"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-10/umr-abdullah.jpg" alt=""></a><br /><p>जम्मू-काश्मीर में 16  अक्टूबर 2024 को चुनी हुई सरकार का गठन होने जा रहा है ,इसके बारह घंटे पहले वहां  से राष्ट्रपति शासन का समापन भी हो गया,इसीलिए बुधवार 16 अक्टूबर की तारीख उसी तरह से इतिहास में दर्ज की जाएगी जिस तरह इस सूबे को तीन टुकड़ों में बाँटने की तारीख दर्ज की गयी थी। जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्र बहाली के इस मौके पर स्थानीय जनता के साथ ही पूरे देश को ताली और थाली बजाकर अपनी ख़ुशी का इजहार करना चाहिए।</p>
<p>दरसल जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र बहाली के लिए ताली और थाली बजाने का आव्हान करना तो माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी को था ,लेकिन वे अपनी दूसरी व्यवस्तताओं के चलते देश को सम्बोधित करना भूल गए । उन्हें भूलने की पुरानी आदत है ।  वे जनता से दस साल में किये गए तमाम  वादे भूल गए, अच्छे दिन लाना भूल गए, कालाधन लाना भूल गए। लेकिन वे प्रधानमंत्री हैं इसलिए उनकी सौ भूलें क़ाबिले माफी हैं।</p>
<p>बीते रोज ही जम्मू कश्मीर पर विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राष्ट्रपति शासन को हटा लिया गया है। केंद्रीय गृह मंत्री ने इस संबंध में एक आदेश जारी किया है। शुक्रवार को नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने सरकार ने बनाने का दावा पेश किया था। उन्होंने राजभवन में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से भेंट की थी। इस दौरान उमर अब्दुल्ला ने उनके समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया था। इसमें उन्होंने सहयोगियों दलों से मिली समर्थन की चिटि्ठयां भी सौंपी थीं। उन्होंने 54 विधायकों के समर्थन होने का दावा किया है।शुरू में मुझे लगा था कि  डॉ फारुख अब्दुल्ला साहब खुद मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे ,लेकिन मै और मेरे कयास गलत निकले ।  अब  उमर   अब्दुल्ला साहब ही मुख्यमंत्री बनेंगे। उन्हें बनना भी चाहिये ।</p>
<p> वे खंडित सूबे की अवाम के,नई जनरेशन के करीब हैं। और उम्मीद है कि  उन्हें दिल्ली के अरविंद केजरीवाल की तरह केंद्र से रोज-रोज टकराना नहीं पडेगा। जम्मू-काश्मीर की विधानसभा उस जीव के समान है जिसके दांत और नाखून पहले ही क़तर दिए गए हैं।  पांच साल पहले जम्मू- कश्मीर जिस तरह से एक पूर्ण  सूबा था,वैसा अब नहीं  है । अब तमाम मुद्दों और विषयों पर नव निर्वाचित   सरकार की नहीं बल्कि केंद्र सरकार की चलेगी।  दिल्ली से जम्मू-कश्मीर के विकास और जन कल्याण की योजनाओं को चलाने के लिए उमर अब्दुल्ला साहब को दिल्ली की तरफ ताकना ही पडेगा।  वे यदि ईडी और सीबीआई से बचकर केंद्र के साथ तालमेल करने में कामयाब हुए तो मुमकिन हैकि अगले आम चुनाव से पहले जम्मू-काश्मीर को राज्य का दर्जा वापस मिल जाये ,अन्यथा जम्मू-कश्मीर एक लंगड़े घोड़े की तरह ही रह जाएगा।</p>
<p>हम बचपन से पढ़ते आए हैं कि  जम्मू-कश्मीर इस मुल्क के माथे का मुकुट है। यहां की जाफरान जब महकती है तो पूरा देश महकने लगता है ,लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यहां की जाफरान में जाफरनी सुगंध कम ,बारूदी गंध ज्यादा आने लगी थी।  भाजपा ने शुरू के वर्षों में यहां पीडीपी के साथ सरकार चलने की कोशिश की और आतंकवाद को नाथने का प्रयास किया किन्तु अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली और सूबे की गठबंधन की सरकार गिर गयी और फिर योजनाबद्ध तरीके से जम्मू-काश्मीर पर राष्ट्रपति शासन थोप दिया गया। राष्ट्रपति शासन में भी केंद्र सरकार जम्मू-काश्मीर में आतंकवाद को नेस्तनाबूद नहीं कर पायी। जम्मू-काश्मीर के विस्थापितों  को वापस नहीं ला सकी। निर्वाचित सरकार के लिए  यही दो काम सबसे बड़ी चुनौती हैं।</p>
<p>जम्मू-काश्मीर में यदि केंद्र की भाजपा के गठबंधन की सरकार ने दिल्ली के साथ किये जा रहे व्यवहार को ही दुहराने की गलती की तो आप तय मानिये कि  यहां विधानसभा चुनाव कराने का कोई लाभ न स्थानीय जनता को मिलेगा और न  देश को। क्योंकि दिल्ली और जम्मू-कश्मीर की भौगौलिक   स्थितियों और मुद्दों में जमीन -आसमान का फर्क है। जम्मू-कश्मीर में जो सरकार बनने जा रही  है वो दक्ष राजनीतिक दलों की सरकार है।  उसे कोई प्रशासनिक अधिकारी नहीं बल्कि अनुभवी राजनेता चला रहे हैं। केंद्र की सरकार यदि घाटी की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करने का पाप करेगी तो उसे ये भारी पड़ेगा , यहां आपरेशन लोटस के लिए कम ही गुंजाईश है ,हालाँकि  केंद्र सरकार ने इसके लिए इंतजाम चुनाव से पहले ही कर रखे हैं।</p>
<p>आपको याद होगा कि जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनावों के लिए नेशनल कांफ्रेंस ने कांग्रेस  से  गठबंधन किया था। नेशनल कांफ्रेंस को 90 सदस्यों वाली विधानसभा में 42 और कांग्रेस को छह सीटों पर जीत मिली है।चूंकि केंद्र  सरकार और माननीय प्रधानमंत्री के सिर से कांग्रेस और राहुल गांधी का भूत उतरने का नाम नहीं ले रहा है इसीलिए मुझे लगातार आशंका  है कि  यहां ताली-थाली बजना बहुत दूर की बात है। केंद्र की कोशिश होगी कि जितनी जल्दी मुमकिन हो नेशनल कांफ्रेंस का कांग्रेस से समझौता समाप्त हो और उमर अब्दुल्ला साहब भाजपा के साथ गठबंधन कर सरकार चलाएं।  उम्र अब्दुल्ला ऐसा कर भी सकते है।  सूबे की भलाई कि नाम पर उनके लिए ऐसा करना आसान भी है। खैर आगे जो होगा सो देखा जाएगा,लेकिन अभी तो सब खुश हैं कि  जम्मू-काश्मीर में एक बार फिर लोकतंत्र की बहाली हुई है।  </p>
<p>हम सूबे की जनता को मुबारकबाद देते हैं और उम्मीद करते हैं के  अब इस खंडित सूबे में जम्मू-कश्मीर में  14  वीं मर्तबा राष्ट्र्पति शासन लागू न किया जाये।  इस सूबे में पहली  बारराष्ट्रपति शासन कांग्रेस ने 1977  में लागू किया था। 1977  और 1986  में राष्ट्रपति शासन की वजह कांग्रेस खुद थी। 1977  में कांग्रेस ने तत्कालीन अब्दुल्ला सरकार से अपना समर्थन  वापस लिया थ। 1986  में भी कांग्रेस की वजह से ही राष्ट्रपति शासन लगा था, उस समय शायद जीएम शाह सरकार से कांग्रेस ने स्मार्थन वापस लिया थ।  </p>
<p>जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की सबसे लम्बी अवधि 1990  में लागू किये गए राष्ट्रपति शासन की थ।  तब राष्ट्रपति शासन पूरे 7  साल चला था ।इस तरह जम्मू-कश्मीर के साथ कांग्रेस द्वारा किये गए गुनाहों की फेहरिश्त भी लम्बी है।   भाजपा सरकार द्वारा लगाया गया राष्ट्रपति शासन 5 साल में ही हटा लिया गया ।हालाँकि भाजपा ने कांग्रेस से भी बड़ा पाप इस सूबे के तीन टुकड़े  कर किया है।  वर्ष   2002 ,2008 ,2015  और 2016   ,2018  में भी राष्ट्रपति शासन से गुजरे जम्मू-कश्मीर ने बहुत खुछ सीखा है।  </p>
<p><strong>राकेश अचल</strong> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 15 Oct 2024 17:22:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
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                <title>पेपर लीक मामला : ओमप्रकाश राजभर की बढ़ती मुश्किलें </title>
                                    <description><![CDATA[<div>पेपर लीक मामले में अब नया मोड़ आ गया है जहां योगी सरकार ने इसके लिए उम्रकैद तक का कानून बना दिया है वहीं ओमप्रकाश राजभर की पार्टी के विधायक वेदीराम की एक वीडियो वायरल हो रहा है जो कि पेपर लीक मामले पर ही आधारित है। इस वीडियो में साफ साफ सुना जा सकता है। इधर इस मामले को लेकर बिहार में एक गिरफ्तारी हो चुकी है। वहीं एनडीए के घटक दल सुभासपा के एक विधायक वेदीराम का नाम आने से मामले में नया ट्विस्ट आ गया है।‌ अब देखना यह है कि वेदीराम पर क्या कार्यवाही होती है।</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142579/paper-leak-case-increasing-troubles-for-omprakash-rajbhar%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/_1719499445.jpg" alt=""></a><br /><div>पेपर लीक मामले में अब नया मोड़ आ गया है जहां योगी सरकार ने इसके लिए उम्रकैद तक का कानून बना दिया है वहीं ओमप्रकाश राजभर की पार्टी के विधायक वेदीराम की एक वीडियो वायरल हो रहा है जो कि पेपर लीक मामले पर ही आधारित है। इस वीडियो में साफ साफ सुना जा सकता है। इधर इस मामले को लेकर बिहार में एक गिरफ्तारी हो चुकी है। वहीं एनडीए के घटक दल सुभासपा के एक विधायक वेदीराम का नाम आने से मामले में नया ट्विस्ट आ गया है।‌ अब देखना यह है कि वेदीराम पर क्या कार्यवाही होती है। वेदीराम पर पहले भी इस तरह के मामले में आरोप लग चुके हैं। लेकिन उन पर अब तक कोई कार्यवाही नही हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर को तलब किया है।</div>
<div> </div>
<div>ओम प्रकाश राजभर योगी कैबिनेट में मंत्री हैं और सुभासपा के अध्यक्ष हैं और वेदीराम उन्हीं की पार्टी के विधायक हैं। पेपर लीक मामले में उत्तरप्रदेश सरकार की थूथू हो रही है जहां विपक्ष सीधे सरकार पर आरोप लगा रही है वहीं नीट परीक्षा को लेकर परीक्षार्थी भी प्रदर्शन कर रहे हैं। बेलीराम से इस मामले पर एक पत्रकार ने जानकारी चाही तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि अभी मेरी तबियत खराब है ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है मैं कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं हूं। पत्रकार के बार बार आग्रह करने पर भी इस मामले में वह एक शब्द नहीं बोले। </div>
<div> </div>
<div> इधर सुभासपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जो अपने बड़बोले पर के लिए मशहूर है वह भी मीडिया से भागते नजर आ रहे हैं। पेपर लीक मामला एक बहुत ही गंभीर समस्या है क्योंकि यह सीधे-सीधे युवाओं और छात्रों के भविष्य से जुड़ी है। विपक्ष बार बार वेदीराम के वीडियो को लेकर सरकार को घेर रही है। वेदीराम के वीडियो की जांच होनी चाहिए और यदि वह दोषी पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए क्योंकि यदि इसमें सरकार ने उन्हें बचाने की कोशिश की तो सरकार से विश्वास में कमी आएगी। कानून एक समान होना चाहिए चाहे वह कोई आम व्यक्ति हो या विशेष। नीट परीक्षा को लेकर छात्र अलग से हंगामा काट रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>आगे चलकर छात्र तो शांत हो जाएंगे लेकिन यदि उस वीडियो की जांच नहीं हुई तो इसका ग़लत संदेश जनता में चला जाएगा। 2027 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसके लिए योगी सरकार फूंक फूंक कर कदम रख रही है लेकिन ये सहयोगी दल सरकार की साख पर पलीता लगाने पर जुटे हैं। वैसे भी ओमप्रकाश राजभर का इतिहास सभी जानते हैं लेकिन वह किसी एक के होकर नहीं रहते वह सत्ता के लिए लालायित रहते हैं।‌ और ऐसे में यदि विधायक वेदीराम पर कार्यवाही नहीं होती है तो मामला बिगड़ सकता है।</div>
<div> </div>
<div>लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में काफी नुकसान उठाना पड़ा है पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस बार वह लगभग आधी सीटों पर सिमट गई है। यदि 2027 की तैयारी भारतीय जनता पार्टी को अच्छी तरह से करनी है तो इसके लिए सख्त कदम उठाने ही पड़ेंगे। केवल सख्त कदम की घोषणा से कुछ नहीं होगा। एक विधायक के लिए पूरी सत्ता को दांव पर लगा देना भारतीय जनता पार्टी के हित में नहीं होगा। वैसे भी सहयोगी दलों और बाहर से आए व्यक्तियों को ज्यादा तरजीह देने के कारण भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं में रोष व्याप्त है और यह बात भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष ने लोकसभा चुनाव पर अपनी रिपोर्ट में भी लिखा है।</div>
<div> </div>
<div>उन्होंने तो सीधे सीधे कार्यकर्ताओं पर ही दोष मढ़ दिया है। कि कार्यकर्ताओं कि निरंकुशता के कारण भारतीय जनता पार्टी को नुकसान हुआ है। भारतीय जनता पार्टी को अगर इन सब चीजों से बचना है तो इस तरह के कदम उठाने होंगे। क्यों कि बेरोजगारी का मुद्दा वैसे ही देश में हावी है। ऊपर से यह पेपर लीक के मामले में युवा वर्ग काफी परेशान नजर आ रहा है।</div>
<div> </div>
<div>वेदीराम का इतिहास भी मीडिया और सोशल मीडिया पर सबके सामने आ चुका है। चूंकि वेदीराम भारतीय जनता पार्टी के विधायक नहीं है भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन दल सुभासपा के विधायक हैं इसलिए सुभासपा के अध्यक्ष से बात करना मुख्यमंत्री के लिए आवश्यक हो जाता है और तभी कोई कार्यवाही हो सकती है। सरकार को इस पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। जिससे जनता में विश्वास पैदा हो। नहीं तो विपक्षी दल इसको अपने पाले में लेने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। और यह मुद्दा यदि विपक्ष को दे दिया गया तो भारतीय जनता पार्टी को परेशानी हो सकती है।</div>
<div> </div>
<div>उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक कई पेपर लीक हुए हैं। केवल छात्रों के परीक्षा केन्द्रों को दूर दूर कर देने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए पारदर्शिता बहुत ही आवश्यक है। ओमप्रकाश राजभर बोलने में बड़े ही बेबाक हैं और हर मुद्दे पर वह खुलकर बोलते हैं। लेकिन इस मुद्दे पर वह चुप क्यों हैं उन्हें मीडिया में आकर जल्द से जल्द अपना पक्ष रखना चाहिए। जिससे कि उनकी जो छवि है वह बरकरार रह सके।</div>
<div> </div>
<div><strong>जितेन्द्र सिंह पत्रकार </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 28 Jun 2024 16:33:01 +0530</pubDate>
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                <title>क्या सचमुच अहंकार से आहत है  संघ परिवार</title>
                                    <description><![CDATA[<p>नयी सरकार बनने के बाद से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने ' अहंकार ' शब्द को लेकर एक अभियान शुरू कर दिया है।  संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत ने अपनी ' संघीय भागवत' ' में जो नया अध्याय  जोड़ा है उसका नाम है ' अहंकार '। डॉ भगवत की भागवत में  ' हाँ ' में ' हाँ ' मिलाने के लिए उनके अवर सह संघ चालक  श्रीमान इंद्रेश   कुमार जी ने भी 'अहंकार ' को लेकर अपनी व्याख्या दी है। पूरा देश इस भ्रम में है कि क्या ' अहंकार ' को लेकर  संघ और भाजपा और माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/142304/is-the-sangh-parivar-really-hurt-by-ego"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-06/bhagwat-and-indresh.jpeg" alt=""></a><br /><p>नयी सरकार बनने के बाद से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने ' अहंकार ' शब्द को लेकर एक अभियान शुरू कर दिया है।  संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत ने अपनी ' संघीय भागवत' ' में जो नया अध्याय  जोड़ा है उसका नाम है ' अहंकार '। डॉ भगवत की भागवत में  ' हाँ ' में ' हाँ ' मिलाने के लिए उनके अवर सह संघ चालक  श्रीमान इंद्रेश   कुमार जी ने भी 'अहंकार ' को लेकर अपनी व्याख्या दी है। पूरा देश इस भ्रम में है कि क्या ' अहंकार ' को लेकर  संघ और भाजपा और माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी के बीच अनबन हो गयी है ?<br />देश के लोग पिछले दस साल से भाजपा और उसके शीर्ष नेतृत्व के मन में उपज रहे 'अहंकार ' के पौधे को देख रहे है।</p>
<p>यह अहंकार अब वटवृक्ष बन गया है। संघ को तो ' अहंकार का ये वटवृक्ष अच्छा लगता है लेकिन देश की जनता को नहीं। देश की जनता ने वर्ष 2024  में जो जनादेश दिया उससे जाहिर है कि जनता ' अहंकार से आहत है। सत्ताधीशों के अहंकार का कदाचित लाभ प्रतिपक्ष को भी मिला है और संघ के असंतोष की यही असली वजह है। संघ चाहता था कि सत्ता का अहंकार भी बना रहे और भाजपा बिना बैशाखियों के सतत चलती रहे लेकिन ऐसा हो नहीं सका।</p>
<p>देश का विपक्ष ' अहंकार ' के इस मुद्दे को अपना हथियार बनाये इससे पहले ही संघ ने खुद इस मुद्दे को अपने हाथ में ले लिया ताकि भाजपा की लंगड़ी -लूली सरकार के सामने ' अहंकार ' कोई मुद्दा न बन जाए। जनता समझे कि संघ अब खुद ही प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्ढा के खिलाफ हो गयी है ,जबकि हकीकत ये नहीं है ।  संघ और भाजपा में कोई अनबन नहीं है ।  ये दोनों एक-दूसरे के बिना एक पल जीवित नहीं रह सकते। हाँ इतना अवश्य है कि संघ परिवार ने मोदी परिवार का मुखौटा लगाकर एक बड़ी भूल कर दी।</p>
<p>मोदी परिवार की अवधारणा साधारण संघियों की समझ में नहीं आयी। उन्हें लगा कि मोदी जी संघ परिवार को हड़प रहे हैं ,इसलिए वे आम चुनाव में जहाँ -तहाँ पीछे हट गए और इसका खमियाजा संघ और भाजपा को उठाना पड़ा। यदि आप गौर करें तो पाएंगे कि संघ और भाजपा का नेतृत्व इस समय जो पीढ़ी कर रही है वो खुद स्वभाव से 'अहंकारी ' है। डॉ भागवत और मोदी जी ही  नहीं बल्कि इंद्रेश कुमार भी आक्रामकता के लिए जाने जाते है। तीनों  हमउम्र हैं ।  ऐसा भ्रम    फैलाया जा रहा है कि मोशा की भाजपा ,संघ का नहीं बल्कि अपना ' हिडन एजेंडा ' चला रही है,जबकि ये सौ फीसदी गलत है।</p>
<p> भाजपा का अपना कोई एजेंडा नहीं है। आज भी संघ इतनी शक्ति रखता है कि मोदी जी को एक झटके में सत्ता से अलग कर दे लेकिन उसके पास मोदी जी जैसी आक्रामकता के साथ संघ के एजेंडे पर काम करने वाला कोई दूसरा नेता है नही।  अमित शाह का खलनायकत्व भी साफ़ झलकता है। संघ चाहता है कि जब तक उसका एजेंडा पूरा न हो जाये भाजपा येन-केन सत्ता में बनी रहे।  भले ही इसके लिए उसे आने वाले दिनों में बैशाखियाँ और ' वॉकर '  ही इस्तेमाल  क्यों न करना पड़े ?</p>
<p>आपको बता दूँ कि डॉ भागवत ने अहंकार से पहले मणिपुर का मुद्दा भी उठाया जबकि मणिपुर में सत्तारूढ़ भाजपा नहीं बल्कि संघ नाकाम हुआ ।  भाजपा के सत्ता में आते ही मणिपुर में पूर्णकालिक प्रचारक की नियुक्ति की गयी थी। बी भगैया जैसे प्रचारक वहां तैनात किये गए थे ,लेकिन मणिपुर में संघ का पासा उलटा पड़ गया और जिस तरह की हिंसा हुई उसे संघ अपने पक्ष में भुना नहीं पाया। संघ यदि सचमुच मणिपुर की हिंसा से द्रवित होता तो डॉ भागवत जिस तरह से आज मोशा सरकार को हिदायत या उपदेश दे रहे हैं</p>
<p>पिछले साल ही दे सकते थे। प्रधानमंत्री को मणिपुर जाने से यदि किसी ने रोका तो वो संघ ही है। मणिपुर समेत पूर्वोत्तर में अपने पांव जमाने में नाकाम रहा संघ अब चाहता है कि   वहां हालात मामूल पर आएं और शायद इसीलिए वहां के विकास के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे सुदर्शन और ऊर्जावान संसद को पूर्वोत्तर मामलों का मंत्री बनाया गया है।</p>
<p>आम चुनाव में भाजपा के कमजोर होकर उभरने से भाजपा के प्रति जनता में अनास्था और न बढ़े इसलिए संघ ने अपना पैंतरा बदलते हुए न सिर्फ मणिपुर का राग अलापा बल्कि ' अहंकार 'को भी मुद्दा बनाया। संघ लगातार भ्रम पैदा करने की कोशिश करता रहता है ।  संघ प्रमुख गोरखपुर में उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ गुफ्तगू कर ये भ्रम भी फैलाना चाहता है कि संघ मोदी का विकल्प खोज रहा है। जबकि मोदी का विकल्प खुद मोदी जी ही है।  वे हिटलर की राह पर चलते हुए बहुत आगे जा चुके हैं और संघ यही चाहता भी था । दरअसल मोदी जी ने वो कर दखाया है जो गुरु गोलवलकर भी नहीं दिखा पाए थे।</p>
<p> मोदी से पहले अटल बिहाई बाजपेयी को भी संघ ने मौक़ा दिया था किन्तु प्रधानमंत्री के रूपमें वे मोदी की तरह संघ की कार्यसूची पार काम नहीं कर पाए उलटे उन्होंने सत्ता में वापसी का मौका भी गंवा दिया। आने वाले दिनों में आप देखेंगे कि भाजपा  और संघ मिलकर देश को उसी दिशा में आगे धकेलेंगे जो पहले से तय है। संसद में शक्ति कम होने की वजह से संघ और भाजपा की यात्रा की रफ्तार थोड़ी धीमी जरूर हो सकती है लेकिन ये रुकने वाली नहीं है। संघ आम चुनाव में घायल हुए मोदी और अमित शाह की जोड़ी की मरहम -पट्टी खुद ही कर उन्हें पीछे से ताकत देने का काम करती रहेगी और ये भ्रम भी बनाये रहेगी की भाजपा और संघ में अनबन है।</p>
<p>ये बात सही है कि माननीय  मोदी जी जैसे  कुछ नेता  अत्यधिक अहंकार के कारण विश्व का परम् सत्य जाने की कोशिश करते हैं । वे खुद को अविनाशी घोषित  कर नर से नारायण बनने की इच्छा करते हैं ।  परमात्मा से भी ऊपर ब्रह्म बनना चाहते हैं ।लेकिन  स्वयं के भीतर की आत्मा को परमात्मा मानते है।  लेकिन उन्हें भी  अंत में ज्ञात हो जाता है कि उसकी ही आत्मा ,परमात्मा है वह ही ब्रह्म है तथा वही नर है वही नारायण है।<br />मोदी जी को अब तब तक अविनाशी बने रहना पडेगा जब तक की वे स्वयं ही अपने आपको भस्म नहीं कर लेते।</p>
<p>उन्हें नाचना सिखाने वाले ईश्वर किस   मोहनी बनकर खुद उनसे ही उनके सर पर उनका हाथ रखवा कर उन्हें भस्म  होने के लिए विवश कर देंगे। ये न संघ जानता है और न दूसरा कोई। एक बात और की भाजपा को रामजी ने कोई नुक्सान नहीं पहुंचाया ,भाजपा को जो नुकसान पहुंचा है वो इस देश की जनता की और से पहुंचा है ,वो भी जनादेश के रूपमे। इंद्रश कुमार का ये कहना बिलकुल गलत है कि रामजी ने भाजपा को या अहंकारियों  को 242  सीटों पर लेकर दण्डित किया है। रामजी तो बड़े उदार हैं। फिर भी इंद्रेश जी को लगता है कि राम जी ने भाजपा को इंद्र के पुत्र जयंत की तरह सीता जी के पेअर में चैंच मारने की सजा एक नयन कर दी है ,तो ठीक है। वैसे डॉ भागवत हों या इंद्रेश कुमार दोनों ने रामचरित मानस पढ़ी है ।  वे जानते हैं कि -</p>
<p> नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं।</p>
<p> प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।<br />माननीय नरेंद्र दामोदर दास मोदी भी इसका अपवाद नहीं हैं भले ही वे अपने आपको बायलोजिकल पैदाइश न मानते हों। वैसे आप कहीं लिखकर रख लीजिये कि मोदी जी को अहंकार से बचने कि सलाह देने वाले इंद्रेश जी ही मोदी कि पसंद से संघ के अगले अलम्बरदार बनने वाले हैं।<br /><strong>राकेश अचल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Jun 2024 17:07:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मतदाता को पढ़ नहीं पाए राजनैतिक दल </title>
                                    <description><![CDATA[<div>मतदाता खामोश है लेकिन बहुत कुछ उसके मन में है। कभी कभी गुस्सा तो हमारे मन में होती है लेकिन हम उसको उजागर नहीं करते। यही हाल इस समय देश की जनता का है। तमाम मुद्दे ऐसे हैं जिसकी वजह से जनता खुश नहीं है। यदि आरोप सत्ता पक्ष पर लगता है तो विपक्ष ने भी वह काम अपनी सरकार के समय में नहीं किए। और यही कारण है कि इस चुनाव में कुछ तो नया होगा। आज लोकसभा चुनाव का छठा चरण चल रहा है और आज के बाद एक और चरण बचेगा। चार जून को जब मतगणना शुरू</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141565/political-parties-could-not-read-the-voters%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/csdf.jpg" alt=""></a><br /><div>मतदाता खामोश है लेकिन बहुत कुछ उसके मन में है। कभी कभी गुस्सा तो हमारे मन में होती है लेकिन हम उसको उजागर नहीं करते। यही हाल इस समय देश की जनता का है। तमाम मुद्दे ऐसे हैं जिसकी वजह से जनता खुश नहीं है। यदि आरोप सत्ता पक्ष पर लगता है तो विपक्ष ने भी वह काम अपनी सरकार के समय में नहीं किए। और यही कारण है कि इस चुनाव में कुछ तो नया होगा। आज लोकसभा चुनाव का छठा चरण चल रहा है और आज के बाद एक और चरण बचेगा। चार जून को जब मतगणना शुरू होगी तो परिणाम काफी कुछ चौंकाने वाले हो सकते हैं। कुछ राजनैतिक विश्लेषकों ने तो यह पहले से ही घोषणा कर दी है कि परिणाम कैसे आने वाले हैं लेकिन अभी सब इस छठे चरण और अंतिम चरण के मतदान का इंतजार कर रहे हैं। किसी भी सरकार के बनने और गिरने के लिए दो चरण बहुत होते हैं।</div>
<div> </div>
<div>योगेन्द्र यादव और प्रशांत किशोर एक जाने-माने राजनैतिक विश्लेषक हैं यदि इनकी मानें तो किसी एक दल को बहुमत नहीं मिल रहा है हां किसी एक गठबंधन एनडीए या इंडी गठबंधन तो बहुमत की करीब पहुंच सकता है। ऐसा नहीं है कि यह भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ गुस्सा है। दरअसल देश में इतनी समस्याएं हैं जो एकाएक समाप्त नहीं हो सकतीं और न ही हम उनको खत्म कर सकते हैं। जो यह कहता है वह झूठ बोल रहा है। वैसे तो भारतीय जनता पार्टी ने गरीबों के लिए बहुत सी योजनाएं चलाई लेकिन इसका बोझ मध्यम वर्ग पर सीधे पड़ गया और महंगाई ने अपने उच्चतम स्तर को छू लिया जब कि आम व्यक्ति की आमदनी उस हिसाब से नहीं बढ़ी।</div>
<div> </div>
<div>भारतीय जनता पार्टी ने गरीबों के लिए एक बहुत बड़ी योजना फ्री राशन की चलाई। सरकार लगभग अस्सी करोड़ जनता को फ्री राशन दे रही है इसका सीधा मतलब यह हुआ कि अभी भी हमारे देश की आधी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे है। यह एक बहुत बड़ी योजना है इसकी बुराई विपक्ष भी नहीं कर पा रहा है। बल्कि अखिलेश यादव ने तो यह तक कह दिया कि हमारी सरकार यदि सत्ता में आती है तो हम जनता को पोष्टिक आहार देंगे। यानि कि कोई भी सरकार सत्ता में आए लेकिन इस योजना को खत्म नहीं कर सकती, बढ़ा तो सकती है। भारतीय जनता पार्टी ने भी जब इस योजना को शुरू किया था तो यह पूर्ण कालिक योजना नहीं थी लेकिन उनको इस योजना को पांच साल के लिए फिर से बढ़ाना पड़ा। लेकिन जनता की मांग फ्री नहीं है। हालांकि इस राशन योजना से भारतीय जनता पार्टी को पिछले कुछ चुनाव में काफी सफलता मिली है।</div>
<div> </div>
<div>आवास योजना भी भारतीय जनता पार्टी की एक बहुत बड़ी योजना थी। हालांकि इस तरह की योजना मायावती ने कांशीराम आवास योजना के रुप में पहले शुरू की थी। फिर इसी योजना को केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना के नाम से लेकर आ गई। सरकार जब कोई भी योजना बनाती है तो बजट को इधर से उधर करना पड़ता है। और यहीं कारण है कि इन योजनाओं में धन की पूर्ति के लिए अन्य जगहों से पैसे की आवश्यकता की पूर्ति की जाती है। जिससे महंगाई बढ़ती है तो मध्यम वर्ग के साथ साथ निचले वर्ग पर भी महंगाई की मार पड़ती है। कुल मिलाकर जनता इस चुनाव में बिल्कुल खामोश है और अब वह परिणाम की प्रतीक्षा कर रही है।</div>
<div> </div>
<div>यहां हम यह नहीं कह सकते कि मतदान बदलाव के लिए हो रहा है। क्यों कि विपक्ष को सरकार में जितना मौका मिला वह अभी तक भारतीय जनता पार्टी को नहीं मिला है इसलिए मतदाता उनसे भी खुश नहीं है। वोट बराबर का मिलने का अनुमान लगाया जा रहा है। लेकिन सरकार भारतीय जनता पार्टी समर्थित एनडीए की ही बनती दिख रही है। हां जो नारा भारतीय जनता पार्टी ने अबकी बार 400 पार का दिया था ऐसा होता कठिन दिखाई दे रहा है। बंगाल में ममता बनर्जी और भारतीय जनता पार्टी की सीधी टक्कर है। वहां ममता कुछ आगे दिखाई दे रहीं हैं। महाराष्ट्र में मामला 50-50 का नजर आ रहा है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी आगे दिख रही है लेकिन विपक्ष की सीट भी पिछले बार से बढ़ती नजर आ रहीं हैं। </div>
<div> </div>
<div> बिहार में यदि पिछले विधानसभा चुनाव से तुलना करें तो मामला 50-50 ही नजर आ रहा है लेकिन नितीश कुमार के एनडीए में शामिल हो जाने से भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचते दिखाई दे रहा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी आगे निकलती दिखाई दे रही है। पंजाब में लड़ाई सीधे आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच है। दिल्ली में भी इस बार टक्कर होती दिखाई दे रही है। क्यों कि दिल्ली में इस बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी मिल कर चुनाव लड़ रही है। दक्षिण भारत की बात करें तो वहां कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी से मतबूत स्थिति में नजर आ रही है। हालांकि वहां ऐसा नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी को बिल्कुल नकार दिया जाए। इस बार दक्षिण में भारतीय जनता पार्टी ने रणनीति के तहत पूरी ताकत झोंक दी है।</div>
<div> </div>
<div>आज जनता का मन राजनीति से ऊबने लगा है और पढ़ा लिखा वर्ग राजनीति पर बहस नहीं करना चाहता है। क्यों कि उसको राजनीति में अब हर दल एक से ही दिखाई दे रहे हैं। इस बार वास्तव में मतदाताओं का मन पढ़ने में राजनैतिक दल असफल रहे हैं। या यह कहें कि वह तमाम प्रयासों के वावजूद भी जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर सके हैं। जिस तरह दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने एक प्रकार की नई राजनीति की शुरुआत की थी तो वहां की जनता ने उसको भरपूर सहयोग दिया था। इस चुनाव में यह भी साफ हो जाएगा कि आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता आज भी दिल्ली में है या वहां की जनता भी अब आम आदमी पार्टी से ऊब चुकी है।</div>
<div> </div>
<div> प्रशांत किशोर और योगेन्द्र यादव ने जिस तरह से अपना विष्लेषण जनता के समक्ष रखा है उसे एक दम से सटीक तो नहीं माना जा सकता। क्यों कि अभी हाल ही में चार राज्यों में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने एक राज्य की सत्ता बरकरार रखी है जब कि दो राज्यों की सत्ता कांग्रेस से छीनी है। अब लोकसभा से तुलना की जाए तो ऐसा नहीं हो सकता कि वहां भारतीय जनता पार्टी का ग्राफ नीचे गिरेगा। हरियाणा में किसानों की कुछ समस्याएं हैं जिससे कुछ नाराजगी दिख रही है। लेकिन वहां भी अभी तक भारतीय जनता पार्टी मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है।</div>
<div> </div>
<div><strong> जितेन्द्र सिंह पत्रकार </strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 May 2024 16:45:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ग्रीष्मकालीन अवकाश छात्रों के लिए शारीरिक और बौद्धिक विकास सुनिश्चित कर सकता है </title>
                                    <description><![CDATA[<div>नवोन्मेषी और शैक्षिक गतिविधियों में संलग्न होकर, बच्चे अपनी गर्मी की छुट्टियों का अधिकतम लाभ उठा सकते हैं और शारीरिक और बौद्धिक विकास सुनिश्चित कर सकते हैं स्कूली छात्र गर्मी की छुट्टियों के आगमन का बड़े उत्साह के साथ इंतजार करते हैं। वह अवधि भी एक छात्र के जीवन के सबसे सुखद चरणों में से एक है। यह भी जरूरी हो जाता है कि इस समय माता-पिता अपने बच्चों के समय की कीमत को पहचानें। उन्हें इस बात की चिंता होने लगती है कि उन दिनों के दौरान वे अपने बच्चे को अपने समय का बुद्धिमानी से उपयोग कैसे करने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141533/summer-vacation-can-ensure-physical-and-intellectual-development-for-students%C2%A0"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/safsdf1.jpg" alt=""></a><br /><div>नवोन्मेषी और शैक्षिक गतिविधियों में संलग्न होकर, बच्चे अपनी गर्मी की छुट्टियों का अधिकतम लाभ उठा सकते हैं और शारीरिक और बौद्धिक विकास सुनिश्चित कर सकते हैं स्कूली छात्र गर्मी की छुट्टियों के आगमन का बड़े उत्साह के साथ इंतजार करते हैं। वह अवधि भी एक छात्र के जीवन के सबसे सुखद चरणों में से एक है। यह भी जरूरी हो जाता है कि इस समय माता-पिता अपने बच्चों के समय की कीमत को पहचानें। उन्हें इस बात की चिंता होने लगती है कि उन दिनों के दौरान वे अपने बच्चे को अपने समय का बुद्धिमानी से उपयोग कैसे करने देंगे। इसके विपरीत, बच्चे उन महीनों में ऊर्जा और प्रत्याशा से भरे होते हैं। हालाँकि, कामकाजी माता-पिता के लिए यह परेशानी भरा हो जाता है यदि उनके बच्चे छोटे और अत्यधिक ऊर्जावान हों।</div>
<div> </div>
<div>उनकी दैनिक निर्धारित गतिविधियाँ अनियंत्रित हो जाती हैं, जिससे माता-पिता के लिए अपने बच्चों को सार्थक गतिविधियों में शामिल करना कठिन हो जाता है। हालाँकि गर्मी की छुट्टियों का मतलब हर किसी के लिए अलग-अलग होता है, लेकिन गर्मियों में सीखने के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह बच्चों के शारीरिक और शैक्षणिक स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण घटक है। केवल 60 दिनों की गर्मी की छुट्टियों के साथ, हर दिन एक बच्चा ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण में भाग नहीं लेता है जो एक झटके का प्रतिनिधित्व करता है। फिर भी, माता-पिता अपने बच्चों को विभिन्न प्रकार की नई और मनोरंजक गतिविधियों में शामिल कर सकते हैं।</div>
<div> </div>
<div>ग्रीष्मकालीन अवकाश पाठ्यक्रम गर्म भारतीय गर्मी कुछ लोगों, विशेषकर बच्चों के लिए सहन करने का सबसे कठिन समय हो सकता है। यदि वे गर्मी से बचने के लिए तैयार नहीं रहेंगे तो उन्हें गंभीर पीड़ा हो सकती है। माता-पिता को इन गर्म दिनों के दौरान अपने बच्चों द्वारा खाए जाने वाले भोजन के बारे में सावधान रहना चाहिए ताकि उनके पाचन तंत्र पर कोई अतिरिक्त दबाव न पड़े। पाचन और निर्जलीकरण की समस्याओं से बचने के लिए, माता-पिता अपने बच्चों की भोजन योजना में तरबूज, दही, ककड़ी, नारियल पानी और मौसमी सब्जियां शामिल कर सकते हैं। बच्चों को उस समकालीन तकनीकी वातावरण के बारे में सीखना शुरू करना चाहिए जिसमें वे रहते हैं।</div>
<div> </div>
<div>इसलिए, माता-पिता अपने बच्चों को आकर्षक और नवीन शिक्षण उत्पादों से जोड़ सकते हैं। रुझान इस प्रकार हैं: बच्चों के लिए एआई और एमएल पाठ्यक्रम: बच्चों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसे भविष्य के कौशल से परिचित कराने के लिए ऑनलाइन कई पाठ्यक्रम हैं। बच्चे जो भी करियर विकल्प चुनेंगे, उसमें ये कौशल अनिवार्य होंगे। छात्रों को ऐसे पाठ्यक्रमों का चयन करना चाहिए जिनमें पायथन कोडिंग, जेनरेटिव-एआई प्रॉम्प्ट राइटिंग और वेबसाइट और ऐप बिल्डिंग जैसे उद्योग प्रोजेक्ट शामिल हों। बच्चों और माता-पिता को नई प्रौद्योगिकियों से डरना नहीं चाहिए, बल्कि इन्हें भविष्य के नौकरी बाजार में मात देने के अवसर के रूप में लेना चाहिए।</div>
<div> </div>
<div>एआई उपकरण सीखने से सांस्कृतिक रूप से सक्रिय छात्रों की प्रदर्शन गुणवत्ता भी उन्नत होगी। एआई-एमएल सीखना छात्रों को आगामी नवाचार और रोबोटिक्स से संबंधित प्रतियोगिताओं के लिए भी तैयार करेगा। सबसे अच्छा परिणाम ऑनलाइन इंटर्नशिप प्राप्त करना होगा। इससे बच्चों को भविष्य के लिए अधिक आत्मविश्वासी बनने में मदद मिलेगी। ग्रीष्मकालीन विशेष नवाचार आधारित ऑनलाइन प्रयोग: छात्रों और अभिभावकों को ऑनलाइन नवाचार आधारित प्रयोगों या परियोजनाओं की तलाश करनी चाहिए जो न केवल एक परियोजना किट प्रदान करेंगे बल्कि परियोजना के विज्ञान और प्रौद्योगिकी को समझने के लिए लाइव सत्र भी शामिल करेंगे।</div>
<div> </div>
<div>छात्रों को स्कूलों में भी परियोजनाओं का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम होना चाहिए। कुछ आकर्षक परियोजनाएँ लेजर होम सिक्योरिटी सिस्टम, वर्षा जल का पता लगाने और स्वचालित कपड़ा पुनर्प्राप्ति मशीन, स्वचालित स्मार्ट छत, पार्किंग अधिभोग संकेतक, स्मार्ट ब्लाइंड स्टिक आदि हो सकती हैं। ऊपर उल्लिखित गतिविधियों के अलावा, कई अन्य नवीन गतिविधियाँ हैं जिनका पता लगाया जा सकता है गर्मियों की छुट्टियों के दौरान माता-पिता अपने बच्चों का आत्मविश्वास और रुचि बढ़ाएं।</div>
<div> </div>
<div>इसके अलावा, सीखना एक अंतहीन प्रक्रिया है। स्कूली बच्चों को हर दिन नई चीजों के बारे में ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता होती है जो उनके करियर और शैक्षिक विकास के लिए उपयोगी हों। छुट्टियों के दौरान बच्चों के लिए सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान में से कुछ होंगे स्थिरता, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रिक वाहन प्रौद्योगिकी, स्वायत्त कार प्रौद्योगिकी, फ्लाइंग टैक्सी प्रणाली और ड्रोन प्रौद्योगिकी आदि। इस प्रकार, अगली गर्मी की छुट्टियों के दौरान, छात्र बस खेल सकते हैं। सीखना। खाओ। सर्वोत्तम और उत्पादक छुट्टियों के उपयोग के इन उल्लिखित तरीकों पर विचार करके दोहराएं।</div>
<div> </div>
<div><strong>विजय गर्ग शैक्षिक स्तंभकार</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 May 2024 17:05:10 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के सामने नई चुनौतिंयाँ ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p>ब्रिटेन की समाचार न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ब्रिटिश इतिहास के 127 सालों में 42 वर्षीय ऋषि सुनक सबसे युवा प्रधानमंत्री बने हैं और उन्हें बोरिस जॉनसन तथा लीज ट्रस के इस्तीफे के बाद विरासत में प्रधानमंत्री का पद प्राप्त हुआ है। कोविड-19 के समय ऋषि सुनक ने वित्त मंत्री रहते हुए ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति को वहां के उद्योगपतियों तथा पर्यटन, होटल एजेंसी के साथ मिलकर काफी हद तक संभाल कर रखा था। अब ब्रिटेन की खराब अर्थव्यवस्था का भारी-भरकम बोझ ऋषि सुनक के कंधे पर आ गया है। खराब अर्थव्यवस्था ऋषि सुनक के लिए आगामी आने वाले जनवरी 2025</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141514/new-challenges-before-british-prime-minister-rishi-sunak"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/gdfsg.jpg" alt=""></a><br /><p>ब्रिटेन की समाचार न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ब्रिटिश इतिहास के 127 सालों में 42 वर्षीय ऋषि सुनक सबसे युवा प्रधानमंत्री बने हैं और उन्हें बोरिस जॉनसन तथा लीज ट्रस के इस्तीफे के बाद विरासत में प्रधानमंत्री का पद प्राप्त हुआ है। कोविड-19 के समय ऋषि सुनक ने वित्त मंत्री रहते हुए ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति को वहां के उद्योगपतियों तथा पर्यटन, होटल एजेंसी के साथ मिलकर काफी हद तक संभाल कर रखा था। अब ब्रिटेन की खराब अर्थव्यवस्था का भारी-भरकम बोझ ऋषि सुनक के कंधे पर आ गया है। खराब अर्थव्यवस्था ऋषि सुनक के लिए आगामी आने वाले जनवरी 2025 को आम चुनाव में बड़ी परेशानी का सबब बन सकता है।</p>
<p>ऋषि सुनक को आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए ट्रबल शूटर की हैसियत से प्रधानमंत्री बनाया गया था। ब्रिटेन की एक सर्वे न्यूज़ एजेंसी द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार अपनी कंजरवेटिव पार्टी को वर्तमान में मजबूत बनाने के लिए काफी कवायद करनी पड़ सकती है क्योंकि सर्वे ने बताया है कि सुनक अपनी ब्रिटेन की संसदीय सीट को आम चुनाव में गंवा सकते हैं क्योंकि कुछ महीने पहले की घटनाक्रम में पहले लिस ट्रस से पिछड़ने और फिर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद ऋषि सुनक के सामने नई नई मुसीबतें सामने आई है। ब्रिटेन में आम चुनाव 2025 में आयोजित हैं और कंजरवेटिव पार्टी की छवि बहुत अच्छी नजर नहीं आ रही है।</p>
<p>सर्वे एजेंसी के अनुसार यह सर्वे में ऋषि सुनक अपनी ब्रिटेन की संसदीय सीट को आम चुनाव में कमजोर हो सकती हैं क्योंकि विपक्ष की लेबर पार्टी को प्रधानमंत्री के सत्तारूढ़ कंजरवेटरी से बहुत ज्यादा अंक प्राप्त हुए हैं। सावंत के प्रवक्ता के अनुसार लेबर पार्टी 314 सीटों के बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज हो सकती है। यार्क शायर ऋषि सुनक का निर्वाचन क्षेत्र है अपनी निर्वाचन सीट तथा लिंकनशायर के उत्तर में अन्य सभी सीटों सहित रूढ़िवादी लगभग 300 सीटें गंवा सकते हैं। ब्रिटेन की न्यूज़ एजेंसी सावंता के विगत समय तक किए गए सर्वे के अनुसार 7 हजार नागरिकों बातचीत के आधार पर एक विस्तृत डाटा तैयार किया गया है।</p>
<p>सर्वे में लेबर पार्टी कंजरवेटिव पार्टी पर बढ़त दिखाई गई है जिसके परिणाम स्वरूप ऋषि सुनक को आने वाले समय में सत्ताधारी दल की बढ़त को बढ़ाएं रखने में और कंजरवेटिव पार्टी की किस्मत को बनाने में काफी मेहनत करनी पड़ सकती है। उल्लेखनीय है कि सत्तारूढ़ कंजरवेटिव यानी टोरी पार्टी की लोकप्रियता धीरे धीरे कम होते जा रही है। ऋषि सुनक को खराब अर्थव्यवस्था विरासत में मिलना भी एक बड़ा कारण भी है। हालांकि ब्रिटेन में कंजरवेटिव पार्टी यानी टोरी पार्टी वर्ष 2010 ब्रिटेन की सत्ता में काबिज है और 4 बार आम चुनाव में जीत हासिल कर चुकी है। 4 बार जीतने के बाद भी अब कंजरवेटिव पार्टी की पकड़ ब्रिटिश नागरिकों पर कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। ऋषि सुनक युवा है और अच्छे अर्थशास्त्री भी, अब देखना यह है कि ऋषि सुनक चुनाव की चुनौती को किस तरह अपनी पार्टी के हक में दिशा दे पाते हैं कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था बहुत निचले स्तर पर पहुंच गई है बेरोजगारी तथा महंगाई तथा पेट्रोल, डीजल, बिजली के दाम तब तक की चरम सीमा पर पहुंच चुके हैं।</p>
<p>ब्रिटिश गवर्नमेंट की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए बैलेंस आफ ट्रेड और उत्पादन को 2 साल में तेजी से विकसित करना होगा। कोविड-19 के काल में ब्रिटेन को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा था पर अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए तत्कालीन वित्त मंत्री ऋषि सुनक ने वहां के उद्योगपतियों, पर्यटन तथा होटल उद्योग को विकसित कर कोविड-19 काल में वित्तीय स्थिति को काफी सहारा दिया था। अब ऋषि सुनक के सामने अनेक चुनौतियां आ गई है ऋषि सुनक को न सिर्फ लेबर पार्टी से चुनौती मिल रही है बल्कि उन्हें अपनी पार्टी के सांसदों का 100% समर्थन भी प्राप्त नहीं हो रहा है। ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बने रहने के साथ-साथ उन्हें अपनी पार्टी की लोकप्रियता को बढ़ाने में अपनी पार्टी के सांसदों का विश्वास मत भी हासिल करना होगा तब जाकर आगामी 2025 जनवरी को सत्तारूढ़ पार्टी यानी कंजरवेटिव पार्टी चुनाव में जीत हासिल कर सकेगी।</p>
<p>ब्रिटिश न्यूज़ एजेंसी और सर्वे एजेंसी सावंत के अनुसार कंजरवेटिव पार्टी धीरे-धीरे लोकप्रियता में कमजोर होती जा रही है और लेबर पार्टी ने अभी से चुनाव अभियान का आगाज कर दिया है, फ़ल स्वरूप ऋषि सुनक के सामने आर्थिक व्यवस्था बेरोजगारी महंगाई और चुनाव की बड़ी चुनौती सामने आ गई है ऐसे में ऋषि सुनक ब्रिटेन के शक्तिशाली जुझारू और संघर्षशील प्रधानमंत्री रहकर अपनी पार्टी का सही नेतृत्व कर जीत दिला पाते हैं या नहीं यह भविष्य तय करेगा। इसके अलावा रूस यूक्रेन युद्ध मैं यूक्रेन का साथ देना इसराइल हमास युद्ध में इजराइल का साथ देना भी एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। इसमें ब्रिटेन को यूक्रेन को आर्थिक मदद के साथ सामरिक मदद भी करनी होगी। क्योंकि ब्रिटिश जनता यूक्रेन के साथ हमदर्दी अब तक रखते आई है।</p>
<p><strong>संजीव ठाकुर,(वर्ल्ड रिकॉर्ड धारक कवि, लेखक),</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 May 2024 17:17:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>12वीं के बाद शुरू करें युपीएससी की तैयारी, मिलेगी सफलता</title>
                                    <description><![CDATA[<div>  सपने तो सभी देखते है लेकिन उसे पूरा करने की कीमत हर कोई नही चुका सकता। सपने भी उन्ही के पूरे होते है जो इसकी कीमत चुकाते है। ऐसा ही एक सपना है आईएएस बनने का। आईएएस बनने के लिए संघ लोक सेवा आयोग (युपीएससी) सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन करता है। यूपीएससी हमारे देश की सबसे कठीन व प्रतिष्ठित परीक्षा है। हर साल लाखों युवा महज कुछ सीटों के लिए इस एग्जाम की तैयारी करते है। इस परीक्षा में सफलता का प्रतिशत बहुत ही कम है। इस परीक्षा में वही सफल होता है जिसमें शैक्षणिक योग्यता के साथ</div>
<div> </div>
<div>अगर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141454/start-upsc-preparation-after-12th-you-will-get-success"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/dfdsgdf.jpg" alt=""></a><br /><div> सपने तो सभी देखते है लेकिन उसे पूरा करने की कीमत हर कोई नही चुका सकता। सपने भी उन्ही के पूरे होते है जो इसकी कीमत चुकाते है। ऐसा ही एक सपना है आईएएस बनने का। आईएएस बनने के लिए संघ लोक सेवा आयोग (युपीएससी) सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन करता है। यूपीएससी हमारे देश की सबसे कठीन व प्रतिष्ठित परीक्षा है। हर साल लाखों युवा महज कुछ सीटों के लिए इस एग्जाम की तैयारी करते है। इस परीक्षा में सफलता का प्रतिशत बहुत ही कम है। इस परीक्षा में वही सफल होता है जिसमें शैक्षणिक योग्यता के साथ ही अनुशासन और धैर्य हो। अगर आप भी आईएएस बनने का सपना देखते है तो इसके लिए जरूरी है कि इसकी तैयारी स्नातक स्तर पर ही शुरू कर दें। सिविल सेवा में सफलता पाने के लिए एक सटीक रणनीति और व्यवस्था होना जरूरी है।</div>
<div> </div>
<div>अगर आप भी आईएएस बनने का सपना देखते हैं तो ऐसे कर सकते हैं इसकी तैयारी-</div>
<div> </div>
<div><strong>1.रणनीति और अध्ययन सामग्री-</strong></div>
<div>सिविल सेवा परीक्षा के लिए सबसे पहले आपको अपनी 12वीं की पढ़ाई के बाद ही ये डिसिजन लें लेना चाहिए कि आपको सिविल सेवा में जाना है। सिविल सेवा की तैयारी के लिए कम से कम 2 से 3 वर्ष का समय लगता है। आप अपने ग्रेजुएशन के दिनों से ही इसकी तैयारी शुरू कर दे। इस परीक्षा की तैयारी की शुरूआत  एनसीईआरटी की किताबों का अध्ययन करने से करे। इसके अलावा सिविल सेवा परीक्षा का पूरा सिलेबस अपने साथ रखे और उसके अनुसार ही तैयारी करे। अधिकतर कैंडिडेट अपनी ग्रेजुएशन के किसी एक विषय में से ही परीक्षा के मुख्य चरण के लिए विषय चुनते है। इससे आपको आसानी रहती है क्योंकि आप ग्रेजुएशन के साथ इस विषय को पूरे तीन साल पढ़ते है। इसके अलावा दूसरे चयनित वैकल्पिक विषयों के लिए आप स्टडी मटेरियल का चयन कर सकते है या फिर एक्सपर्ट की सलाह ले सकते है।</div>
<div> </div>
<div><strong>2.समसामयिक मुद्दो की ऐसे करें तैयारी-</strong></div>
<div>समसामयिक विषयों की तैयारी करने के लिए आप नियमित रूप से समाचार पत्रों का अध्ययन करें। जैसे द हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस के अलावा बीबीसी और डीडी न्यूज का बुलेटिन जरूर देखे। पिछले साल के प्रारंभिक प्रश्न पत्रों में भी समसामयिक मुद्दों से संबंधित प्रश्नों का अच्छा अनुपात रहा है इसलिए ये जरूरी है कि समसामयिक मुद्दों की तैयारी करते रहना चाहिए। इसके अलावा आप समसामयिक मुद्दों के लिए किताबों का भी सहारा लें सकते है। इसके लिए आप चाहे तो  एनसीईआरटी और   एनआईउ एसकी किताबों को पढ़ सकते है ये किताबें आनलाईन नि:शुल्क उपलब्ध है।</div>
<div> </div>
<div><strong>3.विषयों का चयन करते समय रखे इन बातों का ख्याल-</strong></div>
<div>सिविल सेवा परीक्षा में सबसे जरूरी होता है विषय का अध्ययन इसलिए, विषय का चयन करते समय इस बात ध्यान रखें कि आपको उस विषय में रूचि है या नही। वैसे तो कोई भी विषय अध्ययन के लिए असंभव नही है लेकिन फिर भी जिस विषय में आपकी रूचि है उसी विषय का चयन करना आपके लिए फायदेमंद रहता है। सिविल सेवा परीक्षा का सिलेबस बहुत बड़ा होने के कारण पूरे साल भर अध्ययन करना पड़ता है। इसलिए योजना के अनुसार ही चलते हुए पूरे साल अध्ययन करना जरूरी है।</div>
<div> </div>
<div><strong>4.पढ़ाई के लिए जरूरी है एकाग्रता-</strong></div>
<div>सिविल सेवा परीक्षा निकालने के लिए ये जरूरी है कि आप अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहे। क्योंकि सिविल सेवा की परीक्षा कोई बैंकिग या एसएससी की परीक्षा नही है जिसमें रट्टा मारने से सफलता मिल जाती है। इसलिए इस परीक्षा की तैयारी के लिए आपको त्याग तो करना ही पड़ेगा, इसके बिना आप इस परीक्षा में कुछ नही कर सकते। आपको दो से तीन साल सिविल सेवा के लिए देने ही पड़ेंगे। इन सालों में हर दिन आपको नियमित अध्ययन करना पड़ेगा।</div>
<div> </div>
<div><strong>5.कितना पढ़ना है जरूरी-</strong></div>
<div>सिविल सेवा परीक्षा के लिए वैसे तो एक साल पर्याप्त है लेकिन लोगों को दो से तीन साल भी लग जाते है। ये अलग-अलग लोगों की क्षमता पर निर्भर करता है कि वे कितना अध्ययन कर सकते है। इसलिए हर दिन कम से कम 6 घंटे रोजाना पढ़ाई करना जरूरी है। कई बार ऐसा होता है कि आप तैयारी करते-करते डिमोटिवेट हो जाते है इसलिए मोटिवेशनल किताबों को पढ़े। आपके आस-पास कैसे लोग रहते है इसका आपकी जिंदगी पर काफी असर पड़ता है। अगर आपके आसपास नेगेटिव लोग रहते है तो ऐसे लोगों से जितना हो सके दूर रहने का प्रयास करे। ऐसे लोगों के साथ रहे जो आपको अच्छा फील करवाते है।</div>
<div> </div>
<div><strong>6.क्या दिल्ली जाना जरूरी है?</strong></div>
<div>आपने भी लोगों से सुना होगा कि यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली जाकर कोचिंग करना जरूरी है। लेकिन आपको बता दें कि आप घर रहकर भी सिविल सेवा की तैयारी कर सकते है। बस आपको अपनी जिंदगी में थोड़ा सा बदलाव लाना पड़ेगा और आप घर रहकर भी उचित अध्ययन सामग्री से सिविल सेवा की परीक्षा पास कर सकते है। बाहर जाकर पढ़ाई करने के भी अपने ही टेंशन रहते है इसलिए अपने शहर में रहकर भी आप अध्ययन कर सकते है। आप चाहे तो कोई कोचिंग भी लगा सकते है।</div>
<div> </div>
<div><strong>7.पढ़ाई के साथ लेखन का अभ्यास भी है जरूरी-</strong></div>
<div>आपको पढ़ने के साथ लिखने का भी अभ्यास करना है क्योंकि प्री एग्जाम निकालने के बाद मेंस की परीक्षा देनी पड़ती है जिसमें आपको लिखना पड़ता है। आप किसी भी टॉपिक पर संक्षेप में लगभग 200 शब्दों में लिखने का प्रयास करें। जितना आप लिखने की कोशिश करोगे उतनी ही आपकी लेखन शैली सुधरेगी और व्याकरण में कम गलती होगी।</div>
<div> </div>
<div><strong>प्लान बी तैयार रखें</strong></div>
<div>लाखों उम्मीदवार यूपीएससी परीक्षा की तैयारी करते हैं, लेकिन इसमें सभी सफल नहीं हो पाते हैं। ऐसे में यदि आप परीक्षा में पास नहीं हो पाते हैं तो आपको प्लान बी तैयार रखना चाहिए। यूपीएससी की तैयारी के समय अपने विश्व इतिहास, राजनीति, भूगोल, अर्थव्यवस्था, नैतिक सिद्धांतों, विभिन्न दार्शनिकों और क्रांतिकारियों को पढ़ा होगा, यह विषय आपके भविष्य के लिए मददगार होंगे। जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना और उद्देश्य की स्पष्टता होना आपको हमेशा एक अच्छा जीवन जीने के लिए प्रेरित करेगा।</div>
<div> </div>
<div><strong>विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 May 2024 16:58:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Office Desk Lucknow]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत में हिंदुओं की वृद्धि दर में कमी के लिए फर्जी सेकुलरिज्म जिम्मेदार! </title>
                                    <description><![CDATA[<div>अभी हाल ही में एक रिपोर्ट के नतीजों को लेकर काफी चर्चा हो रही है यह रिपोर्ट है प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ईएसी की एक अध्ययन रिपोर्ट । ईएसी पीएम रिपोर्ट में 65 सालों के अंदर हिंदुओं की आबादी घटने की जानकारी दी गई है। अध्ययन के मुताबिक भारत में 1950 से लेकर 2015 तक बहुसंख्यक हिंदुओं की आबादी 7.8 प्रतिशत घट गई है तो वहीं कई पड़ोसी देशों में बहुसंख्यक समाज की आबादी में काफी इजाफा हुआ है।रिपोर्ट के अनुसार  भारत में हिंदुओं की संख्या कम हुई है तो वहीं जैन और पारसियों की संख्या भी घटी है।</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/141134/fake-secularism-responsible-for-decrease-in-growth-rate-of-hindus"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2024-05/fasdf.jpg" alt=""></a><br /><div>अभी हाल ही में एक रिपोर्ट के नतीजों को लेकर काफी चर्चा हो रही है यह रिपोर्ट है प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ईएसी की एक अध्ययन रिपोर्ट । ईएसी पीएम रिपोर्ट में 65 सालों के अंदर हिंदुओं की आबादी घटने की जानकारी दी गई है। अध्ययन के मुताबिक भारत में 1950 से लेकर 2015 तक बहुसंख्यक हिंदुओं की आबादी 7.8 प्रतिशत घट गई है तो वहीं कई पड़ोसी देशों में बहुसंख्यक समाज की आबादी में काफी इजाफा हुआ है।रिपोर्ट के अनुसार  भारत में हिंदुओं की संख्या कम हुई है तो वहीं जैन और पारसियों की संख्या भी घटी है। इसके विपरीत ईसाई, मुस्लिम, बौद्ध और सिखों समेत अल्पसंख्यकों की आबादी बढ़ी है। रिपोर्ट की मानें तो 1950 से लेकर 2015 के बीच भारत में मुस्लिम समाज की आबादी में 43.15 फीसद की बढ़त दर्ज किया गया है तो वहीं सिखों में 6.58 फीसद, ईसाइयों में 5.38 फीसद और बौद्ध में बहुत थोड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके लिए दुनियाभर के 167 देशों का अध्ययन किया गया है।</div>
<div> </div>
<div>इसके लेखकों ने कहा है कि दुनिया के ट्रेंड को देखते हुए भारत में एक स्थिरता पाई गई है, रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में अल्पसंख्यक न केवल सुरक्षित हैं, बल्कि जनसंख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसके मुताबिक चीन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा जैसे देशों के साथ ही कुछ पूर्वी अफ्रीकी देशों की जनसंख्या में बहुसंख्यक समुदाय की आबादी में भारत की अपेक्षा अधिक गिरावट दर्ज की गई है। 167 देशों में बहुसंख्यक समुदाय की हिस्सेदारी 1950-2015 से औसतन 22 प्रतिशत कम हो गई है। इसके अलावा 35 उच्च आय वाले आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के देशों में बहुसंख्यक समुदाय की आबादी में 29 प्रतिशत की औसत गिरावट दर्ज की गई है, जो कि वैश्विक औसत 22 प्रतिशत से अधिक है। 1950 में भारत की जनसंख्या में हिंदू 84. 6प्रतिशत थे, लेकिन 2015 तक घटकर 78 प्रतिशत हो गए हैं। अध्ययन में कहा गया है कि पहले 9.84 फीसद मुसलमान थे, जबकि अब 14.09 प्रतिशत हो गए हैं। भारत के साथ ही म्यांमार में भी बहुसंख्यक आबादी में तेजी से कमी दर्ज की गई है।</div>
<div> </div>
<div>म्यांमार में 10 फीसद और भारत में 7.8 फीसद बहुसंख्यक आबादी कम हुई है। यहीं भारत के पड़ोसी देशों में से एक नेपाल में भी बहुसंख्यक समुदाय हिंदू दर्ज की की आबादी में 3.6 फीसद की गिरावट गई है। है। बता दें कि जहां एक ओर भारत में बहुसंख्यक समाज की संख्या घटी है तो वहीं पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में बहुसंख्यकों की आबादी में जबरदस्त उछाल देखा गया है। इन दोनों देशों में मुस्लिम समाज बहुसंख्यक है। बांग्लादेश में 18.5 फीसद आबादी बड़ी है तो वहीं पाकिस्तान में 3.75 फीसद और अफगानिस्तान में (0.29 फीसद मुस्लिम समाज की आबादी बढ़ी है। पाकिस्तान में बहुसंख्यक धार्मिक संप्रदाय हनफी मुस्लिम की संख्या में 3.75 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है तो वहीं बांग्लादेश में कुल मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी में 10 फीसद की बढ़ोतरी हुई है, बता दें कि 1971 में बांग्लादेश अस्तित्व में आया था। भारत के पूर्वी पड़ोसी देश म्यांमार में भी बहुसंख्यक समाज की आबादी में गिरावट दर्ज की गई है। म्यांमार में थेरवाद बौद्धों की बहुसंख्यक आबादी है।</div>
<div> </div>
<div>इन 65 सालों में यहां पर इनकी आबादी में 10 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। मालदीव में बहुसंख्यक समुदाय शफोई सुत्री की आबादी में 1.47 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है तो वहीं भारत और म्यांमार के अलावा नेपाल में भी बहुसंख्यक हिंदू आबादी में 3.6 प्रतिशत कमी दर्ज की गई है लेकिन बहुसंख्यक बौद्ध आबादी वाले भारत के पड़ोसी देश भूटान और श्रीलंका में क्रमशः 17.6 फीसद और 5.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक अब बचे हुए चुनावों में यह मुद्दा बड़े जोर-शोर से उठेगा। इसके सियासी नफा-नुकसान का आकलन राजनीतिक गलियारों में किया जाने लगा है। जबकि कुछ लोगों ने ऐसी रिपोर्ट पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा है कि जब अभी तक जनगणना नहीं हुई है, तो यह आंकड़े कितने आधिकारिक हैं और कितने मान्य हैं। इस पर सरकार को अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए। </div>
<div> </div>
<div>भारतीय जनता पार्टी पर हिन्दुत्ववादी होने के आरोप लगते हैं तो कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप हैं । चुनावों के समय यह आरोप-प्रत्यारोप ज्यादा ही बढ़ जाता है। इस बार भी भाजपा जहां श्रीराम मंदिर, कश्मीर से धारा 370 हटाने और पड़ोसी देशों के प्रताड़ित हिन्दुओं, सिखों, ईसाइयों व जैनियों को नागरिकता देने वाले नागरिकता संशोधन विधेयक यानी सीएए के नाम पर वोट मांग रही है। वहीं, विपक्षी दल कभी मुस्लिमों का आरक्षण बढ़ाने की बात करते हैं तो कभी जातीय जनगणना की और कभी सबकी संपत्ति लेकर गरीबों में बांटने की विवादास्पद बयान बाजी कर रहे हैं ।</div>
<div> </div>
<div>गौर तलब है कि इस रिपोर्ट का उद्देश्य सकारात्मक है और इसमें कहा गया कि संबंधित आंकड़ों से संकेत मिलता है कि 'समाज में विविधता को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल वातावरण है। यह रिपोर्ट अमेरिका जैसे उन पश्चिमी देशों के मुंह पर भी तमाचा है जो धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव के आरोप लगाकर भारत पर सवाल उठाते रहते हैं। रिपोर्ट के आते ही राजनीतिक बवाल मच गया। जहां भाजपा ने हिंदुओं की जनसंख्या घटने और मुस्लिमों की आबादी बढ़ने पर चिंता जताई है, वहीं कांग्रेस सहित विपक्षी दल रिपोर्ट आने से इसके जारी करने के समय को लेकर सवाल उठा रहे हैं।</div>
<div> </div>
<div>किन्तु इस रिपोर्ट से एक गंभीर सवाल उठता है कि क्या देश में हिंदुओं के अस्तित्व पर खतरा है? क्या मुस्लिम आबादी धीरे-धीरे हिंदुओं से अधिक हो जाएगी? इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि हिंदुओं की तुलना में मुस्लिमों में संतान पैदा करने की प्रवृत्ति अधिक है। इसमें शिक्षा भी एक कारक है, क्योंकि शिक्षित होने के बाद व्यक्ति अपनी संतानों के बेहतर पालन-पोषण की सोचने लगता है और उसी अनुसार अपना परिवार बढ़ाता है, जबकि कम शिक्षित या अशिक्षित लोगों की सोच ऐसी नहीं होती। कुछ क्षेत्र विशेष में कथित धर्मगुरु मुस्लिमों को इस तरह भी बरगलाते हैं कि बच्चे पैदा करोगे तो वोट की ताकत बढ़ेगी और देर-सवेर हम गजवा ए हिंद' का सपना पूरा कर लेंगे। </div>
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<div> यह भी कटु सच है कि इस देश में पिछले लम्बे कालखंड में हिन्दुओं को जाति में बांट कर मुस्लिम समुदाय को बहुसंख्यकों से अधिक सरकारी सुविधाएं देकर उनके वोट पाने की नीति अपनायी गयी जबकि उनके सामाजिक विकास और कट्टरपंथी सोच को कम करने और उन्हें राष्ट्रीय मुख्य धारा में शामिल करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया वरन उन्हें वोट बैंक बनाने के लिए चरमपंथी विचारों को अपनाने व प्रसार करने के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया गया। इस का परिणाम है कि हिन्दू समुदाय अपने घर में भी दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया गया और हर स्तर पर अल्पसंख्यकों में भी सिर्फ मुसलमान अल्पसंख्यक को बढ़ावा देने की राजनीति तमाम कथित सेकुलर दलों ने की।</div>
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<div>इतना ही नहीं सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओ का उत्पीड़न और कट्टरपंथी अल्पसंख्यकों का संरक्षण भी इन तथाकथित सेकुलर मुसलिम परस्त दलों द्वारा किया गया। गौर तलब है कि यदि भारत की आबादी इसी तरह बढ़ती रही संसाधन इसका बोझ सहन नहीं कर पाएंगे। हम चीन को भी पीछे छोड़ कर दुनिया के सबसे जनसंख्या वाले देश बन चुके हैं, यदि अब भी सरकार ने कड़ाई से हम दो-हमारे दो जैसा कोई नियम-कानून बनाकर उसका कड़ाई से पालन नहीं करवाया तो खाने के लिए अन्न भी बाहर से आयात करना पड़ेगा। यदि देश को विकसित बनाना, अपना भविष्य सुखी एवं समृद्ध बनाना है तो जनसंख्या नियंत्रण पर ध्यान देना ही होगा। धर्म कोई भी हो, यदि आबादी इसी तरह बढ़ती रही तो न देश विकसित हो पाएगा और न ही भविष्य सुखी एवं सुरक्षित हो पाएगा।</div>
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<div> यहां यह तथ्य भी विचारणीय है कि 1950 के दशक में में पाकिस्तान में हिन्दू आबादी 12% के करीब थी जो आज घट कर एक प्रतिशत रह गयी है देश के नौ राज्यों में हिन्दू आबादी अल्पसंख्यक हो चुकी है ऐसे में देश के भोगोलिक व सामाजिक स्वरूप को बचाने के लिए प्रयास करना चाहिए। लेकिन पैसठ साल के कालखंड में ऐसी राजनीतिक विचारधारा पल्लवित हुयी जिसका उद्देश्य सत्ता में बने रहने के लिए हिन्दुओं को स्वर्ण दलित पिछड़े अगड़ी और विभिन्न जातियों में बांट कर जातीय विद्वेष पैदा कर मुस्लिम गठजोड़ से येन-केन प्रकरण सत्ता हासिल कर भ्रष्टाचार करना रहा। देश में राष्ट्रीय हित को सर्वोच्चता देने वाली और बिना तुष्टिकरण सबको समान अवसर देने व समान नागरिक कानून लागू करने पर ही यह अव्यवस्था दूर हो सकती है।</div>
<div><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div><strong> (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचारधारा</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 May 2024 16:34:53 +0530</pubDate>
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