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                <title>Biodiversity Conservation - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Biodiversity Conservation RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>राष्ट्रीय ग्रीन यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2026 में असम विश्वविद्यालय 11वें स्थान पर</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>श्रीभूमि  :</strong> पर्यावरण संरक्षण, जलवायु अनुकूल पहल और हरित परिसर के विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए असम विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बनाई है। यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त पर्यावरणीय संस्था ग्रीन मेंटर्स की नेशनल ग्रीन यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2026 में विश्वविद्यालय को देशभर में 11वां स्थान प्राप्त हुआ है। इस उपलब्धि से विश्वविद्यालय के छात्र, शिक्षक एवं कर्मचारियों में उत्साह का माहौल है। परिसर के पर्यावरणीय प्रदर्शन और आवश्यक दस्तावेजों के विस्तृत मूल्यांकन के आधार पर जारी इस रैंकिंग में असम विश्वविद्यालय ने 100 में से 92.9 अंक अर्जित किए हैं। उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184297/assam-university-ranked-11th-in-national-green-university-rankings-2026"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1001662399.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>श्रीभूमि  :</strong> पर्यावरण संरक्षण, जलवायु अनुकूल पहल और हरित परिसर के विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए असम विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बनाई है। यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त पर्यावरणीय संस्था ग्रीन मेंटर्स की नेशनल ग्रीन यूनिवर्सिटी रैंकिंग 2026 में विश्वविद्यालय को देशभर में 11वां स्थान प्राप्त हुआ है। इस उपलब्धि से विश्वविद्यालय के छात्र, शिक्षक एवं कर्मचारियों में उत्साह का माहौल है। परिसर के पर्यावरणीय प्रदर्शन और आवश्यक दस्तावेजों के विस्तृत मूल्यांकन के आधार पर जारी इस रैंकिंग में असम विश्वविद्यालय ने 100 में से 92.9 अंक अर्जित किए हैं। उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए विश्वविद्यालय को गोल्ड रेटिंग से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उन उच्च शिक्षण संस्थानों को दिया जाता है जो शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, कार्बन उत्सर्जन में कमी और जलवायु जागरूकता को प्रभावी ढंग से बढ़ावा देते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ग्रीन मेंटर्स की मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी तरह तथ्य एवं साक्ष्य आधारित रही।100 अंकों की रैंकिंग 10 प्रमुख मानकों पर निर्धारित की गई, जिनमें परिसर की जैव विविधता एवं हरित क्षेत्र, कार्बन और जलवायु कार्ययोजना, पर्यावरण-अनुकूल अवसंरचना, ऊर्जा दक्षता, जल प्रबंधन, अपशिष्ट प्रबंधन तथा सामाजिक सहभागिता जैसे पहलू शामिल थे। यह मूल्यांकन ढांचा भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) तथा यूनेस्को के ग्रीनिंग हायर एजुकेशन फ्रेमवर्क के अनुरूप तैयार किया गया है। इस राष्ट्रीय उपलब्धि के बाद असम विश्वविद्यालय को आगामी सितंबर में न्यूयॉर्क में आयोजित होने वाले 10वें एनवाईसी ग्रीन स्कूल कॉन्फ्रेंस 2026 में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया है। सम्मेलन में दुनिया भर के शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और पर्यावरण विशेषज्ञों की उपस्थिति में विश्वविद्यालय को सम्मानित किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. प्रदोष किरण नाथ ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सफलता विश्वविद्यालय परिवार के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि शिक्षक, कर्मचारी, शोधार्थी और छात्र लंबे समय से परिसर को पर्यावरण-अनुकूल बनाने की दिशा में निरंतर कार्य कर रहे हैं। विश्वविद्यालय शैक्षणिक उत्कृष्टता के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए इसी दिशा में आगे बढ़ता रहेगा। उन्होंने इस उपलब्धि के लिए सभी को बधाई दी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>असम हिमाचल प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 22:17:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>प्रतिबंधित पेड़ो पर आरा चला रहे है लकड़कट्टे</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>सकरन:</strong> थाना सकरन क्षेत्र के गांव में लकड़कट्टों ने प्रतिबंधित जामुन के पेड़ों की निर्भीक अवैध कटाई कर दी है। सरे आम हो रही इस कटाई से स्थानीय पर्यावरण को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।  बड़े जामुन के पेड़ को हाल ही में आरा चलाकर काट दिया गया है।  जामुन के पेड़ वन विभाग के नियमों के तहत संरक्षित श्रेणी में आते हैं। इनकी कटाई के लिए वन विभाग की लिखित अनुमति अनिवार्य है, लेकिन थाना सकरन क्षेत्र के गांव में लकड़कट्टे बिना किसी डर के खुले आम इन पेड़ों को काट रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">स्थानीय सूत्रों के अनुसार यह</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180344/woodcutters-are-running-saws-on-banned-trees"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/17209.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>सकरन:</strong> थाना सकरन क्षेत्र के गांव में लकड़कट्टों ने प्रतिबंधित जामुन के पेड़ों की निर्भीक अवैध कटाई कर दी है। सरे आम हो रही इस कटाई से स्थानीय पर्यावरण को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।  बड़े जामुन के पेड़ को हाल ही में आरा चलाकर काट दिया गया है।  जामुन के पेड़ वन विभाग के नियमों के तहत संरक्षित श्रेणी में आते हैं। इनकी कटाई के लिए वन विभाग की लिखित अनुमति अनिवार्य है, लेकिन थाना सकरन क्षेत्र के गांव में लकड़कट्टे बिना किसी डर के खुले आम इन पेड़ों को काट रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">स्थानीय सूत्रों के अनुसार यह कोई पहली घटना नहीं है। क्षेत्र में पिछले कई दिनों से ऐसी अवैध कटाई लगातार जारी है।वन विभाग और पुलिस प्रशासन की उदासीनता से अवैध लकड़कट्टों का हौसला बढ़ता जा रहा है। स्थानीय लोगों ने चिंता जताते हुए कहा कि यदि समय रहते रोकथाम नहीं की गई तो पूरे क्षेत्र के जंगल साफ हो जाएंगे। जामुन के पेड़ केवल फल देने वाले ही नहीं, बल्कि मिट्टी के कटाव को रोकने, भूमिगत जल स्तर बनाए रखने और जैव विविधता को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बड़े पैमाने पर इनकी कटाई से क्षेत्र में पर्यावरणीय असंतुलन, जल संकट और जैव विविधता के नुकसान की आशंका बढ़ती है। स्थानीय निवासियों ने प्रशासन से तुरंत संज्ञान लेने और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है।अब देखना यह है कि वन विभाग और थाना सकरन पुलिस इस पर्यावरणीय अपराध पर कितनी तेजी से कार्रवाई करती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:34:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>उद्योगपतियों का बोल बाला हरियाली पर चल रही आरा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संपादक/लेखक: राजीव शुक्ला</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में हरियाली संरक्षण की बातें सरकारी योजनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौधारोपण अभियानों और जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में खूब होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी भिन्न है। देश के कई हिस्सों में उद्योगपतियों और लकड़ी माफिया के बोल बाले में आरा मशीनें (बैंड सॉ मिल या सॉइंग मशीनें) बेखौफ हरियाली पर आरी चला रही हैं। हरे-भरे पेड़—नीम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीशम या अन्य प्रजातियां—रातोंरात कटकर लकड़ी के ढेर में बदल जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि प्रशासन या तो आंखें मूंदे बैठा है या जांच की औपचारिकता पूरी कर मामला ठंडा कर देता है। यह न केवल पर्यावरणीय</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177911/industrialists-say-the-saw-is-running-on-greenery"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/istockphoto-1306526998-612x612-1.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">संपादक/लेखक: राजीव शुक्ला</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत में हरियाली संरक्षण की बातें सरकारी योजनाओं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पौधारोपण अभियानों और जलवायु परिवर्तन सम्मेलनों में खूब होती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी भिन्न है। देश के कई हिस्सों में उद्योगपतियों और लकड़ी माफिया के बोल बाले में आरा मशीनें (बैंड सॉ मिल या सॉइंग मशीनें) बेखौफ हरियाली पर आरी चला रही हैं। हरे-भरे पेड़—नीम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">महुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शीशम या अन्य प्रजातियां—रातोंरात कटकर लकड़ी के ढेर में बदल जा रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि प्रशासन या तो आंखें मूंदे बैठा है या जांच की औपचारिकता पूरी कर मामला ठंडा कर देता है। यह न केवल पर्यावरणीय आपदा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विकास के नाम पर हो रही व्यवस्थित लूट का प्रतीक भी है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विभिन्न राज्यों से लगातार खबरें आ रही हैं कि औद्योगिक कॉलोनियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांवों के किनारे या जंगलों के आसपास अवैध आरा मशीनें  संचालित हो रही हैं। मध्य प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे क्षेत्रों में इन मशीनों पर सैकड़ों क्विंटल हरी लकड़ी रोजाना चीरी जा रही है। कई मामलों में बिना लाइसेंस या एनओसी के आरा मशीनें चल रही हैं और हरे पेड़ों की जड़ें तक उखाड़ी जा रही हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि सबूत मिट जाएं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वन विभाग  की भूमिका अक्सर संदिग्ध नजर आती है। लकड़ी का स्रोत जांचे बिना आरा संचालकों को छूट मिल रही है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में कभी-कभी बुलडोजर कार्रवाई होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ये प्रयास छिटपुट और अपर्याप्त साबित हो रहे हैं। लकड़ी उद्योग की मांग ईंधन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फर्नीचर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पैकेजिंग और निर्माण के लिए लगातार बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका फायदा अक्सर शक्तिशाली उद्योगपतियों और उनके नेटवर्क को पहुंचता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस संदर्भ में ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना एक चिंताजनक उदाहरण है। अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में प्रस्तावित इस </span>₹81,000<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ की मेगा परियोजना में अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्यूल-यूज एयरपोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पावर प्लांट और टाउनशिप का निर्माण शामिल है। परियोजना के तहत लगभग </span>130-166<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें प्राथमिक वर्षावन (</span>rainforest) <span lang="hi" xml:lang="hi">की बड़ी मात्रा शामिल है। </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अनुमान है कि इससे करीब </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख से अधिक पेड़ कट सकते हैं। परियोजना को रणनीतिक महत्व (भारतीय महासागर क्षेत्र में भारत की उपस्थिति मजबूत करने) का हवाला देकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (</span>NGT) <span lang="hi" xml:lang="hi">ने हाल ही में पर्यावरणीय मंजूरी बरकरार रखी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पर्यावरणविद् चेतावनी दे रहे हैं कि इससे जैव विविधता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेदरबैक कछुए के घोंसलों और शोम्पेन जनजाति के निवास पर अपूरणीय क्षति होगी। एक ओर हरियाली बचाने के दावे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दूसरी ओर ऐसे बड़े पैमाने पर वन क्षेत्रों का डायवर्शन विकास मॉडल की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आईएसआरओ के उपग्रह डेटा पर आधारित वन सर्वे ऑफ इंडिया (</span>FSI) <span lang="hi" xml:lang="hi">की भारत राज्य वन रिपोर्ट </span>2023 (ISFR 2023) <span lang="hi" xml:lang="hi">में देश की हरियाली की तस्वीर मिश्रित है। रिपोर्ट के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का कुल वन और वृक्ष आवरण </span>8,27,357<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का </span>25.17%<span lang="hi" xml:lang="hi"> है। इसमें वन आवरण </span>7,15,343<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर (</span>21.76%) <span lang="hi" xml:lang="hi">और वृक्ष आवरण </span>1,12,014<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर (</span>3.41%) <span lang="hi" xml:lang="hi">शामिल है। </span>2021<span lang="hi" xml:lang="hi"> की तुलना में कुल वन और वृक्ष आवरण में </span>1,445<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई है (वन आवरण में +</span>156<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर और वृक्ष आवरण में +</span>1,289<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर)। रिपोर्ट </span>ISRO <span lang="hi" xml:lang="hi">के </span>Resourcesat-2<span lang="hi" xml:lang="hi"> सैटेलाइट के </span>LISS-III <span lang="hi" xml:lang="hi">सेंसर (</span>23.5<span lang="hi" xml:lang="hi"> मीटर रिजोल्यूशन) से प्राप्त मध्यम रिजोल्यूशन वाले उपग्रह डेटा पर आधारित है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेषज्ञों का कहना है कि यह वृद्धि मुख्य रूप से प्लांटेशनों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एग्रोफॉरेस्ट्री और रिकॉर्डेड फॉरेस्ट क्षेत्रों के बाहर वृक्षों के विस्तार से आई है। घने प्राकृतिक वनों में गिरावट जारी है। पिछले दो दशकों में घने वनों की कुल हानि </span>24,651<span lang="hi" xml:lang="hi"> वर्ग किलोमीटर से अधिक हो चुकी है। उत्तर-पूर्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य भारत के आदिवासी क्षेत्र और पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील इलाकों में खनन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और अवैध कटाई से वन क्षरण हो रहा है। अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में मैंग्रोव आवरण हालांकि बढ़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बड़े विकास प्रोजेक्ट्स इससे खतरा पैदा कर रहे हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">ग्रेट निकोबार जैसी परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को और मजबूत तथा पारदर्शी बनाना होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि रणनीतिक विकास और जैव विविधता संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे। आईएसआरओ के उपग्रह डेटा जैसी वैज्ञानिक निगरानी को और प्रभावी बनाकर वास्तविक वन क्षरण पर अंकुश लगाया जा सकता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाली हमारी साझा विरासत है। यदि उद्योगपतियों का बोल बाला बिना रोक-टोक जारी रहा और बड़े प्रोजेक्ट्स में वन क्षेत्रों की बलि चढ़ती रही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भविष्य की पीढ़ियां केवल आरा मशीनों की गूंज और सूखे खेतों की कहानियां सुनेंगी। सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासन और नागरिक समाज को मिलकर इस लूट को रोकना होगा। विकास और पर्यावरण के बीच सच्चा संतुलन बनाना संभव है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक सख्ती अनिवार्य है। अन्यथा</span>, ‘<span lang="hi" xml:lang="hi">हरियाली’ शब्द सिर्फ सरकारी फाइलों और भाषणों तक सीमित रह जाएगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 17:47:27 +0530</pubDate>
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                <title>विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर धरा का किया गया जलाभिषेक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>नैनी प्रयागराज।</strong> बुधवार को विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर परमार्थ त्रिवेणी पुष्प,अरैल, प्रयागराज में प्रकृति, पर्यावरण एवं जल संरक्षण को समर्पित एक प्रेरणादायी जलाभिषेक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती का प्रेरणादायी उद्बोधन  हुआ।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में पद्मश्री एवं पद्मभूषण से सम्मानित प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, संजय स्वामी, राष्ट्रीय सह संयोजक, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली, स्वामी वेद विद्यानन्द जी, योगी शुक्राई नाथ जी सहित अनेक गणमान्य अतिथियों, पूज्य संतों, समाजसेवियों, शिक्षाविदों एवं पर्यावरणविदों की गरिमामयी उपस्थिति रही।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">स्वामी चिदानन्द सरस्वती  ने अपने आशीर्वचन में कहा कि</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176954/jalabhishek-of-earth-was-done-on-the-occasion-of-world"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260422-wa0315.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>नैनी प्रयागराज।</strong> बुधवार को विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर परमार्थ त्रिवेणी पुष्प,अरैल, प्रयागराज में प्रकृति, पर्यावरण एवं जल संरक्षण को समर्पित एक प्रेरणादायी जलाभिषेक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती का प्रेरणादायी उद्बोधन  हुआ।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">कार्यक्रम में पद्मश्री एवं पद्मभूषण से सम्मानित प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, संजय स्वामी, राष्ट्रीय सह संयोजक, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली, स्वामी वेद विद्यानन्द जी, योगी शुक्राई नाथ जी सहित अनेक गणमान्य अतिथियों, पूज्य संतों, समाजसेवियों, शिक्षाविदों एवं पर्यावरणविदों की गरिमामयी उपस्थिति रही।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">स्वामी चिदानन्द सरस्वती  ने अपने आशीर्वचन में कहा कि पृथ्वी केवल ग्रह नहीं, हमारी माता है। पृथ्वी केवल संसाधनों का भंडार नहीं, बल्कि समस्त जीवन का आधार है। यदि धरती सुरक्षित है, तो मानवता, संस्कृति, सभ्यता और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित है। जल, जंगल, जमीन और जीवन ये सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि हम पृथ्वी को बचाना चाहते हैं तो हमें जल संरक्षण, वृक्षारोपण और सतत जीवनशैली को अपनाना होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को पूजनीय माना है। हमारे वेदों, उपनिषदों और सनातन परंपरा में पृथ्वी, नदियों, पर्वतों और वृक्षों को देवतुल्य सम्मान दिया है।स्वामी जी ने उपस्थित जनसमूह से आह्वान किया कि हर व्यक्ति अपने जीवन में जल बचाने, प्लास्टिक मुक्त जीवन अपनाने, वृक्ष लगाने तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु व्यक्तिगत संकल्प ले। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि बिन अर्थ (पृथ्वी), सब व्यर्थ। यह सम्पूर्ण जीवन का शाश्वत सत्य है। यदि पृथ्वी न हो, तो न जीवन होगा, न जल होगा, न वायु होगी, न अन्न होगा और न ही यह सुंदर संसार होगा। हमारी हर साँस, हर धड़कन, हर आशा और हर भविष्य पृथ्वी पर ही आधारित है। इसलिए पृथ्वी का संरक्षण केवल पर्यावरण की बात नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">पद्मश्री एवं पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी जी ने कहा कि पृथ्वी को बचाने का समय अभी है। यदि हमने आज प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी। उन्होंने युवाओं से विज्ञान, संस्कार और संवेदनशीलता के साथ पर्यावरण संरक्षण में आगे आने का आह्वान किया।महापौर गणेश केशरवानी ने प्रयागराज को स्वच्छ, हरित बनाने के लिए नगर निगम द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">संजय स्वामी ने शिक्षा के माध्यम से पर्यावरण चेतना को जन-जन तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल दिया।कार्यक्रम के अंतर्गत पवित्र जल से पृथ्वी एवं प्रकृति के प्रतीक स्वरूप जलाभिषेक किया गया तथा सभी ने मिलकर “धरती बचाओ, जल बचाओ, भविष्य बचाओ” का संकल्प लिया। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस दिव्य अवसर पर अशोक मेहता , अपर महाधिवक्ता, विधायक जवाहर लाल राजपूत,प्रो कपिलदेव मिश्रा पूर्व कुलपति रानीदुर्गावती, प्रो राजाराम यादव, पूर्व कुलपति,  अनामिका चौधरी, सुबेदार इमृतलाल, गंगा टास्कफोर्स,न्यायमूर्ति सुधीरनारायण अग्रवाल, स्वामी मदनगोपाल दास जी और अनेक विभूतियों की  उपस्थिति रही।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 20:16:54 +0530</pubDate>
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