<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/77404/civic-responsibility" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>नागरिक जिम्मेदारी - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/77404/rss</link>
                <description>नागरिक जिम्मेदारी RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सुविधाएँ बढ़ीं, बजट बढ़ा, फिर भी व्यवस्था वहीं क्यों?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिकायतों की सूची लंबी है—अस्पताल में दवा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल में शिक्षक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़क पर रोशनी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यालय में कर्मचारी नहीं। लेकिन सवाल हो कि जो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह काम कर रहा है या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आवाज़ धीमी पड़ जाती है। डॉक्टर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज के सामने नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कक्षा में नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मचारी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीट पर नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकारी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दायित्व पर नहीं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्पताल में मशीन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाँच नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल में प्रयोगशाला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोग नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मैदान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेल नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">टंकी है</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184435/facilities-increased-budget-increased-still-why-is-the-system-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1.-prof.-rkjain.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शिकायतों की सूची लंबी है—अस्पताल में दवा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल में शिक्षक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़क पर रोशनी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यालय में कर्मचारी नहीं। लेकिन सवाल हो कि जो है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह काम कर रहा है या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आवाज़ धीमी पड़ जाती है। डॉक्टर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज के सामने नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कक्षा में नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मचारी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीट पर नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकारी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दायित्व पर नहीं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अस्पताल में मशीन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जाँच नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">स्कूल में प्रयोगशाला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रयोग नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">मैदान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेल नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">टंकी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नल में पानी नहीं। समस्या सिर्फ सुविधाओं की कमी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौजूद साधनों और पदों का अपने उद्देश्य से गायब होना है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधन हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुर्सियाँ भरी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम नहीं। सवाल है—इस दिखाई देती अनुपस्थिति को कब तक अनदेखा करेंगे</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हमने सुविधाओं को सेवा का माध्यम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजी लाभ का साधन बना लिया है। सरकारी अस्पताल का डॉक्टर सरकारी समय में निजी मरीजों में व्यस्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि ओ.पी.डी. में गरीब अपनी बारी का इंतजार करता है। शिक्षक कक्षा के लिए नियुक्त है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर उसकी ऊर्जा निजी कोचिंग में खपती है। सरकारी वाहन जनता के लिए है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर निजी आवागमन में चलता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी कंप्यूटर काम के लिए है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर निजी कारोबार में इस्तेमाल होता है। सरकारी फोन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कमरा और संसाधन—नाम सरकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस्तेमाल निजी। यहीं से सुविधा का चरित्र बदल जाता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो साधन जनता की सेवा के लिए था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वही किसी की निजी सुविधा और कमाई का जरिया बन जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना यह है कि हर समस्या का हल हम नई सुविधा में खोजते हैं—अस्पताल में भीड़ हो तो नया भवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिणाम कमजोर हों तो नई इमारत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मशीन खराब हो तो नई मशीन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मचारी कम हों तो नई नियुक्ति। मगर पुरानी सुविधा का हिसाब कौन देगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">लाखों की मशीन खरीदी जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीशियन न मिले तो धूल खाती है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">दवाइयाँ गोदाम भरती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वितरण की लापरवाही से जरूरतमंद तक नहीं पहुँचतीं और एक्सपायरी उन्हें निगल जाती है। स्कूल में स्मार्ट क्लास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रोजेक्टर और स्क्रीन आ जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर पढ़ाने का ढर्रा वही रहता है। प्रशिक्षण होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमाणपत्र बंटते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तस्वीरें खिंचती हैं—कक्षा में फिर भी रट्टा चलता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधन बढ़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बजट बढ़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खर्च बढ़ता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बस उपयोगिता वहीं की वहीं रहती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सुविधाएँ शायद इसी लिए चुपचाप सवाल करती हैं। अस्पताल का बिस्तर पूछता है—“मैं मरीज के लिए था या सिर्फ औपचारिकता के लिए</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">किताब पूछती है—“बच्चे तक पहुँची क्यों नहीं</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">स्ट्रीट लाइट पूछती है—“मेरी रोशनी किस काम की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब महीनों खराब पड़ी रहूँ</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">सार्वजनिक शौचालय बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सफाई के अभाव में बेकार हो जाता है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">बस स्टैंड खड़ा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मगर यात्री सुविधा से वंचित हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">पार्क बनता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">देखरेख न हो तो कूड़े और टूटे सामान में बदल जाता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इमारतें खड़ी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मशीनें खड़ी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">योजनाएँ कागज पर चल रही हैं—बस सेवा गायब है। सुविधा का शरीर बचा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्देश्य मर चुका है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे बड़ी विडंबना तब सामने आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब हम दूसरों से ईमानदारी चाहते हैं और अपनी बारी पर “सिस्टम ऐसा ही है” कहकर बच निकलते हैं। डॉक्टर व्यवस्था को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक विभाग को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मचारी अधिकारी को</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकारी बजट को और नागरिक पूरे सिस्टम को दोष देता है। मगर सिस्टम है किससे</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">हमसे ही।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर न पहुँचने वाला कर्मचारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिना पढ़े फाइल बढ़ाने वाला अधिकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कक्षा को औपचारिकता मानने वाला शिक्षक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मरीज से ज्यादा निजी काम को तरजीह देने वाला डॉक्टर—ये सभी सिस्टम हैं। हम व्यवस्था बदलना चाहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर शुरुआत खुद से नहीं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सिस्टम को कोसना आसान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने भीतर के स्वार्थ को देखना कठिन। यही हमारी असली सामूहिक विडंबना है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असली सवाल सुविधा के होने का नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके सही इस्तेमाल का है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सही उपयोग हो तो मरीज को इलाज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छात्र को समझ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसान को समय पर जानकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरिक को समय पर प्रमाणपत्र और सड़क को रात में रोशनी मिलती है। दुरुपयोग हो तो डॉक्टर की कुर्सी भरी रहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सेवा खाली</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक का वेतन आता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मेहनत नहीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">कार्यालय खुला रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समाधान बंद। कहीं नौकरी जिम्मेदारी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थायी सुविधा बन जाती है—हाजिरी पूरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय पूरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">काम अपनी मर्जी का। कहीं सरकारी संसाधन निजी काम में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं सार्वजनिक समय निजी लाभ में।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह सिर्फ व्यवस्था की कमजोरी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी सामूहिक बेईमानी है—जिसे हम सुविधाजनक ढंग से “सिस्टम की समस्या” कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच जाते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब विकास का सवाल भी बदलना होगा। हर बार “नई सुविधा कब मिलेगी</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">से पहले पूछा जाए—</span>“<span lang="hi" xml:lang="hi">जो मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका परिणाम क्या आया</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">नया अस्पताल बनाने से पहले पुराने की दवा व्यवस्था देखी जाए</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">नई मशीन लाने से पहले पूछा जाए कि पुरानी बंद क्यों है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">नया स्कूल खोलने से पहले देखा जाए कि मौजूदा स्कूल बच्चों को क्या दे रहा है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">नई सड़क से पहले पुरानी सड़क की मरम्मत का हिसाब हो। हर योजना के साथ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">देखभाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिम्मेदारी और परिणाम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भी तय हों। सुविधा खरीदना आसान है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे उपयोगी बनाए रखना कठिन। बजट से भवन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मशीन और फर्नीचर खरीदे जा सकते हैं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">ईमानदार उपयोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिम्मेदारी और संवेदना किसी निविदा में नहीं मिलती।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवस्था केवल नई सुविधाओं से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सही नीयत से बदलती है। डॉक्टर के लिए मरीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षक के लिए कक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कर्मचारी के लिए सरकारी समय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अधिकारी के लिए फाइल के पीछे खड़ा व्यक्ति और नागरिक के लिए सार्वजनिक संसाधन—जब सुविधा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिम्मेदारी बन जाएँ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आधी समस्याएँ बिना नए खर्च के खत्म हो सकती हैं। नई सुविधाएँ जरूरी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर पुरानी नीयत के साथ नहीं। असली सुविधा बजट नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका ईमानदार उपयोग है। जिस दिन “मुझे क्या मिला</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">से पहले “जो मिला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे किसका भला हुआ</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">पूछा जाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी दिन व्यवस्था का हर साधन अपना असली अर्थ पाएगा। तब सुविधाएँ सिर्फ उपलब्ध नहीं होंगी—सार्थक होंगी।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/184435/facilities-increased-budget-increased-still-why-is-the-system-the</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/184435/facilities-increased-budget-increased-still-why-is-the-system-the</guid>
                <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 22:34:48 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-07/1.-prof.-rkjain.jpg"                         length="55370"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अधिकारों की तुलना में कर्तव्य और जिम्मेदारियां के प्रति हम ज्यादा अनभिग्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने कहा था कि “अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है, यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकार अपने आप मिल जाएंगे,” भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन का प्रश्न केवल संवैधानिक बहस का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का आईना भी है।  इसी प्रकार भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह स्पष्ट किया था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा,” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176919/we-are-more-ignorant-of-duties-and-responsibilities-than-rights"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/dgkdjgbvax1605352666.jpeg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने कहा था कि “अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है, यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकार अपने आप मिल जाएंगे,” भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अधिकार और कर्तव्य के बीच संतुलन का प्रश्न केवल संवैधानिक बहस का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का आईना भी है।  इसी प्रकार भारत के संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह स्पष्ट किया था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा,” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि कानून और नियम केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि नागरिकों की चेतना और कार्यों में जीवित रहते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> आज हम जिस दौर में खड़े हैं, वहाँ एक ओर जनसंख्या का विस्तार, स्त्री-पुरुष अनुपात की जटिलता और शिक्षा का असमान वितरण दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर अधिकारों के प्रति तीव्र आग्रह और जिम्मेदारियों के प्रति अपेक्षाकृत शिथिल उदासीनता भी स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। यह विडंबना ही है कि जिस देश ने विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम् और कर्तव्य ही धर्म है जैसे विचार दिए, उसी समाज में आज अधिकारों की माँग तो प्रमुखता से अंगीकार और स्वीकार करने की चाहत रखता है, परंतु कर्तव्यों और जिम्मेदारियां के निर्वहन में परिपक्वता का अभाव एवं दुराग्रह दिखाई देता है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत की जनसंख्या, जो अब विश्व में शीर्षतम जनसंख्या वाले देशों में शामिल है, यहां केवल संख्या का विषय नहीं बल्कि गुणवत्ता का प्रश्न भी है यह गुणवत्ता शिक्षा, सामाजिक समझ और संवैधानिक चेतना, जागरूकता पर आधारित होती है। जब हम स्त्री-पुरुष अनुपात की बात करते हैं, तो यह केवल आंकड़ों का संतुलन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता का संकेतक है। किंतु जब तक दोनों ही वर्ग अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को समान रूप से नहीं समझेंगे, तब तक वास्तविक प्रगति अधूरी और दिवा-स्वप्न ही रहेगी। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">शिक्षा इस पूरे विमर्श का केंद्र बिंदु है, क्योंकि शिक्षित समाज ही अधिकार और जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है, परंतु भारत में शिक्षा का प्रसार अभी भी समरूप नहीं है।ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच, स्त्री और पुरुष के बीच, तथा विभिन्न आर्थिक वर्गों के बीच एक गहरी और बड़ी खाई मौजूद है। परिणामस्वरूप, एक बड़ा वर्ग अपने अधिकारों के प्रति तो जागरूक हो रहा है, परंतु कर्तव्यों के प्रति उसकी समझ अभी भी सीमित संकुचित है। भारतीय संविधान, जो नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है, </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">उसी के साथ मौलिक कर्तव्यों की भी स्पष्ट व्याख्या करता है, किंतु व्यवहारिक जीवन में अधिकारों की चर्चा अधिक होती है और कर्तव्यों की उपेक्षा। महात्मा गांधी ने कहा था कि “अधिकारों का वास्तविक स्रोत कर्तव्य है, यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें, तो अधिकार अपने आप मिल जाएंगे,” परंतु आधुनिक समाज में यह विचार धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में चला गया है। इसी प्रकार डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह स्पष्ट किया था कि “संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह असफल हो जाएगा,” यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है क्योंकि कानून और नियम केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि नागरिकों की चेतना में जीवित रहते हैं। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत में कानूनों की कमी नहीं है सड़क सुरक्षा से लेकर महिला संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण से लेकर शिक्षा के अधिकार तक हर क्षेत्र में स्पष्ट नियम बनाए गए हैं, लेकिन उनका पालन तभी संभव है जब नागरिक स्वयं जिम्मेदारी का परिचय दें। उदाहरण के लिए, सड़क पर यातायात नियमों का उल्लंघन केवल एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन की कमी का संकेत है।इसी प्रकार, महिला सुरक्षा के लिए बनाए गए कानून तब तक प्रभावी नहीं हो सकते जब तक समाज में लैंगिक संवेदनशीलता और सम्मान की भावना विकसित न हो। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">स्त्री-पुरुष समानता के संदर्भ में भी यह स्पष्ट है कि अधिकारों की माँग के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वहन भी उतना ही आवश्यक है।जहाँ महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं, वहीं समाज के सभी वर्गों को उनके प्रति सम्मान और सहयोग का कर्तव्य निभाना होगा। शिक्षा का स्तर बढ़ने के बावजूद यदि नैतिक शिक्षा और नागरिकता के मूल्यों का समावेश नहीं होगा, तो केवल डिग्रीधारी नागरिक तैयार होंगे, जागरूक और जिम्मेदार कर्तव्य निस्ट नागरिक नहीं। आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने अधिकारों की आवाज़ को मजबूत किया है,</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> लेकिन कई बार यह जागरूकता एकतरफा हो जाती है, जहाँ केवल अधिकारों की बात होती है और जिम्मेदारियों की चर्चा गौण हो जाती है। यही असंतुलन समाज में तनाव और गहरे हरेअसंतोष को जन्म देता है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा प्रणाली में प्रारंभ से ही नागरिक कर्तव्यों पर बल दिया जाए, परिवार और समाज में जिम्मेदारी की भावना को विकसित किया जाए, और शासन स्तर पर भी जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को यह समझाया जाए कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> जब तक आम नागरिक स्वयं कानूनों का सम्मान नहीं करेंगे, तब तक कोई भी व्यवस्था पूरी तरह सफल नहीं हो सकती। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नागरिक ही सर्वोच्च शक्ति हैं, और उनकी परिपक्वता ही राष्ट्र की दिशा और दशा तय करती है। इसलिए यह सही समय आत्ममंथन का है क्या हम केवल अपने अधिकारों के लिए सजग हैं, या अपने कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही प्रतिबद्ध हैं?</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> यदि इस प्रश्न का उत्तर पूर्ण ईमानदारी और सजगता  से खोजा जाए, तो स्पष्ट होगा कि हमें अभी लंबा सफर तय करना है। जागरूकता, शिक्षा और सामाजिक जिम्मेदारी के समन्वय से ही वह दिन आएगा जब भारत केवल अधिकारों के प्रति नहीं, बल्कि कर्तव्यों के प्रति भी समान रूप से परिपक्व राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा जिससे विकास की गति को सदैव सशक्त बल मिलेगा और विकास की संभावना चारों दिशाओं में व्याप्त होगी ।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176919/we-are-more-ignorant-of-duties-and-responsibilities-than-rights</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/176919/we-are-more-ignorant-of-duties-and-responsibilities-than-rights</guid>
                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 18:47:29 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/dgkdjgbvax1605352666.jpeg"                         length="76445"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>शहर की सेहत ठीक नहीं—हमारी आदतें इसका रोग हैं</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शहरों की असल तस्वीर उनकी ऊंची इमारतें नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बिखरी हुई नागरिक आदतें बयान करती हैं। भागती सुबह में उड़ता कचरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाल बत्ती को रौंदती गाड़ियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फुटपाथों पर जमे वाहन और सार्वजनिक स्थानों के प्रति बेपरवाही—ये सब उस मानसिकता का खुला बयान हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अधिकार तो चाहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर कर्तव्य से बचती है। घर की चमक और बाहर की गंदगी का यह तीखा विरोध अब हमें झकझोरता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि हमने इसे सामान्य मान लिया है। यहीं सिविक सेंस दम तोड़ता है। हम व्यवस्था से उम्मीदें ऊंची रखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसे बनाने में अपनी</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176703/the-city-is-not-in-good-health%E2%80%94our-habits-are-its"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas16.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शहरों की असल तस्वीर उनकी ऊंची इमारतें नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बिखरी हुई नागरिक आदतें बयान करती हैं। भागती सुबह में उड़ता कचरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाल बत्ती को रौंदती गाड़ियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फुटपाथों पर जमे वाहन और सार्वजनिक स्थानों के प्रति बेपरवाही—ये सब उस मानसिकता का खुला बयान हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अधिकार तो चाहती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर कर्तव्य से बचती है। घर की चमक और बाहर की गंदगी का यह तीखा विरोध अब हमें झकझोरता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि हमने इसे सामान्य मान लिया है। यहीं सिविक सेंस दम तोड़ता है। हम व्यवस्था से उम्मीदें ऊंची रखते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसे बनाने में अपनी जिम्मेदारी से कन्नी काट लेते हैं। </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">में भी यही सोच इस समस्या को जिंदा रखे हुए है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">दैनिक जीवन में सिविक सेंस की कमी केवल दिखाई नहीं देती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि आंकड़ों में भी साफ दर्ज है। देश के शहरी इलाके हर दिन लगभग</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>1.62 <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख टन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नगरपालिका कचरा पैदा करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका बड़ा हिस्सा अब भी लैंडफिल या खुले में जा पहुंचता है—यह बताता है कि स्रोत पर अलग करना और सही निस्तारण जैसी बुनियादी आदतें अब भी हाशिए पर हैं। ट्रैफिक के मोर्चे पर स्थिति और भयावह है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>2024 <span lang="hi" xml:lang="hi">में सड़क दुर्घटनाओं में </span>1.77 <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख से अधिक मौतें</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">दर्ज हुईं—यानी औसतन रोज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>485 <span lang="hi" xml:lang="hi">जिंदगियां खत्म। ओवरस्पीडिंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हेलमेट और सीट बेल्ट की अनदेखी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गलत पार्किंग जैसी लापरवाहियां इस त्रासदी की मुख्य वजह रहीं। सबसे चिंताजनक वह सोच है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो इन आंकड़ों के पीछे छिपी है—“दूसरे नहीं मानते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मैं क्यों मानूं</span>?” <span lang="hi" xml:lang="hi">यही मानसिकता सिविक सेंस को भीतर से खोखला कर रही है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समस्या सतह पर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारी परवरिश और सामाजिक ढांचे में जमी है। स्कूलों में सिविक सेंस सैद्धांतिक रह जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवहारिक अभ्यास लगभग गायब है। बच्चे किताबों में अनुशासन पढ़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर घर और सड़कों पर उसका उल्टा देखते हैं—यहीं से विरोधाभास जन्म लेता है। सफाई को “किसी और का काम” मानना और सार्वजनिक संपत्ति से दूरी इस कमी को और गहरा करते हैं। कानून तो हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर उनका प्रवर्तन न निरंतर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न सख्त</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">जुर्माना अपवाद बनकर रह जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आदत नहीं बदलती। विडंबना यह कि विदेश में नियमों का पालन करने वाला नागरिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपने देश में लौटते ही वही पुरानी लापरवाही दोहराता है—यही दोहरापन बदलाव की सबसे बड़ी बाधा है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके दुष्परिणाम केवल दृश्य गंदगी तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थव्यवस्था और पर्यावरण—तीनों पर भारी पड़ते हैं। कचरे और अस्वच्छता से फैलने वाली बीमारियां लाखों लोगों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खासकर गरीबों और बच्चों को प्रभावित कर रही हैं। सड़क दुर्घटनाएं परिवारों को एक झटके में आर्थिक और भावनात्मक संकट में धकेल देती हैं। पर्यावरणीय नुकसान भी गहरा है—देश की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>296 <span lang="hi" xml:lang="hi">नदियों के खंड प्रदूषित</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें प्लास्टिक और औद्योगिक अपशिष्ट की बड़ी भूमिका है। कई शहरों में हवा खतरनाक स्तर पर बनी हुई है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">खुले में कचरा जलाना इसे और विषैला बनाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि अव्यवस्थित निपटान भूजल को भी दूषित करता है। इसका असर पर्यटन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निवेश और शहरों की छवि पर साफ दिखता है। जब नागरिक जिम्मेदारी से मुंह मोड़ते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो विकास की रफ्तार भी थमने लगती है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारी स्तर पर पहलें कमजोर नहीं रहीं—स्वच्छ भारत मिशन-शहरी </span>2.0 <span lang="hi" xml:lang="hi">ने ढांचे को मजबूती दी है और नतीजे भी दिखने लगे हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">तक शहरी क्षेत्रों में कचरा प्रसंस्करण क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई शहरों में डोर-टू-डोर संग्रह</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>90%+ <span lang="hi" xml:lang="hi">कवरेज</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तक पहुंच चुका है और लीगेसी वेस्ट की सफाई ने रफ्तार पकड़ी है। इंदौर लगातार स्वच्छ सर्वेक्षण में</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नंबर</span> 1 <span lang="hi" xml:lang="hi">बना हुआ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सूरत और नवी मुंबई जैसे शहर व्यवहार और प्रबंधन—दोनों के सफल मॉडल पेश कर रहे हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">के नए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों ने स्रोत पर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>4-<span lang="hi" xml:lang="hi">स्ट्रीम सेग्रिगेशन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को अनिवार्य कर एक स्पष्ट दिशा भी तय कर दी है। फिर भी तस्वीर अधूरी है—उपलब्धियों के बावजूद आम नागरिक के व्यवहार में अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आता। साफ है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इंफ्रास्ट्रक्चर जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन निर्णायक बदलाव मानसिकता बदलने से ही आएगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वैश्विक अनुभव बताते हैं कि सिविक सेंस कानून से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति से बनता है। जापान में बच्चे स्कूल की सफाई खुद करते हैं—सार्वजनिक जगह गंदा करना वहां अस्वीकार्य है। सिंगापुर ने सख्त प्रवर्तन से ऐसी आदतें विकसित कीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब स्वाभाविक व्यवहार हैं। भारत में भी इंदौर और सूरत जैसे शहरों ने शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामुदायिक निगरानी और कड़े अमल के संयोजन से उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। अब जरूरी है कि स्कूलों में सिविक सेंस को पाठ्य विषय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिवार्य व्यवहारिक अभ्यास बनाया जाए</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">युवाओं को नेतृत्व मिले और तकनीक आधारित निगरानी मजबूत हो। वास्तविक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थायी बदलाव तभी संभव है जब इसकी शुरुआत परिवार और शिक्षा—दोनों स्तरों से एक साथ हो।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">समाधान किसी बड़े सूत्र में नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि निरंतरता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी की ठोस आदतों में छिपा है। कूड़ा डस्टबिन में डालना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिग्नल पर रुकना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फुटपाथ खाली रखना और सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान—ये छोटे कदम जब सामूहिक व्यवहार बनते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी बड़ा बदलाव आकार लेता है। व्यवस्था को भी ढील नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दृढ़ता चाहिए—दोहराए उल्लंघनों पर लाइसेंस निलंबन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनिवार्य सामुदायिक सेवा जैसे कड़े प्रावधान लागू हों। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिम्मेदार आचरण को पहचान और प्रोत्साहन मिले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि सकारात्मक उदाहरण फैलें। मीडिया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एनजीओ और स्थानीय समुदाय मिलकर लगातार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लक्ष्य-आधारित जागरूकता अभियान चलाएं—तभी बदलाव टिकाऊ बनेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब मुद्दा “कब” नहीं</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">कैसे” का है। साफ सड़कें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अनुशासित ट्रैफिक और जिम्मेदार नागरिकता किसी एक योजना की देन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामूहिक चेतना की पहचान हैं। आंकड़े साफ चेतावनी दे रहे हैं—हर दिन</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>1.62 <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख टन कचरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सालाना</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>1.77 <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख सड़क मौतें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और लगातार प्रदूषित होती नदियां। इसके बावजूद अगर हम बदलाव टालते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो समस्या ही हमारी आदत बन जाएगी। विकसित भारत का सपना नीतियों से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे रोजमर्रा के व्यवहार से साकार होगा। सिविक सेंस कोई विचार भर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि हमारी पहचान बनना चाहिए—और इसकी शुरुआत आज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अभी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे हर छोटे जिम्मेदार कदम से होनी चाहिए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176703/the-city-is-not-in-good-health%E2%80%94our-habits-are-its</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/176703/the-city-is-not-in-good-health%E2%80%94our-habits-are-its</guid>
                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 18:26:47 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/hindi-divas16.jpg"                         length="137237"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        