<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/76740/federal-politics-india" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>federal politics India - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/76740/rss</link>
                <description>federal politics India RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>नारी बन्दन बिल के सहारे  बीजेपी बंगाल जीतना चाहती थी या चीन मॉडल लागू करना चाहती थी </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176611/bjp-wanted-to-win-bengal-with-the-help-of-nari"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल के चुनाव में जो भी वोटर लिस्ट में धांधली हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">  यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।  अपने ही नागरिकों का वोट का अधिकार छीन कर उनको विदेशी नागरिक कहना उचित नहीं है पर 2014से एक धर्म विशेष के लोगों को हर राज्य में नया नामकरण दिया गया घूसपैठिये और आज तक यानि 2014से अब तक कितने घुसपैठिए हर राज्य में मिले भारत सरकार जनता को चुनाव में नहीं बता पा रही है।  बस एक नरेटिव कि बंगाल में ममता चुनाव घुसपैठियों के वोट से जीत रही है एक धर्म के वोट से जीत रही  है उनको वोट के अधिकार से वंचित करना है । जो चुनाव आयोग सरकार का कठपुतली बन कर कर दिया। नब्बे लाख का नाम काट दिया।  अब चुनाव में वोट नहींदेगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष का आरोप सही कि देश की सभी सम्वैधानिक संस्थानों पर व  न्यायालय हो चुनाव आयोग हो ई डी सी बी आई हर पर एक पार्टी एक विचार धारा का कब्जा हो गया है।यह बात भारत के जनमानस के  साथ  विश्व के जनमानस में भी यही गुज रहा है कि 2014के बाद भारत में लोकतंत्र कमजोर होगया।  बस एक नेता एक पार्टी कीबात होनेलगी है विपक्ष कहीं जिन्दा नहीं  रहे।उसको संसद से सड़क तक लड़ने का अधिकार नहीं जब जब संसद से सड़क पर आया लड़ने उसको देशद्रोही पाक परस्त छदम सेकुलर अवसर वादी न जाने किन किन अलंकरणों से भारतीय मिडिया भाजपा का आईटी सेल सोशल मिडिया अलंकृत करता रहता है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल के चुनाव में एक और बात बहुत दिलचप्स  हो रही की कभी ममता के विधायक रहे हुमाऊ कबीर ममता को छोड़ कर भाजपा में गये फिर वहां से सौदे बाजी करके अलग पार्टी बनाया। भाजपा ने ममता को हराने के लिए एक हजार करोड़ और उपमुख्यमंत्री के पद पर समझौता किया यह बात एक स्टिंग ऑपरेशन करके किसी ने खुलासाकर दिया  विडियो बनाकर  सोशल मिडिया में चला रहा है। मैं यह नहीं कह सकता हूं दावे के साथ की यह विडियो सही या ग़लत  है।जो सोशल मिडिया पर चल रहा उसी की बात कर रहा हूं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सच क्या है जांच हो तो सब जनता जाने ।इसी विडियो से  परेशान होकर देश की सरकार  जो हर समय बस  चुनाव में रहती हैं परेशान हो ग ई जीत का सपना जो बंगाल में  देख रही थी  काबफूर होने लगा। तब वह  एक नया गेम प्लान लेकर आई कि बीच चुनाव में ही संसद का विशेष सत्र तीन दिन का बुला लिया कि अब देश की नारी आधी आबादी शायद बंगाल जीतादे।  जो  नारी शक्ति वन्दन बिल यानि महिला आरक्षण 2023मे पास हो चुका है और 2029के चुनाव में लागू होगा  जिसमें जनगणना और परिसीमन की बात थी ।उसको बदलने के लिए ही विशेष सत्र को बुलाया जो गलत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र में संख्या बल का खेल है। तो सरकार सत्ता में संसद का विशेष सत्र बुला लिया।और तीन अलग अलग बिल पेश कर दिया। 16अप्रैल से बहस चल रही है 17शाम चार बजे के बाद वोटिंग होगी  इस में भी सरकारकिस नियम से वोटिंग करायेगी।इस महिला बिल का विपक्ष समर्थन कर रहा उनका कहना है महिलाओं को आरक्षण 545सासद के वर्तमान नम्बर में से कर दिया जाये।  लेकिन भाजपा कह रही हम देश में नये राजाओं की संख्या बढायेंगे वह 850करके उस संख्या में से महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने की बात कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस आरक्षण में भी एक खेल होगया अनुसुचित जाति और अनुसूचितजन जाति को तो लिया है परन्तु पिछड़ी जाति को आरक्षण में नहीं लिया है।विपक्ष का कहना है फिर परिसीमन  नहीं हो गा तबतक जब तक  जनगणना नही हो जायेगी जनगणना जातिय आधार पर होगी उसके बाद ही महिलाओं को आरक्षण और संसदों तथा प्रदेश में विधानसभा में विधायकों की संख्या बढ़ेगी। भाजपा परिसीमन को जनगणना से नहीं जोड़ना चाहती है भाजपा कि एक मंशा यह भी होगी कि परिसीमन बिल पास कराले। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न ई जनगणना में जातियों की गणना नहीं करायेगे यह आशंका है कि जातिय जनगणाना भाजपा नहीं करना चाहती है।अगर जातिय जन गणना देश की होगी तो बहुत कुछ देश में बदल जायेगा राजनिति का सन्तुलन भी गड़बड़ होगा फिर नारा वहीं चलेगा जिसकी जितनी सख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी ।इसी कारण से यह तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया गया।है या इस सत्र के परिणाम को जनता में ले जाकर सहानभूति लेने का राजनिति चाल  था।  बंगाल के चुनाव प्रचार में पता चलेगा बिल के पीछे का असली मकसद  क्या था या नकली चेहरा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी कारण भाजपा 2011या किसी भी जनगणना से किसी भी राज्य की संसदों की सख्या निर्धारित करने का एकाधिकार चाहती है। जो बहुत ग़लत है विपक्ष विरोध कर रहा यह तो निश्चित है जिस राज्य में जन संख्या कम होगी वहां सांसद कम होंगे इस बिल से उत्तर भारत में यूं पी बिहार राजस्थान  एम पी में सांसदों की संख्या बढ़ेगी और इन राज्यो  की तुलना में दक्षिण राज्यों में कम संख्या सांसदों की होगी पूर्वोत्तर राज्यों में भी कामोवेश यही होगा ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब एक न ई लड़ाई इस बिल से उत्तर भारत और दक्षिण भारत में शुरू होगया है यह सब एक सुनियोजित चाल से भारत में लोकतंत्र को चीनी लोकतंत्र में बदलने का कुचक्र  तो नहीं चल रहा है कि चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिले सम्विधान बदले और चीनी राष्ट्रपति की प्रणाली बना कर  भाजपा सत्ता में सदा के लिए बनी रहे  अगर मंशा साफ होता तो  महिलाओं को आरक्षण  तो2024मे दे दिया होता। पर नारी के पीछे छिपकर देश में नया लोकतंत्र स्थापित करने की एक मंशा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु इस बिल में एक बात और है कि राज्य सभा कि सीट नहीं बढ़ाया जा रहा अनुपातिक तौर पर राज्य सभा में भी सीट बढ़े।  कारण अगर विधानसभा में हर राज्य में पचास प्रतिशत सीट बढ़ रही है तो राज्य सभा का क्योंनही बढ़ेगी। यह और तरह का खेल है कि अगर राज्य सभा में बहुमत नहीं होगा तो दोनों सदनों को मिलाकर कोई बिल‌विधेयक पास हो जायेगा विपक्ष यहां क्यौ मौन है राज्य  सभा में बढ़े पचास प्रतिशत।विपक्ष यह चाल भाजपा का समझ गया और या जाल मेंनही फंसा उस कबुतर की तरह । इस बिल से आभास हो रहा है नाम नारी शक्ति वन्दन पर खेल कुछ और है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब बंगाल का चुनाव बिल पास होगा तब भी नहीं पास होगा तब भी नारीशक्ति वन्दन के सहारे चलेगा सारा फोकस भाजपा का यही होगा  कि हम नारी सम्मान करतेहै  बिल आपके लिए शक्ति देगा नहीं पास हुआ तो  विपक्ष नारी विरोधी है यही गुंजेगा।परन्तु एक बात जो जनता को पूछना होगा अपने नेताओं से कि हम भारत के नागरिक इतने अमीर हो गये है कि 545राजा ससद के चार हजार विधानसभा के राजाओं  के ऐशो आराम के लिए जो अभी टैक्स दे रहे हैं। फिर 307सासदो और 2100 विधायको को जो बिल पास होने के बाद आयेंगे इनको पालने के लिए कितना और टैक्स देंगे लगभग हर वर्ष सभी राजाओं को पालने ऐशो आराम के लिए पन्द्रह हजार करोड़ लगेगा कहा से आयेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कैसे आयेगा क्या और टैक्स लगेगा कोई राजनेता संसद में यह बात नहीं कर रहा नहीं सत्ता पक्ष यह जनता को बता रहा हैं कि इन सभी राजाओं को पालने का खर्च किस मद से होगा बस नारी शक्ति वन्दन हो रहा है। इन राजाओं के साथ साथ देश की जनता पूर्व सांसदों विधायकों को भी पाल रही है।इनके लालनपालन पर हर वर्ष ग्यारह हजार करोड़ खर्च होता पेंशन और मुफ्त यात्रा में यह सब गरीब भारत की जनता है पांच किलो मुफ्त राशन वाले असृसी करोड़ भी इनके लालपाल में अपना योगदान दे रहे हैं।अब भारत इतना अमीर तो नहीं है कि हजारों राजाओं को अपने। जनता के टैक्स पर पाले जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश के उस समय अटल की सरकार ने 2003मे सरकारी कर्मचारियों का पेंशन यह कह कर बन्द कर दिया कि देश की जीडीपी पेंशन के भार को नहीं उठा पायेगी परन्तु इन राजाओं का  पेंशन वेतन मुफ्त आवास चिकित्सा यात्रा भत्ता देश  उठा रहा है।पर हम जनता मौन है। अपने लड़कों के हक में नहीं बोल रहे हैं।यह बिल जो लाया गया है देश हित में नहीं है जितनी पहले सांसदों की सख्या है उसी में से महिलाओं को आरक्षण दिया जाये सांसदों और विधायकों की सख्या न बढ़ाई जाये नहीं तो जनता कभी भी सड़क पर आयेगी तो क्या दृश्य होगा इसकी कल्पना कोई राजनेता या ज्योतिषी नहीं कर सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि नये राजाओं की संख्या देश में बढ़ी तो शायद फिर देश में कोई नया गांधी सुभाष आजाद भगत बनकर जरूर आयेगा इन राज्यों से मुक्ति जनता को मिलेगी जैसे मुगलों से अग्रेजो से देशी राजाओं से मिला था उसी तरह फिर लड़ना होगा नये राजाओ को हटाने के लिए ।भाजपा का मकसद नारी के नाम को चुनाव में लेकर सत्ता तक पहुचना है। वह नारी सम्मान कितना किये है और करेंगे संसद में  दिये गये भाषण को जनता याद कर रही कि आज वही व्यक्ति नारी वन्दन कर रहा जो कभी किसी नारी को विधवा न जाने कैसे कैसे अलंकरणों से सुशोभित किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के ऊपर जो तमाम आरोप लग रहे हैं उसी से जनता और महिलाओं के ध्यान को हटाने के लिए बंगाल तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए यह बिल लाया गया भाजपा को पता है बिल पास नहीं होगा फिर भी यह खेल किया कि चुनाव में विपक्ष को महिलाओं के विरोधी के रुप में स्थापित करके अपनी छबि को बचाने का नया कुचक्र  है।विपक्ष जब मांग कर रहा था कि ईरान अमेरिका इजरायल युद्ध और देश की ऊर्जा सुरक्षा पर बहस के लिए विशेष संसद का सत्र बुलाने की मांग नहीं माना और चर्चा नहीं हुआ वह ईरान पर मौन बस इजरायल अमेरिका के साथ खड़े हैं अब क्यों अमेरिका इजरायल के साथ है यह कूटनिती की कोई भाषा होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कल संसद में मोदी गारंटी दे रहे थे बिल की पर शायद वह हर चुनाव में गारंटी देते आरहे है क्यो पूरा नहीं हुआ दोकरोड रोजगार बिहार में उघोग सौ स्मार्ट सीटी सब कहां  है।अब तो बिल पास नहीं हुआ। यह जो बिल गिरा भारत बच गया अगर बिल पास होगया होता तो 2029मेका आखिरी चुनाव होता या 2027मे मध्यावधि चुनाव कराकर सम्विधान बदले देते की भारत में एक दलित प्रणाली ही होगी।पर विपक्ष की गजब की एक जुटता कल देखने को मिला बिल गिर गया देश बच गया।अब  पांच राज्योचुनाव परिणाम का इन्तजार करे वैसे महंगाई के लिए भी जनता कमर कस ले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">29अप्रैल शाम पांच बजे देश का मौसम गुलाबी होगा जब तेल के दाम बढ़ेंगे यानही बढ़ेंगे  तब भी  भी मौसम गुलाबी रहेगा कारण पांच राज्यों का एक्जिट पोल पर बहस होगी कौन मुख्य मंत्री बनेगा तमाम बातें होंगी फिर लोग नारी शक्ति वन्दन भूल जायेंगे। इस माडल को हराने में दक्षिण के राज्य तृणमूल कांग्रेस के सहयोग की सराहना होनी चाहिए भाजपा समर्थक ससद दक्षिण के जो थे जनता उनसे हिसाब ले क्यों दक्षिण से धोखा किया।।अभी इसे जीत न माने न खुशी माने यह तो बस आरम्भ है।अभी सत्ता से विपक्ष को और लड़ना होगा जनता को भी  लड़ना होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176611/bjp-wanted-to-win-bengal-with-the-help-of-nari</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/176611/bjp-wanted-to-win-bengal-with-the-help-of-nari</guid>
                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:55:11 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/img_20260417_2100471.jpg"                         length="106218"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परिसीमन की सियासत, अस्मिता का उभार और चुनावी हवा का बदलता रुख</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को पीछे छोड़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जिस तेजी से अपनी चुनावी रणनीति को बदला है, वह उनकी राजनीतिक समझ और समय की नब्ज पकड़ने की क्षमता को दर्शाता है। महिला आरक्षण बिल के गिरने के बाद उन्होंने परिसीमन को केंद्र में रखकर एक नया आक्रामक अभियान शुरू किया है। पहले जहां एसआईआर जैसे मुद्दे को बंगाल की अस्मिता से जोड़ा जा रहा था, वहीं अब परिसीमन को “देश को तोड़ने की साजिश” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह बदलाव केवल भाषाई नहीं बल्कि पूरी राजनीतिक दिशा को बदलने वाला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर बंगाल, जहां भाजपा ने पिछली बार मजबूत प्रदर्शन किया था, अब इस नए नैरेटिव का केंद्र बन गया है। चाय बागानों में काम करने वाले लाखों मजदूरों तक पहुंचने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने घर-घर अभियान शुरू किया है। यहां अब रोजगार, मजदूरी और जमीन के अधिकार जैसे मुद्दों की जगह परिसीमन को लेकर भय और असुरक्षा का माहौल बनाया जा रहा है। ममता बनर्जी यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि यदि परिसीमन लागू होता, तो कई जिलों की पहचान ही खत्म हो जाती। यह एक ऐसा भावनात्मक तर्क है जो सीधे जनता के मन में अस्मिता के सवाल को जगाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर अभिषेक बनर्जी जैसे नेता इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की कमजोरी के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि संसद में जो हुआ, वह केवल शुरुआत है और इसका असर राज्यों में भी दिखेगा। यह बयान न केवल आत्मविश्वास दर्शाता है बल्कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का प्रयास भी है।तमिलनाडु में स्थिति और भी रोचक है। यहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने बेहद तेजी से चुनावी हवा को अपने पक्ष में मोड़ने का काम किया है। तीन दिन पहले तक परिसीमन बिल सबसे बड़ा मुद्दा था, लेकिन अब “तमिल अस्मिता” चुनाव का केंद्रीय विषय बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एम. के. स्टालिन को इस पूरे घटनाक्रम में एक विजेता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, मानो उन्होंने केंद्र के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली हो। डीएमके के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर “द्रविड़ गौरव” के पर्चे बांट रहे हैं और यह संदेश दे रहे हैं कि यह केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि तमिल पहचान की रक्षा का प्रश्न है। इस रणनीति का असर यह हुआ है कि चुनावी विमर्श पूरी तरह बदल गया है। अब यह केवल सीटों के बंटवारे का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन गई है। के. अन्नामलाई लगातार यह कह रहे हैं कि परिसीमन से तमिलनाडु को कोई नुकसान नहीं होता, लेकिन उनकी बात उतनी प्रभावी तरीके से जनता तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके विपरीत डीएमके का संदेश ज्यादा संगठित और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, जिससे वह ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।एनडीए की सहयोगी एआईएडीएमके एक असमंजस की स्थिति में है। वह न तो खुलकर परिसीमन बिल के खिलाफ बोल पा रही है और न ही तमिल अस्मिता के मुद्दे पर पूरी तरह डीएमके का विरोध कर पा रही है। यह स्थिति उसे चुनावी मैदान में कमजोर बनाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू उभरकर सामने आया है, वह है नए चेहरों का उदय। अभिनेता विजय ने इस मुद्दे को एक अवसर के रूप में लिया है और अपनी पार्टी के जरिए “तमिलनाडु का हक” जैसे संदेशों को डिजिटल माध्यम से फैलाया है। यह दिखाता है कि कैसे बदलते राजनीतिक माहौल में नए खिलाड़ी भी अपनी जगह बना सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह पहली बार नहीं है जब चुनाव से ठीक पहले मुद्दों में इतना बड़ा बदलाव आया हो। पश्चिम बंगाल में 2011 में “परिवर्तन” का नारा और 2021 में “खेला होबे” जैसे अभियान यह साबित करते हैं कि सही समय पर सही नैरेटिव चुनाव की दिशा बदल सकता है। इसी तरह तमिलनाडु में 1967 और 2016 के चुनावों में भी आखिरी समय में मुद्दों के बदलने से परिणाम प्रभावित हुए थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बार भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है, लेकिन एक अंतर के साथ। इस बार मुद्दे केवल स्थानीय नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय नीतियों से जुड़े हुए हैं। परिसीमन जैसे विषय को लेकर क्षेत्रीय अस्मिता का उभार यह दिखाता है कि भारत की संघीय राजनीति में राज्य और केंद्र के बीच संतुलन का सवाल कितना संवेदनशील है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा की स्थिति भी दिलचस्प है। एक तरफ वह संसद में बिल गिरने के बावजूद इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में उसे नए नैरेटिव का सामना करना पड़ रहा है। यह विरोधाभास उसके लिए चुनौती बन सकता है। दूसरी ओर विपक्ष, जो इस घटनाक्रम से उत्साहित है, कहीं न कहीं आंतरिक असंतोष और भ्रम का भी शिकार दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह स्पष्ट है कि आने वाले चुनाव केवल नीतियों या वादों पर नहीं बल्कि भावनाओं, पहचान और धारणा की लड़ाई पर आधारित होंगे। परिसीमन का मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक हथियार बन चुका है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में जिस तरह से इसे अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह भारतीय राजनीति की विविधता और जटिलता दोनों को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सबकी नजर चुनावी परिणामों पर है। क्या भाजपा इस बदलती हवा के बावजूद अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी, या विपक्ष की नई रणनीतियां उसे पीछे छोड़ देंगी—यह सवाल अभी खुला है। लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श के नए स्वरूप का भी संकेत देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of</guid>
                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:11:20 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/img_20260417_2100471.jpg"                         length="106218"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        