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                <title>DMK vs BJP - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>DMK vs BJP RSS Feed</description>
                
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                <title>परिसीमन की सियासत, अस्मिता का उभार और चुनावी हवा का बदलता रुख</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को पीछे छोड़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जिस तेजी से अपनी चुनावी रणनीति को बदला है, वह उनकी राजनीतिक समझ और समय की नब्ज पकड़ने की क्षमता को दर्शाता है। महिला आरक्षण बिल के गिरने के बाद उन्होंने परिसीमन को केंद्र में रखकर एक नया आक्रामक अभियान शुरू किया है। पहले जहां एसआईआर जैसे मुद्दे को बंगाल की अस्मिता से जोड़ा जा रहा था, वहीं अब परिसीमन को “देश को तोड़ने की साजिश” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह बदलाव केवल भाषाई नहीं बल्कि पूरी राजनीतिक दिशा को बदलने वाला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर बंगाल, जहां भाजपा ने पिछली बार मजबूत प्रदर्शन किया था, अब इस नए नैरेटिव का केंद्र बन गया है। चाय बागानों में काम करने वाले लाखों मजदूरों तक पहुंचने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने घर-घर अभियान शुरू किया है। यहां अब रोजगार, मजदूरी और जमीन के अधिकार जैसे मुद्दों की जगह परिसीमन को लेकर भय और असुरक्षा का माहौल बनाया जा रहा है। ममता बनर्जी यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि यदि परिसीमन लागू होता, तो कई जिलों की पहचान ही खत्म हो जाती। यह एक ऐसा भावनात्मक तर्क है जो सीधे जनता के मन में अस्मिता के सवाल को जगाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर अभिषेक बनर्जी जैसे नेता इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की कमजोरी के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि संसद में जो हुआ, वह केवल शुरुआत है और इसका असर राज्यों में भी दिखेगा। यह बयान न केवल आत्मविश्वास दर्शाता है बल्कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का प्रयास भी है।तमिलनाडु में स्थिति और भी रोचक है। यहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने बेहद तेजी से चुनावी हवा को अपने पक्ष में मोड़ने का काम किया है। तीन दिन पहले तक परिसीमन बिल सबसे बड़ा मुद्दा था, लेकिन अब “तमिल अस्मिता” चुनाव का केंद्रीय विषय बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एम. के. स्टालिन को इस पूरे घटनाक्रम में एक विजेता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, मानो उन्होंने केंद्र के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली हो। डीएमके के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर “द्रविड़ गौरव” के पर्चे बांट रहे हैं और यह संदेश दे रहे हैं कि यह केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि तमिल पहचान की रक्षा का प्रश्न है। इस रणनीति का असर यह हुआ है कि चुनावी विमर्श पूरी तरह बदल गया है। अब यह केवल सीटों के बंटवारे का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन गई है। के. अन्नामलाई लगातार यह कह रहे हैं कि परिसीमन से तमिलनाडु को कोई नुकसान नहीं होता, लेकिन उनकी बात उतनी प्रभावी तरीके से जनता तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके विपरीत डीएमके का संदेश ज्यादा संगठित और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, जिससे वह ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।एनडीए की सहयोगी एआईएडीएमके एक असमंजस की स्थिति में है। वह न तो खुलकर परिसीमन बिल के खिलाफ बोल पा रही है और न ही तमिल अस्मिता के मुद्दे पर पूरी तरह डीएमके का विरोध कर पा रही है। यह स्थिति उसे चुनावी मैदान में कमजोर बनाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू उभरकर सामने आया है, वह है नए चेहरों का उदय। अभिनेता विजय ने इस मुद्दे को एक अवसर के रूप में लिया है और अपनी पार्टी के जरिए “तमिलनाडु का हक” जैसे संदेशों को डिजिटल माध्यम से फैलाया है। यह दिखाता है कि कैसे बदलते राजनीतिक माहौल में नए खिलाड़ी भी अपनी जगह बना सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह पहली बार नहीं है जब चुनाव से ठीक पहले मुद्दों में इतना बड़ा बदलाव आया हो। पश्चिम बंगाल में 2011 में “परिवर्तन” का नारा और 2021 में “खेला होबे” जैसे अभियान यह साबित करते हैं कि सही समय पर सही नैरेटिव चुनाव की दिशा बदल सकता है। इसी तरह तमिलनाडु में 1967 और 2016 के चुनावों में भी आखिरी समय में मुद्दों के बदलने से परिणाम प्रभावित हुए थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बार भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है, लेकिन एक अंतर के साथ। इस बार मुद्दे केवल स्थानीय नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय नीतियों से जुड़े हुए हैं। परिसीमन जैसे विषय को लेकर क्षेत्रीय अस्मिता का उभार यह दिखाता है कि भारत की संघीय राजनीति में राज्य और केंद्र के बीच संतुलन का सवाल कितना संवेदनशील है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा की स्थिति भी दिलचस्प है। एक तरफ वह संसद में बिल गिरने के बावजूद इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में उसे नए नैरेटिव का सामना करना पड़ रहा है। यह विरोधाभास उसके लिए चुनौती बन सकता है। दूसरी ओर विपक्ष, जो इस घटनाक्रम से उत्साहित है, कहीं न कहीं आंतरिक असंतोष और भ्रम का भी शिकार दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह स्पष्ट है कि आने वाले चुनाव केवल नीतियों या वादों पर नहीं बल्कि भावनाओं, पहचान और धारणा की लड़ाई पर आधारित होंगे। परिसीमन का मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक हथियार बन चुका है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में जिस तरह से इसे अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह भारतीय राजनीति की विविधता और जटिलता दोनों को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सबकी नजर चुनावी परिणामों पर है। क्या भाजपा इस बदलती हवा के बावजूद अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी, या विपक्ष की नई रणनीतियां उसे पीछे छोड़ देंगी—यह सवाल अभी खुला है। लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श के नए स्वरूप का भी संकेत देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:11:20 +0530</pubDate>
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