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                <title>oil supply crisis - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>होर्मुज पर ईरान की हुकूमत: दुनिया की नब्ज पर हाथ</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div class="m_7345850882644653164WordSection1">
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद होर्मुज को खोल दिया गया है। युद्ध के बाद पहली बार यहां से </span>35<span lang="hi" xml:lang="hi">  पोत पास हुए जिसमें </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi">  पोत भारत आ रहे हैं। इनमें कच्चा तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलपीजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्वरक व अन्य सामान है। लेकिन ईरान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि होर्मुज पर उसकी हुकूमत चलती रहेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे छोटा लेकिन सबसे खतरनाक गलियारा है। चौड़ाई सिर्फ </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi">  किलोमीटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसी से होकर हर दिन दुनिया के </span>20%<span lang="hi" xml:lang="hi">  तेल और </span>30% LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरती है। मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi">  में ईरान ने इस गलियारे को</span>700</p></div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182049/irans-rule-on-hormuz-has-its-hand-on-the-pulse"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas21.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के बाद होर्मुज को खोल दिया गया है। युद्ध के बाद पहली बार यहां से </span>35<span lang="hi" xml:lang="hi"> पोत पास हुए जिसमें </span>11<span lang="hi" xml:lang="hi"> पोत भारत आ रहे हैं। इनमें कच्चा तेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एलपीजी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्वरक व अन्य सामान है। लेकिन ईरान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि होर्मुज पर उसकी हुकूमत चलती रहेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे छोटा लेकिन सबसे खतरनाक गलियारा है। चौड़ाई सिर्फ </span>33<span lang="hi" xml:lang="hi"> किलोमीटर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसी से होकर हर दिन दुनिया के </span>20%<span lang="hi" xml:lang="hi"> तेल और </span>30% LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">गुजरती है। मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में ईरान ने इस गलियारे को बंद कर दिया। </span>700<span lang="hi" xml:lang="hi"> टैंकर फंस गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल </span>80<span lang="hi" xml:lang="hi"> डॉलर पार कर गया। ये सिर्फ युद्ध की घोषणा नहीं थी। ये ईरान का ये कहना था कि "दुनिया की ऊर्जा की नब्ज मेरे हाथ में है"। होर्मुज क्या है और ईरान इसे क्यों चाहता है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">होर्मुज फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। सऊदी अरब</span>, UAE, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुवैत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इराक का पूरा तेल इसी रास्ते से जाता है। ईरान का दक्षिणी तट इस जलडमरूमध्य के उत्तर में है। भूगोल ने ईरान को स्ट्रेटेजिक लीवरेज दिया है। फरवरी </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> में अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर के जरिए - पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी बना दी। अब नियम ये है: होर्मुज से गुजरने वाले हर जहाज को </span>40<span lang="hi" xml:lang="hi"> सवालों का घोषणा पत्र जमा करना होगा। माल क्या है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मालिक कौन है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्रू की नेशनलिटी क्या है। जो नहीं मानेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस पर मिसाइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ड्रोन हमला या कब्जे का खतरा है। मार्च </span>2026: <span lang="hi" xml:lang="hi">जब ईरान ने नल बंद कर दिया- </span>3<span lang="hi" xml:lang="hi"> मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> को ईरान ने आधिकारिक रूप से होर्मुज बंद करने का ऐलान कर दिया। बंद होते ही</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामान्य तेल यातायात में </span>86%<span lang="hi" xml:lang="hi"> गिरावट आई</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक मार्च को </span>19.8<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिलियन बैरल/दिन की जगह सिर्फ </span>2.8<span lang="hi" xml:lang="hi"> मिलियन बैरल गुजरे। </span>706<span lang="hi" xml:lang="hi"> गैर-ईरानी टैंकर कतार में फंस गए। ब्रेंट क्रूड </span>10%<span lang="hi" xml:lang="hi"> उछलकर </span>80<span lang="hi" xml:lang="hi"> डॉलर पर पहुंच गया। ईरान ने कहा कि ये बंद सिर्फ अमेरिका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इजरायल और यूरोपीय जहाजों के लिए है। चीन के झंडे वाले जहाजों को छूट दी गई।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या ईरान कानूनी तौर पर ऐसा कर सकता है</span>?</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका छोटा सा जवाब है नहीं। </span>UNCLOS <span lang="hi" xml:lang="hi">यानी संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि की धारा </span>37-44<span lang="hi" xml:lang="hi"> के तहत होर्मुज जैसे अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य में सभी देशों को "ट्रांजिट पैसेज" का अधिकार है। न ईरान और न ओमान एकतरफा तरीके से इसे बंद कर सकते हैं। समुद्री कानून विशेषज्ञ रेड्जा जकारिया कहते हैं कि ईरान आत्मरक्षा का हवाला दे सकता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अगर वो नेविगेशन रोकता है तो ये </span>UNCLOS <span lang="hi" xml:lang="hi">का उल्लंघन होगा। लेकिन असलियत में ईरान सैन्य शक्ति और भौगोलिक स्थिति से यातायात को प्रभावित कर रहा है। ये कानूनी संप्रभुता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन "डिफैक्टो कंट्रोल" है। ईरान ने अब "टोल-पास" सिस्टम शुरू कर दिया है। जहाजों को </span>PGSA <span lang="hi" xml:lang="hi">से पास लेना होगा। रिपोर्ट्स कहती हैं कि सुरक्षित गुजरने के लिए जहाजों से </span>20<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख डॉलर तक मांगे जा रहे हैं। ईरान ने इनकार किया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अमेरिका ने जहाजों को चेतावनी दी है कि टोल न दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इससे </span>IRGC <span lang="hi" xml:lang="hi">को फंड मिलेगा। दुनिया पर असर-</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेल और गैस: भारत अपनी जरूरत का </span>90%<span lang="hi" xml:lang="hi"> तेल आयात करता है। </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> में </span>160<span lang="hi" xml:lang="hi"> अरब डॉलर का तेल आयात हुआ था। होर्मुज बंद होने से भारत सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। यूरोप: कतर ने </span>LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पादन रोका तो यूरोपीय गैस कीमतें </span>40%<span lang="hi" xml:lang="hi"> बढ़ गईं। </span>LNG <span lang="hi" xml:lang="hi">टैंकर का किराया </span>2<span lang="hi" xml:lang="hi"> लाख डॉलर/दिन से ऊपर चला गया। अफ्रीका- </span>UN <span lang="hi" xml:lang="hi">महासचिव गुटेरेश ने चेताया कि अफ्रीका के तेल और उर्वरक आयात का </span>13%<span lang="hi" xml:lang="hi"> होर्मुज से आता है। बंद रहा तो महंगाई और खाद्य संकट बढ़ेगा। लेबनान में सीजफायर के बाद ईरान ने </span>10<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिन के लिए होर्मुज खोल दिया। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि ये सिर्फ सीजफायर की अवधि के लिए है। भारत के लिए क्या मायने हैं- भारत के लिए होर्मुज "लाइफलाइन" है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">- <span lang="hi" xml:lang="hi">विकल्प सीमित हैं: केप ऑफ गुड होप से रास्ता </span>15 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन लंबा और </span>20% <span lang="hi" xml:lang="hi">महंगा पड़ता है। रणनीति: चाबहार पोर्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान के साथ डिप्लोमेसी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बढ़ाना। लेकिन ये सब शॉर्ट टर्म सॉल्यूशन हैं। अगर होर्मुज पर ईरान का कंट्रोल स्थायी हो गया तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा हर </span>6 <span lang="hi" xml:lang="hi">महीने में दांव पर लगेगी। होर्मुज पर ईरान की हुकूमत कानून से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भूगोल और मिसाइल से चलती है। वो जानता है कि दुनिया तेल के बिना </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिन नहीं चल सकती। इसलिए वो कभी पूरी तरह बंद नहीं करेगा। वो सिर्फ "नल" को धीमा-तेज करेगा ताकि अमेरिका झुके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेल महंगा हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और उसकी बात मानी जाए। ये </span>21<span lang="hi" xml:lang="hi">वीं सदी की नाकेबंदी है। बंदूक की जगह टोल-पास</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध की जगह </span>40 <span lang="hi" xml:lang="hi">सवालों का फॉर्म। और दांव पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था।</span></p>
</div>
</div>
</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
<div class="WhmR8e"></div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Jun 2026 16:08:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>युद्ध नहीं, संवाद ही समाधान: अमेरिका–ईरान तनाव</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176587/america-iran-tension-is-solved-by-dialogue-not-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/c8979c10-0dca-11f1-b7e1-afb6d0884c18.jpg.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मिडिल ईस्ट एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां से आगे का रास्ता या तो स्थिरता और कूटनीति की ओर जाता है या फिर टकराव, अस्थिरता और वैश्विक संकट की तरफ। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव अब एक बार फिर निर्णायक चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर नई वार्ता का दौर इस्लामाबाद में शुरू हो सकता है। हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तरह से कूटनीतिक हलचल तेज हुई है और दोनों पक्षों के बयान सामने आ रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि पर्दे के पीछे गंभीर प्रयास जारी हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह पूरा विवाद केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किए जाते हैं। ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, क्षेत्रीय स्थिरता और यहां तक कि आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक, इस तनाव का असर गहराई से जुड़ा हुआ है। खासकर जब बात परमाणु कार्यक्रम और एनरिच्ड यूरेनियम की आती है, तो यह केवल रणनीतिक ताकत का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के हालिया बयान ने स्थिति को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान के पास मौजूद ज्यादा एनरिच्ड यूरेनियम को हासिल करेगा। यह बयान केवल एक कूटनीतिक चेतावनी नहीं, बल्कि संभावित सैन्य कार्रवाई का संकेत भी माना जा रहा है। उन्होंने यह भी इशारा किया कि यदि तय समय सीमा तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो मौजूदा संघर्ष विराम समाप्त हो सकता है और हालात फिर से बिगड़ सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, ईरान का रुख भी कम सख्त नहीं है। वह अपने परमाणु कार्यक्रम को अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मानता है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन अमेरिका और उसके सहयोगी इसे शक की नजर से देखते हैं। यही अविश्वास इस पूरे विवाद की जड़ है, जिसने वर्षों से समाधान को मुश्किल बना रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस तनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा हुआ है। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां से गुजरने वाले जहाजों पर किसी भी तरह का खतरा सीधे तौर पर वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित करता है। हाल ही में इस क्षेत्र में अस्थिरता के कारण कई जहाजों ने अपने रास्ते बदल दिए या यात्रा टाल दी, जिससे बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई। यदि स्थिति और बिगड़ती है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम में दिलचस्प और महत्वपूर्ण दोनों है। पाकिस्तान ने एक मध्यस्थ के रूप में दोनों पक्षों को बातचीत के लिए एक मंच देने की कोशिश की है। इस्लामाबाद में संभावित वार्ता इसी प्रयास का हिस्सा है। हालांकि, मध्यस्थता आसान नहीं होती, खासकर तब जब दोनों पक्षों के बीच गहरा अविश्वास हो और उनके हित एक-दूसरे के विपरीत हों। फिर भी, कूटनीति का यही उद्देश्य होता है कि संवाद के माध्यम से ऐसे समाधान खोजे जाएं जो सभी के लिए स्वीकार्य हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास गवाह है कि जब-जब बातचीत के रास्ते बंद हुए हैं, तब-तब संघर्ष ने जन्म लिया है और उसका खामियाजा केवल संबंधित देशों ने ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ने भुगता है। युद्ध कभी भी स्थायी समाधान नहीं देता। यह केवल विनाश, अस्थिरता और मानवीय संकट को जन्म देता है। आज के वैश्विक परिदृश्य में, जहां अर्थव्यवस्थाएं आपस में जुड़ी हुई हैं और ऊर्जा संसाधनों पर निर्भरता अत्यधिक है, किसी भी बड़े संघर्ष का प्रभाव दूरगामी और गंभीर हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे विवाद का एक और पहलू यह है कि यह केवल सैन्य या राजनीतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि हर कदम पर संदेह और आशंका बनी रहती है। ऐसे में किसी भी समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होता। इसके लिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि धैर्य, समझ और पारदर्शिता की भी जरूरत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दुनिया के अन्य बड़े देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वे चाहते हैं कि यह विवाद शांतिपूर्ण तरीके से सुलझे, क्योंकि किसी भी तरह का युद्ध वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया पहले ही कई आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है, एक नया संघर्ष स्थिति को और जटिल बना सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अगर इस बार की वार्ता सफल होती है, तो यह न केवल अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम होगा, बल्कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता लाने में भी मदद करेगा। इससे वैश्विक बाजारों में भरोसा बढ़ेगा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं कम होंगी। लेकिन अगर यह वार्ता विफल होती है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। तनाव बढ़ सकता है, सैन्य कार्रवाई की संभावना बढ़ सकती है और क्षेत्र एक बार फिर संघर्ष की आग में झुलस सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे समय में सबसे जरूरी है संयम और समझदारी। नेताओं को यह समझना होगा कि उनके फैसलों का असर केवल उनके देशों तक सीमित नहीं है। यह पूरी मानवता को प्रभावित करता है। इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाना जरूरी है। कूटनीति, संवाद और सहयोग ही ऐसे रास्ते हैं जो स्थायी शांति की ओर ले जा सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि आज दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसे यह तय करना है कि वह संघर्ष का रास्ता चुनेगी या सहयोग का। अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता केवल एक द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति और स्थिरता की परीक्षा भी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देश इस अवसर का उपयोग करेंगे और ऐसा समाधान निकालेंगे जो न केवल उनके लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए हितकारी हो। युद्ध किसी भी हालत में समाधान नहीं है, और इतिहास ने बार-बार इस सच्चाई को साबित किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:06:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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