<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/76065/tamil-nadu-politics" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>Tamil Nadu politics - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/76065/rss</link>
                <description>Tamil Nadu politics RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>बहुत कठिन है डगर पनघट की</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीतिक में वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों ने एक ऐसी पटकथा लिख दी है जिसकी कल्पना पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के दिग्गजों ने कदाचित ही की होगी। सिनेमा के पर्दे से निकलकर जननायक बनने की राह पर अग्रसर थलपति विजय और उनकी नवगठित राजनीतिक शक्ति तमिलगा वेत्री कड़गम ने राज्य के दशकों पुराने द्विध्रुवीय राजनीतिक ढांचे को झकझोर कर रख दिया है। यह चुनाव मात्र सत्ता के हस्तांतरण का माध्यम नहीं रहा बल्कि इसने तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक मानस में गहरे पैठ बना चुके द्रविड़ गौरव और परिवर्तन की आकांक्षा के बीच एक नए संघर्ष को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178742/the-path-of-panghat-is-very-difficult"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images5.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीतिक में वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों ने एक ऐसी पटकथा लिख दी है जिसकी कल्पना पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के दिग्गजों ने कदाचित ही की होगी। सिनेमा के पर्दे से निकलकर जननायक बनने की राह पर अग्रसर थलपति विजय और उनकी नवगठित राजनीतिक शक्ति तमिलगा वेत्री कड़गम ने राज्य के दशकों पुराने द्विध्रुवीय राजनीतिक ढांचे को झकझोर कर रख दिया है। यह चुनाव मात्र सत्ता के हस्तांतरण का माध्यम नहीं रहा बल्कि इसने तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक मानस में गहरे पैठ बना चुके द्रविड़ गौरव और परिवर्तन की आकांक्षा के बीच एक नए संघर्ष को जन्म दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विजय की पार्टी ने अपनी पहली ही चुनावी परीक्षा में 108 सीटों पर विजय पताका फहराकर सबको विस्मित कर दिया किंतु लोकतंत्र के कठोर गणित ने उन्हें सत्ता की दहलीज पर लाकर एक अनिश्चितता के भंवर में खड़ा कर दिया है। 234 सदस्यों वाली तमिलनाडु विधानसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के लिए 118 का जादुई आंकड़ा अनिवार्य है और विजय की सेना इस लक्ष्य से मात्र 10 कदम दूर रह गई है। यह 10 सीटों की दूरी वर्तमान में तमिलनाडु की राजनीति का सबसे बड़ा और जटिल प्रश्न बन गई है जिसने राज्य के भविष्य को अनिश्चितता के बादलों से घेर लिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विजय के समक्ष उत्पन्न हुई चुनौतियों का विश्लेषण करें तो सबसे पहली बाधा स्वयं उनकी जीत के तकनीकी स्वरूप से उपजी है। विजय ने अपनी लोकप्रियता को सिद्ध करने हेतु दो अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव लड़ा और दोनों ही स्थानों पर विजय प्राप्त की। यद्यपि यह उनके व्यक्तिगत प्रभाव का प्रमाण है परंतु संवैधानिक नियमों के अनुसार उन्हें एक सीट से त्यागपत्र देना होगा। इस प्रक्रिया के पश्चात उनकी पार्टी की प्रभावी सदस्य संख्या 107 रह जाएगी जिसका सीधा अर्थ यह है कि अब उन्हें बहुमत सिद्ध करने के लिए 11 और सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संख्याबल का यह सूक्ष्म अंतर किसी भी राजनीतिक दल के लिए सामान्य परिस्थितियों में सरल हो सकता था परंतु तमिलनाडु की वर्तमान घेराबंदी ने इसे अत्यंत दुष्कर बना दिया है। विजय के समर्थन में कांग्रेस के 8 विधायक और वामपंथी दलों के 2 विधायक खड़े दिखाई दे रहे हैं जिससे यह कुल आंकड़ा 117 तक पहुंचता हुआ प्रतीत होता है। फिर भी बहुमत के लिए आवश्यक 118 के आंकड़े तक पहुंचने के लिए अंतिम एक सदस्य का समर्थन जुटाना उनके लिए हिमालय लांघने जैसी चुनौती बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीति में शत्रु का शत्रु मित्र होता है और यह उक्ति इस समय तमिलनाडु में चरितार्थ होती दिख रही है। दशकों तक एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम एक नए और प्रभावशाली विकल्प के उदय से सशंकित हैं। सत्ता के गलियारों में यह सुगबुगाहट तीव्र है कि ये दोनों ही स्थापित शक्तियां एक नवागंतुक को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से रोकने के लिए गुप्त रणनीतियों पर कार्य कर रही हैं। वे जानते हैं कि यदि विजय एक बार सत्तासीन हो गए तो राज्य में उनके वर्चस्व का सूर्य सदा के लिए अस्त हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यही कारण है कि छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए विपक्षी खेमों द्वारा साम, दाम, दंड और भेद का खुला प्रयोग किया जा रहा है। अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम जैसे छोटे राजनीतिक समूहों ने विजय की पार्टी पर फर्जी दस्तावेजों और अनैतिक दबाव के आरोप लगाकर इस राजनीतिक युद्ध को कानूनी गलियारों तक खींच लिया है। इन आरोपों ने न केवल विजय की छवि को प्रभावित करने का प्रयास किया है बल्कि गठबंधन की प्रक्रिया में भी अवरोध उत्पन्न कर दिए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में राजभवन की भूमिका अत्यंत निर्णायक और संवैधानिक मर्यादाओं से बंधी हुई है। राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने सरकार गठन की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की शिथिलता बरतने से इनकार कर दिया है। राजभवन का स्पष्ट मत है कि केवल मौखिक दावों या संख्या बल के प्रदर्शन मात्र से सरकार गठन का निमंत्रण नहीं दिया जा सकता। राज्यपाल महोदय ने विजय के समक्ष यह शर्त रख दी है कि उन्हें समर्थन देने वाले प्रत्येक विधायक का व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना और उनके हस्ताक्षरित समर्थन पत्रों का भौतिक सत्यापन अनिवार्य होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संवैधानिक प्रावधानों की यह कठोरता विजय के लिए एक बड़ी बाधा सिद्ध हो रही है क्योंकि गठबंधन के घटक दलों के भीतर भी असंतोष के स्वर उभरने की आशंका बनी रहती है। विधायकों की बाड़ेबंदी और उन्हें विपक्षी प्रलोभनों से बचाकर रखना विजय के नेतृत्व की सबसे बड़ी परीक्षा है। यदि वे अपने कुनबे को सुरक्षित रखते हुए राज्यपाल को संतुष्ट करने में विफल रहते हैं तो राज्य में एक गहरा संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समय की सुइयां विजय के विरुद्ध अत्यंत तीव्र गति से चल रही हैं। वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 10 मई 2026 को समाप्त हो रहा है और इस समय सीमा से पूर्व एक वैध सरकार का गठन न होना लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। यदि आगामी कुछ घंटों के भीतर राजनीतिक गतिरोध नहीं टूटता और समर्थन का विश्वसनीय स्वरूप उभरकर सामने नहीं आता तो राज्यपाल के पास अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की संस्तुति करने के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं रहेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु जैसे राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य के लिए राष्ट्रपति शासन का लागू होना एक पीछे की ओर कदम होगा जिसे कोई भी दल अपने माथे पर कलंक के रूप में नहीं देखना चाहेगा। विजय के लिए संकट यह है कि उन्हें न केवल बाहर से समर्थन जुटाना है बल्कि अपनी पार्टी के भीतर उन महत्वाकांक्षाओं को भी नियंत्रित करना है जो सत्ता के इतने निकट आकर स्वाभाविक रूप से जागृत हो जाती हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की जनता ने विजय को एक विशाल जनादेश तो दिया है परंतु वह जनादेश खंडित है। जनता परिवर्तन चाहती थी और उसने विजय के रूप में उस विकल्प को चुना भी लेकिन संख्याबल की कमी ने उस परिवर्तन की राह में कांटे बो दिए हैं। विपक्षी दलों द्वारा लगाए जा रहे खरीद-फरोख्त के आरोपों ने इस पूरे लोकतांत्रिक उत्सव को विवादों के घेरे में ला दिया है। विजय के समर्थक जहां इसे लोकतंत्र की हत्या और जनादेश का अपमान बता रहे हैं वहीं विपक्षी खेमा इसे सिद्धांतों की लड़ाई करार दे रहा है। सत्य इन दोनों के मध्य कहीं स्थित है। वास्तव में यह एक नए युग के आगमन और पुराने युग के अवसान के बीच की संधि बेला है जहां संघर्ष अपरिहार्य है। विजय को अब केवल एक फिल्म अभिनेता की लोकप्रियता के सहारे नहीं बल्कि एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ की दूरदर्शिता और धैर्य के साथ इस चक्रव्यूह को भेदना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंतिम निष्कर्ष की ओर बढ़ते हुए यह स्पष्ट है कि विजय की चुनौतियां केवल संख्या जुटाने तक सीमित नहीं हैं। यदि वे किसी प्रकार बहुमत सिद्ध कर भी देते हैं तो उनके सामने एक अस्थिर सरकार चलाने की चुनौती होगी जो निरंतर सहयोगियों के दबाव में रहेगी। एक भी विधायक का इधर से उधर होना सरकार के स्थायित्व को खतरे में डाल सकता है। इसके अतिरिक्त राज्य की आर्थिक स्थिति, सामाजिक मुद्दे और प्रशासनिक सुधारों की लंबी सूची उनका प्रतीक्षारत है। तमिलनाडु के लोग अब सिनेमाई संवादों से ऊपर उठकर ठोस परिणाम चाहते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विजय के लिए यह 118 का आंकड़ा केवल सत्ता की चाबी नहीं है बल्कि यह उनकी विश्वसनीयता और राजनीतिक भविष्य का निर्णायक मानदंड भी है। आने वाले कुछ घंटे तमिलनाडु के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाएंगे या फिर एक अधूरे स्वप्न की गाथा बनकर रह जाएंगे यह पूरी तरह से विजय की कूटनीतिक कुशलता पर निर्भर करता है। राज्य की जनता सांसें रोककर राजभवन की ओर देख रही है जहां से निकलने वाला एक निर्णय तमिलनाडु की अगली पांच वर्षों की दिशा तय करेगा। क्या थलपति विजय इस विषम परिस्थिति में अपनी विजय गाथा को पूर्ण कर पाएंगे या फिर सत्ता की दहलीज पर आकर यह सफर थम जाएगा यह देखना शेष है। राजनीति संभावनाओं का खेल है और इस खेल में विजय का अगला कदम ही उनकी वास्तविक विरासत को परिभाषित करेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/178742/the-path-of-panghat-is-very-difficult</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/178742/the-path-of-panghat-is-very-difficult</guid>
                <pubDate>Sat, 09 May 2026 18:04:28 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-05/images5.jpg"                         length="68854"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परिवर्तन की बयार और सत्ता के बदलते समीकरण</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान विधानसभा चुनावों के परिणाम केवल सत्ता के हस्तांतरण की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र के विकसित होते स्वरूप का एक जीवंत दस्तावेज हैं। भारत के राजनीतिक मानचित्र पर पूरब से दक्षिण तक जो लहर दिखाई दी है, उसने स्थापित मान्यताओं को ध्वस्त करते हुए एक नई वैचारिक धरातल तैयार की है। पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु और केरल से लेकर असम तक, मतदाताओं ने जिस प्रकार का विवेक प्रदर्शित किया है, वह यह स्पष्ट करता है कि अब भारतीय राजनीति केवल प्रतीकों के सहारे नहीं, बल्कि ठोस परिणामों और नए विकल्पों के आकर्षण पर आधारित</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178219/winds-of-change-and-changing-equations-of-power"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/election-(11)-5432758.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान विधानसभा चुनावों के परिणाम केवल सत्ता के हस्तांतरण की कहानी नहीं कहते, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र के विकसित होते स्वरूप का एक जीवंत दस्तावेज हैं। भारत के राजनीतिक मानचित्र पर पूरब से दक्षिण तक जो लहर दिखाई दी है, उसने स्थापित मान्यताओं को ध्वस्त करते हुए एक नई वैचारिक धरातल तैयार की है। पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु और केरल से लेकर असम तक, मतदाताओं ने जिस प्रकार का विवेक प्रदर्शित किया है, वह यह स्पष्ट करता है कि अब भारतीय राजनीति केवल प्रतीकों के सहारे नहीं, बल्कि ठोस परिणामों और नए विकल्पों के आकर्षण पर आधारित हो चुकी है। इन चुनावों में सबसे चौंकाने वाला और ऐतिहासिक परिवर्तन पश्चिम बंगाल की धरती पर देखा गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय जनता पार्टी ने यहाँ पहली बार पूर्ण बहुमत प्राप्त कर राज्य में अपनी सरकार बनाने की स्थिति हासिल की है। यह परिवर्तन साधारण नहीं है क्योंकि इसने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले लगभग 15 वर्ष लंबे शासन का अंत कर दिया है। बंगाल की राजनीति, जो दशकों तक वामपंथी और फिर तृणमूल कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही, अब एक बिल्कुल नई दिशा में मुड़ गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहाँ सत्ता-विरोधी लहर के साथ-साथ सांस्कृतिक और संगठनात्मक बदलाव की जो प्रक्रिया वर्षों से चल रही थी, उसने 2026 में अपना पूर्ण स्वरूप प्राप्त कर लिया। यह जीत केवल एक राज्य की जीत नहीं है, बल्कि इसे पूर्वी भारत में एक बड़ी राष्ट्रीय विचारधारा के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है। बंगाल के मतदाताओं ने इस बार भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जड़ता के विरुद्ध विकास और नई कार्यसंस्कृति को प्राथमिकता दी है। तृणमूल कांग्रेस के लिए यह एक बड़ा झटका है क्योंकि उनकी पकड़ न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर हुई, बल्कि शहरी मध्यम वर्ग ने भी इस बार परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दक्षिण की ओर रुख करें तो तमिलनाडु ने पूरे देश को अपनी राजनीतिक परिपक्वता और नए नेतृत्व के प्रति उत्साह से विस्मित कर दिया है। अभिनेता विजय की नवगठित पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम ने अपने पहले ही चुनाव में जो प्रदर्शन किया है, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। तमिलनाडु की राजनीति दशकों से द्रविड़ मुनेत्र कझगम और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम जैसी दो पारंपरिक पार्टियों के वर्चस्व में बंधी हुई थी। विजय की पार्टी ने इस द्विपक्षीय चक्र को तोड़कर स्वयं को एक सशक्त विकल्प के रूप में स्थापित किया। आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो उनकी पार्टी ने 100 से अधिक सीटों पर अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई है, जिससे वह राज्य की राजनीति में केवल तीसरी ताकत नहीं, बल्कि एक नई धुरी बनती दिख रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह परिणाम इस बात का संकेत है कि तमिलनाडु का युवा वर्ग अब पुरानी द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक ढांचों से बाहर निकलकर कुछ नया और आधुनिक देख रहा है। विजय ने अपनी रैलियों में जिस तरह से सामाजिक न्याय और सुशासन की बात की, उसने युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले नागरिकों को गहराई से प्रभावित किया। यह बदलाव आने वाले समय में दक्षिण भारत की पूरी राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में भी इस बार परिवर्तन की परंपरा अक्षुण्ण रही। संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा यानी यूडीएफ ने 10 वर्ष के अंतराल के बाद सत्ता में वापसी की है। पिछले चुनाव में वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा यानी एलडीएफ ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर जो इतिहास रचा था, उसे इस बार मतदाताओं ने दोहराने नहीं दिया। केरल के चुनावी इतिहास में यह देखा गया है कि जनता प्रायः हर 5 वर्ष में सरकार बदल देती है,</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परंतु पिछले कार्यकाल में इस परंपरा के टूटने के बाद यह माना जा रहा था कि वामपंथ की जड़ें और गहरी हो गई हैं। लेकिन 2026 के परिणामों ने सिद्ध कर दिया कि प्रशासनिक थकान और सत्ता के प्रति असंतोष किसी भी शासन के लिए घातक हो सकता है। यूडीएफ की इस जीत में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अपनी पुरानी ताकत को फिर से संकलित किया। अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यक समुदाय के बीच एक नए प्रकार के संतुलन और विकास के वादों ने यूडीएफ को पुनः सत्ता की दहलीज तक पहुँचाया। वामपंथी दलों के लिए यह आत्ममंथन का समय है क्योंकि उनका यह गढ़ अब ढह चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम की स्थिति इन तीनों राज्यों से बिल्कुल भिन्न रही। यहाँ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने लगातार तीसरी बार सरकार बनाने</div>
<div style="text-align:justify;">की दिशा में जीत दर्ज कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा ने अपनी पकड़ न केवल बनाए रखी, बल्कि उसे और अधिक मजबूत किया। असम का यह परिणाम स्थिरता की मांग को दर्शाता है। जहाँ अन्य राज्यों में परिवर्तन की लहर थी, वहीं असम के मतदाताओं ने मौजूदा नेतृत्व की नीतियों और सुरक्षा संबंधी दृष्टिकोण पर अपना विश्वास जताया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विकास कार्यों की गति और सीमावर्ती मुद्दों पर सरकार की सक्रियता ने जनता के बीच एक सकारात्मक संदेश भेजा। भाजपा के लिए असम पूर्वोत्तर भारत का वह प्रवेश द्वार बना हुआ है, जहाँ से उसकी नीतियां पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं। यह जीत यह भी दर्शाती है कि यदि नेतृत्व सक्रिय हो और विकास के जमीनी कार्य दिख रहे हों, तो सत्ता-विरोधी लहर का प्रभाव कम किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रीय स्तर पर यदि इन चार राज्यों के परिणामों का निचोड़ निकाला जाए, तो कई महत्वपूर्ण संकेत मिलते हैं। मतदाताओं ने इस बार 'परिवर्तन' को एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में देखा है। यह प्रवृत्ति उन राज्यों में अधिक स्पष्ट रही जहाँ सत्ता लंबे समय से एक ही दल के पास थी। भारतीय मतदाता अब बहुत अधिक गतिशील हो गया है। वह केवल पुराने संबंधों या भावनाओं के आधार पर वोट नहीं दे रहा, बल्कि वह परिणामों की समीक्षा कर रहा है। नए नेतृत्व और विकल्पों के लिए खुलापन इस चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता रही। तमिलनाडु में विजय की पार्टी का उदय इसका सबसे सटीक उदाहरण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं दूसरी ओर, जहाँ स्थिरता और सुरक्षा का अनुभव हुआ, वहाँ मतदाताओं ने यथास्थिति को बनाए रखने में संकोच नहीं किया, जैसा कि असम में देखा गया। क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय दलों के बीच का संतुलन भी बदल रहा है। जहाँ बंगाल में राष्ट्रीय दल ने क्षेत्रीय शक्ति को विस्थापित किया, वहीं तमिलनाडु में एक नई क्षेत्रीय शक्ति ने राष्ट्रीय स्तर के गठबंधनों को चुनौती दी।</div>
<div style="text-align:justify;">इन चुनावों का एक और महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं और युवाओं की भागीदारी रही। सभी राज्यों में मतदान प्रतिशत में वृद्धि देखी गई, जो लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डेटा के अनुसार, पश्चिम बंगाल में महिला मतदाताओं का झुकाव इस बार निर्णायक साबित हुआ, जिन्होंने सुरक्षा और रोजगार के मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया। केरल में शिक्षित युवाओं ने भ्रष्टाचार के मुद्दों पर वामपंथ के विरुद्ध मतदान किया। तमिलनाडु में सिनेमाई लोकप्रियता का राजनीतिक प्रभाव एक बार फिर सिद्ध हुआ, लेकिन इस बार इसके पीछे एक व्यवस्थित संगठन और नीतिगत ढांचा भी मौजूद था। यह चुनाव यह भी स्पष्ट करते हैं कि भारत की राजनीति अब अधिक गतिशील और प्रतिस्पर्धात्मक हो रही है। अब कोई भी राजनीतिक किला अभेद्य नहीं रह गया है। मतदाताओं की आकांक्षाएं बढ़ रही हैं और वे अब शासन से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि 2026 के ये चुनाव परिणाम आने वाले 2029 के आम चुनावों के लिए एक बड़ी आधारभूमि तैयार कर रहे हैं। इन परिणामों ने यह संदेश दिया है कि भारतीय राजनीति में नए चेहरों और नए विचारों के लिए पर्याप्त स्थान है। क्षेत्रीय अस्मिता और राष्ट्रीय आकांक्षाओं के बीच एक नया सामंजस्य बनता दिख रहा है। बंगाल की जीत भाजपा के लिए एक बड़ी वैचारिक विजय है, जबकि तमिलनाडु में विजय का उदय द्रविड़ राजनीति के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल और असम के परिणाम बताते हैं कि सुशासन और विकल्प की उपलब्धता ही सत्ता की कुंजी है। यह संपूर्ण प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र की उस जीवंतता को दर्शाती है, जिसमें जनता ही अंतिम निर्णायक है और उसकी चुप्पी में ही सबसे बड़े परिवर्तन के बीज छिपे होते हैं। 2026 का यह साल भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक बड़े प्रस्थान बिंदु के रूप में याद किया जाएगा, जिसने पुराने दिग्गजों को विश्राम दिया और नए नायकों को मंच प्रदान किया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/178219/winds-of-change-and-changing-equations-of-power</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/178219/winds-of-change-and-changing-equations-of-power</guid>
                <pubDate>Tue, 05 May 2026 17:45:53 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-05/election-%2811%29-5432758.jpg"                         length="84785"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दक्षिण से पूर्व तक बदलता राजनीतिक भूगोल</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत के 2026 के विधानसभा चुनावों के ताजा परिणामो ने  देश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ लाने के संकेत दे दिए हैं। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे अहम राज्यों में जो तस्वीर उभर रही,वह पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देती दिख रही है। इन चुनावों में न केवल सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं बनी, बल्कि नए चेहरों और नए गठबंधनों ने राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में इस बार का चुनाव सबसे ज्यादा दिलचस्प बन गया है। यहां द्रविड़ राजनीति का दशकों पुराना ढांचा पहली बार गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। एम.के. स्टालिन</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178094/changing-political-geography-from-south-to-east"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत के 2026 के विधानसभा चुनावों के ताजा परिणामो ने  देश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ लाने के संकेत दे दिए हैं। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे अहम राज्यों में जो तस्वीर उभर रही,वह पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों को चुनौती देती दिख रही है। इन चुनावों में न केवल सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं बनी, बल्कि नए चेहरों और नए गठबंधनों ने राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु में इस बार का चुनाव सबसे ज्यादा दिलचस्प बन गया है। यहां द्रविड़ राजनीति का दशकों पुराना ढांचा पहली बार गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम डीएमके जहां सत्ता बचाने की कोशिश में थी, वहीं अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम ने राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। शुरुआती दौर में टीवीके का सबसे आगे होना और पार्टी पूर्ण बहुमत को हासिल कर चुकी यह दिखाता है कि जनता अब पारंपरिक दलों के विकल्प तलाश रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की 234 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 117-118 है।अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम और डीएमके दोनों ही स्पष्ट बहुमत से दूर दिखे। ऐसे में विजय का “किंगमेकर” के रूप में उभरना स्वाभाविक है। उनकी लोकप्रियता, खासकर युवाओं में, और साफ-सुथरी छवि उन्हें एक निर्णायक भूमिका में ला खड़ा करती है। इस पूरे घटनाक्रम में नरेंद्र मोदी के साथ विजय की पुरानी तस्वीर ने राजनीतिक चर्चाओं को और हवा दे दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह तस्वीर भले ही पुरानी हो, लेकिन इसके समय पर सामने आने से यह अटकलें तेज हो गई हैं कि क्या भारतीय जनता पार्टी और टीवीके के बीच चुनाव बाद गठबंधन संभव है। यदि ऐसा होता है और एएएडी भी इसमें शामिल होती है, तो तमिलनाडु में पहली बार एक नया राजनीतिक समीकरण बन सकता है, जो द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक ढांचे को तोड़ देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर केरल में जो तस्वीर सामने आ रही है, वह पूरी तरह अलग लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण है। यहां पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा को बड़ा झटका लगता दिख रहा है। शुरुआती रुझानों में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा स्पष्ट बढ़त के साथ सत्ता में वापसी करता नजर आया।कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ अगर बहुमत हासिल करता है, तो यह केरल की राजनीति में बड़ा बदलाव होगा, क्योंकि राज्य में आमतौर पर सत्ता परिवर्तन का ट्रेंड तो रहा है, लेकिन इस बार मुकाबला बेहद करीबी माना जा रहा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि खुद पिनाराई विजयन अपनी सीट पर पीछे चलने से  उयह केवल एक सीट की हार नहीं, बल्कि उनके शासन मॉडल पर सवाल के रूप में भी देखा जा रहा है। उनके कार्यकाल में कल्याणकारी योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर जोर दिया गया, लेकिन लगता है कि विपक्ष ने सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने में सफलता पाई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में भारतीय जनता पार्टी का खाता खुलना भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है। भले ही सीटें कम हों, लेकिन यह पार्टी के लिए दक्षिण भारत में धीरे-धीरे बढ़ती स्वीकार्यता का संकेत देता है। राजीव चंद्रशेखर जैसे नेताओं का आगे रहना यह दर्शाता है कि भाजपा अब केवल उत्तर और पश्चिम भारत तक सीमित नहीं रहना चाहती। अगर पश्चिम बंगाल की बात करें, तो यहां तस्वीर और भी नाटकीय है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को इस बार कड़ी चुनौती मिल गई है। शुरुआती रुझानों में भाजपा भारी बढ़त बनाती दिखाई दी।॥यह रुझान नतीजों में बदलता है, तो यह राज्य की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में भाजपा की बढ़त को केवल चुनावी जीत के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का संकेत भी है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य में कानून-व्यवस्था, राजनीतिक हिंसा और ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इन मुद्दों को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ा और लगता है कि मतदाताओं ने इस पर प्रतिक्रिया दी है।हालांकि ममता बनर्जी अब भी अपनी सीट पर बढ़त बनाए हुए हैं और उन्होंने अंतिम परिणाम तक इंतजार करने की बात कही है, लेकिन राज्य के समग्र रुझान उनके लिए चिंता का विषय जरूर हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन तीनों राज्यों के रुझानों को एक साथ देखें तो एक बड़ा राष्ट्रीय राजनीतिक संदेश उभरकर सामने आता है। पहला, क्षेत्रीय दलों की पकड़ कमजोर हो रही है या उन्हें नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरा, नए चेहरे और नए दल तेजी से उभर रहे हैं, जैसे तमिलनाडु में विजय की टीवीकेतीसरा, भाजपा का विस्तार अब उन राज्यों तक पहुंच रहा है जहां वह पहले कमजोर मानी जाती थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन चुनावों में “मोदी फैक्टर” की भी चर्चा हो रही है। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि का असर कई राज्यों में देखने को मिल रहा है। खासकर पश्चिम बंगाल और संभावित रूप से तमिलनाडु में यह असर निर्णायक साबित हो सकता है।लेकिन यह भी सच है कि हर राज्य की अपनी अलग राजनीतिक संस्कृति और मुद्दे होते हैं। तमिलनाडु में द्रविड़ पहचान, केरल में वैचारिक राजनीति और बंगाल में क्षेत्रीय अस्मिता हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में किसी एक राष्ट्रीय ट्रेंड को पूरे देश पर लागू करना जल्दबाजी होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर भी, 2026 के ये चुनाव यह जरूर संकेत दे रहे हैं कि भारतीय राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है। पुराने समीकरण टूट रहे हैं, नए गठबंधन बन रहे हैं और मतदाता पहले से ज्यादा जागरूक और निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। तमिलनाडु में अगर टीवीके “किंगमेकर” बनती है, केरल में यूडीएफ सत्ता में लौटता है और पश्चिम बंगाल में भाजपा ऐतिहासिक जीत दर्ज करती है, तो यह केवल राज्यों के स्तर पर बदलाव नहीं होगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी बदल सकता है। आने वाले दिनों में अंतिम नतीजे इन रुझानों को कितनी मजबूती देते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। लेकिन इतना तय है कि 2026 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र को एक नई ऊर्जा, नई बहस और नए विकल्प दिए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/178094/changing-political-geography-from-south-to-east</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/178094/changing-political-geography-from-south-to-east</guid>
                <pubDate>Mon, 04 May 2026 17:10:36 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-05/hindi-divas.jpg"                         length="173958"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पांच राज्यों के चुनाव परिणाम को लेकर देशभर में बढ़ती उत्सुकता और राजनीतिक भविष्य की दिशा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद अब पूरे देश की नजर आने वाले परिणामों पर टिकी हुई है। मतदान समाप्त होने के साथ ही विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है ।हर गली हर शहर और हर राजनीतिक मंच पर यही चर्चा है कि आखिर किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा ।हालांकि यह भी सच है कि एग्जिट पोल केवल अनुमान होते हैं और कई बार ये वास्तविक परिणामों से काफी अलग साबित हुए हैं। इसलिए अंतिम फैसला तो मतगणना</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177667/there-is-increasing-curiosity-across-the-country-regarding-the-election"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20250331-wa0163.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश के पांच महत्वपूर्ण राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के बाद अब पूरे देश की नजर आने वाले परिणामों पर टिकी हुई है। मतदान समाप्त होने के साथ ही विभिन्न एजेंसियों द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल ने राजनीतिक माहौल को और अधिक गर्म कर दिया है ।हर गली हर शहर और हर राजनीतिक मंच पर यही चर्चा है कि आखिर किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा ।हालांकि यह भी सच है कि एग्जिट पोल केवल अनुमान होते हैं और कई बार ये वास्तविक परिणामों से काफी अलग साबित हुए हैं। इसलिए अंतिम फैसला तो मतगणना के दिन ही होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन चुनावों में असम केरल पश्चिम बंगाल तमिलनाडु और पुदुचेरी जैसे राज्यों की राजनीति दांव पर लगी हुई है ।हर राज्य का राजनीतिक परिदृश्य अलग है और वहां की जनता के मुद्दे भी भिन्न हैं। ऐसे में इन चुनावों के परिणाम केवल सरकारों का गठन ही तय नहीं करेंगे बल्कि यह देश की व्यापक राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित करेंगे। असम में एग्जिट पोल के अनुसार सत्तारूढ़ दल को बढ़त मिलती दिख रही है और लगातार तीसरी बार सरकार बनने की संभावना जताई जा रही है यदि ऐसा होता है तो यह राज्य की राजनीति में स्थिरता का संकेत होगा वहीं विपक्ष के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी कि वह अपनी रणनीति को पुनः परिभाषित करे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केरल में स्थिति कुछ अलग नजर आती है यहां एग्जिट पोल में सत्ता परिवर्तन की संभावना जताई जा रही है यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो यह राज्य की पारंपरिक राजनीतिक प्रवृत्ति के अनुरूप होगा जहां जनता समय समय पर सरकार बदलती रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि मतदाता अपने अधिकारों के प्रति सजग हैं और वे प्रदर्शन के आधार पर निर्णय लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार सबसे अधिक चर्चा में रहा है। यहां मुकाबला बेहद कड़ा बताया जा रहा है ।एग्जिट पोल के अनुसार दोनों प्रमुख दलों के बीच कांटे की टक्कर है कुछ अनुमानों में एक पक्ष को बढ़त दिखाई गई है तो कुछ में दूसरे को यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण काफी गहरा है और मतदाताओं ने सोच समझकर मतदान किया है। तमिलनाडु में एग्जिट पोल के अनुसार वर्तमान सरकार की वापसी की संभावना जताई गई है यदि ऐसा होता है तो यह वहां की जनता द्वारा स्थिरता और निरंतरता को प्राथमिकता देने का संकेत होगा। साथ ही यह भी दर्शाता है कि राज्य में क्षेत्रीय दलों की पकड़ अभी भी मजबूत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पुदुचेरी में भी राजनीतिक समीकरण दिलचस्प बने हुए हैं। यहां एग्जिट पोल में मौजूदा गठबंधन को बढ़त मिलती दिख रही है हालांकि छोटे राज्यों में अक्सर परिणाम अप्रत्याशित भी हो सकते हैं इसलिए यहां भी अंतिम नतीजों का इंतजार करना जरूरी है। एग्जिट पोल को लेकर एक महत्वपूर्ण बात यह है कि इनका इतिहास पूरी तरह विश्वसनीय नहीं रहा है कई बार ये वास्तविक परिणामों के काफी करीब रहे हैं लेकिन कई बार पूरी तरह गलत भी साबित हुए हैं। उदाहरण के तौर पर पहले भी कई चुनावों में एग्जिट पोल ने एक पक्ष की जीत का दावा किया लेकिन परिणाम ठीक इसके उलट आए ,इससे यह स्पष्ट होता है कि मतदाताओं का अंतिम निर्णय अक्सर अनुमान से परे होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देशभर में इन चुनावों को लेकर उत्साह का माहौल है ।चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह लोग अपने अपने अनुमान लगा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न आंकड़ों और रुझानों के आधार पर भविष्यवाणी कर रहे हैं। वहीं आम जनता भी इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में गहरी रुचि दिखा रही है। इन चुनावों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसमें महिलाओं और युवाओं की भागीदारी काफी अधिक रही है। कई स्थानों पर महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक दर्ज की गई है यह लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि समाज के सभी वर्ग अपनी भूमिका निभा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके अलावा इन चुनावों में स्थानीय मुद्दों के साथ साथ राष्ट्रीय मुद्दों का भी प्रभाव देखा गया है ।विकास ,रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था जैसे विषय मतदाताओं के निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते नजर आए हैं। राजनीतिक दलों ने भी अपने अपने घोषणापत्र में इन मुद्दों को प्रमुखता दी है। चुनाव परिणाम केवल सरकार गठन तक सीमित नहीं होते बल्कि यह आने वाले समय की नीतियों और योजनाओं को भी प्रभावित करते हैं ,इसलिए इन परिणामों का महत्व और भी बढ़ जाता है ।यह तय करेंगे कि किस दिशा में विकास की नीतियां आगे बढ़ेंगी और जनता की अपेक्षाओं को किस प्रकार पूरा किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि यह भी जरूरी है कि हम एग्जिट पोल को अंतिम सत्य न मानें यह केवल एक संकेत हैं न कि निष्कर्ष वास्तविक परिणाम ही यह तय करेंगे कि जनता ने किसे अपना समर्थन दिया है ।इसलिए धैर्य बनाए रखना और आधिकारिक नतीजों का इंतजार करना ही उचित होगा।</div>
<div style="text-align:justify;">अंत में यह कहा जा सकता है कि पांच राज्यों के ये चुनाव देश के लोकतांत्रिक ढांचे की मजबूती को दर्शाते हैं। मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं बल्कि एक जीवंत परंपरा है।</div>
<div style="text-align:justify;">अब सभी की नजरें मतगणना के दिन पर टिकी हुई हैं जब यह स्पष्ट हो जाएगा कि किसकी सरकार बनेगी और कौन मुख्यमंत्री बनेगा तब तक अटकलों और चर्चाओं का दौर जारी रहेगा लेकिन अंतिम निर्णय जनता के मतों के आधार पर ही होगा और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।</div>
<div style="text-align:justify;">          *कान्तिलाल मांडोत*</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/177667/there-is-increasing-curiosity-across-the-country-regarding-the-election</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/177667/there-is-increasing-curiosity-across-the-country-regarding-the-election</guid>
                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:12:15 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/img-20250331-wa0163.jpg"                         length="154899"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पश्चिम बंगाल-तमिलनाडु में थमा चुनाव प्रचार, 23 अप्रैल को मतदान, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को होने वाले मतदान से 48 घंटे पहले मंगलवार शाम को चुनाव प्रचार थम गया। पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 152 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होनी है, जबकि तमिलनाडु में सभी 234 सीटों के लिए मतदान होने हैं। इसको लेकर चुनाव आयोग ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी कड़ी निगरानी रखी जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">चुनाव प्रचार थमने से पहले दोनों राज्यों में शीर्ष नेताओं और उम्मीदवारों ने समर्थकों को आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं, चुनाव प्रचार थमने के बाद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177019/election-campaign-stopped-in-west-bengal-tamil-nadu-strong-arrangements-for"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(1)10.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को होने वाले मतदान से 48 घंटे पहले मंगलवार शाम को चुनाव प्रचार थम गया। पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 152 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होनी है, जबकि तमिलनाडु में सभी 234 सीटों के लिए मतदान होने हैं। इसको लेकर चुनाव आयोग ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी कड़ी निगरानी रखी जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चुनाव प्रचार थमने से पहले दोनों राज्यों में शीर्ष नेताओं और उम्मीदवारों ने समर्थकों को आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं, चुनाव प्रचार थमने के बाद अब कोई भी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार के समर्थन में जनसभा या रैली नहीं कर सकेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> पश्चिम बंगाल की तो यहां इस बार दो चरणों में चुनाव संपन्न कराया जाना है। पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होना है। इस चरण में कुल 1,478 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वहीं, तीन करोड़ 60 लाख 77 हजार 171 मतदाता उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। इन मतदाताओं में एक करोड़ 75 लाख 77 हजार 210 महिलाएं अपने मत का इस्तेमाल करेंगी। आरक्षण को लेकर बने माहौल के बीच इस बार पश्चिम बंगाल में महिलाओं की भूमिका काफी अहम मानी जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल में पहले चरण में जहां मतदान होने हैं, उनमें उत्तर बंगाल के आठ, दक्षिण बंगाल के तीन और जंगलमहल अंचल के पांच जिले शामिल हैं।इनमें मुर्शिदाबाद की 22, कूचबिहार की 9, जलपाईगुड़ी की 7, अलीपुरद्वार की 5, कलिंपोंग की एक, दार्जिलिंग की 5, उत्तर दिनाजपुर की 9, दक्षिण दिनाजपुर की 6, मालदा की 12, बीरभूम की 11, पश्चिम ब‌र्द्धमान की 9, पूर्व मेदिनीपुर की 16, पश्चिम मेदिनीपुर की 15, झारग्राम की 4, पुरुलिया की 9 और बांकुड़ा की 12 सीटें शामिल हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु  राज्य में सभी सीटों पर एक चरण में ही चुनाव संपन्न कराया जाना है। 23 अप्रैल को ही सभी 234 सीटों पर मतदान होना है। तमिलनाडु में इस बार 4,023 उम्मीदवार मैदान में हैं। चुनाव में कुल 5.73 करोड़ मतदाता अपने मत का इस्तेमाल कर उम्मीदवारों की किस्मत लिखेंगे।इस बार चुनाव में सबकी निगाहें अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके पर टिकी हैं, क्योंकि कई सीटों पर उनको लोगों का काफी समर्थन मिल रहा है, इसलिए चुनाव में उनकी भूमिका काफी अहम हो सकती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/177019/election-campaign-stopped-in-west-bengal-tamil-nadu-strong-arrangements-for</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/177019/election-campaign-stopped-in-west-bengal-tamil-nadu-strong-arrangements-for</guid>
                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 22:08:36 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/images-%281%2910.jpg"                         length="124787"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तमिलनाडु की सियासत में बूथ की जंग: वोटर रिमाइंडर से बदला चुनावी मैदान</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनावी जंग अब बड़े-बड़े मंचों और नारों से निकलकर सीधे बूथ स्तर तक पहुंच चुकी है। इस बार मुकाबला केवल पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि रणनीतियों, संगठन क्षमता और मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कला के बीच भी है। सत्तारूढ़ एम. के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने चुनावी लड़ाई को अंतिम चरण में एक नए आयाम पर ला दिया है, जिसे “वोटर रिमाइंडर कैंपेन” के रूप में देखा जा रहा है। यह अभियान केवल मतदाताओं को मतदान की याद दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176711/booth-war-in-tamil-nadu-politics-changed-electoral-ground-due"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas16.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां चुनावी जंग अब बड़े-बड़े मंचों और नारों से निकलकर सीधे बूथ स्तर तक पहुंच चुकी है। इस बार मुकाबला केवल पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि रणनीतियों, संगठन क्षमता और मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कला के बीच भी है। सत्तारूढ़ एम. के. स्टालिन के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने चुनावी लड़ाई को अंतिम चरण में एक नए आयाम पर ला दिया है, जिसे “वोटर रिमाइंडर कैंपेन” के रूप में देखा जा रहा है। यह अभियान केवल मतदाताओं को मतदान की याद दिलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संवाद का हिस्सा बन चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से एक चक्र चलता आया है, जिसमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम बारी-बारी से सत्ता में आती रही हैं। इस बार की सबसे बड़ी चुनौती इसी चक्र को तोड़ने की है। एम. के. स्टालिन के सामने यह केवल सत्ता में बने रहने का सवाल नहीं, बल्कि एक स्थायी राजनीतिक आधार तैयार करने की परीक्षा भी है। यही कारण है कि उनकी पार्टी ने प्रचार के पारंपरिक तरीकों से आगे बढ़कर मतदाताओं के दरवाजे तक पहुंचने की रणनीति अपनाई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">“वोटर रिमाइंडर कैंपेन” दरअसल एक सूक्ष्म और लक्षित अभियान है, जिसके तहत पार्टी कार्यकर्ता घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क कर रहे हैं। इस अभियान में विशेष रूप से महिलाओं, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों और शहरी क्षेत्रों के मतदाताओं को प्राथमिकता दी जा रही है। यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि तमिलनाडु के चुनावों में महिलाओं की भागीदारी और उनका झुकाव अक्सर निर्णायक भूमिका निभाता है। इसके साथ ही शहरी, तटीय और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में पार्टी की पकड़ को मजबूत करने का प्रयास भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, विपक्ष में खड़ी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम अपनी पारंपरिक ताकत, यानी मजबूत बूथ संगठन और ग्रामीण नेटवर्क पर भरोसा कर रही है। एडापड्डी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व में पार्टी पश्चिमी तमिलनाडु के जिलों—कोयंबटूर, तिरुपुर, इरोड और सेलम—में अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रही है। यहां पार्टी का आधार मुख्य रूप से गौंडर समुदाय पर टिका हुआ है, जो लंबे समय से उसकी रीढ़ माना जाता रहा है। हालांकि, बदलते सामाजिक समीकरण और गठबंधन राजनीति ने इस बार इस समर्थन को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के लिए दोधारी तलवार साबित हो रहा है। जहां एक ओर यह गठबंधन कुछ क्षेत्रों में राजनीतिक मजबूती देता है, वहीं दूसरी ओर दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच पार्टी की स्वीकार्यता को प्रभावित कर रहा है। यही कारण है कि कई ऐसे क्षेत्र, जो पहले पार्टी के मजबूत गढ़ माने जाते थे, अब वहां स्थिति उतनी सहज नहीं दिख रही।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस चुनाव में मुद्दों की बात करें तो केवल स्थानीय समस्याएं ही नहीं, बल्कि बड़े राष्ट्रीय और भावनात्मक विषय भी प्रमुखता से उभरे हैं। डिलिमिटेशन यानी परिसीमन का मुद्दा, जिसे द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने तमिलनाडु के अधिकारों से जोड़ दिया है, चुनावी बहस के केंद्र में है। पार्टी इसे “राज्य बनाम केंद्र” के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जिससे क्षेत्रीय अस्मिता को बल मिलता है। इसके अलावा महिला कल्याण योजनाएं, नकद सहायता और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े वादे भी मतदाताओं को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युवाओं के बीच भी इस बार चुनावी चर्चा काफी सक्रिय है। रोजगार, शिक्षा और विशेष रूप से NEET परीक्षा जैसे मुद्दे लगातार उठ रहे हैं। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने इन मुद्दों को राज्य की स्वायत्तता और केंद्र के हस्तक्षेप से जोड़ते हुए अपनी राजनीतिक रणनीति को धार दी है। सोशल मीडिया पर भी पार्टी की सक्रियता इस बात का संकेत देती है कि वह युवा मतदाताओं तक पहुंच बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही, तमिल सिनेमा और राजनीति का पारंपरिक संबंध भी इस चुनाव में नजर आ रहा है। अभिनेता विजय की राजनीतिक सक्रियता और उनके नए प्रयासों ने युवा मतदाताओं में एक अलग तरह की उत्सुकता पैदा की है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इसका सीधा लाभ किसे मिलेगा, लेकिन यह निश्चित है कि इससे चुनावी माहौल में एक नई ऊर्जा का संचार हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन इस बार उनका प्रभाव अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहा है। इसके बजाय “अस्मिता”, “अधिकार” और “कल्याण” जैसे व्यापक मुद्दे अधिक प्रमुखता से उभरकर सामने आए हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि राज्य की राजनीति धीरे-धीरे एक नए चरण में प्रवेश कर रही है, जहां मतदाता केवल पारंपरिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और प्रदर्शन के आधार पर भी निर्णय ले रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चुनाव के इस अंतिम चरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लड़ाई अब पूरी तरह से बूथ स्तर पर सिमट गई है। कौन पार्टी अपने समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में सफल होती है, कौन अपने मतदाताओं को अंतिम समय तक जोड़े रख पाती है—यही जीत और हार का निर्धारण करेगा। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का “वोटर रिमाइंडर कैंपेन” और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का मजबूत बूथ नेटवर्क—इन दोनों के बीच की टक्कर इस चुनाव की असली कहानी बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, तमिलनाडु का यह चुनाव केवल एक राज्य की सत्ता का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह उस दिशा का संकेत भी है, जिसमें क्षेत्रीय राजनीति आगे बढ़ रही है। क्या एम. के. स्टालिन इस बार सत्ता में वापसी कर इतिहास रच पाएंगे, या फिर ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम अपने संगठन के बल पर वापसी करेगी—यह तो परिणाम ही बताएंगे। लेकिन इतना तय है कि इस बार की जंग ने तमिलनाडु की राजनीति को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया है, जहां हर वोट, हर बूथ और हर मतदाता निर्णायक बन चुका है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176711/booth-war-in-tamil-nadu-politics-changed-electoral-ground-due</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/176711/booth-war-in-tamil-nadu-politics-changed-electoral-ground-due</guid>
                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 18:43:18 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/hindi-divas16.jpg"                         length="137237"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नारी बन्दन बिल के सहारे  बीजेपी बंगाल जीतना चाहती थी या चीन मॉडल लागू करना चाहती थी </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176611/bjp-wanted-to-win-bengal-with-the-help-of-nari"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल के चुनाव में जो भी वोटर लिस्ट में धांधली हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">  यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।  अपने ही नागरिकों का वोट का अधिकार छीन कर उनको विदेशी नागरिक कहना उचित नहीं है पर 2014से एक धर्म विशेष के लोगों को हर राज्य में नया नामकरण दिया गया घूसपैठिये और आज तक यानि 2014से अब तक कितने घुसपैठिए हर राज्य में मिले भारत सरकार जनता को चुनाव में नहीं बता पा रही है।  बस एक नरेटिव कि बंगाल में ममता चुनाव घुसपैठियों के वोट से जीत रही है एक धर्म के वोट से जीत रही  है उनको वोट के अधिकार से वंचित करना है । जो चुनाव आयोग सरकार का कठपुतली बन कर कर दिया। नब्बे लाख का नाम काट दिया।  अब चुनाव में वोट नहींदेगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष का आरोप सही कि देश की सभी सम्वैधानिक संस्थानों पर व  न्यायालय हो चुनाव आयोग हो ई डी सी बी आई हर पर एक पार्टी एक विचार धारा का कब्जा हो गया है।यह बात भारत के जनमानस के  साथ  विश्व के जनमानस में भी यही गुज रहा है कि 2014के बाद भारत में लोकतंत्र कमजोर होगया।  बस एक नेता एक पार्टी कीबात होनेलगी है विपक्ष कहीं जिन्दा नहीं  रहे।उसको संसद से सड़क तक लड़ने का अधिकार नहीं जब जब संसद से सड़क पर आया लड़ने उसको देशद्रोही पाक परस्त छदम सेकुलर अवसर वादी न जाने किन किन अलंकरणों से भारतीय मिडिया भाजपा का आईटी सेल सोशल मिडिया अलंकृत करता रहता है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल के चुनाव में एक और बात बहुत दिलचप्स  हो रही की कभी ममता के विधायक रहे हुमाऊ कबीर ममता को छोड़ कर भाजपा में गये फिर वहां से सौदे बाजी करके अलग पार्टी बनाया। भाजपा ने ममता को हराने के लिए एक हजार करोड़ और उपमुख्यमंत्री के पद पर समझौता किया यह बात एक स्टिंग ऑपरेशन करके किसी ने खुलासाकर दिया  विडियो बनाकर  सोशल मिडिया में चला रहा है। मैं यह नहीं कह सकता हूं दावे के साथ की यह विडियो सही या ग़लत  है।जो सोशल मिडिया पर चल रहा उसी की बात कर रहा हूं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सच क्या है जांच हो तो सब जनता जाने ।इसी विडियो से  परेशान होकर देश की सरकार  जो हर समय बस  चुनाव में रहती हैं परेशान हो ग ई जीत का सपना जो बंगाल में  देख रही थी  काबफूर होने लगा। तब वह  एक नया गेम प्लान लेकर आई कि बीच चुनाव में ही संसद का विशेष सत्र तीन दिन का बुला लिया कि अब देश की नारी आधी आबादी शायद बंगाल जीतादे।  जो  नारी शक्ति वन्दन बिल यानि महिला आरक्षण 2023मे पास हो चुका है और 2029के चुनाव में लागू होगा  जिसमें जनगणना और परिसीमन की बात थी ।उसको बदलने के लिए ही विशेष सत्र को बुलाया जो गलत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र में संख्या बल का खेल है। तो सरकार सत्ता में संसद का विशेष सत्र बुला लिया।और तीन अलग अलग बिल पेश कर दिया। 16अप्रैल से बहस चल रही है 17शाम चार बजे के बाद वोटिंग होगी  इस में भी सरकारकिस नियम से वोटिंग करायेगी।इस महिला बिल का विपक्ष समर्थन कर रहा उनका कहना है महिलाओं को आरक्षण 545सासद के वर्तमान नम्बर में से कर दिया जाये।  लेकिन भाजपा कह रही हम देश में नये राजाओं की संख्या बढायेंगे वह 850करके उस संख्या में से महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने की बात कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस आरक्षण में भी एक खेल होगया अनुसुचित जाति और अनुसूचितजन जाति को तो लिया है परन्तु पिछड़ी जाति को आरक्षण में नहीं लिया है।विपक्ष का कहना है फिर परिसीमन  नहीं हो गा तबतक जब तक  जनगणना नही हो जायेगी जनगणना जातिय आधार पर होगी उसके बाद ही महिलाओं को आरक्षण और संसदों तथा प्रदेश में विधानसभा में विधायकों की संख्या बढ़ेगी। भाजपा परिसीमन को जनगणना से नहीं जोड़ना चाहती है भाजपा कि एक मंशा यह भी होगी कि परिसीमन बिल पास कराले। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न ई जनगणना में जातियों की गणना नहीं करायेगे यह आशंका है कि जातिय जनगणाना भाजपा नहीं करना चाहती है।अगर जातिय जन गणना देश की होगी तो बहुत कुछ देश में बदल जायेगा राजनिति का सन्तुलन भी गड़बड़ होगा फिर नारा वहीं चलेगा जिसकी जितनी सख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी ।इसी कारण से यह तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया गया।है या इस सत्र के परिणाम को जनता में ले जाकर सहानभूति लेने का राजनिति चाल  था।  बंगाल के चुनाव प्रचार में पता चलेगा बिल के पीछे का असली मकसद  क्या था या नकली चेहरा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी कारण भाजपा 2011या किसी भी जनगणना से किसी भी राज्य की संसदों की सख्या निर्धारित करने का एकाधिकार चाहती है। जो बहुत ग़लत है विपक्ष विरोध कर रहा यह तो निश्चित है जिस राज्य में जन संख्या कम होगी वहां सांसद कम होंगे इस बिल से उत्तर भारत में यूं पी बिहार राजस्थान  एम पी में सांसदों की संख्या बढ़ेगी और इन राज्यो  की तुलना में दक्षिण राज्यों में कम संख्या सांसदों की होगी पूर्वोत्तर राज्यों में भी कामोवेश यही होगा ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब एक न ई लड़ाई इस बिल से उत्तर भारत और दक्षिण भारत में शुरू होगया है यह सब एक सुनियोजित चाल से भारत में लोकतंत्र को चीनी लोकतंत्र में बदलने का कुचक्र  तो नहीं चल रहा है कि चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिले सम्विधान बदले और चीनी राष्ट्रपति की प्रणाली बना कर  भाजपा सत्ता में सदा के लिए बनी रहे  अगर मंशा साफ होता तो  महिलाओं को आरक्षण  तो2024मे दे दिया होता। पर नारी के पीछे छिपकर देश में नया लोकतंत्र स्थापित करने की एक मंशा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु इस बिल में एक बात और है कि राज्य सभा कि सीट नहीं बढ़ाया जा रहा अनुपातिक तौर पर राज्य सभा में भी सीट बढ़े।  कारण अगर विधानसभा में हर राज्य में पचास प्रतिशत सीट बढ़ रही है तो राज्य सभा का क्योंनही बढ़ेगी। यह और तरह का खेल है कि अगर राज्य सभा में बहुमत नहीं होगा तो दोनों सदनों को मिलाकर कोई बिल‌विधेयक पास हो जायेगा विपक्ष यहां क्यौ मौन है राज्य  सभा में बढ़े पचास प्रतिशत।विपक्ष यह चाल भाजपा का समझ गया और या जाल मेंनही फंसा उस कबुतर की तरह । इस बिल से आभास हो रहा है नाम नारी शक्ति वन्दन पर खेल कुछ और है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब बंगाल का चुनाव बिल पास होगा तब भी नहीं पास होगा तब भी नारीशक्ति वन्दन के सहारे चलेगा सारा फोकस भाजपा का यही होगा  कि हम नारी सम्मान करतेहै  बिल आपके लिए शक्ति देगा नहीं पास हुआ तो  विपक्ष नारी विरोधी है यही गुंजेगा।परन्तु एक बात जो जनता को पूछना होगा अपने नेताओं से कि हम भारत के नागरिक इतने अमीर हो गये है कि 545राजा ससद के चार हजार विधानसभा के राजाओं  के ऐशो आराम के लिए जो अभी टैक्स दे रहे हैं। फिर 307सासदो और 2100 विधायको को जो बिल पास होने के बाद आयेंगे इनको पालने के लिए कितना और टैक्स देंगे लगभग हर वर्ष सभी राजाओं को पालने ऐशो आराम के लिए पन्द्रह हजार करोड़ लगेगा कहा से आयेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कैसे आयेगा क्या और टैक्स लगेगा कोई राजनेता संसद में यह बात नहीं कर रहा नहीं सत्ता पक्ष यह जनता को बता रहा हैं कि इन सभी राजाओं को पालने का खर्च किस मद से होगा बस नारी शक्ति वन्दन हो रहा है। इन राजाओं के साथ साथ देश की जनता पूर्व सांसदों विधायकों को भी पाल रही है।इनके लालनपालन पर हर वर्ष ग्यारह हजार करोड़ खर्च होता पेंशन और मुफ्त यात्रा में यह सब गरीब भारत की जनता है पांच किलो मुफ्त राशन वाले असृसी करोड़ भी इनके लालपाल में अपना योगदान दे रहे हैं।अब भारत इतना अमीर तो नहीं है कि हजारों राजाओं को अपने। जनता के टैक्स पर पाले जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश के उस समय अटल की सरकार ने 2003मे सरकारी कर्मचारियों का पेंशन यह कह कर बन्द कर दिया कि देश की जीडीपी पेंशन के भार को नहीं उठा पायेगी परन्तु इन राजाओं का  पेंशन वेतन मुफ्त आवास चिकित्सा यात्रा भत्ता देश  उठा रहा है।पर हम जनता मौन है। अपने लड़कों के हक में नहीं बोल रहे हैं।यह बिल जो लाया गया है देश हित में नहीं है जितनी पहले सांसदों की सख्या है उसी में से महिलाओं को आरक्षण दिया जाये सांसदों और विधायकों की सख्या न बढ़ाई जाये नहीं तो जनता कभी भी सड़क पर आयेगी तो क्या दृश्य होगा इसकी कल्पना कोई राजनेता या ज्योतिषी नहीं कर सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि नये राजाओं की संख्या देश में बढ़ी तो शायद फिर देश में कोई नया गांधी सुभाष आजाद भगत बनकर जरूर आयेगा इन राज्यों से मुक्ति जनता को मिलेगी जैसे मुगलों से अग्रेजो से देशी राजाओं से मिला था उसी तरह फिर लड़ना होगा नये राजाओ को हटाने के लिए ।भाजपा का मकसद नारी के नाम को चुनाव में लेकर सत्ता तक पहुचना है। वह नारी सम्मान कितना किये है और करेंगे संसद में  दिये गये भाषण को जनता याद कर रही कि आज वही व्यक्ति नारी वन्दन कर रहा जो कभी किसी नारी को विधवा न जाने कैसे कैसे अलंकरणों से सुशोभित किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के ऊपर जो तमाम आरोप लग रहे हैं उसी से जनता और महिलाओं के ध्यान को हटाने के लिए बंगाल तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए यह बिल लाया गया भाजपा को पता है बिल पास नहीं होगा फिर भी यह खेल किया कि चुनाव में विपक्ष को महिलाओं के विरोधी के रुप में स्थापित करके अपनी छबि को बचाने का नया कुचक्र  है।विपक्ष जब मांग कर रहा था कि ईरान अमेरिका इजरायल युद्ध और देश की ऊर्जा सुरक्षा पर बहस के लिए विशेष संसद का सत्र बुलाने की मांग नहीं माना और चर्चा नहीं हुआ वह ईरान पर मौन बस इजरायल अमेरिका के साथ खड़े हैं अब क्यों अमेरिका इजरायल के साथ है यह कूटनिती की कोई भाषा होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कल संसद में मोदी गारंटी दे रहे थे बिल की पर शायद वह हर चुनाव में गारंटी देते आरहे है क्यो पूरा नहीं हुआ दोकरोड रोजगार बिहार में उघोग सौ स्मार्ट सीटी सब कहां  है।अब तो बिल पास नहीं हुआ। यह जो बिल गिरा भारत बच गया अगर बिल पास होगया होता तो 2029मेका आखिरी चुनाव होता या 2027मे मध्यावधि चुनाव कराकर सम्विधान बदले देते की भारत में एक दलित प्रणाली ही होगी।पर विपक्ष की गजब की एक जुटता कल देखने को मिला बिल गिर गया देश बच गया।अब  पांच राज्योचुनाव परिणाम का इन्तजार करे वैसे महंगाई के लिए भी जनता कमर कस ले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">29अप्रैल शाम पांच बजे देश का मौसम गुलाबी होगा जब तेल के दाम बढ़ेंगे यानही बढ़ेंगे  तब भी  भी मौसम गुलाबी रहेगा कारण पांच राज्यों का एक्जिट पोल पर बहस होगी कौन मुख्य मंत्री बनेगा तमाम बातें होंगी फिर लोग नारी शक्ति वन्दन भूल जायेंगे। इस माडल को हराने में दक्षिण के राज्य तृणमूल कांग्रेस के सहयोग की सराहना होनी चाहिए भाजपा समर्थक ससद दक्षिण के जो थे जनता उनसे हिसाब ले क्यों दक्षिण से धोखा किया।।अभी इसे जीत न माने न खुशी माने यह तो बस आरम्भ है।अभी सत्ता से विपक्ष को और लड़ना होगा जनता को भी  लड़ना होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176611/bjp-wanted-to-win-bengal-with-the-help-of-nari</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/176611/bjp-wanted-to-win-bengal-with-the-help-of-nari</guid>
                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:55:11 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/img_20260417_2100471.jpg"                         length="106218"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परिसीमन की सियासत, अस्मिता का उभार और चुनावी हवा का बदलता रुख</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को पीछे छोड़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जिस तेजी से अपनी चुनावी रणनीति को बदला है, वह उनकी राजनीतिक समझ और समय की नब्ज पकड़ने की क्षमता को दर्शाता है। महिला आरक्षण बिल के गिरने के बाद उन्होंने परिसीमन को केंद्र में रखकर एक नया आक्रामक अभियान शुरू किया है। पहले जहां एसआईआर जैसे मुद्दे को बंगाल की अस्मिता से जोड़ा जा रहा था, वहीं अब परिसीमन को “देश को तोड़ने की साजिश” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह बदलाव केवल भाषाई नहीं बल्कि पूरी राजनीतिक दिशा को बदलने वाला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर बंगाल, जहां भाजपा ने पिछली बार मजबूत प्रदर्शन किया था, अब इस नए नैरेटिव का केंद्र बन गया है। चाय बागानों में काम करने वाले लाखों मजदूरों तक पहुंचने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने घर-घर अभियान शुरू किया है। यहां अब रोजगार, मजदूरी और जमीन के अधिकार जैसे मुद्दों की जगह परिसीमन को लेकर भय और असुरक्षा का माहौल बनाया जा रहा है। ममता बनर्जी यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि यदि परिसीमन लागू होता, तो कई जिलों की पहचान ही खत्म हो जाती। यह एक ऐसा भावनात्मक तर्क है जो सीधे जनता के मन में अस्मिता के सवाल को जगाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर अभिषेक बनर्जी जैसे नेता इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की कमजोरी के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि संसद में जो हुआ, वह केवल शुरुआत है और इसका असर राज्यों में भी दिखेगा। यह बयान न केवल आत्मविश्वास दर्शाता है बल्कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का प्रयास भी है।तमिलनाडु में स्थिति और भी रोचक है। यहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने बेहद तेजी से चुनावी हवा को अपने पक्ष में मोड़ने का काम किया है। तीन दिन पहले तक परिसीमन बिल सबसे बड़ा मुद्दा था, लेकिन अब “तमिल अस्मिता” चुनाव का केंद्रीय विषय बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एम. के. स्टालिन को इस पूरे घटनाक्रम में एक विजेता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, मानो उन्होंने केंद्र के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली हो। डीएमके के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर “द्रविड़ गौरव” के पर्चे बांट रहे हैं और यह संदेश दे रहे हैं कि यह केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि तमिल पहचान की रक्षा का प्रश्न है। इस रणनीति का असर यह हुआ है कि चुनावी विमर्श पूरी तरह बदल गया है। अब यह केवल सीटों के बंटवारे का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन गई है। के. अन्नामलाई लगातार यह कह रहे हैं कि परिसीमन से तमिलनाडु को कोई नुकसान नहीं होता, लेकिन उनकी बात उतनी प्रभावी तरीके से जनता तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके विपरीत डीएमके का संदेश ज्यादा संगठित और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, जिससे वह ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।एनडीए की सहयोगी एआईएडीएमके एक असमंजस की स्थिति में है। वह न तो खुलकर परिसीमन बिल के खिलाफ बोल पा रही है और न ही तमिल अस्मिता के मुद्दे पर पूरी तरह डीएमके का विरोध कर पा रही है। यह स्थिति उसे चुनावी मैदान में कमजोर बनाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू उभरकर सामने आया है, वह है नए चेहरों का उदय। अभिनेता विजय ने इस मुद्दे को एक अवसर के रूप में लिया है और अपनी पार्टी के जरिए “तमिलनाडु का हक” जैसे संदेशों को डिजिटल माध्यम से फैलाया है। यह दिखाता है कि कैसे बदलते राजनीतिक माहौल में नए खिलाड़ी भी अपनी जगह बना सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह पहली बार नहीं है जब चुनाव से ठीक पहले मुद्दों में इतना बड़ा बदलाव आया हो। पश्चिम बंगाल में 2011 में “परिवर्तन” का नारा और 2021 में “खेला होबे” जैसे अभियान यह साबित करते हैं कि सही समय पर सही नैरेटिव चुनाव की दिशा बदल सकता है। इसी तरह तमिलनाडु में 1967 और 2016 के चुनावों में भी आखिरी समय में मुद्दों के बदलने से परिणाम प्रभावित हुए थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बार भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है, लेकिन एक अंतर के साथ। इस बार मुद्दे केवल स्थानीय नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय नीतियों से जुड़े हुए हैं। परिसीमन जैसे विषय को लेकर क्षेत्रीय अस्मिता का उभार यह दिखाता है कि भारत की संघीय राजनीति में राज्य और केंद्र के बीच संतुलन का सवाल कितना संवेदनशील है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा की स्थिति भी दिलचस्प है। एक तरफ वह संसद में बिल गिरने के बावजूद इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में उसे नए नैरेटिव का सामना करना पड़ रहा है। यह विरोधाभास उसके लिए चुनौती बन सकता है। दूसरी ओर विपक्ष, जो इस घटनाक्रम से उत्साहित है, कहीं न कहीं आंतरिक असंतोष और भ्रम का भी शिकार दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह स्पष्ट है कि आने वाले चुनाव केवल नीतियों या वादों पर नहीं बल्कि भावनाओं, पहचान और धारणा की लड़ाई पर आधारित होंगे। परिसीमन का मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक हथियार बन चुका है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में जिस तरह से इसे अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह भारतीय राजनीति की विविधता और जटिलता दोनों को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सबकी नजर चुनावी परिणामों पर है। क्या भाजपा इस बदलती हवा के बावजूद अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी, या विपक्ष की नई रणनीतियां उसे पीछे छोड़ देंगी—यह सवाल अभी खुला है। लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श के नए स्वरूप का भी संकेत देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of</guid>
                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:11:20 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/img_20260417_2100471.jpg"                         length="106218"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परिसीमन 2026 से क्यों चिंतित हैं दक्षिण भारतीय राज्य?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 2026 एक निर्णायक मोड़ के रूप में अंकित होने जा रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के प्रावधानों के अंतर्गत निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया जिसे परिसीमन कहा जाता है वह अब एक राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुकी है। यह प्रक्रिया केवल भौगोलिक सीमाओं के अंकन तक सीमित नहीं है अपितु यह भारतीय संघवाद की आत्मा और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के मूल सिद्धांतों को प्रभावित करने वाली है। वर्तमान परिसीमन विधेयक 2026 ने देश के राजनीतिक मानचित्र को पुनः परिभाषित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176438/why-are-south-indian-states-worried-about-delimitation-2026"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas15.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 2026 एक निर्णायक मोड़ के रूप में अंकित होने जा रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के प्रावधानों के अंतर्गत निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया जिसे परिसीमन कहा जाता है वह अब एक राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुकी है। यह प्रक्रिया केवल भौगोलिक सीमाओं के अंकन तक सीमित नहीं है अपितु यह भारतीय संघवाद की आत्मा और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के मूल सिद्धांतों को प्रभावित करने वाली है। वर्तमान परिसीमन विधेयक 2026 ने देश के राजनीतिक मानचित्र को पुनः परिभाषित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विधेयक के केंद्र में जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण है। पिछले कई दशकों से भारत में लोकसभा की सीटों की संख्या 543 पर स्थिर रही है जिसका आधार 1971 की जनगणना थी। उस समय की जनसंख्या और वर्तमान समय की जनसंख्या के बीच का अंतराल इतना विशाल हो चुका है कि एक सांसद के लिए अपनी विशाल जनता का प्रभावी प्रतिनिधित्व करना कठिन हो गया है। इसी समस्या के समाधान हेतु नए विधेयक में निचले सदन की सीटों की संख्या को बढ़ाकर लगभग 850 करने का प्रस्ताव है। यह विस्तार नए संसद भवन की क्षमता और भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए आवश्यक माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिसीमन की इस यात्रा को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर दृष्टि डालना अनिवार्य है। भारत में 1976 में आपातकाल के दौरान संविधान के 42वें संशोधन के माध्यम से सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगा दी गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य उन राज्यों को सुरक्षा प्रदान करना था जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया था। सरकार का मानना था कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई गईं तो जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्य राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाएंगे। इस रोक को पहले वर्ष 2001 तक और फिर 84वें संशोधन द्वारा वर्ष 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया था। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जबकि यह समय सीमा समाप्त हो रही है सरकार ने इस प्रक्रिया को पुनः सक्रिय करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसे महिला आरक्षण विधेयक के क्रियान्वयन से जोड़ दिया गया है। वर्ष 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के अनुसार संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी हैं। हालांकि इस आरक्षण के प्रभावी होने की पूर्व शर्त परिसीमन की प्रक्रिया का पूर्ण होना है। इस प्रकार परिसीमन अब केवल जनसंख्या का गणित नहीं बल्कि लैंगिक न्याय और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का प्रवेश द्वार भी बन गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विधेयक के प्रस्तुत होते ही देश में एक वैचारिक विभाजन स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। विशेष रूप से दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केरल</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इस प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त कर रहे हैं। इन राज्यों का तर्क अत्यंत सुदृढ़ और तर्कसंगत है। उनका कहना है कि पिछले पांच दशकों में उन्होंने शिक्षा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और परिवार नियोजन के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। इसके परिणामस्वरूप वहां जनसंख्या वृद्धि दर उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में काफी कम रही है। यदि अब सीटों का आवंटन केवल जनसंख्या की संख्या के आधार पर होता है तो इन राज्यों की संसद में हिस्सेदारी वर्तमान की तुलना में कम हो जाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> उदाहरण के लिए वर्तमान में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर अधिक होने के कारण उनकी सीटों में भारी वृद्धि होने की संभावना है। आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटें वर्तमान 80 से बढ़कर 140 से अधिक हो सकती हैं। वहीं दक्षिणी राज्यों की सीटों में भी संख्यात्मक वृद्धि तो होगी किंतु कुल संसद में उनका प्रतिशत हिस्सा घट जाएगा। यह स्थिति दक्षिण के राज्यों को यह संदेश देती है कि उनके द्वारा किए गए विकास और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों का उन्हें राजनीतिक पुरस्कार मिलने के स्थान पर दंड मिल रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह विवाद सत्ता के संतुलन से जुड़ा है। उत्तर भारत के राज्यों में वर्तमान सत्ताधारी दलों की पैठ अधिक गहरी है। विपक्ष का आरोप है कि सीटों के इस नए वितरण से उन दलों को लाभ होगा जिनका आधार उच्च जनसंख्या वाले क्षेत्रों में है। इस प्रकार परिसीमन एक निष्पक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया के स्थान पर राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने का उपकरण बन सकता है। हालांकि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को दूर करने का प्रयास करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी राज्य की वर्तमान सीटों को कम नहीं किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रस्तावित ढांचे के अनुसार यदि कुल सीटें 850 तक पहुंचती हैं तो दक्षिणी राज्यों की कुल सीटें वर्तमान 129 से बढ़कर लगभग 195 हो सकती हैं। सरकार का तर्क है कि जब हर राज्य की सीटों में वृद्धि होगी तो किसी के साथ अन्याय होने का प्रश्न ही नहीं उठता। किंतु विवाद का वास्तविक बिंदु कुल संख्या नहीं बल्कि तुलनात्मक शक्ति है। यदि उत्तर भारत की शक्ति दक्षिण के मुकाबले अधिक तेजी से बढ़ती है तो नीति निर्माण और बजटीय आवंटन में उत्तर का प्रभाव अधिक प्रबल हो जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक मोर्चे पर भी दक्षिणी राज्यों के अपने तर्क हैं। ये राज्य देश के सकल घरेलू उत्पाद में बड़ा योगदान देते हैं और अधिक राजस्व केंद्र को प्रदान करते हैं। उनका मत है कि केवल जनसंख्या को ही प्रतिनिधित्व का आधार मानना आधुनिक शासन व्यवस्था के विरुद्ध है। कुछ क्षेत्रीय नेताओं ने सुझाव दिया है कि परिसीमन के लिए एक मिश्रित मॉडल अपनाया जाना चाहिए जिसमें जनसंख्या के साथ</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ शिक्षा के स्तर</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य संकेतकों और आर्थिक योगदान को भी कुछ महत्व दिया जाए। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करना संवैधानिक रूप से अत्यंत जटिल होगा क्योंकि भारत का लोकतंत्र एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत पर आधारित है। किसी भी मतदाता के वोट का मूल्य उसके क्षेत्र की आर्थिक प्रगति या शिक्षा के आधार पर कम या अधिक नहीं किया जा सकता। इस जटिलता के कारण सरकार के सामने एक ऐसी व्यवस्था बनाने की चुनौती है जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संघीय संतुलन के बीच सामंजस्य बिठा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिसीमन आयोग की कार्यप्रणाली भी इस बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है जिसका गठन केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। इसकी अध्यक्षता सामान्यतः सर्वोच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाती है और इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा संबंधित राज्यों के निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं। आयोग की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि इसके द्वारा जारी किए गए आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। ये आदेश राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून का रूप ले लेते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अपार शक्ति के कारण विपक्ष ने आयोग की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए हैं। उनका कहना है कि आयोग की संरचना में राज्यों का अधिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए ताकि क्षेत्रीय चिंताओं को बेहतर ढंग से सुना जा सके। विधेयक में यह भी प्रावधान है कि संसद यह निश्चित करेगी कि किस वर्ष की जनगणना को आधार बनाया जाए। इससे सरकार को समय और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की शक्ति मिलती है जो आलोचकों के अनुसार राजनीतिक हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विधेयक के दीर्घकालिक परिणामों पर विचार करें तो वर्ष 2029 के आम चुनाव भारत के लिए पूरी तरह से भिन्न होंगे। संसद के भीतर का परिदृश्य बदल जाएगा। बड़ी संख्या में नए सांसदों की उपस्थिति और महिलाओं के लिए आरक्षित 33 प्रतिशत सीटों के साथ भारतीय विधायी ढांचे का चेहरा बदल जाएगा। यह परिवर्तन केवल संख्यात्मक नहीं बल्कि गुणात्मक भी हो सकता है। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से नीति निर्माण में अधिक संवेदनशीलता और सामाजिक विषयों पर अधिक ध्यान दिए जाने की अपेक्षा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु इस उज्ज्वल पक्ष के साथ क्षेत्रीय असंतुलन का काला बादल भी मंडरा रहा है। यदि उत्तर और दक्षिण के बीच का राजनीतिक अंतराल बढ़ता है तो यह भारत की एकता और अखंडता के लिए एक नई चुनौती पेश कर सकता है। संघीय ढांचे में राज्यों का विश्वास बनाए रखना केंद्र की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसके लिए व्यापक परामर्श और संभवतः संविधान के उच्च सदन अर्थात राज्यसभा की शक्तियों में वृद्धि जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है ताकि राज्यों के हितों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कर्षतः परिसीमन विधेयक 2026 केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं है बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के अगले अध्याय की पटकथा है। इसमें एक ओर जनसंख्या के आधार पर न्यायोचित प्रतिनिधित्व देने की आकांक्षा है तो दूसरी ओर संघीय संतुलन बिगड़ने का वास्तविक भय है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संख्या का महत्व सर्वोपरि है परंतु विविधतापूर्ण राष्ट्र में सभी क्षेत्रों की भावनाओं का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। आने वाले वर्षों में यह देखना रोचक होगा कि भारत सरकार और राजनीतिक दल इस संवैधानिक अनिवार्यता और क्षेत्रीय न्याय के बीच कैसे संतुलन साधते हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंततः सफलता उसी मॉडल में निहित होगी जो भारत के प्रत्येक नागरिक को यह अनुभव कराए कि संसद में उसकी आवाज और उसके राज्य का महत्व अक्षुण्ण है चाहे वह भौगोलिक रूप से कहीं भी स्थित हो। यह विधेयक भारतीय राजनीति की परिपक्वता की परीक्षा है जो यह तय करेगा कि आने वाले दशकों में देश का संघीय ढांचा कितना सुदृढ़ और समावेशी होगा। 2026 का यह मोड़ भारत के भविष्य की दिशा निर्धारित करने वाला एक ऐतिहासिक क्षण सिद्ध होने जा रहा है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176438/why-are-south-indian-states-worried-about-delimitation-2026</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/176438/why-are-south-indian-states-worried-about-delimitation-2026</guid>
                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:00:15 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/hindi-divas15.jpg"                         length="137237"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        