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                <title>South vs North India politics - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>South vs North India politics RSS Feed</description>
                
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                <title>परिसीमन 2026 से क्यों चिंतित हैं दक्षिण भारतीय राज्य?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 2026 एक निर्णायक मोड़ के रूप में अंकित होने जा रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के प्रावधानों के अंतर्गत निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया जिसे परिसीमन कहा जाता है वह अब एक राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुकी है। यह प्रक्रिया केवल भौगोलिक सीमाओं के अंकन तक सीमित नहीं है अपितु यह भारतीय संघवाद की आत्मा और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के मूल सिद्धांतों को प्रभावित करने वाली है। वर्तमान परिसीमन विधेयक 2026 ने देश के राजनीतिक मानचित्र को पुनः परिभाषित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176438/why-are-south-indian-states-worried-about-delimitation-2026"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas15.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 2026 एक निर्णायक मोड़ के रूप में अंकित होने जा रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के प्रावधानों के अंतर्गत निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया जिसे परिसीमन कहा जाता है वह अब एक राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुकी है। यह प्रक्रिया केवल भौगोलिक सीमाओं के अंकन तक सीमित नहीं है अपितु यह भारतीय संघवाद की आत्मा और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के मूल सिद्धांतों को प्रभावित करने वाली है। वर्तमान परिसीमन विधेयक 2026 ने देश के राजनीतिक मानचित्र को पुनः परिभाषित करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस विधेयक के केंद्र में जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण है। पिछले कई दशकों से भारत में लोकसभा की सीटों की संख्या 543 पर स्थिर रही है जिसका आधार 1971 की जनगणना थी। उस समय की जनसंख्या और वर्तमान समय की जनसंख्या के बीच का अंतराल इतना विशाल हो चुका है कि एक सांसद के लिए अपनी विशाल जनता का प्रभावी प्रतिनिधित्व करना कठिन हो गया है। इसी समस्या के समाधान हेतु नए विधेयक में निचले सदन की सीटों की संख्या को बढ़ाकर लगभग 850 करने का प्रस्ताव है। यह विस्तार नए संसद भवन की क्षमता और भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए आवश्यक माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिसीमन की इस यात्रा को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर दृष्टि डालना अनिवार्य है। भारत में 1976 में आपातकाल के दौरान संविधान के 42वें संशोधन के माध्यम से सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगा दी गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य उन राज्यों को सुरक्षा प्रदान करना था जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक लागू किया था। सरकार का मानना था कि यदि केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ाई गईं तो जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्य राजनीतिक रूप से कमजोर हो जाएंगे। इस रोक को पहले वर्ष 2001 तक और फिर 84वें संशोधन द्वारा वर्ष 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया था। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब जबकि यह समय सीमा समाप्त हो रही है सरकार ने इस प्रक्रिया को पुनः सक्रिय करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय इसलिए भी अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसे महिला आरक्षण विधेयक के क्रियान्वयन से जोड़ दिया गया है। वर्ष 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के अनुसार संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी हैं। हालांकि इस आरक्षण के प्रभावी होने की पूर्व शर्त परिसीमन की प्रक्रिया का पूर्ण होना है। इस प्रकार परिसीमन अब केवल जनसंख्या का गणित नहीं बल्कि लैंगिक न्याय और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का प्रवेश द्वार भी बन गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विधेयक के प्रस्तुत होते ही देश में एक वैचारिक विभाजन स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। विशेष रूप से दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">केरल</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कर्नाटक</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इस प्रक्रिया को लेकर गंभीर चिंताएं व्यक्त कर रहे हैं। इन राज्यों का तर्क अत्यंत सुदृढ़ और तर्कसंगत है। उनका कहना है कि पिछले पांच दशकों में उन्होंने शिक्षा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और परिवार नियोजन के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। इसके परिणामस्वरूप वहां जनसंख्या वृद्धि दर उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में काफी कम रही है। यदि अब सीटों का आवंटन केवल जनसंख्या की संख्या के आधार पर होता है तो इन राज्यों की संसद में हिस्सेदारी वर्तमान की तुलना में कम हो जाएगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> उदाहरण के लिए वर्तमान में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर अधिक होने के कारण उनकी सीटों में भारी वृद्धि होने की संभावना है। आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटें वर्तमान 80 से बढ़कर 140 से अधिक हो सकती हैं। वहीं दक्षिणी राज्यों की सीटों में भी संख्यात्मक वृद्धि तो होगी किंतु कुल संसद में उनका प्रतिशत हिस्सा घट जाएगा। यह स्थिति दक्षिण के राज्यों को यह संदेश देती है कि उनके द्वारा किए गए विकास और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों का उन्हें राजनीतिक पुरस्कार मिलने के स्थान पर दंड मिल रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह विवाद सत्ता के संतुलन से जुड़ा है। उत्तर भारत के राज्यों में वर्तमान सत्ताधारी दलों की पैठ अधिक गहरी है। विपक्ष का आरोप है कि सीटों के इस नए वितरण से उन दलों को लाभ होगा जिनका आधार उच्च जनसंख्या वाले क्षेत्रों में है। इस प्रकार परिसीमन एक निष्पक्ष प्रशासनिक प्रक्रिया के स्थान पर राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने का उपकरण बन सकता है। हालांकि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को दूर करने का प्रयास करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी राज्य की वर्तमान सीटों को कम नहीं किया जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> प्रस्तावित ढांचे के अनुसार यदि कुल सीटें 850 तक पहुंचती हैं तो दक्षिणी राज्यों की कुल सीटें वर्तमान 129 से बढ़कर लगभग 195 हो सकती हैं। सरकार का तर्क है कि जब हर राज्य की सीटों में वृद्धि होगी तो किसी के साथ अन्याय होने का प्रश्न ही नहीं उठता। किंतु विवाद का वास्तविक बिंदु कुल संख्या नहीं बल्कि तुलनात्मक शक्ति है। यदि उत्तर भारत की शक्ति दक्षिण के मुकाबले अधिक तेजी से बढ़ती है तो नीति निर्माण और बजटीय आवंटन में उत्तर का प्रभाव अधिक प्रबल हो जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक मोर्चे पर भी दक्षिणी राज्यों के अपने तर्क हैं। ये राज्य देश के सकल घरेलू उत्पाद में बड़ा योगदान देते हैं और अधिक राजस्व केंद्र को प्रदान करते हैं। उनका मत है कि केवल जनसंख्या को ही प्रतिनिधित्व का आधार मानना आधुनिक शासन व्यवस्था के विरुद्ध है। कुछ क्षेत्रीय नेताओं ने सुझाव दिया है कि परिसीमन के लिए एक मिश्रित मॉडल अपनाया जाना चाहिए जिसमें जनसंख्या के साथ</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">-</span><span lang="hi" xml:lang="hi">साथ शिक्षा के स्तर</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य संकेतकों और आर्थिक योगदान को भी कुछ महत्व दिया जाए। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा करना संवैधानिक रूप से अत्यंत जटिल होगा क्योंकि भारत का लोकतंत्र एक व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत पर आधारित है। किसी भी मतदाता के वोट का मूल्य उसके क्षेत्र की आर्थिक प्रगति या शिक्षा के आधार पर कम या अधिक नहीं किया जा सकता। इस जटिलता के कारण सरकार के सामने एक ऐसी व्यवस्था बनाने की चुनौती है जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संघीय संतुलन के बीच सामंजस्य बिठा सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिसीमन आयोग की कार्यप्रणाली भी इस बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है जिसका गठन केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। इसकी अध्यक्षता सामान्यतः सर्वोच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश द्वारा की जाती है और इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा संबंधित राज्यों के निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं। आयोग की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि इसके द्वारा जारी किए गए आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। ये आदेश राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून का रूप ले लेते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अपार शक्ति के कारण विपक्ष ने आयोग की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए हैं। उनका कहना है कि आयोग की संरचना में राज्यों का अधिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए ताकि क्षेत्रीय चिंताओं को बेहतर ढंग से सुना जा सके। विधेयक में यह भी प्रावधान है कि संसद यह निश्चित करेगी कि किस वर्ष की जनगणना को आधार बनाया जाए। इससे सरकार को समय और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की शक्ति मिलती है जो आलोचकों के अनुसार राजनीतिक हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विधेयक के दीर्घकालिक परिणामों पर विचार करें तो वर्ष 2029 के आम चुनाव भारत के लिए पूरी तरह से भिन्न होंगे। संसद के भीतर का परिदृश्य बदल जाएगा। बड़ी संख्या में नए सांसदों की उपस्थिति और महिलाओं के लिए आरक्षित 33 प्रतिशत सीटों के साथ भारतीय विधायी ढांचे का चेहरा बदल जाएगा। यह परिवर्तन केवल संख्यात्मक नहीं बल्कि गुणात्मक भी हो सकता है। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से नीति निर्माण में अधिक संवेदनशीलता और सामाजिक विषयों पर अधिक ध्यान दिए जाने की अपेक्षा है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किंतु इस उज्ज्वल पक्ष के साथ क्षेत्रीय असंतुलन का काला बादल भी मंडरा रहा है। यदि उत्तर और दक्षिण के बीच का राजनीतिक अंतराल बढ़ता है तो यह भारत की एकता और अखंडता के लिए एक नई चुनौती पेश कर सकता है। संघीय ढांचे में राज्यों का विश्वास बनाए रखना केंद्र की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसके लिए व्यापक परामर्श और संभवतः संविधान के उच्च सदन अर्थात राज्यसभा की शक्तियों में वृद्धि जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है ताकि राज्यों के हितों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कर्षतः परिसीमन विधेयक 2026 केवल एक प्रशासनिक कवायद नहीं है बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के अगले अध्याय की पटकथा है। इसमें एक ओर जनसंख्या के आधार पर न्यायोचित प्रतिनिधित्व देने की आकांक्षा है तो दूसरी ओर संघीय संतुलन बिगड़ने का वास्तविक भय है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संख्या का महत्व सर्वोपरि है परंतु विविधतापूर्ण राष्ट्र में सभी क्षेत्रों की भावनाओं का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। आने वाले वर्षों में यह देखना रोचक होगा कि भारत सरकार और राजनीतिक दल इस संवैधानिक अनिवार्यता और क्षेत्रीय न्याय के बीच कैसे संतुलन साधते हैं। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंततः सफलता उसी मॉडल में निहित होगी जो भारत के प्रत्येक नागरिक को यह अनुभव कराए कि संसद में उसकी आवाज और उसके राज्य का महत्व अक्षुण्ण है चाहे वह भौगोलिक रूप से कहीं भी स्थित हो। यह विधेयक भारतीय राजनीति की परिपक्वता की परीक्षा है जो यह तय करेगा कि आने वाले दशकों में देश का संघीय ढांचा कितना सुदृढ़ और समावेशी होगा। 2026 का यह मोड़ भारत के भविष्य की दिशा निर्धारित करने वाला एक ऐतिहासिक क्षण सिद्ध होने जा रहा है।</span></p>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:00:15 +0530</pubDate>
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