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                <title>इतिहास से सबक और भविष्य के प्रति आशावान होने का सार्थक समय</title>
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                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">प्रत्येक परिवर्तन अपने साथ-साथ बड़े तथा महान अवसर लेकर आता है।  मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने जिस "आई हैव ए ड्रीम "की कल्पना की थी वह जीवन के नए अवसर की कल्पना थी। महात्मा गांधी जी ने भी जिस स्वराज की कल्पना अपने मन में की थी वह भी उसी नए अवसर की खोज में उसकी तरफ छेड़ा गया एक अभियान था । बराक ओबामा ने भी कहा था "यस वी कैन" ने भी बड़े परिवर्तन को सच्चाई के अवसर की तलाश थी। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी मनुष्य से देवत्व की यात्रा का वर्णन किया था।  समय परिवर्तन के</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/154145/lesson-from-history-and-meaningful-time-to-be-hopeful-towards"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-08/hindi-divas11.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रत्येक परिवर्तन अपने साथ-साथ बड़े तथा महान अवसर लेकर आता है।  मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने जिस "आई हैव ए ड्रीम "की कल्पना की थी वह जीवन के नए अवसर की कल्पना थी। महात्मा गांधी जी ने भी जिस स्वराज की कल्पना अपने मन में की थी वह भी उसी नए अवसर की खोज में उसकी तरफ छेड़ा गया एक अभियान था । बराक ओबामा ने भी कहा था "यस वी कैन" ने भी बड़े परिवर्तन को सच्चाई के अवसर की तलाश थी। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भी मनुष्य से देवत्व की यात्रा का वर्णन किया था।  समय परिवर्तन के मुख्य द्वार से होकर गुजरता कर प्रत्येक परिवर्तन अपने साथ-साथ बड़े तथा अर्थपूर्ण अवसर लेकर आता है।  मनुष्य के जीवन में प्रगति विकास और परिवर्तन ही जीवन का असली गुंजन है, और यही विजय यात्रा की ओर मनुष्य, समाज तथा देश को अग्रसर करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अवसर का जिसने भी सदुपयोग कर लाभ उठाया है और अपने अनुकूल बनाने का ऊर्जा के साथ प्रयास किया है वह विश्व विजेता बनने में सक्षम हुआ जीवन की संपूर्ण यात्रा में व्यक्ति को अपने जीवन में संघर्ष करना पड़ता है और तमाम कठिनाइयों को तोड़कर आगे की ओर अग्रसर होना पड़ता है। अवसर के मार्ग को खोलकर बड़ी विजय की महायात्रा प्राप्त हो सकती है। मूलतः परिवर्तन जीवन की एक मूलभूत विशेषता और एक जरूरी सत्य है बल्कि बेहतर कल तथा विकास के प्रत्येक सपने का हल भी होता है। परिवर्तन में अवसर तलाशने की यात्रा का अस्तित्व ही एक विजय गीत का गान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परिवर्तन की इस महा प्रक्रिया का साइकल स्वयं इस बात का साक्ष्य है की परिवर्तन खुद ही नवीनता की एक बड़ी खोज है और परिवर्तन का सीधा अर्थ है जड़ता का नाश है। जो हमारी पुरानी परंपराएं जड़ तथा जंगम हो चुकी है या जो स्वयं को नई परिस्थितियों के अनुसार ढाल पाने में सक्षम नहीं है उसका अंत ही परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु होता है और इसका अंत एक बड़े शून्य को जन्म देता है और यह नवीन तथा प्राचीनता के बीच की एक समन्वय की कड़ी होती हैं। और इसमें वह सारे और अवसर निहित होते हैं जिनका चयन ही भविष्य की बुनियाद तय करता है और इस शून्य के काल में किया गया प्रयत्न और प्रयास भविष्य के बड़े भाग्य को तय करता है और किसी समय चक्र के बार-बार परिवर्तन को ही जीवन की संज्ञा दी गई है। गीता में कृष्ण ने इस परिवर्तन वह उसमें अंतर्निहित मौके की तलाश करने का संकेत दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मानवीय इतिहास में भी यदि नजर दौड़ाई तो पहला परिवर्तन 1215 में नागरिक अधिकार पत्र यानी मैग्नाकार्टा की प्राप्ति हुई थी। 12वीं और 13वीं सदी का समय सामंती प्रथा व क्रूरता से भरा समय था जहां मनुष्य एक साधन मात्र था। और उसी समय जब सदियों से भरी जनता को ललकारते हुए परिवर्तन का महत्व तथा सपना मनुष्य के दिमाग में पैदा हुआ,परिवर्तन की इस घड़ी ने एक अवसर को जन्म दिया था और उसी अवसर का उपयोग करते हुए मानव को नागरिक अधिकार पत्र प्रदान किया था। अब मनुष्य स्वयं का कर्ताधर्ता था और उसी नागरिक अधिकार पत्र में किए उल्लेख का परिणाम है कि आज हर समाज को सभ्यता का प्रमाण उसी अधिकार पत्र के आधार पर दिया जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बीसवीं सदी ने जड़ता पर चोट की, मशीनों के शोर, हथियारों की होड़ के बीच कैलिफोर्निया क्रांति ने विश्व को सूचना प्रौद्योगिकी का उपहार दिया था। इस बड़े परिवर्तन ने संपूर्ण मानव समाज को एक बड़ा अवसर प्रदान किया पूरी कार्यप्रणाली को सरल बनाने और संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को पारदर्शी बनाने का उपहार भी दिया था। यह तो तय है कि जब जब जनता ने समाज की गति को रोकने का प्रयास किया तब मानवीय उद्यम और साहस ने उसे चुनौती दी और नए नए अवसरों की तलाश कर उसका नवीन परिवर्तन का सकारात्मक उपयोग किया। एक प्रसिद्ध कहावत है परिवर्तन के अलावा कुछ भी स्थाई नहीं है यह प्रकृति का एक स्थाई और व्यवस्था जनक है कि परिवर्तनशील होना जिवंतता और संघर्ष का प्रमाण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिस व्यक्ति, समाज तथा देश में स्थायित्व जाता है वह विकास के विरुद्ध होने लगता है। परिवर्तन सदैव धीरे-धीरे होते हैं यह अचानक नहीं होते प्राकृतिक व्यवस्था अनुसार हर परिवर्तन का एक बड़ा उद्देश्य होता है हर परिवर्तन अपने साथ एक बड़ा अवसर लेकर आता है यह अवसर नवीन लक्ष्यों के आपूर्ति का और उद्देश्य की ओर बढ़ती आकांक्षा को नवीन सृष्टि के निर्माण को संभव बनाने का प्रयास होता है। परिवर्तन का चक्र स्वयं इस बात का प्रमाण है कि परिवर्तन स्वयं की नवीनता का एक बड़ा स्रोत है। बढ़ती जनसंख्या के लिए उत्पादन की ना तो मात्रा पूरी हो पा रही थी और नाही उत्पादन उसकी गति में भी विराम लग गया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">व्यक्ति, समाज तथा देश के पास पूंजी होने के बावजूद उसके उपयोग का ना तो सामर्थ्य था नहीं उतनी बौद्धिक क्षमता,उसी क्षण विचारों ने परिवर्तन लाना शुरू किया मानव की बुद्धि ने एक बड़ा परिवर्तन लाकर मशीनों का इजाद किया फल स्वरूप कार्य करने की गति को अवसर मिला इस अवसर के साथ उत्पादन मैं भी वृद्धि हुई। मानव समाज ने इस परिवर्तन तथा नए अवसर की खोज के साथ नई नई वस्तुओं का अंबार लगा और संपूर्ण विश्व में औद्योगिक क्रांति का उदय हुआ। यही औद्योगिक क्रांति विश्व के लिए विकास की नई गाथा है और सफलता के साथ एक नए युग का परिवर्तन भी हुआ है। स्थायित्व के विरुद्ध नए अवसर की तलाश थी मनुष्य के जीवन के नवीन पायदान ओं का आगाज करती है और जीवन परिवर्तनशील होकर नए युग की ओर प्रशस्त होता है।</div>]]>
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                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Sep 2025 17:21:10 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Swatantra Prabhat Reporters]]>
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                <title>अपनी जेब के बजाय औरंगजेब पर रार</title>
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                        <![CDATA[<p>हिन्दुस्तानी यानि सनातनी बेमिसाल होते हैं .आजकल हम हिन्दुस्तानी अपनी लगातार काटी जा रही जेब की फ़िक्र करने के बजाय उस औरंगजेब  को लेकर आपस में कट -मर रहे हैं जिसे हम में से किसी ने भी देखा नहीं. देखते भी कैसे ,क्योंकि  उसे दुनिया से गए सैकड़ों साल हो चुके हैं .आज की राजनीति ने औरंगजेब को एक बार फिर ज़िंदा कर दिया है .अब औरंगजेब सत्ताप्रतिष्ठांन  और उससे बाबस्ता दलों और संगठनों के काम आ रहा है .कोई औरंगजेब के कसीदे पढ़ रहाहै तो कोई उसकी क्रूरता के किस्से सुना-सुनाकर हिंदुस्तान में मौजूद हर मुसलमान को औरंगजेब बनाये</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/149340/raz-on-aurangzeb-instead-of-your-pocket"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2025-03/mughal-story-why-mughal-emperor-aurangzeb-was-buried-in-aurangabad-not-delhi.webp" alt=""></a><br /><p>हिन्दुस्तानी यानि सनातनी बेमिसाल होते हैं .आजकल हम हिन्दुस्तानी अपनी लगातार काटी जा रही जेब की फ़िक्र करने के बजाय उस औरंगजेब  को लेकर आपस में कट -मर रहे हैं जिसे हम में से किसी ने भी देखा नहीं. देखते भी कैसे ,क्योंकि  उसे दुनिया से गए सैकड़ों साल हो चुके हैं .आज की राजनीति ने औरंगजेब को एक बार फिर ज़िंदा कर दिया है .अब औरंगजेब सत्ताप्रतिष्ठांन  और उससे बाबस्ता दलों और संगठनों के काम आ रहा है .कोई औरंगजेब के कसीदे पढ़ रहाहै तो कोई उसकी क्रूरता के किस्से सुना-सुनाकर हिंदुस्तान में मौजूद हर मुसलमान को औरंगजेब बनाये दे रहा है ।</p>
<p>यकीनन बात हैरानी की है ,लेकिन हिंदुस्तान में बहुसंख्यक लोग हैं जो औरंगजेब के मुद्दे पर आपस में जूझने की वकालत कर रहे हैं .बहुत से कूढ़ मगज हैं जो आजकल औरंगजेब की तस्वीरें सार्वजनिक गुसलखानों और पाखानों पर लगाकर अपने राष्ट्रवादी होने का प्रमाण दे रहे हैं .ये सब देखकर औरंगजेब जहाँ भी होगा हंस ही रहा होगा . हिन्दू तालिबानियों  ने औरंगजेब को गुसलखानों और पखानों से लेकर फ़िल्मी दुनिया के जरिये एक बार फर जिन्दा कर दिया है .आजकल वो ' छावा ' फिल्म का लोकप्रिय खलनायक है .दर्शक औरंगजेब की भूमिका करने वाले अक्षय खन्ना के अभिनय की भूरि  -भूरि   प्रशंसा कर रहे हैं।</p>
<p>आप मानें या न माने किन्तु ये सच है कि आज की सियासत में भी औरंगजेबों की कमी नहीं है .मैंने  तो औरंगजेब को देखा नहीं, किताबें के जरिये ही जाना है .इसलिए मैं उसके बारे में आधिकारिक रूप से कुछ कहने का अधिकारी नहीं हूँ ,किन्तु जो औरंगजेब को ज़िंदा कर सियासत  कर रहे हैं वे शायद उसके बारे में मुझसे ज्यादा जानकारी रखते हैं .न रखते होते तो औरंगजेब को आज की सियासत का औजार भी नहीं बनाते .अब औरंगजेब ज़िंदा हो ही गया है तो रोजाना कटती अपनी जेब की चर्चा कौन करे ? जेब कतरी की चर्चा न हो ये भी औरंगजेब को जिन्दा करने की एक वजह हो सकती है।</p>
<p>आज की तारीख में लोग जितना देश के प्रधानमंत्री के बारे में या लोकसभा में विपक्ष के नेता के बारे में या अपने खुद के पुरखों के बारे में नहीं जानते जितना की 318 साल पहले 3 मार्च के रोज दिवंगत  हुए औरंगजेब के बारे में जानते हैं .औरंगजेब के बारे में जिसके पास जो भी जानकारी है वो इतिहास की किताबों से ही आयी है .अब आज की सरकार और आज की सरकार चलने वाली भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठन कहते हैं कि औरंगजेब के बारे में इतिहास सच नहीं बताता .मुमकिन है कि ऐसा हो भी और न भी हो ,लेकिन सवाल ये है कि तीन सौ साल से भी ज्यादा पुराने किरदार की  आज की सियासत में क्या जगह है ? कौन से मुकाम पर हमें औरंगजेब कोई जरूरत पड़ गयी ?</p>
<p>आप यकीन मानिये कि औरंगजेब न मणिपुर की समस्या सुलझाने के काम आ सकते हैं और न रूस और यूक्रेन के बीच  की जंग समाप्त करने में कोई भूमिका अदा कर सकते हैं. वे दो गज जमीन के नीचे  318 साल से खामोशी के साथ सोये पड़े हैं ,फिर उन्हें क्यों परेशान किया जा रहा है  ? देश के अल्पसंख्यक मुसलमानों को लज्जित करने के लिए .उन्हें देशद्रोही बताने के लिए ? दुनिया में कितने देशों में गड़े मुर्दे उखाड़कर राजनीति की जाती है मुझे नहीं मालूम लेकिन मैं इतना जानता हूँ कि आजकल देश एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जिसमें केवल और केवल एक उन्माद है .ऐसा उन्माद जिसकी न आँखें हैं और न कान .उसे न किसी की बात सुनाई देती है और न हकीकत दिखाई देती है ।</p>
<p>अब सुना है कि औरंगजेब को खलनायक मानने वाले लोग पूरे  मुल्क के मुसलमानों को भी औरंगजेब मानने लगे हैं. वे आने वाली होली पर मुसलमानों को अपने पास फटकने भी नहीं देंगे. गले लगाने और रंग-अबीर का इस्तेमाल करना तो दूर है .ये औरंगजेबी घृणा का ज्वार मथुरा से उठा है उसी मथुरा से जहाँ रसखान कृष्ण भक्ति में सराबोर रहा करते थे .ये गुबार देश की उस गंगा जमुनी साझा विरासत को फूंक से उड़ा देने की कोशिश है .आम मुसलमान को औरंगजेब मानने वाले हिन्दू तालिबानियों की नजर में हिंदुस्तान में कोई गंगा-जमुनी संस्कृति थी ही नहीं ,ये तो अर्बन नक्सलियों द्वारा पैदा किया गया एक मिथक है।</p>
<p>इतिहास एक ऐसी चीज है जो बदली नहीं जा सकती. इतिहास के जरिये आप अपना वर्तमान और भविष्य बना और बिगाड़  सकते हैं ,लेकिन इतिहास का बाल -बांका नहीं कर सकते,फिर चाहे वो इतिहास किसी अंग्रेज ने लिखा हो,किसी मुग़ल ने लिखा हो या किसी भटियारे ने . इतिहास को बदलने की कोशिश जो लोग करते हैं उन्हें इतिहास कूड़ेदान में डाल देता है .दुर्भाग्य ये है कि हम न वर्तमान को लेकर फिक्रमंद हैं और न भविष्य को लेकर .हमारी परेशानी वो इतिहास है जो अब इतिहास हो चुका है .वो हमारा कुछ भी भला-बुरा नहीं कर सकता .हाँ हम जरूर इतिहास को जेरे बहस लेकर अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं .मुमकिन है कि आप मेरी बात से इत्तेफाक न रखते हों लेकिन क्या एक भी तर्क है जो आप इस पक्ष में दे सकें ? क्या आप बता सकते हैं कि गुसलखानों और पाखानों  पर औरंगजेब की तस्वीरें लगाकर हम औरंगजेब का कुछ बिगाड़ लेंगे ?</p>
<p>आज की सियासत में कोई औरंगजेब नहीं हो सकता. कोई औरंगजेब की तरह मुल्क पर आधी सदी तक राज नहीं कर सकता ,क्योंकि अब हर पांच साल में चुनाव होते हैं .आज यदि औरंगजेब भी होता तो उसे भी चुनाव लड़ना पड़ता और मुमकिन था कि उसे भी एके-दो चुनाव के बाद जनता ख़ारिज कर देती .औरंगजेब   खुशनसीब  था  जो  उसके  जमाने  में  आरएसएस और भाजपा नहीं थी,यदि  होती तो उसे कभी का देश निकाला दे चुकी होती .संघ के और भाजपा के रहते देश किसी सूरत में गुलाम हो ही नहीं सकता था .लेकिन हम सब बदनसीब हैं कि हमारे दौर में औरंगजेब न सही लेकिन उसकी मानसिकता के लोग हमारे बीच हैं।</p>
<p>मुहिउद्दीन मोहम्मद कहें या  औरंगज़ेब या आलमगीर यदि चाहता तो पचास साल के शासन में देश को हिन्दू विहीन कर देता लेकिन उसने ऐसा नहीं चाहा. उसकी चाहत आज के शासकों जैसी शायद नहीं रही होगी. जो देश को कांग्रेस विहीन ,मुसलमान विहीन करना चाहते हैं .उसने हिन्दुओं पर भी राज किया और मुसलमानों पर भी ,लेकिन आज के शासक केवल हिन्दू पदशाही चाहते हैं. वे न मुसलमानों पर राज करना चाहते हैं और न उन्हें राजसत्ता में भागीदारी करने देना चाहते हैं ,इसीलिए एक-एक कर विधानसभाओं से लेकर संसद तक में उनकी सहभागिता  को कम करते जा रहे हैं ,औरंगजेब को छोड़िये जैसे अकबर के दरबार में दिखावे के लिए जो नवरत्न थे वैसे ही आज की सरकार में दिखावे के लिए भी एक मुसलमान न संसद है और न मंत्री .अब आप समझ सकते हैं की औरंगजेब कौन है ?</p>
<p>मेरे अवचेतन में भी औरंगजेब की वही क्रूर  छवि  है जो आम हिन्दुस्तानी,आम सनातनी,आम कांग्रेसी ,आम भाजपाई के जेहन में है ,लेकिन मैं औरंगजेब को लेकर आज अपनी जेब की दुर्दशा को नहीं भुला सकता .मेरी या आपकी जेब किसी औरंगजेब ने नहीं काटी. हमारी जेब हमारी सरकार काट रही है ,हालाँकि हमारे मुखिया औरंगजेब नहीं हैं लेकिन वे और उनके कारनामें औरंगजेब जैसे जरूर नजर आ रहे हैं .इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि औरंगजेब को भाड़ में जाने दीजिये. देश के हर मुसलमान को औरंगजेब मत समझिये .मुसलमान को लेकर इतनी नफरत पैदा मत कीजिये की एक और विभाजन की त्रासदी से इस खूबसूरत मुल्क को दो -चार होना पड़े ।</p>]]>
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                                                            <category>संपादकीय</category>
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                <pubDate>Tue, 04 Mar 2025 15:18:13 +0530</pubDate>
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                <title>हमने सुनी कहानी.....इतिहास की ........&quot;हाड़ी-रानी&quot;</title>
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                        <![CDATA[Anand Vedanti Ayodhya ]]>
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                        <![CDATA[<br /><p><br />"सिसोदिया कुलभूषण, क्षत्रिय शिरोमणि महाराणा राजसिंह को रूपनगर की राजकुमारी का प्रणाम। महाराज को विदित हो कि मुगल औरंगजेब ने मुझसे विवाह का आदेश भेजा है। आप वर्तमान समय में क्षत्रियों के सर्वमान्य नायक हैं। आप बताएं, क्या पवित्र कुल की यह कन्या उस मलेच्छ का वरण करे? क्या एक राजहंसिनी एक गिद्ध के साथ जाए?</p>
<p><br />महाराज! मैं आपसे अपने पाणिग्रहण का निवेदन करती हूँ। मुझे स्वीकार करना या अस्वीकार करना आपके ऊपर है, पर मैंने आपको पति रूप में स्वीकार कर लिया है। अब मेरी रक्षा का भार आपके ऊपर है। आप यदि समय से मेरी रक्षा के लिए न आये तो मुझे आत्महत्या करनी होगी। अब आपकी...."</p>
<p><br />     मेवाड़ की राजसभा में रूपनगर के राजपुरोहित ने जब पत्र को पढ़ कर समाप्त किया तो जाने कैसे सभासदों की कमर में बंधी सैकड़ों तलवारें खनखना उठीं।<br />     महाराज राजसिंह अब प्रौढ़ हो चुके थे। अब विवाह की न आयु बची थी न इच्छा, किन्तु राजकुमारी के निवेदन को अस्वीकार करना भी सम्भव नहीं था। वह प्रत्येक निर्बल की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने वाले राजपूतों की सभा थी। वह अपनी प्रतिष्ठा के लिए सैकड़ों बार शीश चढ़ाने वाले क्षत्रियों की सभा थी। फिर एक क्षत्रिय बालिका के इस समर्पण भरे निवेदन को अस्वीकार करना कहाँ सम्भव था! पर विवाह...? महाराणा चिंतित हुए।<br />      महाराणा मौन थे पर राजसभा मुखर थी। सब ने सामूहिक स्वर में कहा, "राजकुमारी की प्रतिष्ठा की रक्षा करनी ही होगी महाराज! अन्यथा यह राजसभा भविष्य के सामने सदैव अपराधी बनी कायरों की भाँती खड़ी रहेगी। हमें रूपनगर कूच करना ही होगा।<br />      महाराणा ने कुछ देर सोचने के बाद कहा, "हम सभासदों की भावना का सम्मान करते हैं। राजकुमारी की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है, और हम अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटेंगे। राजकुमारी की रक्षा के लिए आगे आने का सीधा अर्थ है औरंगजेब से युद्ध करना, सो सभी सरदारों को युद्ध के लिए तैयार होने का सन्देश भेज दिया जाय। हम कल ही रूपनगर के लिए कूच करेंगे।<br />       महाराणा रूपनगर के लिए निकले, और इधर औरंगजेब की सेना उदयपुर के लिए निकली। युद्ध अब अवश्यम्भावी था। <br />       सलूम्बर के सरदार रतन सिंह चुण्डावत के यहाँ जब महाराणा का संदेश पहुँचा, तब रतन सिंह घर की स्त्रियों के बीच नवविवाहिता पत्नी के साथ बैठे विवाह के बाद चलने वाले मनोरंजक खेल खेल रहे थे। उनके विवाह को अभी कुल छह दिन हुए थे। उन्होंने जब महाराणा का सन्देश पढ़ा तो काँप उठे। औरंगजेब से युद्ध का अर्थ आत्मोत्सर्ग था, यह वे खूब समझ रहे थे। खेल रुक गया, स्त्रियाँ अपने-अपने कक्षों में चली गईं। सरदार रतन सिंह की आँखों के आगे पत्नी का सुंदर मुखड़ा नाचने लगा। उनकी पत्नी बूंदी के हाड़ा सरदारों की बेटी थी, अद्भुत सौंदर्य की मालकिन...<br />       प्रातः काल मे मेघों की ओट में छिपे सूर्य की उलझी हुई किरणों जैसी सुंदर केशराशि, पूर्णिमा के चन्द्र जैसा चमकता ललाट, दही से भरे मिट्टी के कलशों जैसे कपोल, अरुई के पत्ते पर ठहरी जल की दो बड़ी-बड़ी बूंदों सी आँखे, और उनकी रक्षा को खड़ी आल्हा और ऊदल की दो तलवारों सी भौहें, प्रयागराज में गले मिल रही गङ्गा-यमुना की धाराओं की तरह लिपटे दो अधर, नाचते चाक पर कुम्हार के हाथ में खेलती कच्ची सुराही सी गर्दन... ईश्वर ने हाड़ी रानी को जैसे पूरी श्रद्धा से बनाया था। सरदार उन्हें भूल कर युद्ध को कैसे जाता?<br />       रतन सिंह ने दूत को विश्राम करने के लिए कहा और पत्नी के कक्ष में आये। सप्ताह भर पूर्व वधु बन कर आई हाड़ी रानी से महाराणा का संदेश बताते समय बार-बार काँप उठते थे रतन सिंह, पर रानी के चेहरे की चमक बढ़ती जाती थी। पूरा सन्देश सुनने के बार सोलह वर्ष की हाड़ा राजकुमारी ने कहा, " किसी क्षत्राणी के लिए सबसे सौभाग्य का दिन वही होता है जब वह अपने हाथों से अपने पति के मस्तक पर तिलक लगा कर उन्हें युद्ध भूमि में भेजती है। मैं सौभाग्यशाली हूँ जो विवाह के सप्ताह भर के अंदर ही मुझे यह महान अवसर प्राप्त हो रहा है। निकलने की तैयारी कीजिये सरदार! मैं यहाँ आपकी विजय के लिए प्रार्थना और आपकी वापसी की प्रतीक्षा करूंगी।"<br />       रतन सिंह ने उदास शब्दों में कहा, "आपको छोड़ कर जाने की इच्छा नहीं हो रही है।युद्ध क्षेत्र में भी आपकी बड़ी याद आएगी! सोचता हूँ, मेरे बिना आप कैसे रहेंगी।"<br />       रानी का मस्तक गर्व से चमक उठा था। कहा," मेरी चिन्ता न कीजिये स्वामी! अपने कर्तव्य की ओर देखिये। मैं वैसे ही रहूंगी जैसे अन्य योद्धाओं की पत्नियाँ रहेंगी। और फिर कितने दिनों की बात ही है, युद्ध के बाद तो पुनः आप मेरे ही संग होंगे न!"<br />       रतन सिंह ने कोई उत्तर नहीं दिया। वे अपनी टुकड़ी को निर्देश देने और युद्ध के लिए  कूच करने की तैयारी में लग गए। अगली सुबह प्रस्थान के समय जब रानी ने उन्हें तिलक लगाया तो रतन सिंह ने अनायास ही पत्नी को गले लगा लिया। दोनों मुस्कुराए, फिर रतन सिंह निकल गए।<br />       तीसरे दिन युद्ध भूमि से एक दूत रतन सिंह का पत्र लेकर सलूम्बर पहुँचा। पत्र हाड़ी रानी के लिए था। लिखा था-<br />         " आज हमारी सेना युद्ध के पूरी तरह तैयार खड़ी है। सम्भव है दूसरे या तीसरे दिन औरंगजेब की सेना से भेंट हो जाय। महाराणा रूपनगर गए हैं सो उनकी अनुपस्थिति में राज्य की रक्षा हमारे ही जिम्मे है। आपका मुखड़ा पल भर के लिए भी आँखों से ओझल नहीं होता है। आपके निकट था तो कह नहीं पाया, अभी आपसे दूर हूँ तो बिना कहे रहा नहीं जा रहा है। मैं आपसे बहुत प्रेम करता हूँ। आपका- सरदार रतन सिंह चूंडावत।"<br />       रानी पत्र पढ़ कर मुस्कुरा उठीं। किसी से स्वयं के लिए यह सुनना कि "मैं आपको बहुत प्रेम करता हूँ" भाँग से भी अधिक मता देता है। रानी ने उत्तर देने के लिए कागज उठाया और बस इतना ही लिखा-<br />        "आपकी और केवल आपकी...."<br />       पत्रवाहक उत्तर ले कर चला गया। दो दिन के बाद पुनः पत्रवाहक रानी के लिए पत्र ले कर आया। इसबार रतन सिंह ने लिखा था-<br />        "उसदिन के आपके पत्र ने मदहोश कर दिया है। लगता है जैसे मैं आपके पास ही हूँ। हमारी तलवार मुगल सैनिकों के सरों की प्रतीक्षा कर रही है। कल राजकुमारी का महाराणा के साथ विवाह है। औरंगजेब की सेना भी कल तक पहुँच जाएगी। औरंगजेब भड़का हुआ है, सो युद्ध भयानक होगा। मुझे स्वयं की चिन्ता नहीं, केवल आपकी चिन्ता सताती है।"<br />         रानी ने पत्र पढ़ा, पर मुस्कुरा न सकीं। आज उन्होंने कोई उत्तर भी नहीं भेजा। पत्रवाहक लौट गया। अगले दिन सन्ध्या के समय पत्रवाहक पुनः पत्र लेकर उपस्थित था। रानी ने उदास हो कर पत्र खोला। लिखा था-<br />        "औरंगजेब की सेना पहुँच चुकी। प्रातः काल मे ही युद्ध प्रारम्भ हो जाएगा। मैं वापस लौटूंगा या नहीं, यह अब नियति ही जानती है। अब शायद पत्र लिखने का मौका न मिले,सो आज पुनः कहता हूँ, मैंने अपने जीवन मे सबसे अधिक प्रेम आपसे ही किया है। सोचता हूँ, यदि युद्ध में मैं वीरगति प्राप्त कर लूँ तो आपका क्या होगा। एक बात पूछूँ- यदि मैं न रहा तो क्या आप मुझे भूल जाएंगी? आपका- रतन सिंह।"<br />        हाड़ा रानी गम्भीर हुईं। वे समझ चुकीं थीं कि रतन सिंह उनके मोह में फँस कर अपने कर्तव्य से दूर हो रहे हैं। उन्होंने पल भर में ही अपना कर्तव्य निश्चित कर लिया। उन्होंने सरदार रतन सिंह के नाम एक पत्र लिखा, फिर पत्रवाहक को अपने पास बुलवाया। पत्रवाहक ने जब रानी का मुख देखा तो काँप उठा। शरीर का सारा रक्त जैसे रानी के मुख पर चढ़ आया था, केश हवा में ऐसे उड़ रहे थे जैसे आंधी चल रही हो। सोलह वर्ष की लड़की जैसे साक्षात दुर्गा लग रही थी। उन्होंने गम्भीर स्वर में पत्रवाहक से कहा-"मेरा एक कार्य करोगे भइया?"<br />       पत्रवाहक के हाथ अनायास ही जुड़ गए थे। कहा, "आदेश करो बहन"<br />      "मेरा यह पत्र और एक वस्तु सरदार तक पहुँचा दीजिये।"<br />       पत्रवाहक ने हाँ में सर हिलाया। रानी ने आगे बढ़ कर एक झटके से उसकी कमर से तलवार खींच ली, और एक भरपूर हाथ अपनी ही गर्दन पर चलाया। हाड़ी रानी का शीश कट कर दूर जा गिरा। पत्रवाहक भय से चिल्ला उठा, उसके रोंगटे खड़े गए थे।<br />       अगले दिन पत्रवाहक सीधे युद्धभूमि में रतन सिंह के पास पहुँचा और हाड़ी रानी की पोटली दी। रतन सिंह ने मुस्कुराते हुए लकड़ी का वह डब्बा खोला, पर खुलते ही चिल्ला उठे। डब्बे में रानी का कटा हुआ शीश रखा था। सरदार ने जलती हुई आँखों से पत्रवाहक को देखा, तो उसने उनकी ओर रानी का पत्र बढ़ा दिया। रतन सिंह ने पत्र खोल कर देखा। लिखा था-<br />        "सरदार रतन सिंह के चरणों में उनकी रानी का प्रणाम। आप शायद भूल रहे थे कि मैं आपकी प्रेयसी नहीं पत्नी हूँ। हमने पवित्र अग्नि को साक्षी मान कर फेरे लिए थे सो मैं केवल इस जीवन भर के लिए ही नहीं, अगले सात जन्मों तक के लिए आपकी और केवल आपकी ही हूँ। मेरी चिन्ता आपको आपके कर्तव्य से दूर कर रही थी, इसलिए मैं स्वयं आपसे दूर जा रही हूँ। वहाँ स्वर्ग में बैठ कर आपकी प्रतीक्षा करूँगी। रूपनगर की राजकुमारी के सम्मान की रक्षा आपका प्रथम कर्तव्य है, उसके बाद हम यहाँ मिलेंगे। एक बात कहूँ सरदार? मैंने भी आपसे बहुत प्रेम किया है। उतना, जितना किसी ने न किया होगा।"<br />        रतन सिंह की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। वे कुछ समय तक तड़पते रहे, फिर जाने क्यों मुस्कुरा उठे। उनका मस्तक ऊँचा हो गया था, उनकी छाती चौड़ी हो गयी थी। उसके बाद तो जैसे समय भी ठहर कर रतन सिंह की तलवार की धार देखता रहा था। तीन दिन तक चले युद्ध में राजपूतों की सेना विजयी हुई थी, और इस युद्ध मे सबसे अधिक रक्त सरदार रतन सिंह की तलवार ने ही पिया था। वह अंतिम सांस तक लड़ा था। जब-जब शत्रु के शस्त्र उसका शरीर छूते, वह मुस्कुरा उठता था। एक-एक करके उसके अंग कटते गए, और अंत मे वह अमर हुआ।<br />       रूपनगर की राजकुमारी मेवाड़ की छोटी रानी बन कर पूरी प्रतिष्ठा के साथ उदयपुर में उतर चुकी थीं। राजपूत युद्ध भले अनेक बार हारे हों, प्रतिष्ठा कभी नहीं हारे। राजकुमारी की प्रतिष्ठा भी अमर हुई।<br />       महाराणा राजसिंह और राजकुमारी रूपवती के प्रेम की कहानी मुझे ज्ञात नहीं। मुझे तो हाड़ी रानी का मूल नाम भी नहीं पता। हाँ! यह देश हाड़ा सरदारों की उस सोलह वर्ष की बेटी का ऋणी है, यह जानता हूँ मैं।</p>]]>
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                                            <category>साहित्य/ज्योतिष</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Jul 2023 12:49:50 +0530</pubDate>
                
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