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                <title>भारत की अर्थव्यवस्था - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>भारत की अर्थव्यवस्था RSS Feed</description>
                
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                <title>आ अब लौट चलें</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180373/come-lets-go-back-now"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa016315.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों की जान को खतरा मंडराने लगा और विदेशी शासको के पराई पान के व्यवहार से परेशान होकर वापस घर लौटने की मानसिकता बन चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व पिछले कुछ वर्षों से युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, सांस्कृतिक तनाव और कठोर होती आव्रजन नीतियों के दौर से गुजर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष, अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथा पश्चिमी देशों में बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति ने विदेशी नागरिकों के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों के सामने वीजा, स्थायी निवास और रोजगार सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अनेक देशों में स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देने की मांग तेज हुई है, जिसके कारण प्रवासी समुदाय स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा है। हाल के वर्षों में अमेरिका की एच-1बी वीजा नीतियों में बदलाव और बढ़ती अनिश्चितताओं ने हजारों भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों को भविष्य के प्रति चिंतित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मूल के लाखों पेशेवर विदेशों में रहते हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार विश्वभर में लगभग 3.5 करोड़ भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय माना जाता है।  इनमें बड़ी संख्या डॉक्टरों, इंजीनियरों, आईटी विशेषज्ञों, वित्तीय सलाहकारों और शोधकर्ताओं की है। केवल भारतीय छात्रों की बात करें तो वर्ष 2024 तक 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में अध्ययन कर रहे थे। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की चमकदार तस्वीर अक्सर दिखाई जाती है, किंतु उसके पीछे छिपी मानसिक और सामाजिक पीड़ा कम चर्चा में आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक सफलता के बावजूद सांस्कृतिक अकेलापन, परिवार से दूरी, बुजुर्ग माता-पिता की चिंता, बच्चों की पहचान का संकट तथा नस्लीय भेदभाव के अनुभव अनेक प्रवासी भारतीयों को भीतर से विचलित करते हैं। पश्चिमी देशों में जीवन की बढ़ती लागत ने भी स्थिति कठिन बना दी है। ऊंचे किराए, महंगी स्वास्थ्य सेवाएं, बच्चों की शिक्षा का खर्च और नौकरी की असुरक्षा ने उस आकर्षण को कमजोर किया है जो कभी विदेशों को अवसरों की स्वर्णभूमि बनाता था। अनेक भारतीय पेशेवर स्वीकार करते हैं कि आर्थिक समृद्धि के बावजूद भावनात्मक संतोष की कमी उन्हें लगातार परेशान करती रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने भी इस विषय पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भारतीय प्रवासी समुदाय को "ब्रेन ड्रेन" नहीं बल्कि "ब्रेन बैंक" बताया है। उनका मानना है कि प्रतिभाएं जहां अवसर मिलते हैं वहां जाती हैं, किंतु वे अनुभव, पूंजी, तकनीक और वैश्विक दृष्टि के रूप में अपने देश को भी समृद्ध करती हैं।  यह विचार आज और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अब विदेशों से लौटकर भारत में स्टार्टअप, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में भी परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक क्षमता केंद्रों के विस्तार ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत अब केवल प्रतिभा निर्यातक देश नहीं रह गया है, बल्कि प्रतिभाओं को आकर्षित करने वाला देश भी बनने लगा है। कई भर्ती एजेंसियों ने बताया है कि विदेशों में कार्यरत अनुभवी भारतीय पेशेवरों की वापसी की प्रवृत्ति पिछले वर्षों की तुलना में बढ़ी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भी सच है कि भारत को अभी बहुत कार्य करना बाकी है। अनुसंधान एवं विकास पर खर्च, शहरी अवसंरचना, प्रशासनिक पारदर्शिता, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भारत वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार के लिए विश्वस्तरीय वातावरण नहीं बनाएगा, तब तक प्रतिभा पलायन पूरी तरह नहीं रुकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">परिस्थितियों का संकेत स्पष्ट है कि दुनिया का भू-राजनीतिक वातावरण तेजी से बदल रहा है। विदेशी धरती पर बसे भारतीय पेशेवर अब केवल अधिक वेतन नहीं, बल्कि जीवन की स्थिरता, सामाजिक अपनत्व और भावनात्मक सुरक्षा को भी महत्व देने लगे हैं। वे महसूस कर रहे हैं कि अपने देश में संघर्ष करना पराए देश में असुरक्षा के साथ जीने से कहीं अधिक संतोषजनक हो सकता है। माता-पिता की वृद्ध आंखें, अपनी भाषा की मिठास, अपने त्योहारों की खुशबू और अपनी मिट्टी का अपनापन किसी भी मुद्रा में नहीं खरीदा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत उन लाखों प्रतिभाशाली प्रवासी भारतीयों को पुकार रहा है जिन्होंने अपनी मेहनत से विश्व के बड़े संस्थानों को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। यदि वही ज्ञान, अनुभव और नवाचार भारत की धरती पर लगे तो विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है। यह केवल भावनात्मक आह्वान नहीं बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में अनेक भारतीय पेशेवरों के मन में एक ही स्वर गूंज रहा है,विदेशों की चमक बहुत देख ली, अब अपने देश की धड़कनों को महसूस करने का समय है। सचमुच, यह समय कह रहा है,"आ अब लौट चलें।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 18:37:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नए भारत का स्वर्णिम अध्याय: नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में विकास, शक्ति और वैश्विक प्रतिष्ठा की गाथा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">वर्ष 2014 भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है, जब नरेंद्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली। उस समय भारत दुनिया की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और उसकी जीडीपी लगभग 1.86 ट्रिलियन डॉलर थी। आज, एक दशक के भीतर भारत न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी प्रतिष्ठा भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। प्रति व्यक्ति आय का लगभग दोगुना हो जाना इस बात का प्रमाण है कि विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचा है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था में आई यह तेजी केवल आंकड़ों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178327/the-golden-chapter-of-new-india-the-story-of-development"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa01634.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">वर्ष 2014 भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाता है, जब नरेंद्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली। उस समय भारत दुनिया की 10वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था और उसकी जीडीपी लगभग 1.86 ट्रिलियन डॉलर थी। आज, एक दशक के भीतर भारत न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हुआ है, बल्कि वैश्विक मंच पर उसकी प्रतिष्ठा भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है। प्रति व्यक्ति आय का लगभग दोगुना हो जाना इस बात का प्रमाण है कि विकास का लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत की अर्थव्यवस्था में आई यह तेजी केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक परिवर्तन का संकेत है। 2026 तक भारत की जीडीपी 4 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंचने का अनुमान है और 7.4 से 7.6 प्रतिशत की वृद्धि दर इसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बनाए हुए है। यह उपलब्धि सरकार की नीतियों, आर्थिक सुधारों और मजबूत नेतृत्व का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस परिवर्तन में अमित शाह की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने संगठन को मजबूत करते हुए भाजपा को देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया। मोदी और शाह की जोड़ी ने राजनीति को केवल सत्ता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में जो बदलाव आया है, वह अभूतपूर्व है। सड़कों का विस्तार, हाईवे का निर्माण, रेलवे का आधुनिकीकरण और हवाई अड्डों की संख्या में वृद्धि—इन सभी ने भारत को एक नए युग में प्रवेश कराया है। आधुनिक ट्रेनों, विद्युतीकरण और सुरक्षा तकनीकों ने यात्रा को अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाया है। गांवों तक सड़क और बिजली पहुंचाना विकास को समावेशी बनाने का प्रयास है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डिजिटल इंडिया अभियान ने भारत को तकनीकी रूप से सशक्त बनाया है। यूपीआई जैसी व्यवस्था ने देश को डिजिटल भुगतान में अग्रणी बना दिया है। आज सरकारी सेवाएं मोबाइल पर उपलब्ध हैं, जिससे पारदर्शिता और गति दोनों में वृद्धि हुई है। यह परिवर्तन आम नागरिक के जीवन को आसान बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सामाजिक कल्याण की योजनाओं ने भी करोड़ों लोगों के जीवन में बदलाव लाया है। जन धन योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी पहलों ने गरीब और वंचित वर्ग को मुख्यधारा से जोड़ा है। यह केवल योजनाएं नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने का प्रयास हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रेलवे क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। ट्रैक का तेजी से विद्युतीकरण, आधुनिक ट्रेनों का संचालन, और सुरक्षा प्रणाली का विकास—इन सभी ने भारतीय रेलवे को नई पहचान दी है। पर्यावरण संरक्षण के लिए भी रेलवे ने सौर ऊर्जा, एलईडी लाइटिंग और कार्बन उत्सर्जन में कमी जैसे कदम उठाए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का पुनर्विकास भी इस दौर की एक विशेष पहचान रहा है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर और महाकाल लोक जैसे प्रोजेक्ट्स ने भारत की सांस्कृतिक विरासत को नया जीवन दिया है। यह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक भी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कानूनी और नीतिगत सुधारों ने भी देश की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तीन तलाक कानून, अनुच्छेद 370 का हटाया जाना और नागरिकता संशोधन कानून जैसे फैसलों ने सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित किया है। इन निर्णयों को समर्थक जहां साहसिक कदम मानते हैं, वहीं आलोचक इनके प्रभावों पर चर्चा करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">विदेश नीति के क्षेत्र में भारत ने एक नई पहचान बनाई है। “भारत प्रथम” के सिद्धांत पर आधारित नीति ने भारत को वैश्विक मंच पर एक मजबूत और आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है। अमेरिका, रूस और अन्य प्रमुख देशों के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखते हुए भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक दृष्टि से भी भाजपा का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। देश के अधिकांश राज्यों में पार्टी की मजबूत उपस्थिति यह दर्शाती है कि संगठन और नेतृत्व दोनों स्तरों पर पार्टी ने प्रभावी कार्य किया है। बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देना इसकी सफलता का आधार रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, इस विकास यात्रा में चुनौतियां भी मौजूद हैं। रोजगार सृजन, आय असमानता और कृषि क्षेत्र की समस्याएं ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन यह भी सच है कि सरकार इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए सुधार की दिशा में प्रयासरत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नरेंद्र मोदी का नेतृत्व केवल प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक दृष्टिकोण है—एक ऐसा दृष्टिकोण जो भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना देखता है। “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य इसी सोच का परिणाम है। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक संकल्प है, जिसे साकार करने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमित शाह की रणनीतिक क्षमता और संगठनात्मक कौशल ने इस दृष्टिकोण को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने पार्टी को मजबूत करते हुए उसे हर स्तर पर सशक्त बनाया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां वह न केवल अपने अतीत पर गर्व करता है, बल्कि भविष्य को लेकर भी आश्वस्त है। यह आत्मविश्वास पिछले कुछ वर्षों में हुए विकास का परिणाम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भारत ने जिस गति से प्रगति की है, वह न केवल देशवासियों के लिए गर्व का विषय है, बल्कि दुनिया के लिए भी एक उदाहरण है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि यही दिशा और प्रयास जारी रहे, तो भारत जल्द ही एक विकसित राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने खड़ा होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, यह दौर केवल राजनीतिक सफलता का नहीं, बल्कि एक युग निर्माण का दौर है, जिसमें भारत अपनी नई पहचान गढ़ रहा है और वैश्विक मंच पर अपनी छाप छोड़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;">        <strong>*कांतिलाल मांडोत वरिष्ठ पत्रकार*</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 May 2026 17:22:47 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title> वैश्विक शक्ति का विकेंद्रीकरण और उभरते नए आयाम</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>- महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div>  </div>
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<div>इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक परिदृश्य एक ऐसे परिवर्तनकारी मोड़ पर खड़ा है जहाँ पुरानी व्यवस्थाओं की दीवारें ढह रही हैं और नई शक्तियों का उदय हो रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की दुनिया मुख्य रूप से दो ध्रुवों में विभाजित थी जिसमें एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका और दूसरी ओर सोवियत संघ का नेतृत्व था। वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही एकध्रुवीय विश्व का युग आरंभ हुआ जिसमें अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बनकर उभरा। लेकिन वर्तमान समय में हम देख रहे हैं</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178089/%C2%A0%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B6%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A3-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%89%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%8F-%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images2.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>- महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div> </div>
<div> </div>
<div>इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक परिदृश्य एक ऐसे परिवर्तनकारी मोड़ पर खड़ा है जहाँ पुरानी व्यवस्थाओं की दीवारें ढह रही हैं और नई शक्तियों का उदय हो रहा है। इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की दुनिया मुख्य रूप से दो ध्रुवों में विभाजित थी जिसमें एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका और दूसरी ओर सोवियत संघ का नेतृत्व था। वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही एकध्रुवीय विश्व का युग आरंभ हुआ जिसमें अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बनकर उभरा। लेकिन वर्तमान समय में हम देख रहे हैं कि यह स्थिति तेजी से बदल रही है। अब दुनिया किसी एक शक्ति के इशारे पर नहीं चलती बल्कि शक्ति का केंद्र अब बिखर गया है और कई देशों के बीच विभाजित हो गया है। इस बदलाव को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विद्वान बहुध्रुवीय विश्व की संज्ञा देते हैं जहाँ निर्णय लेने की प्रक्रिया में अब वाशिंगटन के साथ-साथ नई दिल्ली, बीजिंग, मॉस्को और ब्रासीलिया जैसे शहरों की गूँज भी सुनाई देती है।</div>
<div> </div>
<div>शक्ति के इस स्थानांतरण का सबसे प्रमुख कारण उभरती अर्थव्यवस्थाओं का अभूतपूर्व उदय है। पिछले दो दशकों में वैश्विक आर्थिक मानचित्र पूरी तरह से बदल गया है। चीन की अर्थव्यवस्था वर्ष 1980 के दशक में वैश्विक उत्पादन में मात्र 2 प्रतिशत का योगदान देती थी जो आज बढ़कर लगभग 18 प्रतिशत से अधिक हो गई है। इसी प्रकार भारत आज विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाएगा। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है बल्कि यह उस क्रय शक्ति और उत्पादन क्षमता का परिचायक है जिसने विकासशील देशों को वैश्विक बाजार के केंद्र में ला खड़ा किया है। अब ये देश केवल विकसित देशों के उत्पादों के उपभोक्ता नहीं हैं बल्कि वे स्वयं नवाचार, विनिर्माण और तकनीक के वैश्विक खिलाड़ी बन चुके हैं।</div>
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<div>इस बदलते संतुलन में नए वैश्विक समूहों और संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। जी7 जैसे पुराने समूह जो कभी दुनिया की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करते थे अब अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसके विपरीत ब्रिक्स जैसे संगठन जिनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं अब वैश्विक विमर्श को नई दिशा दे रहे हैं। वर्ष 2024 में ब्रिक्स के विस्तार के बाद अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी शामिल हो गए हैं। यह विस्तारित समूह अब दुनिया की लगभग 45 प्रतिशत जनसंख्या और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के 28 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। जी20 जैसे मंच अब अंतरराष्ट्रीय नीति निर्माण में अधिक समावेशी हो गए हैं जहाँ अफ्रीकी संघ को स्थाई सदस्यता मिलना इस बात का प्रमाण है कि अब दुनिया के फैसले केवल कुछ पश्चिमी देशों के कमरों में बंद होकर नहीं लिए जा सकते।</div>
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<div>तकनीक और डिजिटल शक्ति ने भी वैश्विक शक्ति के मानकों को पूरी तरह से बदल दिया है। किसी समय में शक्ति का पैमाना केवल परमाणु हथियारों की संख्या या विशाल सेना हुआ करती थी परंतु आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा और डेटा भंडार नई सैन्य और राजनीतिक ताकतें बन चुके हैं। जो देश इन तकनीकों में अग्रणी हैं वे ही भविष्य की राजनीति का निर्धारण करेंगे। वर्तमान में वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार का लगभग 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कुछ गिने-चुने देशों के नियंत्रण में है जिससे पूरी दुनिया की डिजिटल सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। डेटा को अब नया तेल कहा जा रहा है और जिस देश के पास अपने नागरिकों के डेटा पर संप्रभुता है वह वैश्विक मंच पर अधिक मोलभाव करने की स्थिति में है। अंतरिक्ष अन्वेषण में भी अब निजी कंपनियों और नए देशों के प्रवेश ने महाशक्तियों के पुराने एकाधिकार को चुनौती दी है।</div>
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<div>वैश्विक संघर्ष और अस्थिरता ने भी शक्ति संतुलन को बदलने में उत्प्रेरक का कार्य किया है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने न केवल यूरोप की सुरक्षा संरचना को हिला दिया है बल्कि इसने ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के नए संकट पैदा कर दिए हैं। इस संघर्ष ने दुनिया को यह अहसास कराया है कि किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कितनी घातक हो सकती है। इसी प्रकार पश्चिम एशिया की अस्थिरता और व्यापारिक मार्गों पर बढ़ते खतरों ने देशों को मजबूर किया है कि वे अपने रणनीतिक विकल्पों का विस्तार करें। इन परिस्थितियों में छोटे और मध्यम आकार के देशों की अहमियत भी बढ़ गई है क्योंकि उनकी भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक संसाधन उन्हें बड़े देशों की प्रतिस्पर्धा में महत्वपूर्ण मोहरा बना देते हैं।</div>
<div>इस पूरी प्रक्रिया में संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रभाव कम होता दिख रहा है यद्यपि वह अभी भी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। अमेरिकी डॉलर की वैश्विक स्वीकार्यता अब धीरे-धीरे कम हो रही है क्योंकि कई देश अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। इसे डी-डॉलराइजेशन की प्रक्रिया कहा जा रहा है। दुनिया अब एक ऐसे युग में प्रवेश कर चुकी है जहाँ कोई भी एक देश वैश्विक नियमों को अकेले थोप नहीं सकता। पश्चिमी देशों के मानवीय मूल्यों और मानवाधिकारों के दोहरे मानकों पर भी अब वैश्विक दक्षिण के देशों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। यह एक सांस्कृतिक और वैचारिक स्वतंत्रता का दौर भी है जहाँ देश अपनी सभ्यतागत पहचान को वैश्विक मंच पर गौरव के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं।</div>
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<div>भारत की भूमिका इस बदलते परिवेश में सबसे विशिष्ट और संतुलनकारी है। भारत ने किसी भी एक गुट में शामिल होने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता दी है। भारत की विदेश नीति अब केवल आदर्शवाद पर नहीं बल्कि यथार्थवाद और राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। भारत जहाँ एक ओर क्वॉड जैसे समूहों के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में सहयोग कर रहा है वहीं दूसरी ओर शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स के माध्यम से गैर-पश्चिमी शक्तियों के साथ भी अपने संबंधों को प्रगाढ़ बना रहा है। वैश्विक दक्षिण की आवाज बनकर भारत ने जलवायु परिवर्तन, डिजिटल बुनियादी ढांचे और विकासशील देशों के ऋण संकट जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है। भारत का मिशन अब केवल वैश्विक व्यवस्था का पालन करना नहीं बल्कि उसका निर्माण करना है।</div>
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<div>अंततः यह स्पष्ट है कि हम एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ शक्ति का कोई एक केंद्र नहीं होगा। यह बहुध्रुवीय विश्व अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धी होगा लेकिन साथ ही इसमें अधिक देशों की भागीदारी की संभावना भी होगी। आने वाले समय में शांति और समृद्धि इस बात पर निर्भर करेगी कि ये विभिन्न ध्रुव आपस में कितना सहयोग करते हैं और मतभेदों को सुलझाने के लिए किन अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करते हैं। शक्ति का यह नया संतुलन केवल सरकारों के बीच का बदलाव नहीं है बल्कि यह मानवता के साझा भविष्य को अधिक न्यायसंगत और संतुलित बनाने का एक अवसर भी है। विश्व अब एक विशाल परिवार की तरह है जहाँ प्रत्येक सदस्य की आवाज का महत्व है और जहाँ भविष्य का निर्माण प्रतिस्पर्धा के बजाय सामूहिक सहयोग के आधार पर किया जाना चाहिए। शक्ति का विकेंद्रीकरण अपरिहार्य है और इसके साथ तालमेल बिठाना ही इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी।</div>
<div> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 17:12:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>भारत तेजी से तीसरी अर्थव्यवस्था का देश बनने को अग्रसर है तब क्यों नोएडा में मजदूरो ने  न्यूनतम वेतन बढ़ाने के आन्दोलन किया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> नोएडा औघोगिक क्षेत्र में १२अप्रैल से जो मजदूर आन्दोलन शुरू हुआ उस पर कुछ कहने लिखने से पहले यह भी समझने की जरूरत है कि भारत जब विश्व का चौथी अर्थव्यवस्था का देश बन गया है औरविज्ञापनो में सरकार यह दिखा रही है  कि भारत तेजी से तीसरी अर्थव्यवस्था का देश बनने को अग्रसर है तब क्यों नोएडा में मजदूरो ने आन्दोलन किया यह सवाल उठ रहा है परन्तु ज़बाब सही नहीं मिल रहा है कि हम तीसरी अर्थव्यवस्था की और बढ़ रहे या और नीचे अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर जा रहे हैं जिस कारण</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176421/india-is-rapidly-moving-towards-becoming-a-third-economy-country"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/india-set-to-become-third-largest-economy-in-world.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> नोएडा औघोगिक क्षेत्र में १२अप्रैल से जो मजदूर आन्दोलन शुरू हुआ उस पर कुछ कहने लिखने से पहले यह भी समझने की जरूरत है कि भारत जब विश्व का चौथी अर्थव्यवस्था का देश बन गया है औरविज्ञापनो में सरकार यह दिखा रही है  कि भारत तेजी से तीसरी अर्थव्यवस्था का देश बनने को अग्रसर है तब क्यों नोएडा में मजदूरो ने आन्दोलन किया यह सवाल उठ रहा है परन्तु ज़बाब सही नहीं मिल रहा है कि हम तीसरी अर्थव्यवस्था की और बढ़ रहे या और नीचे अपनी अर्थव्यवस्था को लेकर जा रहे हैं जिस कारण से मजदूर मजबूर हो गये आन्दोलन करने को ।नोएडा मजदूर आन्दोलन से पहले विश्व में श्रमिक आन्दोलन के इतिहास को भी थोड़ा मूड कर देखना होगा क्यों हर शताब्दी में मजदूर आन्दोलित हो रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व में जब मजदूरों की आर्थिक सामाजिक पारिवारिक स्थिति बद से बदत्तर होने लगी तब विश्व में मजदूर क्रान्ति का उदय हुआ 18वी19वी शताब्दी में जो शोषण के ख़िलाफ़ पूंजीवाद विरोधी आन्दोलन 1884कम्युनिस्ट1917रूसी क्रांति के माध्यम से सर्वहारा वर्ग का उदय हुआ था यह संघर्ष काम के घन्टें कम करके बेहतर वेतन और श्रमिक संघों को अधिकार के लिए किया गया था जो सफल रहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नोएडा में भी मजदूरों ने काम के घन्टो का सही निर्धारण बेहतर वेतनमान के लिए ही संघर्ष कर रहे थे पर जैसा कि भारत में यह सर्व विदित है कि सत्ता के विरोध में शान्ति पूरृण आन्दोलन को बदनाम करने के लिए भाड़े के गूणृडो से तोड़ फोड़ करायाजाता है और आरोप आनृदोलनकरियो पर लगाकर गोली लाठी के दम पर सरकार इन।दोलन को कुचल‌देती है।यही नोएडा भी हुआ ।आनृदोलन उग्र हुआ तोड़फोड़ आगजनी सड़कों पर शुरू हुआ पर उसमें मजदूर तो नहीं रहा होगा यह मेरा मानना है।नोएडा का युवा मजदूर शायद ही विश्व के श्रमिक आंदोलन का इतिहास कभी पढ़ा सुना होगा या नहीं पर हक के लिए लडे यही बहुत बड़ी आज के सरकार में उनकी कामयाबी है की सड़क पर दो दिन ही सही अपने हकों के लिए आये।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में भी रूसी क्रांति से प्रेरित होकर श्रमिक आन्दोलन 1875मे पहली बार बाम्बे में हुआ थाफिर1920मेमिल मजदूरों ने  हड़ताल कियाथा  उसी तरह नोएडा में पहली बार  मजदूरों ने किया नोएडा के मजदूर आन्दोलन में कोई संगठित मजदूर संघ नहीं था बस थे सब मिलों के मजदूर बिना संगठन का आन्दोलन था पर बदनाम तो किसी ने करने का कुकृत्य तो आगजनी तोड फोड़ कर किया ।आन्दोलन अच्छा रहा सरकार मिल मालिकोक्षने हित किया समाधान निकला पर जैसा मजदूर चाह रहा था वैसा तो नहीं निकला।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सभी निजीकरण के क्षेत्रों में काम करने वालों को पहले विश्व के मजदूर नेताओं के बारे थोड़ा पढ़ना चाहिए कैसे आन्दोलन किया सफलता मिली ।उस समय इस तरह के संसाधन नहीं थे कि आपके आन्दोलन को तत्काल सरकार तक पहुंचा दिया जाये जैसा आज सोशल मिडिया प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया है।1808के दशक मे गोम्पर्स संगठित व्यापार और श्रम संघों ने संघ की स्थापना  में महत्व पूर्ण भूमिका निभाई।जब 1886मे फाटलू FOTLU का पुनर्गणन अमेरिकन फेडरेशन आफ लेबर के रुप में हुआ था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में नारायण  मेधाजी लोखंडे 1884/97भारत में ट्रेंड यूनियन आनृदोलन के जनक थे।आज भी  राजनिति दलों के श्रमिक संगठन है जैसे भारतीय जनता का भारतीय मजदूर संघ कांग्रेस का इंटक कम्युनिस्ट का कामरेड पर यह संगठन सब सरकिरी दलिल से इन संगठनों के लोग कभी भी मिल मजदूरों निजिकरण में काम करनेवाले अकुशल और तकनिकी रूप से क्सक्षम मजदूरों के लिए नहीं लड़ाई लगी  परिणाम स्वरूप मिलों और कार्पोरेट घरानों ने मजदूरों का हर तरह से शोषण करके अपने लिए लाभ का अफसर बनाने लग गये ।मजदूर केमेहनत का पैसा वह अपने ऐशो आराम अपने कारोबार बढ़ाने लगाना शुरू कर दिया मजदूरों को झोपडी वाला बेदम बना दिया जिसका परिणाम समय समय पर मिलो और बड़े बड़े कार्पोरेट उघोगो में आन्दोलन हुआ पर सब सर्किल और मजदूरों के दलाल नेताओं की आपसी सांठगांठ में भेंट चढ़ता गया मजदूर मजबूर होता गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नोएडा का का आन्दोलन मजदूरों के अशनतोष की सामान्य क्रिया थी बढ़ते महंगाई के दबाव के कारण बस मजदूरी बढ़ाने और कार्यस्थल पर सुविधाओ की कमी  ने उन से सड़कों पर उतार दिया इसमें श्रमिक नेता संगठन कुछ नहीं था बस सब मजदूर थे।।जैसा भारत सरकार का एक चरित्र बन गया है आन्दोलन की जड़ को बिना समझे पुलिस से लाठी चार्ज करने की एक आम सिद्धांत बना लिया कि आन्दोलन नहीं करने देंगे वैसे 2814से देश में तो यही हो रहा जो भी पार्टी किसान छात्र मजदूर आन्दोलन किया सबको लाठी के बल पर और जेल में भेजकर दबाया जा रहा अब तो सोनल मिडिया पर अगर आन्दोलन के बारे लिखा बोला तो देशद्रोह का मुकदमा तमाशा सोशल मिडिया के लोग आज भी जेल में हैं या उनका सोशल मिडिया एकाउंट बन्द करादे रही है सरकार नोएडा का आन्दोलन भी सोशल मिडिया के कारण ही हर घर हर शहर में पहुंच गया कि मजदूर बेहतर वेतन और निर्धारित घन्टो तक काम करने के लिए आन‌दोलन कर रहे हैं ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह हर आन्दोलन का चरित्र भी की आन।दोलन में भीड़ होगी नारे लगे गे पुलिस रोकेगी तो आनृदोलन अराजक हो जायेगा यही तो नोएडा के आन्दोलन में हुआ ।आऔघोगिक क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ा वहां स्थिरता हो रही उघोग की पूंजी है अगर स्थिरता नहीं होगी तो उघोग बन्द हो जायेगे उघोग पति पलायन करेगा बैंकों का लोन डूबेगा और मजदूरों की नौकरी समाप्त होंगी।।किसी भी राष्ट्र की प्रगति में वहां के श्रमिक को प्राणवायु माना जाता है।हर उघोग रोजगार और आर्थिक विकास को गति देते हैं। वर्तमान में जो अस्थिरता का दौर चल रहा है इस में मजदूर और उघोग दोनों परेशान हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज जो विश्व में युद्ध शुरू है उससे निश्चित तौर पर हर देश पर असर हो रहि भारत में थोड़ा ज्यादा कारण हम ऊर्जा में आत्मनिर्भर नहीं है कच्चे मारो की आपूर्ति भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित हो रही है ।जिससे उत्पादन लागत बढ़ रहा है।इन परिस्थितियों में सबसे ज्यदा मजदूर जो मिलों में काम कर रहा प्रभावित हो रहा रोजमर्रा की हर जीत महंगी हो रही उसको जो वेतन मिल रहा उससे गुजारा परिवार का असम्भव है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज के दौर में दस से पन्द्रह हजार रुपये महीने में कोई भी मजदूर अपना परिवार नहीं पाल सकता नहीं लड़के को पढ़ा सकता है दवा व अन्य खर्च की सोच नहीं सकता है इसी से परेशान होकर नोएडा के मजदूरों ने आन‌दोलन किया कोई गुनाह नहीं था सरकार आज तक जो भी न्यूनतम वेतन निर्धारित किया है वह बहुत कम है ।अब मजदूरों को वास्तव में अकुशल कामगार जो है कम से कम बीस हजार रुपये महीना तथा मिल द्वारा मुफ्त चिकित्सा शिक्षा व रहने को परिवारों कोक्षदोकमरे का मकान दे फिर बारह घन्टे काम ले सकते परन्तु यह नहीं हो रहा साथ में तरह तरह  केक्षकुशल कामगारो को कम से कम चालीस हजार वेतनमिन सरकार तय करें। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मजदूरों के लिए कम से कम बीस लाख का जीवन बीमा दस लाख का मुफ़्त चिकित्सा कार्ड अकुशल कारीगर के लिए इसी तरह कुशलल कारीगरों के लिए भी हो तब जाकर नोएडा जैसा आन्दोलन देश में नहीं होगा। भारत में एक और बात कि हर आन्दोलन वह किसानों का हो मजदूरों का हो छात्रों का हो उसे सतृतादल पाकिस्तान प्रायोजित कह कर बदनाम करने लगती है नोएडा के आन्दोलन को भी सरकार यानि सत्ता दल का विधायक पाकिस्तान प्रायोजित कह दिया और मिडिया जिसे हम गोदी कहते हैं वह चिल्लाने लगी नोएडा मजदूर आनृदोलन को धन पाकिस्तान ने दिया जबकि यह आनृदोलन तो बिना किसी नेता के चलि और सरकार मिल मालिकों से बैठकर समझौता होगया पर क्या यूं पी राजेश की सर्किल जो विधायक भाजपा के थे आनृदोलन को पाकिस्तान प्रायोजित बताया उनके ऊपर कारवाई करेगी नहीं होगा</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जैसा किसान आन।लोल जेएनयू आन‌दोलन में सतृतादल के नेता आरोप लगाते पर सरकार मौन थी सरकार ने अपने कुछ सांसदों विधायकों और नेताओं  को इसी काम में लगाया है कि हर आन‌दोलन को बदनाम करो ।यही नोएडा में भी हुआ पर सब कुछ ठीक होगया पर चिनगारी तो मजदूरों की आज कम होग ई है वह शानृत नहीं सुलग रही कब विस्फोटक आग बनेगी यह समय बचियेगा यदि अब मजदूरों को बीस हजार न्यून्तम। वेतन सामाजिक सुरक्षा के लिए बीमा और मुफ्त चिकित्सा नहीं दिया जायेगा तो रूसी क्रांति की तरह पुनः भारत में नये मजदूर क्रान्ति की जरूरत है बस मजदूर जो देश में पार्टी आधार पत्र संगठन है उसे दूर होकर स्वयं अपनी मागो के लिए अहिंसक आन्दोलन को करें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जब तक देश में श्रमिकों की बुनियादी जरूरतों को मिले नहीं पूरा करेगी मोक्ष उघोगोक्षको मजदूर आन्दोलन से समस्या होंगी। मजदूरों का यह जो असन्तोष था वह धीरे धीरे अराजकता के वातावरण में बदल सकता है।इस परिस्थिति से बचने के लिए जरूरी है सरकार उघोगपति मजदूर आपस मे बैठकर सही मजदूरी सही काम के घन्टें और कार्यस्थल पर शिक्षा चिकित्सा तथा बेहतर जीवन के लिए बुनियादी सुविधाओं को विकसित करें।अब नीतगत प्रयास हो जिसे देश में विकास की गति बढ़े और देश विश्व में तीसरी अर्थव्यवस्था के रुप स्थापित हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मदरसन के श्रमिका के आन्दोलन के साथ पूरे नोएडा ग्रेटर नोएडा में आन्दोलन  फैल गया हर मिल का मजदूर स्वयं हडताल मे शामिल हो गया कहीं कोई सन्देश नहीं बुलाया नहीं गया बस सोशल मिडिया पर खबर और मिल के बाहर मजदूर अच्छा रहा कि किसी मजदूर के घर पुलिस जाकर घेराबंदी या नजर बन्द नहीं  किया कि आप आन्दोलन में नहीं जायेंगे ।अगर यह आन्दोलन विपक्ष करवा रहा होता तो विपक्ष का हर नेता घर में नजर बन्द हो जाता । यह भी भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में एक अलोकतांत्रिक तरीका सरकार ने अपनाया है हर आन्दोलन को कुचलने के लिए नेताओं को घर में बन्दी बना दो जनता डर कर आन्दोलन में नहीं भाग लेंगी सरकार कहेगी हमारी सरकार में आजतक कोई आन्दोलन नहीं हुआ । जनता मजदूर किसान छात्र सब सरकार  के साथ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष के साथ पाकिस्तान और विदेशी ताकतें हैं ‌।जब आन्दोलन हो रहा था प्रदेश के मुखिया बंगाल चुनाव में व्यस्त हैं।  फिर भी आन्दोलरत मजदूर मिल मालिकों और सरकार बैठकर समाधान निकाल लिया कुछ रूपये बढ़ाये पर वह स्थाई समाधान नहीं है।  कानुन नया  बनाये जिसमें न्यूनतम वेतन अकुशल और कुशल तथा तकनीकी के लिए अलग हो तथा हर मजदूर को बीस लाख का जीवन बीमा बीमा की राशि सरकार मिल और कर्मचारी तीनों दे। चिकित्सा मुफ्त दस लाख का कार्ड यूं पी सरकार दे ।आवास मिल दे।  शिक्षा सरकार कार्य स्थल  पर दे।योगी जी ने जो भी अभी कदम उठाया है उसकी सराहना भी होनी चाहिए।उनका कहना सही है श्रमिको के अधिकारों और सम्मान से समझौता नहीं । श्रमिक ही किसी राष्ट्र के उत्थान में महत्व पूर्ण भूमिका अदा करता है। वह  अपने श्रमसे राष्ट्र  के विकास में सहयोग करता है।श्रमिक नहीं होगे  तो उघोग नहीं लगेगे। उघोग नहीं चलेंगे तो विकास नहीं होगा रोजगार नहीं मिलेगा श्रमिक और उघोग विकास के पहिये है दोनों का चलना राष्ट्र हित में सुन्दर होगा। सरकारे बस दोनों के हितों की संरक्षक होती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 21:28:16 +0530</pubDate>
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