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                <title>legal awareness India - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>लंबित मुकदमे : न्याय में देरी की भारी कीमत</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्यायपालिका मानी जाती है। संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय का अधिकार देता है। लेकिन जब किसी व्यक्ति का मुकदमा वर्षों या दशकों तक अदालतों में लंबित रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह अधिकार केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाता है। भारत में करोड़ों मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार (</span>08<span lang="hi" xml:lang="hi">  दिसंबर </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi">  तक): सुप्रीम कोर्ट: </span>90,897<span lang="hi" xml:lang="hi">  मामले लंबित</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च न्यायालय: </span>63,63,406<span lang="hi" xml:lang="hi">  मामले लंबित जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय: </span>4,84,57,343<span lang="hi" xml:lang="hi">  मामले लंबित कुल लंबित मामले: लगभग </span>5.49<span lang="hi" xml:lang="hi">  करोड़</span>5,48,11,646)</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184248/pending-cases-are-a-heavy-cost-for-delaying-justice"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/hindi-divas16.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी न्यायपालिका मानी जाती है। संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष और समयबद्ध न्याय का अधिकार देता है। लेकिन जब किसी व्यक्ति का मुकदमा वर्षों या दशकों तक अदालतों में लंबित रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह अधिकार केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाता है। भारत में करोड़ों मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार (</span>08<span lang="hi" xml:lang="hi"> दिसंबर </span>2025<span lang="hi" xml:lang="hi"> तक): सुप्रीम कोर्ट: </span>90,897<span lang="hi" xml:lang="hi"> मामले लंबित</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उच्च न्यायालय: </span>63,63,406<span lang="hi" xml:lang="hi"> मामले लंबित जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय: </span>4,84,57,343<span lang="hi" xml:lang="hi"> मामले लंबित कुल लंबित मामले: लगभग </span>5.49<span lang="hi" xml:lang="hi"> करोड़ (</span>5,48,11,646)<span lang="hi" xml:lang="hi">।  इन लंबित मामलों का सबसे अधिक दुष्प्रभाव केवल पीड़ित पक्ष पर ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन आरोपियों पर भी पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका अपराध अभी तक अदालत में सिद्ध नहीं हुआ है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;">"<span lang="hi" xml:lang="hi">जब तक अपराध सिद्ध न हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक व्यक्ति निर्दोष है" – भारतीय न्याय व्यवस्था का यह मूल सिद्धांत व्यवहार में कई बार कमजोर पड़ जाता है। वर्षों तक मुकदमे झेलने वाला आरोपी सामाजिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक और मानसिक रूप से ऐसी सजा भुगतता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कई बार अदालत द्वारा दी जाने वाली वास्तविक सजा से भी अधिक कठोर साबित होती है। लंबित मुकदमों का बढ़ता बोझ- देश की विभिन्न अदालतों में करोड़ों मामले वर्षों से लंबित हैं। जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमों का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं— न्यायाधीशों के हजारों पद रिक्त होना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मुकदमों की लगातार बढ़ती संख्या। बार-बार स्थगन  मिलना। पुलिस जांच और चार्जशीट दाखिल करने में देरी। गवाहों का समय पर उपस्थित न होना।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आधुनिक तकनीक का सीमित उपयोग। इन कारणों से न्याय की प्रक्रिया लंबी होती चली जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आरोपी की सबसे बड़ी पीड़ा- जब किसी व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके जीवन में अनेक कठिनाइयाँ एक साथ आ जाती हैं। यदि उसे गिरफ्तार कर लिया जाए तो उसे जेल में समय बिताना पड़ सकता है। जमानत मिलने के बाद भी उसकी परेशानियाँ समाप्त नहीं होतीं। आरोपी को बार-बार अदालत में पेश होना पड़ता है। हर तारीख पर नौकरी या व्यवसाय छोड़कर अदालत जाना पड़ता है। कई बार मुकदमे की सुनवाई आगे नहीं बढ़ती और केवल अगली तारीख मिल जाती है। यह प्रक्रिया वर्षों तक चलती रहती है। सामाजिक बदनामी समाज में किसी व्यक्ति पर मुकदमा दर्ज होने मात्र से उसकी छवि प्रभावित हो जाती है। भले ही बाद में अदालत उसे पूरी तरह निर्दोष घोषित कर दे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उस पर लगा आरोप लोगों की स्मृति में बना रहता है। ऐसे व्यक्ति को नौकरी मिलने में कठिनाई होती है। कई सरकारी नौकरियों में लंबित मुकदमे भी परेशानी का कारण बन जाते हैं। परिवार को भी सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। आर्थिक नुकसान- लंबे मुकदमों की सबसे बड़ी मार आर्थिक होती है। वकीलों की फीस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत आने-जाने का खर्च</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दस्तावेजों पर होने वाला खर्च</span>,</p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">काम-धंधे में नुकसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी छूटने का खतरा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई परिवार मुकदमे लड़ते-लड़ते आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं। मानसिक तनाव- वर्षों तक मुकदमा झेलने वाला व्यक्ति लगातार तनाव में रहता है। उसे हर समय फैसले की चिंता सताती रहती है। परिवार के सदस्यों पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। कई मामलों में मानसिक अवसाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य समस्याएँ और पारिवारिक विवाद बढ़ जाते हैं। यदि अंत में आरोपी निर्दोष निकले तो</span>?0<span lang="hi" xml:lang="hi">यह सबसे गंभीर प्रश्न है। कई बार अदालत वर्षों बाद आरोपी को यह कहते हुए बरी कर देती है कि उसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले। उसके जीवन के कई वर्ष बीत चुके होते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो चुकी होती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आर्थिक नुकसान हो चुका होता है। मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ चुकी होती है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि व्यक्ति निर्दोष था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके खोए हुए वर्षों की भरपाई कौन करेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">पीड़ित पक्ष भी प्रभावित- न्याय में देरी केवल आरोपी के लिए ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पीड़ित के लिए भी कष्टदायक होती है। पीड़ित वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करता है। गवाह कमजोर पड़ जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">साक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं और कई बार न्याय का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है। सुधार की आवश्यकता- न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई सुधार आवश्यक हैं— न्यायाधीशों के रिक्त पदों को शीघ्र भरना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नई अदालतों की स्थापना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ई-कोर्ट और डिजिटल सुनवाई का विस्तार</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">अनावश्यक स्थगन पर सख्ती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुलिस जांच की गुणवत्ता में सुधार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटे मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष अदालतें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैकल्पिक विवाद समाधान (</span>ADR) <span lang="hi" xml:lang="hi">को बढ़ावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गवाह संरक्षण प्रणाली को मजबूत करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय में देरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय से वंचित करना अंग्रेज़ी की प्रसिद्ध उक्ति है—"</span>Justice delayed is justice denied." <span lang="hi" xml:lang="hi">अर्थात न्याय में देरी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय से वंचित करने के समान है। यह बात आरोपी और पीड़ित—दोनों पर समान रूप से लागू होती है। यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को वर्षों तक मुकदमा झेलना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह भी न्याय से वंचित है। यदि पीड़ित को वर्षों तक निर्णय का इंतजार करना पड़े</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके साथ भी न्याय अधूरा रह जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्यायपालिका पर जनता का विश्वास आज भी मजबूत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन बढ़ते लंबित मुकदमे इस विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा बन गए हैं। न्याय केवल निष्पक्ष होना ही पर्याप्त नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर मिलना भी उतना ही आवश्यक है। अदालतों में लंबित मामलों को कम करना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीक का अधिक उपयोग करना और मुकदमों के त्वरित निस्तारण की प्रभावी व्यवस्था करना समय की मांग है। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता तभी मानी जाएगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक आरोपी बनकर न जीए और पीड़ित को न्याय के लिए अनंत प्रतीक्षा न करनी पड़े। न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल फैसला सुनाना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर और प्रभावी न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 19:55:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जुर्माना बना था रिहाई में बाधा, सामाजिक पहल से दो बंदी आजाद कराए </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> जिला कारागार से गुरुवार को दो सिद्धदोष बंदियों को रिहा कर दिया गया, जो अपनी सजा पूरी करने के बावजूद जुर्माना न जमा कर पाने के कारण अतिरिक्त सजा भुगत रहे थे। जेल अधीक्षक आर.के. पाण्डेय के अनुसार, उन्नाव निवासी अकबर अली और कानपुर नगर के राजेश उर्फ राजू ‘बिजली वाला’ अपनी निर्धारित सजा पूरी कर चुके थे। लेकिन आर्थिक तंगी के चलते अर्थदंड अदा न कर पाने के कारण उनकी रिहाई संभव नहीं हो पा रही थी।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस बीच सामाजिक सरोकार का उदाहरण पेश करते हुए ‘अपराध मुक्त सामाजिक चिकित्सा समिति’ और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने पहल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177192/fine-was-a-hindrance-in-release-two-prisoners-were-freed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1001856990.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> जिला कारागार से गुरुवार को दो सिद्धदोष बंदियों को रिहा कर दिया गया, जो अपनी सजा पूरी करने के बावजूद जुर्माना न जमा कर पाने के कारण अतिरिक्त सजा भुगत रहे थे। जेल अधीक्षक आर.के. पाण्डेय के अनुसार, उन्नाव निवासी अकबर अली और कानपुर नगर के राजेश उर्फ राजू ‘बिजली वाला’ अपनी निर्धारित सजा पूरी कर चुके थे। लेकिन आर्थिक तंगी के चलते अर्थदंड अदा न कर पाने के कारण उनकी रिहाई संभव नहीं हो पा रही थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बीच सामाजिक सरोकार का उदाहरण पेश करते हुए ‘अपराध मुक्त सामाजिक चिकित्सा समिति’ और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने पहल की। दोनों संस्थाओं के संयुक्त प्रयास से जुर्माने की पूरी राशि जमा कराई गई, जिसके बाद 23 अप्रैल 2026 को दोनों बंदियों को रिहा कर दिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिहाई के दौरान समिति के चेयरमैन आशुतोष बाजपेई, चिकित्सा सचिव अंकुश अग्रवाल, उपाध्यक्ष प्रवीण पासान और विजय सेठ सहित जेल प्रशासन के अधिकारी मौजूद रहे। यह पहल मानवीय संवेदनाओं का उदाहरण है, जो दर्शाती है कि आर्थिक कमजोरी किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधा नहीं बननी चाहिए।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 18:33:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत झूठे मामलों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? </title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 के तहत तीसरे पक्ष द्वारा झूठे मामले दर्ज किए जाने के “परेशान करने वाले ट्रेंड” पर चिंता जताई। [मोहम्मद फैजान और अन्य बनाम यूपी राज्य और अन्य]।जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने यह बात एक ऐसे मामले में कही, जिसमें तीन मुस्लिम आदमियों पर 2021 के एंटी-कन्वर्जन कानून के तहत केस दर्ज किया गया था।</p><p style="text-align:justify;">कथित पीड़िता ने एक बयान में इन दावों से इनकार किया कि उसे आरोपियों में से एक आदमी "लुभा" रहा था। इसके बजाय, उसने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176409/what-action-was-taken-against-false-cases-under-anti-conversion-law"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court-1.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 के तहत तीसरे पक्ष द्वारा झूठे मामले दर्ज किए जाने के “परेशान करने वाले ट्रेंड” पर चिंता जताई। [मोहम्मद फैजान और अन्य बनाम यूपी राज्य और अन्य]।जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने यह बात एक ऐसे मामले में कही, जिसमें तीन मुस्लिम आदमियों पर 2021 के एंटी-कन्वर्जन कानून के तहत केस दर्ज किया गया था।</p><p style="text-align:justify;">कथित पीड़िता ने एक बयान में इन दावों से इनकार किया कि उसे आरोपियों में से एक आदमी "लुभा" रहा था। इसके बजाय, उसने दावा किया कि वह उससे प्यार करती थी, और उसे अपने रिश्तेदारों और थर्ड-पार्टी से हैरेसमेंट का डर था। कोर्ट ने कहा, "FIR में लगाए गए आरोपों के मुकाबले पीड़िता का बयान एक परेशान करने वाले ट्रेंड को जन्म देता है, जिसे कोर्ट बार-बार उत्तर प्रदेश प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलीजन एक्ट, 2021 के प्रोविजन्स के तहत थर्ड-पार्टी द्वारा दर्ज की जा रही FIRs के संबंध में देख रही है।"</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने अब राज्य सरकार को एक एफिडेविट फाइल करके इस ट्रेंड से निपटने के लिए की जा रही कार्रवाई के बारे में बताने का निर्देश दिया है।कोर्ट ने आदेश दिया, “UP सरकार के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) भी अपना पर्सनल एफिडेविट फाइल करेंगे, जिसमें बताया जाएगा कि ऐसे मामलों में क्या एक्शन लिया जा रहा है, जहां एक्ट 2021 के प्रोविजन के तहत FIR इधर-उधर दर्ज की जा रही हैं और उसके बाद FIR साफ तौर पर गलत निकलीं, जिससे अधिकारियों का कीमती समय ऐसी FIR को पकड़ने में बर्बाद हो रहा है, जिनका कोई आधार भी नहीं है।”</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि अगर एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) 19 मई से पहले एफिडेविट फाइल नहीं कर पाते हैं, तो उन्हें कोर्ट की मदद के लिए रिकॉर्ड के साथ खुद पेश होना होगा। यह एक पिटीशन पर सुनवाई कर रहा था जिसमें बहराइच जिले के पुलिस स्टेशन थाना कोतवली नगर द्वारा भारतीय न्याय संहिता (BNS) और उत्तर प्रदेश प्रोहिबिशन ऑफ अनलॉफुल कन्वर्जन ऑफ रिलीजन एक्ट, 2021 के अलग-अलग प्रोविजन के तहत रजिस्टर्ड FIR को रद्द करने की मांग की गई थी।</p><p style="text-align:justify;">यह केस एक आदमी की कंप्लेंट पर रजिस्टर किया गया था, जिसने आरोप लगाया था कि उसकी बेटी को एक मुस्लिम आदमी ने दो और लोगों की मदद से बहला-फुसलाकर भगा लिया था। कंप्लेंट करने वाले ने कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि आरोपी उसकी बेटी का धर्म बदलने और उसे एक मुस्लिम आदमी से शादी करने के लिए मजबूर करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि कथित विक्टिम ने मजिस्ट्रेट के सामने अपने बयान में कहा है कि वह बालिग है और पिछले तीन साल से उस आदमी से प्यार करती है।</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने ऑर्डर में लिखा, “उसने आगे कहा है कि उसका धर्म नहीं बदला गया है, न ही पिटीशनर ने उससे शादी की है और न ही उसके साथ फिजिकल रिलेशन बनाए हैं, न ही पिटीशनर नंबर 3 या उसके रिश्तेदारों ने विक्टिम को धर्म बदलने के लिए मजबूर किया है। उसने आगे कहा है कि वह पिटीशनर नंबर 3 के साथ रहना चाहती है और उसका धर्म नहीं बदला गया है। उसने अपने बयान में यह भी रिक्वेस्ट की है कि हिंदू ऑर्गनाइजेशन के मेंबर उसे या उसके रिश्तेदारों को परेशान न करें।”</p><p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि, पहली नज़र में, इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर दबाव में काम कर रहा था या कुछ दूसरी वजहों से 'मना' गया था।कोर्ट ने थर्ड पार्टी द्वारा ऐसे केस रजिस्टर करने के ट्रेंड पर ध्यान दिया। बेंच ने कहा, “यह एक परेशान करने वाला ट्रेंड है जो अब समाज में फैल गया है और जिसका इशारा माननीय सुप्रीम कोर्ट ने राजेंद्र बिहारी लाल बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. एंड ऑर्स. : 2025 SCC OnLine SC 2265 के केस में भी किया है।”</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 21:06:23 +0530</pubDate>
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                <title>वकील अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने के लिए PIL याचिकाकर्ता नहीं बन सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी वकील, जिसके पास उसके क्लाइंट्स अपनी शिकायतों के निवारण के लिए आते हैं, उसे खुद याचिकाकर्ता बनकर अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने वाली जनहित याचिका (PIL) दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने एक वकील द्वारा दायर की गई PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की।</p>
<p style="text-align:justify;">इस याचिका में वकील ने प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176405/lawyer-cannot-become-pil-petitioner-to-further-interests-of-his"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court_1623565927.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में यह टिप्पणी की कि कोई भी वकील, जिसके पास उसके क्लाइंट्स अपनी शिकायतों के निवारण के लिए आते हैं, उसे खुद याचिकाकर्ता बनकर अपने क्लाइंट्स के हितों को आगे बढ़ाने वाली जनहित याचिका (PIL) दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने एक वकील द्वारा दायर की गई PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की।</p>
<p style="text-align:justify;">इस याचिका में वकील ने प्रतिवादियों को यह निर्देश देने की मांग की थी कि वे पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा जारी दिशानिर्देशों के आधार पर उद्योगों को प्राकृतिक गैस कनेक्शन उपलब्ध कराएं।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिका में अपनी पहचान और साख बताते हुए याचिकाकर्ता ने अन्य बातों के साथ-साथ यह भी कहा था कि वह जिला फिरोजाबाद में वकालत करने वाला वकील है, कुछ उद्योगों का कानूनी सलाहकार है। साथ ही वह औद्योगिक प्राधिकरणों के समक्ष उद्योगों से जुड़े मामलों को देखता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अतः, यह देखते हुए कि ऐसा आचरण पेशेवर कदाचार माना जा सकता है, खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को भविष्य में इस तरह के किसी भी प्रयास में शामिल न होने की चेतावनी देते हुए, PIL याचिका वापस लिए जाने के आधार पर खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
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                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 20:57:47 +0530</pubDate>
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