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                <title>political participation of women - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>political participation of women RSS Feed</description>
                
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                <title>लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन प्रतिनिधित्व के स्तर पर यह लंबे समय तक आधा अधूरा रहा है क्योंकि जनसंख्या का लगभग आधा हिस्सा होने के बावजूद महिलाएं राजनीतिक संस्थाओं में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हो पाई हैं। इसी ऐतिहासिक असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से 2023 में पारित संविधान का 106वां संशोधन अधिनियम</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया। यह अधिनियम लोकसभा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176334/the-future-of-womens-participation-in-democracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas14.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन प्रतिनिधित्व के स्तर पर यह लंबे समय तक आधा अधूरा रहा है क्योंकि जनसंख्या का लगभग आधा हिस्सा होने के बावजूद महिलाएं राजनीतिक संस्थाओं में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हो पाई हैं। इसी ऐतिहासिक असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से 2023 में पारित संविधान का 106वां संशोधन अधिनियम</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया। यह अधिनियम लोकसभा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान करता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए भी उप आरक्षण शामिल है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह कानून लगभग 27 वर्षों से चल रही बहस और राजनीतिक प्रयासों का परिणाम है। 19 सितंबर 2023 को इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया गया और 20 तथा 21 सितंबर को दोनों सदनों से पारित कर दिया गया। 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह संविधान का हिस्सा बन गया। यह घटना न केवल विधायी दृष्टि से महत्वपूर्ण थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह इस बात का संकेत भी थी कि भारतीय राजनीति अब महिलाओं की भागीदारी को एक संरचनात्मक आवश्यकता के रूप में स्वीकार कर रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि इस अधिनियम का उद्देश्य स्पष्ट है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसकी वास्तविकता को समझने के लिए वर्तमान स्थिति पर नजर डालना जरूरी है। आज लोकसभा की 543 सीटों में से केवल 74 सीटों पर महिलाएं हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो लगभग 13.6 प्रतिशत है। यह संख्या 2019 के 78 से थोड़ी कम है। वहीं देशभर में कुल 4666 सांसदों और विधायकों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत के आसपास है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 8360 उम्मीदवारों में केवल 797 महिलाएं थीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यानी लगभग 9.6 प्रतिशत</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और लगभग 28 प्रतिशत सीटों पर कोई महिला प्रत्याशी ही नहीं था। यह आंकड़े इस बात को स्पष्ट करते हैं कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अभी भी संरचनात्मक बाधाओं से घिरी हुई है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विपरीत यदि पंचायती राज संस्थाओं को देखा जाए तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। यहां महिलाओं की भागीदारी लगभग 46.6 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और कई राज्यों में यह 50 प्रतिशत से भी अधिक है। उत्तराखंड लगभग 56 प्रतिशत के साथ अग्रणी है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ भी इस दिशा में उल्लेखनीय हैं। यह अनुभव इस बात का प्रमाण है कि जब आरक्षण को सही तरीके से लागू किया जाता है तो महिलाएं न केवल प्रतिनिधित्व प्राप्त करती हैं बल्कि प्रभावी नेतृत्व भी प्रस्तुत करती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो 1957 में लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 5.46 प्रतिशत थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो धीरे धीरे बढ़कर 2024 में 13.6 प्रतिशत तक पहुंची है। यह वृद्धि महत्वपूर्ण जरूर है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। वैश्विक तुलना में भी भारत पीछे है। रवांडा में संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 64 प्रतिशत है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्यूबा में 53 प्रतिशत</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निकारागुआ में 52 प्रतिशत और संयुक्त अरब अमीरात में 50 प्रतिशत। इस परिप्रेक्ष्य में भारत का आंकड़ा अपेक्षाकृत कम है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो यह दर्शाता है कि केवल लोकतांत्रिक ढांचा पर्याप्त नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समावेशी नीतियों की भी आवश्यकता होती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी शक्ति वंदन अधिनियम इस कमी को दूर करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसके कार्यान्वयन से जुड़ी शर्तें इसे जटिल बना देती हैं। अधिनियम में जोड़ा गया अनुच्छेद 334</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">A </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्पष्ट करता है कि महिलाओं के लिए आरक्षण तब तक लागू नहीं होगा जब तक अगली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। इसका अर्थ यह है कि कानून पारित होने के बावजूद इसका प्रभाव तुरंत नहीं दिखेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यही बिंदु इस अधिनियम की सबसे बड़ी आलोचना का कारण भी बना हुआ है। 2021 की जनगणना पहले ही टल चुकी है और अब यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि नई जनगणना 2026 के बाद होगी। इसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया भी समय लेगी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि महिलाओं का आरक्षण 2029 या उससे भी बाद के चुनावों में लागू हो सकता है। इस देरी को कई विशेषज्ञ न्याय में विलंब के रूप में देखते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि सरकार और कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि बिना अद्यतन जनसंख्या आंकड़ों के सीटों का पुनर्वितरण करना उचित नहीं होगा। संविधान के अनुसार परिसीमन एक आवश्यक प्रक्रिया है ताकि प्रतिनिधित्व समान और संतुलित रहे। यदि पुराने आंकड़ों के आधार पर आरक्षण लागू किया जाता है तो भविष्य में इसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। इस प्रकार यह बहस केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अधिनियम के साथ एक और महत्वपूर्ण मुद्दा जुड़ा हुआ है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वह है संघीय संतुलन। परिसीमन की प्रक्रिया जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व का अनुपात बदल सकता है। दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए उन्हें यह आशंका है कि उनकी सीटें घट सकती हैं जबकि उत्तर भारत की सीटें बढ़ सकती हैं। यह स्थिति राजनीतिक तनाव को जन्म दे सकती है और संघीय ढांचे को चुनौती दे सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से भी यह अधिनियम पूरी तरह निर्विवाद नहीं है। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए उप आरक्षण का प्रावधान है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं की गई है। कई राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन इसे अधूरा कदम मानते हैं और </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">OBC </span><span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग करते हैं। यह मुद्दा भविष्य में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अतिरिक्त यह अधिनियम केवल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं तक सीमित है। राज्यसभा और विधान परिषद जैसे उच्च सदनों में महिलाओं के लिए कोई आरक्षण नहीं है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या यह सुधार वास्तव में व्यापक है या केवल आंशिक।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावहारिक स्तर पर भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। राजनीतिक दलों के भीतर महिलाओं को टिकट देने की प्रवृत्ति अभी भी सीमित है। चुनावी फंडिंग</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठनात्मक समर्थन और नेतृत्व प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी कम है। पंचायत स्तर पर देखे गए प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व के उदाहरण</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की जगह उनके परिजन निर्णय लेते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी एक संभावित खतरा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी इस अधिनियम के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। यह भारतीय लोकतंत्र में एक संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में कदम है। पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी ने यह सिद्ध कर दिया है कि अवसर मिलने पर महिलाएं प्रभावी नेतृत्व कर सकती हैं और नीति निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। यह अधिनियम उस अनुभव को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का प्रयास है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक ऐसा कानून है जो सिद्धांत रूप में अत्यंत प्रगतिशील है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन व्यवहार में कई जटिलताओं से घिरा हुआ है। यह महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी शीघ्रता और प्रभावशीलता के साथ लागू किया जाता है। यदि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रियाओं को समय पर पूरा कर लिया जाता है और राजनीतिक इच्छाशक्ति बनी रहती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह अधिनियम भारत के लोकतंत्र को अधिक समावेशी और संतुलित बना सकता है। अन्यथा यह केवल एक अधूरी संभावना बनकर रह सकता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>संपादकीय</category>
                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 19:03:14 +0530</pubDate>
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