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                <title>नारी शक्ति वंदन अधिनियम - Swatantra Prabhat</title>
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                            <item>
                <title>नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम - सुधांशु शुक्ला</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>अमेठी।</strong> नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर मटियारी हाउस गौरीगंज में एक भव्य आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी प्रतिष्ठित महिलाओं ने प्रतिभाग किया और अधिनियम के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में महिलाओं ने मीडिया से मुखातिब होते हुए इस अधिनियम को देश में लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं परिवर्तनकारी कदम बताया। इस अवसर पर भाजपा जिला अध्यक्ष सुधांशु शुक्ला ने कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सशक्त भागीदारी प्रदान करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> उन्होंने कहा कि</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176507/nari-shakti-vandan-act-is-a-historic-step-towards-women"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1-9.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>अमेठी।</strong> नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर मटियारी हाउस गौरीगंज में एक भव्य आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी प्रतिष्ठित महिलाओं ने प्रतिभाग किया और अधिनियम के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में महिलाओं ने मीडिया से मुखातिब होते हुए इस अधिनियम को देश में लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं परिवर्तनकारी कदम बताया। इस अवसर पर भाजपा जिला अध्यक्ष सुधांशु शुक्ला ने कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सशक्त भागीदारी प्रदान करने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> उन्होंने कहा कि लंबे समय से राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही है, जिसे संतुलित करने के लिए यह अधिनियम अत्यंत आवश्यक था। यह कानून महिलाओं को लोकसभा, राज्यसभा एवं विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान कर उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में सशक्त बनाएगा। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि अनीता सिंह ने कहा कि यह अधिनियम केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में महिलाओं के प्रति सोच और दृष्टिकोण को भी सकारात्मक रूप से परिवर्तित करेगा। उन्होंने कहा कि इससे महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता मिलेगी और वे आत्मविश्वास के साथ समाज के हर क्षेत्र में आगे बढ़ेंगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">  महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से नीति निर्माण में संवेदनशीलता आएगी, जिससे महिलाओं और बच्चों से जुड़े मुद्दों को बेहतर ढंग से समझा और हल किया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि यह अधिनियम भविष्य में एक सशक्त एवं समावेशी समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। जिला उपाध्यक्ष उपमा सरोज ने कहा कि यह कानून महिलाओं को संवैधानिक अधिकारों के तहत मजबूत आधार प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि इससे महिलाओं को न्याय और समानता के अधिकारों को और अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने का अवसर मिलेगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> उपमा सरोज ने कहा कि महिलाएं किसी भी क्षेत्र में आगे आती हैं तो वह किसी भी समस्या का समाधान भावनात्मक रूप से करती हैं हमारे देश में जितना महिला नेतृत्व बढ़ेगा उतना ही हमारा देश विकसित होगा। महिला ही नींव बनाती है कि हमारा भविष्य कैसा होगा हमारे देश का भविष्य कैसा होगा, जितना महिलाएं आगे आएंगी उतना ही हमारा देश तरक्की करेगा। इस अधिनियम में सभी वर्गों की महिलाओं को समान अवसर मिलेगा।  केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में भी सकारात्मक परिवर्तन लाएगा। इससे बालिकाओं को प्रेरणा मिलेगी और वे अपने भविष्य को लेकर अधिक जागरूक और आत्मनिर्भर बनेगी ,महिलाओं को समाज में सम्मान और पहचान मिलेगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> उन्होंने कहा कि जब महिलाएं निर्णय लेने वाले पदों पर पहुंचेंगी, तो स्वास्थ्य, पोषण और महिला कल्याण से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता मिलेगी, जिससे समाज का समग्र विकास सुनिश्चित होगा। कार्यक्रम में उपस्थित सभी महिलाओं ने एक स्वर में कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का महत्व केवल 33 प्रतिशत आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज में लैंगिक समानता की दिशा में एक सशक्त संदेश भी देता है। यह महिलाओं को राजनीतिक नेतृत्व में आगे आने के लिए प्रेरित करेगा और शासन व्यवस्था में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करेगा। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">महिलाओं ने यह भी कहा कि इस अधिनियम के लागू होने से पंचायत से लेकर संसद तक महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे समाज के सभी वर्गों की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा और नीतियां अधिक समावेशी एवं प्रभावी बनेंगी। अंत में सभी वक्ताओं ने इस अधिनियम का स्वागत करते हुए इसे महिलाओं के उज्जवल भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया और कहा कि इससे देश में महिला सशक्तिकरण को नई गति मिलेगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 20:07:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में उतरी महिलाएं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में आज सरसैया घाट स्थित नवीन सभागार में समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़ी महिलाओं ने एकजुट होकर प्रेस वार्ता की और इसे महिलाओं के प्रतिनिधित्व को सशक्त करने वाला ऐतिहासिक सुधार बताया। वक्ताओं ने कहा कि यह पहल देश के लोकतंत्र को नई दिशा देने के साथ-साथ आधी आबादी की भागीदारी को और मजबूत करेगी।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">अधिवक्ता एवं महिला अधिकारों के लिए कार्य करने वाली सोशल एक्टिविस्ट दिशा अरोड़ा ने बताया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं के प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक कमी को दूर करने वाला महत्वपूर्ण कदम है। महिलाओं में क्षमता हमेशा</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176494/women-came-out-in-support-of-nari-shakti-vandan-act"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1001837614.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर।</strong> नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में आज सरसैया घाट स्थित नवीन सभागार में समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़ी महिलाओं ने एकजुट होकर प्रेस वार्ता की और इसे महिलाओं के प्रतिनिधित्व को सशक्त करने वाला ऐतिहासिक सुधार बताया। वक्ताओं ने कहा कि यह पहल देश के लोकतंत्र को नई दिशा देने के साथ-साथ आधी आबादी की भागीदारी को और मजबूत करेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अधिवक्ता एवं महिला अधिकारों के लिए कार्य करने वाली सोशल एक्टिविस्ट दिशा अरोड़ा ने बताया कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं के प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक कमी को दूर करने वाला महत्वपूर्ण कदम है। महिलाओं में क्षमता हमेशा से रही है, लेकिन अवसर और भागीदारी सीमित थे। 33 प्रतिशत आरक्षण के साथ अब संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की आवाज अधिक मजबूती से गूंजेगी और वे नीति निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएंगी। उन्होंने इस पहल के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सामाजिक कार्यकर्ता सुभाषिनी शिवहरे ने बताया कि यह अधिनियम महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास और बदलती भूमिका का प्रतीक है। पहले महिलाएं वोट डालने की बात करती थीं, लेकिन अब वे नेतृत्व की भूमिका में आने के लिए आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से देश की आधी आबादी से जुड़े मुद्दे मजबूती से सामने आएंगे और उनका समाधान संभव होगा। 33 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को निर्णय लेने का अधिकार देगा, जिससे वे अपने मुद्दों को खुलकर रख सकेंगी। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में “प्रधान पति” जैसी चुनौतियाँ अभी भी हैं, लेकिन यह व्यवस्था तेजी से बदल रही है और महिलाएं अब वास्तविक नेतृत्व की ओर बढ़ रही हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 19:47:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मील का पत्थर साबित होगा नारी शक्ति वंदन अधिनियम </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">नारी शक्ति वंदन अधिनियम आज लोकसभा के पटल पर चर्चा के लिए रख दिया गया है। यह भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए मील का पत्थर साबित होगा। देश की राजनीति और भविष्य निर्माण में महिलाओं की भूमिका हमेशा से उल्लेखनीय रही है। भारतीय संविधान सभा में कुल 15 महिला सदस्य थीं। इन महिलाओं ने संविधान के मसौदे को तैयार करने और देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संविधान सभा के बाद महिलाओं ने संसद में भी एंट्री ली। भारतीय लोकतंत्र के सात दशकों के सफर में संसद की संरचना में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176346/nari-shakti-vandan-act-will-prove-to-be-a-milestone"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas14.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नारी शक्ति वंदन अधिनियम आज लोकसभा के पटल पर चर्चा के लिए रख दिया गया है। यह भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए मील का पत्थर साबित होगा। देश की राजनीति और भविष्य निर्माण में महिलाओं की भूमिका हमेशा से उल्लेखनीय रही है। भारतीय संविधान सभा में कुल 15 महिला सदस्य थीं। इन महिलाओं ने संविधान के मसौदे को तैयार करने और देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संविधान सभा के बाद महिलाओं ने संसद में भी एंट्री ली। भारतीय लोकतंत्र के सात दशकों के सफर में संसद की संरचना में कई बदलाव आए हैं, लेकिन अब एक बड़ा बदलाव अंतिम चरण में है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि महिलाएं सशक्त देती हैं और देश के शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी बढ़ती है, तो हमारे लोकतंत्र और समाज के लिए इससे बेहतर भला और क्या होगा। आधी आबादी को उनका हक मिलना सिर्फ न्याय नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य है। लेकिन जब हम महिला आरक्षण से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और इसके कानूनी पेचीदगियों को देखते हैं, तो साफ नजर आता है कि सरकार की मंशा इस मुद्दे पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसा लगता है कि इसे वास्तविक सशक्तिकरण के बजाय एक राजनीतिक हथियार के तौर पर अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। इस कानून की सबसे बड़ी और बुनियादी कमी इसका शतों में बंधा होना है। सरकार ने बिल तो पास कर दिया, लेकिन इसके साथ एक ऐसी शतं जोड़ दी जिसने इसे फिलहाल एक भविष्य का वादा बनाकर खेड़ दिया है। कानून के मुताबिक, आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना होगी और उसके आधार पर सीटों का नया चंटवारा यानी परिसीमन होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के माध्यम से लोकसभा में महिलाओं को मिलने वाला 33 प्रतिशत आरक्षण केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि उस असमानता को दूर करने का प्रयास है जो 1952 से लगातार चली आ रही है। लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ती रही है, हालांकि यह अब भी संतोषजनक स्तर तक नहीं पहुंची है। पहली लोकसभा में 22 महिलाएं चुनी गई थीं, जो कुल सदस्यों का 4.4 प्रतिशत थीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके बाद 1957 की दूसरी लोकसभा में यह संख्या बढ़कर 27 (5.4 प्रतिशत) हो गई और 1962 की तीसरी लोकसभा में 34 महिलाएं (6.7 प्रतिशत) सदन तक पहुंचीं।चौथी लोकसभा में यह संख्या थोड़ी घटकर 31 (5.9 प्रतिशत) रह गई, जबकि पांचवीं लोकसभा में केवल 22 महिलाएं (4.2 प्रतिशत) ही चुनी गईं। इसके बाद छठी लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी और कम होकर 19 (3.4 प्रतिशत) रह गई, लेकिन सातवीं लोकसभा में यह फिर बढ़कर 28 (5.1 प्रतिशत) हो गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आठवीं लोकसभा में महिलाओं की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई और 44 महिलाएं (8.11 प्रतिशत) चुनी गईं। हालांकि नौवीं लोकसभा में यह संख्या फिर घटकर 28 (5.3 प्रतिशत) रह गई, जबकि दसवीं लोकसभा में 36 महिलाएं (7 प्रतिशत) सांसद बनीं। इसके बाद 11वीं लोकसभा में 40 महिलाएं (7.4 प्रतिशत) और 12वीं लोकसभा में 44 महिलाएं (8 प्रतिशत) चुनी गईं। 13वीं लोकसभा में यह आंकड़ा बढ़कर 48 (8.8 प्रतिशत) हुआ, जबकि 14वीं लोकसभा में 45 महिलाएं (8.1 प्रतिशत) संसद पहुंचीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">15वीं लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी पहली बार दो अंकों में पहुंची, जब 59 महिलाएं (10.9 प्रतिशत) सांसद बनीं। 16वीं लोकसभा में यह संख्या और बढ़कर 62 हो गई, जो कुल संख्याबल का लगभग 11 प्रतिशत है। वहीं, 2019 की 17वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 78 रही जो कुल सांसदों का 14.3 प्रतिशत थी। वर्तमान 18वीं लोकसभा में मामूली बदलाव के साथ यह संख्या 74 पर है, जो पिछली बार से कम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान 18वीं लोकसभा में मामूली बदलाव के साथ यह संख्या 74 पर है, जो पिछली बार से कम है। कुल मिला कर यह वृद्धि सुखद तो है, लेकिन भारत की उस आधी आबादी की आकांक्षाओं के सामने नाकाफी है, जो देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में बराबर की हिस्सेदार है। हालांकि, साल 2026 की जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन ने महिला आरक्षण की राह को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार की नई योजना के अनुसार भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 की जा सकती है। इसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, क्योंकि सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम लागू करने जा रही है। कानून के आने से ऐसा पहली बार होगा जब भारतीय संसद में महिला सांसदों की संख्या एक साथ लगभग 200 की बढ़त दर्ज करेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण के लागू होने से केवल संख्या बल नहीं बदलेगा, बल्कि विधायी प्रक्रिया और नीति-निर्माण के मुद्दों में भी व्यापक बदलाव आने की उम्मीद है। शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षा जैसे विषयों पर सदन के भीतर अब और अधिक प्रखर और संवेदनशील बहसें देखने को मिलेंगी।जानकारों का मानना है कि इस लंबी प्रक्रिया के कारण यह आरक्षण 2029 या शायद 2034 तक खिंच सकता है। सवाल यह उठता है कि अगर नीयत साफ थी, तो इसे तुरंत मौजूदा सीटों पर ही क्यों लागू नहीं किया गया?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जनगणना और परिसीमन जैसी उलझी हुई प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर सरकार ने इसे एक ऐसे रास्ते पर डाल दिया है, जिसकी मंजिल का फिलहाल कोई पता नहीं है। जैसे ही सरकार सीटों के नए बंटवारे की बात करती है, दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता बढ़ जाती है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने पिछले कई सालों में जनसंख्या को काबू करने के लिए बहुत अच्छा काम किया है। अब तकनीकी दिक्कत यह है कि यदि सीटों का फैसला केवल आबादी के आधार पर होता है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की लोकसभा सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी और दक्षिण का राजनीतिक बजन कम हो जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आंकड़ों के हिसाब से देखें तो उत्तर भारत के कुछ राज्यों में सीटें अस्सी प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं, जबकि दक्षिण में यह बढ़ोतरी बहुत कम होगी। दक्षिण के राज्यों का कहना है कि उन्हें अच्छा काम करने की सजा दी जा रही है। सरकार ने इस क्षेत्रीय विवाद को सुलझाने का कोई पका रास्ता बताए बिना ही महिला आरक्षण को सीटों के बंटवारे से जोड़ दिया। इससे यह डर पैदा हो गया है कि महिलाओं को हक देने के नाम पर कहीं देश के अलग-अलग हिस्सों के बीच का तालमेल ही न बिगड़ जाए। इस बिल की एक और बड़ी व्यावहारिक चिंता प्रॉक्सी संस्कृति और रसूखदार राजनीतिक घरानों का कब्जा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसे आसान भाषा में समों तो यह नाम महिला का और काम पुरुष का वाली स्थिति है। गाँवों की पंच्चायतों में हमने अक्सर देखा है कि महिला चुनाव तो जीत जाती है, लेकिन दफ्तर में उसके पति, पिता या भाई बैठते हैं और सारे फैसले बही लेते हैं। इसे ही पति-सरपंच संस्कृति कहा जाता है। अब डर यह है कि विधानसभा और संसद में भी यही होगा। राजनीतिक पार्टियां जमीन से जुड़ी संघर्षशील महिलाओं के बजाय उन्हीं महिलाओं को टिकट देंगी जो पहले से ताकतवर राजनीतिक परिवारों से आती हैं। यानी एक आम महिला के लिए संसद के दरवाजे अभी भी बंद रह सकते हैं, क्योंकि आज के दौर में चुनाव लड़ना बहुत महंगा हो चुका है और महिलाओं के पास अपने खर्च के लिए पैसे नहीं होते।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिना सरकारी मदद या चुनावी खर्च में छूट के, यह आरक्षण केवल अमीर वर्ग की महिलाओं तक सिमट कर रह जाएगा।गौरतलब है कि आज से लोकसभा सभा का तीन दिवसीय विशेष सत्र शुरू हो रहा है। इस दौरान केंद्र सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर चर्चा कर इसे लागू करेगी। इसके लागू होने के बाद 2029 की लोकसभा में संसद में महिला सांसदों की संख्या 273 तक पहुंचने की उम्मीद है। यह आरक्षण केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के निर्माण में महिलाओं की बराबरी की दावेदारी का प्रमाण है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 19:26:49 +0530</pubDate>
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                <title>महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर लोकसभा में मंथन और राजनीति का नया दौर</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">लोकसभा में महिला आरक्षण कानून से जुड़े तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश होने के साथ ही देश की राजनीति एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। इन विधेयकों पर चर्चा के लिए सदन में लंबा समय तय किया गया है और इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन का बड़ा प्रश्न बन चुका है। चर्चा के लिए पहले मतदान हुआ जिसमें बहुमत ने इस विषय पर बहस को मंजूरी दी और अब सभी दल अपने अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">यह पूरा घटनाक्रम</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176340/brainstorming-in-lok-sabha-on-womens-reservation-amendment-bill-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/lok-sabha.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">लोकसभा में महिला आरक्षण कानून से जुड़े तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश होने के साथ ही देश की राजनीति एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। इन विधेयकों पर चर्चा के लिए सदन में लंबा समय तय किया गया है और इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन का बड़ा प्रश्न बन चुका है। चर्चा के लिए पहले मतदान हुआ जिसमें बहुमत ने इस विषय पर बहस को मंजूरी दी और अब सभी दल अपने अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह पूरा घटनाक्रम उस पृष्ठभूमि में हो रहा है जब वर्ष 2023 में महिला आरक्षण कानून को संसद से मंजूरी मिली थी। उस समय इसे नारी सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया था लेकिन इसके लागू होने की समयसीमा जनगणना और परिसीमन से जुड़ी शर्तों के कारण आगे खिसकती नजर आ रही थी। अब सरकार ने संशोधन के जरिए इन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और लागू करने की समयसीमा को आगे लाने की कोशिश की है ताकि वर्ष 2029 के आम चुनावों तक इसका प्रभाव दिखाई दे सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नए प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करने की योजना है। वर्तमान में यह संख्या 543 है। इस विस्तार के साथ ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है जिससे लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित होंगी। यह बदलाव केवल संख्या का नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व के स्वरूप का भी संकेत देता है क्योंकि इससे संसद में महिलाओं की भागीदारी में बड़ा उछाल आ सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार का तर्क है कि यह संशोधन सामाजिक न्याय और समान भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। उनका कहना है कि संविधान में संशोधन करने का अधिकार संसद को है और समय समय पर देश की जरूरतों के अनुसार ऐसे बदलाव जरूरी होते हैं। इस दृष्टिकोण के साथ सरकार यह भी स्पष्ट कर रही है कि परिसीमन की प्रक्रिया को नई जनगणना के बजाय 2011 के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा जिससे देरी कम हो और कानून जल्दी लागू हो सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं विपक्ष ने इस पूरे प्रस्ताव पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि महिला आरक्षण का वे समर्थन करते हैं लेकिन परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने के तरीके पर आपत्ति है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए राज्यों के बीच संतुलन बिगाड़ने की कोशिश हो रही है और यह संघीय ढांचे के लिए चुनौती बन सकता है। कुछ नेताओं ने इसे समाज को वर्गों में बांटने की साजिश भी बताया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक बहस का एक और महत्वपूर्ण पहलू मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने की मांग को लेकर सामने आया है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि अगर महिलाओं को आरक्षण दिया जा रहा है तो उसमें सभी वर्गों की महिलाओं को समान रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इसके जवाब में सरकार की ओर से यह कहा गया कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ है और यह संभव नहीं है। इस पर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे विवाद में परिसीमन सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा है। परिसीमन का मतलब है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण ताकि जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। अभी तक सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया जा रहा था लेकिन अब इसमें बदलाव का प्रस्ताव है। नए प्रस्ताव के तहत संसद को यह अधिकार दिया जाएगा कि वह तय करे कि किस जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन किया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बदलाव का असर राज्यों पर अलग अलग तरीके से पड़ सकता है। अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों को सीटों में बढ़ोतरी का लाभ मिलेगा जबकि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में सीटों का अनुपात घट सकता है। यही कारण है कि तमिलनाडु और अन्य राज्यों के नेताओं ने इसका विरोध किया है और इसे क्षेत्रीय असंतुलन की ओर कदम बताया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण के प्रभाव को समझने के लिए वर्तमान स्थिति पर नजर डालना जरूरी है। अभी लोकसभा में महिलाओं की संख्या बहुत कम है और कुल सदस्यों का लगभग चौदह प्रतिशत ही महिलाएं हैं। राज्यसभा में भी यह प्रतिशत बहुत ज्यादा नहीं है। वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत इस मामले में काफी पीछे है और कई छोटे देश भी महिलाओं के प्रतिनिधित्व में आगे हैं। ऐसे में यह कानून भारत को इस दिशा में आगे ले जाने की क्षमता रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इसके साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। आरक्षित सीटों का रोटेशन हर चुनाव में होगा जिससे नेताओं को अपने क्षेत्र बदलने पड़ सकते हैं। इसके अलावा राजनीतिक दलों को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा और अधिक संख्या में महिला उम्मीदवारों को तैयार करना होगा। यह बदलाव केवल कानून से नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति में परिवर्तन से ही सफल हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संविधान संशोधन होने के कारण इस विधेयक को पारित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता है। इसका मतलब है कि केवल साधारण बहुमत से काम नहीं चलेगा बल्कि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो तिहाई समर्थन जरूरी होगा। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार सरकार के पास बहुमत है लेकिन दो तिहाई समर्थन के लिए उसे अन्य दलों से भी सहयोग लेना पड़ सकता है। यही कारण है कि बैक चैनल बातचीत और राजनीतिक सहमति इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है बल्कि यह पिछले तीन दशकों से चर्चा में रहा है। कई बार इसे संसद में पेश किया गया लेकिन विभिन्न कारणों से यह पारित नहीं हो सका। वर्ष 2010 में इसे राज्यसभा से मंजूरी मिली थी लेकिन लोकसभा में पेश नहीं किया जा सका। अंततः वर्ष 2023 में इसे कानून का रूप मिला और अब संशोधन के जरिए इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि महिला आरक्षण केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। इसके जरिए महिलाओं को राजनीति में अधिक अवसर मिलेंगे और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। हालांकि इसके साथ जुड़े विवाद और चुनौतियां भी कम नहीं हैं और आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि संसद इस पर किस तरह सहमति बनाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंत में यह कहा जा सकता है कि यह विधेयक भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। यह तय करेगा कि देश सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों को किस हद तक लागू करने के लिए तैयार है। अगर यह सफल होता है तो यह आने वाले वर्षों में राजनीति के स्वरूप को बदल सकता है और महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम साबित हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 19:14:10 +0530</pubDate>
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                <title>क्या महिला आरक्षण बिल 2029 में लागू होगा या पंचायत के चुनाव में ही  सिर्फ लागू रहेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> भारतीय लोकतंत्र में १६अप्रैल के बाद नया अध्याय शुरू होगा।भारत में वैसे तो पंचायती राज  संस्थाओं में ७३ वे और ७५वे सम्बिधान संशोधन से महिलाओं को पंचायती राज के तीनों स्तर पर आरक्षण दे दिया गया था । परन्तु संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात पुरी नहीं हो पाई थी। कारण कि पुरूष सांसदों को अपनी संख्या कम हो जाने का भय था और महिलाओं के आरक्षण में अनु, सूचित जाति जन जाति मुसलमान और पिछड़े वर्गों की मांग के कारण  महिला आरक्षण विधेयक नहीं पास हो पाया  था । उस समय गठबन्धन की</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176045/will-the-womens-reservation-bill-be-implemented-in-2029-or"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/women-reservation-bill-3.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> भारतीय लोकतंत्र में १६अप्रैल के बाद नया अध्याय शुरू होगा।भारत में वैसे तो पंचायती राज  संस्थाओं में ७३ वे और ७५वे सम्बिधान संशोधन से महिलाओं को पंचायती राज के तीनों स्तर पर आरक्षण दे दिया गया था । परन्तु संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात पुरी नहीं हो पाई थी। कारण कि पुरूष सांसदों को अपनी संख्या कम हो जाने का भय था और महिलाओं के आरक्षण में अनु, सूचित जाति जन जाति मुसलमान और पिछड़े वर्गों की मांग के कारण  महिला आरक्षण विधेयक नहीं पास हो पाया  था । उस समय गठबन्धन की सरकार थी दो तिहाई बहुमत लोक सभा  में बिल पास कराने लायक नहीं था।भाजपा बिल का विरोध कर रही थी।  वह महिलाओं के आरक्षण में जातिगत आरक्षण के पक्ष में नहीं थी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष जातिगत आरक्षण चाहता था।आरक्षण में आरक्षण कैसे लागू हो महिलाओं का इस पर सहमति नहीं बन पाई थी। कांग्रेस ने मनमोहन सरकार में महिलाओं के आरक्षण के लिए लोकसभा में बिल लाया पर भाजपा के विरोध तथा सत्ता में गठबन्धन साथियों के कारण बिल नहीं पास हुआ फिर ठंडे बस्ते में रख दिया गया।उस समय संसद में सांसदों की संख्या बढ़ाने की बात भी नहीं हो रही थी कि पुरूष सांसदों की संख्या कम नहीं होंगी।फिर भी कांग्रेस ने महिलाओं के आरक्षण बिल को दूसरी बार लोक सभा में नहीं राज्य सभा से पास करवा दिया जहां पर वह बहुमत में थी।इस आशा विश्वास से अगर २०१४मे लोक सभा में बहुत मिलेगा तो बिल पास हो जायेगा और महिलाओं के लिए आरक्षण विधानसभा से सांसद तक हो जायेगा । </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु २०१४मे भाजपा की सरकार बन ग ई।  फिर भी   विपक्ष के बार बार आग्रह पर बिल नहीं पास हुआ ।भाजपा कांग्रेस के उस बिल को नहीं पास करवाना चाहती थी।फिर २०२२दोबारा भाजपा सरaकार में वापस आई तो महिला विधेयक को नये तरीक़े से बनाया गया और विधेयक का नाम नारी वन्दन विधेयक  दिया गया । लोक सभा राज्य सभा में  सार्थक रूप मेंबहस हुआ सुझाव व कुछ संशोधन भी किये गये फिर दोनों सदनों में बहुमत के साथ २०२३मे बिल पास  कर दिया गया।  जोअब एक काननी विधेयक बन गया है। परन्तु लागू करने की  समय सीमा पर सत्ता और विपक्ष में बहुत विवाद हुआ । विपक्ष चाहता था २०२४के चुनाव में लागू हो लेकिन सत्ता पक्ष ने नहीं माना और कहा जब न ई जनगणना हो जायेगी हर सीट का परसिमन होगा। तथा संसदों और विधानसभाओ की संख्या तैंतीस प्रतिशत बढ़ जायेगा  प्रदेश की आबादी के अनुसार संसद की सीटों की संख्या निर्धारित होगी। तभी नारी वन्दन आरक्षण लागू होगा ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संसदों की सख्या ८१६ होगी जिसमे२७३महिला सांसदों की संख्या होगी । यह पहले पन्द्रह साल के लिए ही लागू होगा फिर आगे बढ़ाने पर विचार होंगा।संसद और विधानसभाओं में आबादी के अनुसार जो सीटों को बढ़ाने की बात हो रही वह भी एक जटिल समस्या बन गया है  वर्तमान सरकार का कहना है जिस राज्य में जन संख्या कम है।  जो राज्य जनसंख्या वृद्धि दर को कम किया है उस राज्य में सांसदों की संख्या कम होगी । जिस राज्य में जन संख्या ज्यादा है उस राज्य में सांसदों की संख्या बढ़ जायेगी इस निती से दक्षिण के संसद की सीटों में वर्तमान की अपेक्षा बहुत कम संसद संख्या बढ़ेगी जो उनके लिए  नुकसानदायक होगा वह अपने राज्यों में अधिक संसदों की सख्या चाहते  हैं  उनका कहना जनसंख्या वृद्धि दर रोकर कोई अपराध नहीं किया है कि हमारे प्रदेश में संसदों की सख्या उत्तर-भारत के अनुसार कम हो उसी अनुपात में दक्षिण राज्यों की संसद की संख्या बढ़े।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसे नियम से यूं भी कहें उत्तर भारत के प्रदेशों में सांसदों की सख्या दक्षिण भारत की अपेक्षा ज्यादा होगी और दक्षिण भारत का जो अभी वर्चस्व है वह कम हो जायेगा।यह भी विशेष सत्र में चर्चा में आयेगा साथ में दक्षिण भारत से कम महिलाओं का संसद में प्रतिनिधित्व होगा।२०२९मे होने वाले संसद के चुनाव में लागू करना है पर अभी संशय बना हुआ हैं अब यह स्वयं १६अप्रैल को होने वाले विशेष संसद के सत्र में ही दूर होगा कि महिला आरक्षण कब और कैसे देश में लागु होगा आरक्षण संसदीय सीटों और विधानसभा में किस तरह लागू होगा महिलाओं को पंचायती राज की तरह जाति-आधारित आरक्षण होगा याआरक्षण में आरक्षण का क्या होगा कैसे होगा। विपक्ष शुरुआत से ही महिलाओं को जातिगत आधार पर आरक्षण मांगताआ रहा है। मुसलमान सांसद  मुस्लिम महिलाओं के लिए भी अलग से आरक्षण मांग रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अभी भारत में जनगणना शुरू हो रही  है।इस जनगणना में पहली बार जातियों की भी गणना होगी जो महिलाओं को जातिगत आरक्षण के लिए लाभ दायक होगा ‌यह जनगणना होने के बाद ही सही तौर पर पता चलेगा।अभी तो बस सबकी नजर संसद के विशेष सत्र पर टीका है।वैसे यह भाजपा की एक नई चाल है वह बंगाल के चुनाव को ध्यान में रख कर ही इस नारी वन्दन बिल के लिए विशेष सत्र बुलाया है।  वह बंगाल की सत्ता चाहता है।अगर वास्तव में महिलाओं को आरक्षण देने में ईमानदार होते तो २०२३मे  बिल पास होगया था पर २०२४मे लागू नहीं किया क्यों यह सवाल तो जनता में  है।अब क्या २०२९मे लागू होगा या उसके बाद यह अभी स्पष्ट नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सम्बिधानमे१२८वा संशोधन करके महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण दिया गया है आरक्षण मे ही अनुसूति जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण देने का प्रवधान है लेकिन इस आरक्षण में पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए पंचायती राज की तरह आरक्षण नहीं दिया गया है।इस पर विशेष सत्र में बात उठेगी यह अभी पता नहीं है परन्तु विपक्ष पिछड़े वर्ग की महिलाओ के लिए आरक्षण बराबर माग करता आ रहा है।और मुसलमान भी मांग रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नारी वन्दन बिल से आम नारी को बहुत लाभ नहीं मिलेगा जेबा कि पंचायती राज चुनाव में बहुत कम आम महिलाएं चुनाव जीत पाती है या लगती अधिकांश आरक्षित सीटों पर पहले से राजनीति में स्थापित परिवार कि महिलाओं को ही जीत मिलती है।यह बात संसद और विधानसभाओं के चुनाव में आरक्षण लागू होने के बाद होगा। आम महिलाएं  आरक्षण के सहारे संसद विधायक बनती है या पहले से स्थापित राजनेताओं की पत्नियां बेटी बहू ही आयेगी आरक्षण में।अभी तो लोग पति प्रधान बन कर चलते बाद विधायक पति गाड़ी प्पर लिख कर चलेंगे।महिला पीछे रहेगी पति आगे से विधायक संसद रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 21:14:53 +0530</pubDate>
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