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                <title>इजरायल ईरान तनाव - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>इजरायल ईरान तनाव RSS Feed</description>
                
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                <title>अमेरिकी-ईरान समझौते का सबसे बड़ा अवरोध, इजरायल की हमलावर नीति</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">विगत दिनों अमेरिका ईरान के बीच एक लंबा समझौता हुआ, समझौते में यह स्पष्ट हो गया था कि स्टेट ऑफ हारमोंस को ईरान द्वारा खोल दिया जाएगा किंतु फिर इजरायल द्वारा लेबनान में इस समझौता के बाद लगातार हमले किए गए जिससे लेबनान में फिर तबाही मच गई है और इस हमले के परिणाम स्वरूप ईरान ने स्टेट आफ हारमोंस को फिर बंद कर दिया है और यह भी शर्त रख दी है जब तक इसराइल लेबनान पर हमले करते रहेगा तब तक स्टेट ऑफ हारमोंस भी बंद रहेगा। ईरान लंबे समय से लेबनान के हिज़्बुल्लाह को अपना प्रमुख रणनीतिक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181765/the-biggest-obstacle-to-the-us-iran-agreement"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas17.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विगत दिनों अमेरिका ईरान के बीच एक लंबा समझौता हुआ, समझौते में यह स्पष्ट हो गया था कि स्टेट ऑफ हारमोंस को ईरान द्वारा खोल दिया जाएगा किंतु फिर इजरायल द्वारा लेबनान में इस समझौता के बाद लगातार हमले किए गए जिससे लेबनान में फिर तबाही मच गई है और इस हमले के परिणाम स्वरूप ईरान ने स्टेट आफ हारमोंस को फिर बंद कर दिया है और यह भी शर्त रख दी है जब तक इसराइल लेबनान पर हमले करते रहेगा तब तक स्टेट ऑफ हारमोंस भी बंद रहेगा। ईरान लंबे समय से लेबनान के हिज़्बुल्लाह को अपना प्रमुख रणनीतिक सहयोगी मानता आया है। यह संबंध केवल वैचारिक नहीं, बल्कि सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव से भी जुड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि इज़राइल लेबनान में व्यापक सैन्य अभियान चलाता है, तो तेहरान इसे अपने प्रभाव क्षेत्र पर सीधी चुनौती के रूप में देख सकता है। ऐसी स्थिति में ईरान के लिए मौन रहना भी कठिन होगा और प्रत्यक्ष युद्ध में उतरना भी जोखिमपूर्ण। दूसरी ओर अमेरिका की स्थिति और भी जटिल है। वह इज़राइल की सुरक्षा का सबसे बड़ा समर्थक है, परंतु वह यह भी जानता है कि यदि संघर्ष ईरान तक फैलता है, तो पूरा मध्य-पूर्व एक ऐसे युद्ध में बदल सकता है जिसकी आर्थिक और राजनीतिक कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी। तेल की कीमतों में उछाल, समुद्री व्यापार मार्गों पर संकट, वैश्विक महँगाई और ऊर्जा असुरक्षा ये सभी संभावित परिणाम अमेरिका की रणनीतिक चिंताओं का हिस्सा हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कूटनीति का सबसे कठिन क्षण वही होता है जब मित्र राष्ट्र युद्ध चाहते हों और राष्ट्रीय हित शांति की माँग कर रहे हों। अमेरिका आज इसी द्वंद्व से गुजरता दिखाई देता है। एक ओर वह इज़राइल का विश्वास खोना नहीं चाहता, दूसरी ओर ईरान के साथ संवाद के दरवाज़े भी पूरी तरह बंद नहीं करना चाहता। यही संतुलन आने वाले समय की सबसे कठिन कूटनीतिक परीक्षा है।</p>
<p style="text-align:justify;">ईरान भी आज वैसा नहीं है जैसा चार दशक पहले था। आर्थिक प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला है। युवा पीढ़ी बेहतर जीवन, रोजगार और वैश्विक अवसरों की अपेक्षा रखती है। ऐसे में अमेरिका के साथ किसी संभावित समझौते का अर्थ केवल प्रतिबंधों में राहत नहीं, बल्कि आर्थिक पुनर्जीवन भी है। इसलिए तेहरान के लिए युद्ध और संवाद—दोनों के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। इतिहास बताता है कि शांति और संघर्ष साथ-साथ चलते हैं। शीत युद्ध के दौर में भी परमाणु प्रतिस्पर्धा के बीच हथियार नियंत्रण संधियाँ हुईं</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व राजनीति का इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि युद्ध कभी केवल रणभूमि में नहीं लड़े जाते, वे सभ्यताओं की चेतना, अर्थव्यवस्थाओं की धड़कनों और कूटनीति की मेज़ों पर भी अपने गहरे निशान छोड़ जाते हैं। जब किसी सीमा पर पहला गोला दागा जाता है, उसी क्षण अनेक समझौतों की नींव भी हिलने लगती है। आज मध्य-पूर्व पुनः उसी मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से जमे अविश्वास को संवाद के माध्यम से कम करने की कोशिशें दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर इज़राइल और लेबनान के बीच बढ़ता सैन्य तनाव पूरे क्षेत्र को व्यापक युद्ध की ओर धकेलता प्रतीत हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सवाल यह नहीं कि युद्ध होगा या नहीं वास्तविक प्रश्न यह है कि यदि युद्ध की आग और भड़कती है, तो क्या अमेरिका और ईरान के बीच बनती हुई कूटनीतिक संभावनाएँ उसी आग में भस्म हो जाएँगी? मध्य-पूर्व केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन की धुरी है। विश्व की ऊर्जा आपूर्ति, सामरिक समुद्री मार्ग, धार्मिक आस्थाएँ और महाशक्तियों के रणनीतिक हित—सब यहाँ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसीलिए यहाँ की हर सैन्य घटना का प्रभाव वाशिंगटन, मॉस्को, बीजिंग, ब्रुसेल्स और नई दिल्ली तक महसूस किया जाता है। कई बार युद्ध ने वार्ता को जन्म दिया और कई बार वार्ता युद्ध को रोकने में असफल रही।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए यह मान लेना कि इज़राइल–लेबनान संघर्ष शुरू होते ही अमेरिका–ईरान समझौता समाप्त हो जाएगा, राजनीतिक यथार्थ का अत्यधिक सरलीकरण होगा। यह भी उतना ही सत्य है कि यदि संघर्ष सीमित न रहकर क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले लेता है, यदि हिज़्बुल्लाह, ईरान और अन्य क्षेत्रीय शक्तियाँ प्रत्यक्ष रूप से इसमें उतरती हैं, तो अमेरिका–ईरान संबंधों में अविश्वास की खाई और गहरी हो सकती है। तब कूटनीति की भाषा बारूद के शोर में दब जाएगी।।</p>
<p style="text-align:justify;">आज का विश्व बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। चीन अपने आर्थिक और सामरिक प्रभाव का विस्तार कर रहा है, रूस पश्चिमी दबावों का प्रतिरोध कर रहा है और यूरोप ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंतित है। ऐसे समय में मध्य-पूर्व का कोई भी बड़ा युद्ध केवल क्षेत्रीय संकट नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करेगा। यही कारण है कि विश्व की लगभग सभी प्रमुख शक्तियाँ युद्ध के विस्तार को रोकने में रुचि रखती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सबसे अधिक चिंता उस आम नागरिक की है जिसका न तो युद्ध से कोई लाभ है और न ही सत्ता की महत्वाकांक्षाओं से कोई संबंध। युद्ध की हर लपट सबसे पहले निर्दोष बच्चों, महिलाओं, बुज़ुर्गों और विस्थापित परिवारों को अपनी चपेट में लेती है। इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि निर्णय शासक लेते हैं और मूल्य समाज चुकाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत जैसे देशों के लिए भी यह संकट अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग पश्चिम एशिया से जुड़ा है। वहाँ रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा, व्यापारिक हित और समुद्री मार्गों की स्थिरता भारत की विदेश नीति के प्रमुख आयाम हैं। इसलिए भारत निरंतर संयम, संवाद और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करता आया है। यही नीति आज भी सबसे व्यावहारिक और दूरदर्शी प्रतीत होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब यह माना जा सकता है कि इज़राइल का लेबनान पर आक्रमण अमेरिका–ईरान संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित अवश्य करेगा, परंतु किसी भी संभावित समझौते का भविष्य केवल युद्ध नहीं, बल्कि उससे उत्पन्न राजनीतिक निर्णय तय करेंगे। यदि विवेक, संयम और कूटनीति को प्राथमिकता मिली, तो संवाद जीवित रहेगा। यदि प्रतिशोध, विस्तारवाद और शक्ति-प्रदर्शन हावी रहे, तो समझौतों की मेज़ें फिर वर्षों तक सूनी पड़ सकती हैं। मानव सभ्यता को यह स्वीकार करना होगा कि स्थायी शांति मिसाइलों के भंडार से नहीं, बल्कि विश्वास के निर्माण से आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हथियार भय पैदा कर सकते हैं, सम्मान नहीं; युद्ध सीमाएँ बदल सकते हैं, इतिहास नहीं; और कूटनीति ही वह सेतु है, जिस पर चलकर शत्रु भी भविष्य के साझेदार बन सकते हैं।आज मध्य-पूर्व केवल युद्ध के कगार पर नहीं खड़ा है, बल्कि मानवता की सामूहिक बुद्धिमत्ता की परीक्षा के सामने भी खड़ा है। आने वाले दिनों में लिए जाने वाले निर्णय यह तय करेंगे कि इतिहास आने वाली पीढ़ियों को बारूद की विरासत देगा या संवाद की संस्कृति।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 17:48:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>धोखा और नाकामी का मसौदा रही इस्लामाबाद वार्ता </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">करीब डेड़ महीने से से अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। 21 घंटे की चर्चा के बावजूद ईरान और अमेरिका में आपसी सहमति नहीं बन पाई तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपने लाव-लश्कर के साथ अमेरिका वापस लौट गए और जाते-जाते कह गए कि यह ईरान के लिए बुरी खबर है कि कोई समझौता नहीं हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन जो ईरान 28 फरवरी को अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई की शहादत से लेकर मिनाब में डेढ़ सौ बच्चियों की जान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175979/islamabad-talks-remained-a-draft-of-deception-and-failure"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/on3hke0s_america-iran_625x300_12_april_26.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">करीब डेड़ महीने से से अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा खत्म हो गई। 21 घंटे की चर्चा के बावजूद ईरान और अमेरिका में आपसी सहमति नहीं बन पाई तो अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अपने लाव-लश्कर के साथ अमेरिका वापस लौट गए और जाते-जाते कह गए कि यह ईरान के लिए बुरी खबर है कि कोई समझौता नहीं हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन जो ईरान 28 फरवरी को अपने सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई की शहादत से लेकर मिनाब में डेढ़ सौ बच्चियों की जान जाने तक कई बुरी खबरों को झेलकर भी अपनी शर्तों पर टिका हुआ है, उसे अमेरिका भला एक वार्ता के विफल होने से क्या हिला पाएगा। असल में तो इस्लामाबाद वार्ता की असफलता अमेरिका के लिए बुरी खबर है, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य की चाबी अब भी ईरान के हाथ में ही है और इससे भी बढ़कर उसके पास सिर न झुकाने का जो जज्बा है, वो अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप  के पास नहीं है। ट्रंप नेतन्याहू की मर्जी से युद्ध छेड़ते हैं और समझौता भी नहीं कर पाते, क्योंकि नेतन्याहू ऐसा नहीं चाहते।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें बीते दिनों न्यूयार्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें बताया गया कि बेंजामिन नेतन्याहू 11 फरवरी को अमेरिका में थे, जहां उन्होंने ट्रंप के सामने एक पूरी रणनीति बताई थी कि ईरान पर हमला करना चाहिए, क्योंकि वह अभी कमजोर है। इससे ईरान में सत्ता बदली जा सकती है और उसके संसाधनों पर कब्जा भी किया जा सकता है। नेतन्याहू ऐसे ही प्रस्ताव पहले बराक ओबामा, जो बाइडेन और जार्ज बुश को भी दे चुके थे, लेकिन इन तीनों राष्ट्रपतियों ने अपने कार्यकाल में ऐसा कोई फैसला नहीं लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह खुलासा पूर्व विदेश मंत्री जॉन केरी ने हाल ही में किया है। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप नेतन्याहू की बात मानने को मजबूर हो गए। क्या इसके पीछे एपस्टीन फाइल्स के खुलासे हैं, इस सवाल का जवाब अभी मिलना बाकी है। बहरहाल, यह वार्ता बेनतीजा रही, क्योंकि एक तरफ इजरायल लेबनान पर अपने हमले नहीं रोक रहा था, जबकि ईरान की 10 शर्तों में यह एक अहम शर्त थी कि लेबनान पर हमले रुकने चाहिए। दूसरी तरफ अमेरिका ने भी अपने रुख में इंच भर का बदलाव नहीं दिखाया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अमेरिका-ईरान वार्ता बिना नतीजे के खत्म हो गई. लेकिन बातचीत के नाम पर असली फायदा डोनाल्ड ट्रंप ने उठाया है. अमेरिका ने होर्मुज में माइंस हटाने वाले जहाज भेज दिए हैं. वहीं पाकिस्तान ने भी सऊदी अरब में जेट भेजे हैं. इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या बातचीत के नाम पर ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई गई. कहीं बातचीत में उलझाकर उसे फिर से धोखा तो नहीं दिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्योंकि बातचीत के बीच ही अमेरिका ने माइंस हटाने के लिए अपने दो सैन्य जहाजों को होर्मुज के पार ईरान के पास भेज दिया है. करीब 21 घंटे तक चली मैराथन बातचीत के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को खाली हाथ लौटना पड़ा. वेंस ने साफ कहा कि अमेरिका ने अपनी ‘रेड लाइन’ बता दी थी, लेकिन ईरान ने उन्हें मानने से इनकार कर दिया. दूसरी तरफ ईरान का आरोप है कि अमेरिका ने जरूरत से ज्यादा शर्तें थोप दीं और बातचीत को संतुलित नहीं रखा.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यहां यह भी गौरतलब है कि दोनों पक्षों के बीच 5 अहम मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य, परमाणु कार्यक्रम, युद्ध की भरपाई, ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाना और ईरान के खिलाफ तथा पूरे क्षेत्र में चल रहे युद्ध को पूरी तरह खत्म करने जैसे विषय शामिल रहे। लेकिन इन मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई। अमेरिका न ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए तैयार हुआ, न उसने होर्मुज पर अपना रुख साफ किया। दरअसल पिछले दस दिनों में ही ट्रम्प दो बिल्कुल अलग-अलग बातें कह चुके हैं। पहले उन्होंने कहा था कि होर्मज में अमेरिका की कोई खास दिलचस्पी नहीं है, अमेरिका को वहां से गुजरने वाले तेल की जरूरत नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">फिर कुछ ही दिनों बाद उन्होंने कहा कि यह अमेरिका की मांगों का सबसे जरूरी हिस्सा है, और अगर इसे खुला नहीं रखा गया तो कोई बातचीत नहीं हो सकती। वैसे यह तय है कि होर्मुज बनारसमध्य पर अमेरिका अपना कब्जा चाहता है, क्योंकि ईरान ते इस पर न केवल नाकेबंदी की है, बल्कि अब शुल्क चिनेको एरुआत भी कर दी है और ट्रंप इससे बुरी तरह गए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरानी संसद से मंजूरी मिलने के बाद अब नामिरिखोलूश्यनरी गाईस कॉर्पस को होर्मुज से गुजरने पाहा से शुल्क वसूलने का अधिकार मिल गया है। एक बेरल तेल पर एक डॉलर ईरान वसूलेगा, साथ ही क्रिप्टो करेंसी में भुगतान की व्यवस्था भी होगी, ताकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का कोई असर न पड़े। ईरान की इस रणनीति से उसे आर्थिक मजबूती मिलेगी, अमेरिका को इस बात का अहसास हो चुका है। इसलिए अब उसने फिर से अपने पत्ते फेंटने शुरु किए हैं, ताकि युद्ध को जायज ठहरा सके। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इस युद्ध ने एक तरफ ईरान और खाड़ी देशों समेत पूरी दुनिया में घोर तबाही मचाई है, वहीं एक नयी वैश्विक व्यवस्था भी तैयार की है, जिसमें ईरान निस्संदेह एक आदर्श की तरह उभरा है। ईरान ने संदेश दे दिया है कि महाशक्ति की अवधारणा और उसके हौव्वे को आत्मबल से कैसे तोड़ा जा सकता है। अब अन्य देशों को भी यह प्रेरणा मिली है कि वे अमेरिकी शर्तों के आगे झुकने से इंकार करने की हिम्मत दिखाएं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने फाइटर जेट तैनात कर दिए. यह तैनाती दोनों देशों के रक्षा समझौते के तहत की गई, लेकिन इसे ईरान के लिए एक सख्त संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है. यह अमेरिका की दोहरी रणनीति थी ताकि एक तरफ बातचीत के जरिए समाधान का दिखावा किया जाए, दूसरी तरफ सैन्य दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाई घटनाक्रम की तुलना 28 फरवरी की उस घटना से भी की जा रही है, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया था. यह हमला ऐसे समय में किया गया था जब दोनों देशों के बीच बातचीत चल रही थी. जब किसी को हमले की उम्मीद नहीं थी तब ईरान पर अटैक हुआ, जिसमें सुप्रीम लीडर अली खामेनेई मारे गए. इस बात का खतरा पहले से था कि कहीं अमेरिका बातचीत के बीच धोखा न दे दे वही हुआ अब ईरान को और मजबूती से खड़े होने की जरूरत होगी।</div>]]></content:encoded>
                
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                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 19:25:36 +0530</pubDate>
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