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                <title>Legal System India - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>नया न्यायिक सवेरा – जब न्याय समय पर मिले, तो हर घाव भर जाता है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180348/new-judicial-dawn-%E2%80%93-when-justice-is-delivered-on-time"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images11.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय न्याय व्यवस्था में कुछ फैसले केवल कानूनी आदेश नहीं होते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि बदलाव की नई दिशा तय करते हैं। </span>29 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश ऐसा ही एक ऐतिहासिक हस्तक्षेप है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी हाईकोर्टों को स्पष्ट किया कि सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित (रिजर्व) रखा गया कोई भी फैसला सामान्यतः तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रहना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद </span>142 <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत जारी यह निर्देश महज प्रशासनिक व्यवस्था नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय की मूल भावना को सशक्त करने का प्रयास है। वर्षों से न्यायालयों में गूंज रही “तारीख पर तारीख” की संस्कृति पर इसे एक निर्णायक और दूरगामी प्रहार माना जा रहा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">न्याय की सबसे बड़ी कसौटी केवल निर्णय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसका समय पर मिलना है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायिक प्रक्रिया की उस गंभीर खामी पर प्रहार करता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे लाखों मुकदमेबाज वर्षों से प्रभावित होते रहे हैं। अनेक मामलों में बहस पूरी होने के बाद फैसले सुरक्षित रख लिए जाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उन्हें महीनों या वर्षों तक सुनाया नहीं जाता था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परिणामस्वरूप पक्षकार कानूनी अनिश्चितता में जीने को विवश हो जाते थे और उनका रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">व्यवसाय तथा भविष्य अदालत के निर्णय की प्रतीक्षा में अटक जाता था। इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक फैसलों का अनिश्चितकाल तक लंबित रहना स्वीकार्य नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि न्याय का अर्थ केवल सुनवाई नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर निर्णय भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस आदेश की शक्ति उसके संवैधानिक आधार में निहित है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद </span>21 <span lang="hi" xml:lang="hi">केवल जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समय पर न्याय की अपेक्षा का भी संरक्षक है। जब किसी व्यक्ति का सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भविष्य या स्वतंत्रता किसी फैसले पर निर्भर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब निर्णय में अनावश्यक देरी उसके मौलिक अधिकारों को प्रभावित करती है। इसलिए न्यायालय ने समयबद्ध न्याय को महज प्रशासनिक आवश्यकता नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संवैधानिक दायित्व माना है। न्यायमूर्ति सूर्य कांत का यह कथन कि उन्होंने अपने लगभग पंद्रह वर्षों के हाईकोर्ट कार्यकाल में कभी किसी रिजर्व फैसले को तीन महीने से अधिक लंबित नहीं रखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी न्यायपालिका के लिए एक प्रेरक मानक प्रस्तुत करता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने सबसे स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि जमानत याचिकाओं पर आदेश आदर्श रूप से उसी दिन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अथवा अधिकतम अगले दिन जारी हो तथा इसकी सूचना तत्काल जेल प्रशासन तक पहुंचे। यह उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए बड़ी राहत है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो दोषसिद्धि के बिना लंबे समय से कारावास में हैं। न्यायालय का स्पष्ट मत है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रक्रियागत देरी की भेंट नहीं चढ़ाया जा सकता। जमानत मंजूर होने के बाद उसका त्वरित लाभ मिलना ही वास्तविक न्याय है। इससे न केवल जेलों का बोझ घटेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्यायपालिका में जनविश्वास भी और मजबूत होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस ऐतिहासिक निर्देश की सबसे बड़ी ताकत उसका जवाबदेह निगरानी तंत्र है। सुप्रीम कोर्ट ने केवल समय-सीमा तय नहीं की</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसके पालन की ठोस व्यवस्था भी सुनिश्चित की है। तीन महीने के भीतर फैसला न आने पर मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर दूसरी पीठ को सौंपा जा सकेगा। साथ ही लंबित रिजर्व मामलों की निगरानी के लिए डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह व्यवस्था पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगी। वहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जटिल मामलों के लिए सीमित छूट का प्रावधान रखकर न्यायालय ने व्यावहारिक संतुलन भी बनाए रखा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">यह पहल केवल लंबित फैसलों के निस्तारण का उपाय नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि न्याय व्यवस्था की कार्यसंस्कृति में बदलाव का स्पष्ट संकेत है। देश में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं और लगातार स्थगन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लंबी सुनवाई तथा निर्णयों में देरी ने आम नागरिक के मन में न्याय को एक थकाऊ और अंतहीन प्रक्रिया बना दिया था। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बताता है कि शीर्ष अदालत अब केवल अंतिम फैसले सुनाने तक सीमित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र को अधिक उत्तरदायी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। समयबद्ध निर्णयों की संस्कृति विकसित होने से न्यायालयों की कार्यक्षमता बढ़ेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और मुकदमों के निस्तारण की गति को नई ऊर्जा मिलेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बेशक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस सुधार की राह पूरी तरह आसान नहीं है। कई हाईकोर्ट न्यायाधीशों की कमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बढ़ते मुकदमों के बोझ और जटिल मामलों की चुनौती से जूझ रहे हैं। कुछ मामलों में गहन अध्ययन के कारण निर्णय में अतिरिक्त समय भी स्वाभाविक है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक संतुलन बनाए रखा है। अतिरिक्त पीठों का गठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल तकनीक का विस्तार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वैज्ञानिक केस मैनेजमेंट और प्रशासनिक दक्षता में सुधार इस बदलाव को गति दे सकते हैं। इन उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन से न्यायिक प्रक्रिया की रफ्तार और गुणवत्ता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">दोनों में उल्लेखनीय सुधार संभव है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी भी न्यायिक सुधार की असली कसौटी उसका प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर होता है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश मुकदमेबाजों को भरोसा देता है कि सुनवाई पूरी होने के बाद उनका मामला अनिश्चित प्रतीक्षा में नहीं रहेगा। किसान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्यमवर्ग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उद्योग जगत और समाज के कमजोर वर्गों के लिए समयबद्ध न्याय नई उम्मीद लेकर आएगा। समय पर मिला न्याय कानून की प्रतिष्ठा और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनविश्वास को मजबूत करता है। यदि इस निर्देश का प्रभावी पालन हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो “तारीख पर तारीख” की संस्कृति अतीत बन सकती है और “समय पर न्याय” भारतीय न्याय व्यवस्था की नई पहचान।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 22:40:55 +0530</pubDate>
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                <title>दिल्ली हाईकोर्ट में हड़कंप: चीफ जस्टिस की कोर्ट में वर्चुअल सुनवाई के दौरान चला अश्लील वीडियो; जांच के आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार को उस समय अजीबोगरीब और शर्मनाक स्थिति पैदा हो गई, जब मुख्य न्यायाधीश की अदालत में एक मामले की वर्चुअल कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए सुनवाई की तैयारी चल रही थी। जैसे ही जज अपनी कुर्सी पर बैठे, अचानक वीसी सिस्टम पर अश्लील वीडियो प्ले होने लगा। इस अप्रत्याशित घटना से कोर्टरूम में मौजूद जज, वकील और कर्मचारी सन्न रह गए।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के मुताबिक, यह घटना तब हुई जब हाईकोर्ट अपनी नियमित कार्यवाही शुरू करने वाली थी। बताया जा रहा है कि अश्लील वीडियो एक बार नहीं बल्कि दो बार चला। इस स्थिति को देखते</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177752/panic-in-delhi-high-court-obscene-video-played-during-virtual"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(4).jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार को उस समय अजीबोगरीब और शर्मनाक स्थिति पैदा हो गई, जब मुख्य न्यायाधीश की अदालत में एक मामले की वर्चुअल कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए सुनवाई की तैयारी चल रही थी। जैसे ही जज अपनी कुर्सी पर बैठे, अचानक वीसी सिस्टम पर अश्लील वीडियो प्ले होने लगा। इस अप्रत्याशित घटना से कोर्टरूम में मौजूद जज, वकील और कर्मचारी सन्न रह गए।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के मुताबिक, यह घटना तब हुई जब हाईकोर्ट अपनी नियमित कार्यवाही शुरू करने वाली थी। बताया जा रहा है कि अश्लील वीडियो एक बार नहीं बल्कि दो बार चला। इस स्थिति को देखते हुए तुरंत एहतियातन वीसी सिस्टम को बंद कर दिया गया और तकनीकी टीम को बुलाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">सूत्रों के हवाले से खबर है कि यह वीडियो श्रीधर सार्नोबत और शितजीत सिंह नामक व्यक्तियों के लॉग-इन आईडी से जुड़ा पाया गया है।हालांकि, इस मामले में अभी आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है कि क्या यह किसी की जानबूझकर की गई शरारत थी या सिस्टम की सुरक्षा में कोई सेंध लगाई गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालतों में हाइब्रिड और वर्चुअल सुनवाई की व्यवस्था पारदर्शी न्याय के लिए की गई है, लेकिन इस घटना ने इसके मॉनिटरिंग सिस्टम की खामियों को उजागर कर दिया है। घटना के तुरंत बाद एहतियात के तौर पर वीसी सिस्टम को ठप कर दिया गया ताकि आगे ऐसी स्थिति न बने और हाई कोर्ट की आईटी व तकनीकी टीम को इस मामले की गहन जांच के निर्देश दिए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलहाल, इस पूरी घटना के लिए जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया चल रही है और यह स्पष्ट किया गया है कि दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:18:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बॉम्बे हाईकोर्ट ने खीझ कर 90 साल के बुजुर्ग के अवमानना केस की तारीख़ लगा दी साल 2046 की</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">बॉम्बे कोर्ट ने 90 साल के एक बुजुर्ग को अगली तारीख़ साल 2046 की लगा दी है। यानी 20 साल बाद की। अगली तारीख़ आने तक क्या बुजुर्ग अदालत जाने की स्थिति में होंगी? दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला खीझकर दिया है। एक बुजुर्ग महिला द्वारा दायर 9 साल पुराने मानहानि के केस में यह बेहद असामान्य और सख्त फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने इस मामले को 2046 तक के लिए इसलिए टाल दिया क्योंकि कोर्ट को लगा कि यह केस दो बुजुर्गों के बीच अहंकार की लड़ाई है, जिसकी वजह से कोर्ट का बहुमूल्य समय बर्बाद हो रहा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177591/bombay-high-court-angrily-dates-the-contempt-case-of-a"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/bombay-highcourt_1713880877.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बॉम्बे कोर्ट ने 90 साल के एक बुजुर्ग को अगली तारीख़ साल 2046 की लगा दी है। यानी 20 साल बाद की। अगली तारीख़ आने तक क्या बुजुर्ग अदालत जाने की स्थिति में होंगी? दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला खीझकर दिया है। एक बुजुर्ग महिला द्वारा दायर 9 साल पुराने मानहानि के केस में यह बेहद असामान्य और सख्त फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने इस मामले को 2046 तक के लिए इसलिए टाल दिया क्योंकि कोर्ट को लगा कि यह केस दो बुजुर्गों के बीच अहंकार की लड़ाई है, जिसकी वजह से कोर्ट का बहुमूल्य समय बर्बाद हो रहा है। इसलिए इस मामले को अगले 20 साल तक नहीं सुना जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन ने 28 अप्रैल 2026 को दिए गए आदेश में साफ़ लिखा, 'यह उन मामलों में से एक है जिसमें अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पार्टियों के बीच अहंकार की लड़ाई कोर्ट सिस्टम को जाम कर रही है। इससे उन अहम मामलों को सुनने का मौका नहीं मिल पाता जो वाकई प्राथमिकता के हैं।'</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता सीनियर सिटीजन या सुपर सीनियर सिटीजन हैं, इसलिए भी इस मामले को कोई प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। आदेश में साफ़ तौर पर लिखा गया, 'इस मामले को 2046 के बाद सूचीबद्ध किया जाए। किसी भी स्थिति में इसे सीनियर सिटीजन होने के आधार पर प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। यह साफ़ तौर पर कहा जाता है कि 2046 से पहले इस मामले को कभी भी सुनवाई के लिए नहीं लिया जाएगा।'</p>
<p style="text-align:justify;">यह विवाद श्याम को-ऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी में 2015 के वार्षिक आम बैठक से शुरू हुआ। सोसाइटी ने दो महिलाओं- लगभग 90 वर्षीय तारिणीबेन देसाई और दूसरी महिला- को सोसाइटी से निकालने का प्रस्ताव पास किया था। इन महिलाओं ने सोसाइटी के नोटिस, पत्र और प्रस्ताव को मानहानिकारक बताते हुए 2017 में कोर्ट में मुक़दमा दायर किया और 20 करोड़ रुपये का मुआवजा मांगा। उनका आरोप था कि इन पत्रों की वजह से उन्हें मानसिक परेशानी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने पहले कई बार समझौता कराने की कोशिश की। एक बार तो कहा गया कि अगर सोसाइटी बिना शर्त माफी मांग ले तो मामला सुलझ सकता है, लेकिन 90 वर्षीय तारिणीबेन देसाई माफी स्वीकार करने को तैयार नहीं हुईं और केस आगे बढ़ाने पर अड़ी रहीं। 27 मार्च 2025 को जब मामला सुनवाई के लिए आया तो न तो महिलाएं कोर्ट में आईं और न ही उनके वकील। कोर्ट ने सख्त चेतावनी दी थी। अब 28 अप्रैल 2026 को न्यायमूर्ति जितेंद्र जैन ने पूरे मामले को 20 साल के लिए फ्रीज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा, 'मैं इस मामले पर और कुछ नहीं कहना चाहता, बस अगले 20 साल तक इसे न उठाया जाए।'</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट का मानना है कि छोटे-छोटे अहंकार और व्यक्तिगत झगड़ों के कारण कोर्ट का समय उन गंभीर मामलों से छीन लिया जाता है, जिनमें आम लोगों की जान-माल, संपत्ति या अधिकारों से जुड़े बड़े मुद्दे होते हैं। यह फैसला कोर्ट की बढ़ती खीझ का नतीजा बताया जा रहा है, जहां छोटे-मोटे झगड़ों में सालों-साल तक समय बर्बाद होता रहता है। यह ख़बर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई है। कई लोग कोर्ट के इस फैसले की तारीफ़ कर रहे हैं, तो कुछ इसे बहुत सख्त बता रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:49:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राजा रघुवंशी हत्याकांड प्रकरण और न्याय की चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">राजा रघुवंशी का प्रकरण आधुनिक समय की उन सबसे हृदयविदारक घटनाओं में से एक है जिसने भारतीय समाज की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। यह मात्र एक आपराधिक घटना नहीं है बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, अटूट विश्वास और विश्वासघात की पराकाष्ठा का एक ऐसा दस्तावेज है जो हमारी न्याय प्रणाली की सूक्ष्मताओं को भी कटघरे में खड़ा करता है। वर्ष 2025 में आरंभ हुई यह दुखद कथा 2026 में भी जनमानस के बीच गहन विमर्श का केंद्र बनी हुई है, विशेषकर उस समय जब इस संपूर्ण प्रकरण की मुख्य अभियुक्त को न्यायालय से सशर्त मुक्ति प्राप्त</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177571/article-raja-raghuvanshi-murder-case-and-challenges-of-justice"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/raja-raghuvanshi-murder-case-2026-04-28-16-09-36.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजा रघुवंशी का प्रकरण आधुनिक समय की उन सबसे हृदयविदारक घटनाओं में से एक है जिसने भारतीय समाज की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। यह मात्र एक आपराधिक घटना नहीं है बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, अटूट विश्वास और विश्वासघात की पराकाष्ठा का एक ऐसा दस्तावेज है जो हमारी न्याय प्रणाली की सूक्ष्मताओं को भी कटघरे में खड़ा करता है। वर्ष 2025 में आरंभ हुई यह दुखद कथा 2026 में भी जनमानस के बीच गहन विमर्श का केंद्र बनी हुई है, विशेषकर उस समय जब इस संपूर्ण प्रकरण की मुख्य अभियुक्त को न्यायालय से सशर्त मुक्ति प्राप्त हुई है। इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया है कि कभी-कभी वास्तविकता किसी भी काल्पनिक कथा से अधिक भयावह और विचलित करने वाली हो सकती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस संपूर्ण घटनाक्रम की जड़ें इंदौर के एक सामान्य परिवार से जुड़ी हैं। इंदौर के निवासी राजा रघुवंशी का विवाह 11 मई 2025 को सोनम के साथ अत्यंत हर्षोल्लास के वातावरण में संपन्न हुआ था। परिवार के सदस्यों और मित्रों के अनुसार यह एक अत्यंत सुखी और सामान्य विवाह प्रतीत होता था, जिसमें किसी भी प्रकार के तनाव या विवाद की कोई सुगबुगाहट नहीं थी। विवाह के पश्चात के रीति-रिवाजों को पूर्ण करने के बाद, अपनी नई जीवन यात्रा को स्मरणीय बनाने के उद्देश्य से यह दंपति 20 मई 2025 के आसपास मेघालय की प्राकृतिक छटाओं का आनंद लेने के लिए प्रस्थान कर गया। उस समय किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि खुशियों की यह खोज एक भयानक त्रासदी में परिवर्तित होने वाली है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मेघालय की वादियों में भ्रमण के दौरान 23 मई 2025 वह अंतिम तिथि थी जब राजा और सोनम को अंतिम बार एक साथ देखा गया था। इसके पश्चात अचानक उनका अपने परिवार से संपर्क विच्छेद हो गया। कई घंटों तक कोई सूचना न मिलने और संचार के सभी साधन बंद होने के कारण परिवार की चिंता बढ़ती गई। अंततः स्थानीय प्रशासन और पुलिस को इस संदर्भ में सूचित किया गया। इसके पश्चात एक व्यापक खोज अभियान का सूत्रपात हुआ जिसमें स्थानीय पुलिस बल के साथ-साथ आपदा प्रबंधन दल और अन्य जांच एजेंसियों ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। कई दिनों की निरंतर खोज और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का सामना करने के पश्चात 2 जून 2025 को राजा का निष्प्राण शरीर एक अत्यंत गहरी खाई से बरामद किया गया। इस समाचार ने न केवल रघुवंशी परिवार को अपूर्णीय क्षति पहुँचाई बल्कि संपूर्ण देश में सनसनी फैला दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रारंभिक स्तर पर यह मामला एक रहस्यमय दुर्घटना प्रतीत हो रहा था क्योंकि राजा की पत्नी सोनम उस स्थान से लापता थी। पुलिस ने अपनी जांच की दिशा बदली और विभिन्न राज्यों में तलाशी अभियान चलाया। अंततः 8 जून 2025 को पुलिस को एक बड़ी सफलता मिली जब सोनम को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से बंदी बना लिया गया। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, वैसे-वैसे इस घटना के पीछे छिपे काले सत्यों की परतें खुलने लगीं। जांच अधिकारियों ने उद्भेदन किया कि राजा की मृत्यु कोई संयोग या दुर्घटना नहीं थी, अपितु यह एक अत्यंत सुव्यवस्थित और क्रूर षड्यंत्र का परिणाम थी। पुलिस के दावों के अनुसार, सोनम ने अपने कथित प्रेमी राज कुशवाहा और 3 अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर इस जघन्य अपराध की रूपरेखा तैयार की थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जांच में यह तथ्य प्रकाश में आया कि हत्या की इस वारदात को मेघालय के सोहरा क्षेत्र के अत्यंत दुर्गम और एकांत स्थान पर अंजाम दिया गया था। वहां अपराधी पूर्व से ही घात लगाकर बैठे थे। आरोप है कि सोनम सुनियोजित तरीके से राजा को उस एकांत स्थान पर ले गई, जहां पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार हमलावरों ने उस पर प्रहार किया और साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से उसके शरीर को खाई में फेंक दिया। यह विवरण किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित करने के लिए पर्याप्त था क्योंकि यह उस पवित्र बंधन के विरुद्ध था जिसमें दो व्यक्ति एक-दूसरे की सुरक्षा का वचन लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आरक्षी विभाग ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए साक्ष्यों का संकलन किया और सितंबर 2025 में न्यायालय के समक्ष लगभग 790 पृष्ठों का एक विशाल आरोप पत्र प्रस्तुत किया। इस दस्तावेज में सोनम, राज कुशवाहा और अन्य अभियुक्तों के विरुद्ध वैज्ञानिक साक्ष्य, परिस्थितिजन्य प्रमाण और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों को विस्तृत रूप से सम्मिलित किया गया था। इस आरोप पत्र की गंभीरता को देखते हुए यह स्पष्ट था कि यह मामला कानूनी रूप से अत्यंत सुदृढ़ है। इस अवधि के दौरान अभियुक्तों की ओर से कई बार जमानत के लिए आवेदन किया गया, परंतु अपराध की प्रकृति और साक्ष्यों की प्रबलता को देखते हुए आरंभिक 3 प्रयासों में सोनम को कोई राहत नहीं मिली। वह लगभग 10 महीनों तक न्यायिक अभिरक्षा में जेल की सलाखों के पीछे रही।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्ष 2026 के अप्रैल माह में इस प्रकरण ने एक अप्रत्याशित मोड़ लिया। शिलांग की एक अदालत ने सोनम की जमानत याचिका पर विचार करते हुए उसे मुक्त करने का आदेश दिया। न्यायालय ने अपने निर्णय में जांच प्रक्रिया में व्याप्त कुछ गंभीर विसंगतियों और तकनीकी त्रुटियों को आधार बनाया। न्यायालय का यह प्रेक्षण था कि गिरफ्तारी के समय अभियुक्त को उसके अधिकारों और आरोपों की जानकारी उस प्रकार नहीं दी गई जैसा कि विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया में अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, दस्तावेजों के रख-रखाव में भी कुछ प्रक्रियात्मक कमियां पाई गईं। न्यायालय ने इस बात पर भी बल दिया कि बिना किसी अंतिम निर्णय के किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक कारावास में रखना मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से उचित नहीं है, विशेषकर तब जब मुकदमे की कार्यवाही की गति धीमी हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यद्यपि न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि जमानत प्रदान करने का अर्थ अभियुक्त को निर्दोष घोषित करना नहीं है, फिर भी इस निर्णय ने एक नई बहस को जन्म दे दिया। राजा रघुवंशी के वृद्ध माता-पिता और परिजनों के लिए यह आदेश किसी वज्रपात से कम नहीं था। उनका तर्क है कि जिस महिला पर उनके पुत्र की हत्या का इतना गंभीर आरोप है और जिसके विरुद्ध पुलिस ने 790 पृष्ठों के साक्ष्य जुटाए हैं, उसे केवल तकनीकी त्रुटियों के आधार पर राहत मिलना न्याय की अवधारणा के विपरीत है। परिवार ने अब इस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का संकल्प लिया है और वे न्याय के लिए निरंतर संघर्षरत हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह प्रकरण समाज के सम्मुख कई गंभीर प्रश्न प्रस्तुत करता है। यह व्यक्तिगत संबंधों में बढ़ती असुरक्षा और स्वार्थपरता को उजागर करता है। यह घटना दर्शाती है कि किस प्रकार आधुनिक जीवनशैली और अनैतिक आकांक्षाएं व्यक्ति को इतने बड़े अपराध की ओर धकेल सकती हैं। साथ ही, यह मामला हमारी जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी उंगली उठाता है। यदि पुलिस ने जांच और गिरफ्तारी के समय स्थापित नियमों का पूर्णतः पालन किया होता, तो शायद आज अभियुक्त को तकनीकी आधार पर जमानत न मिलती। यह प्रकरण यह भी सिखाता है कि न्याय केवल भावना से नहीं बल्कि ठोस तथ्यों और सही कानूनी प्रक्रिया से प्राप्त होता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस मामले में संचार माध्यमों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2025 से ही इस घटना को निरंतर प्रसारित किया गया जिससे यह एक राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। किंतु कई बार अत्यधिक प्रचार के कारण वास्तविक विधिक तथ्य गौण हो जाते हैं और भावनात्मक पक्ष अधिक प्रभावी हो जाता है। सामाजिक स्तर पर यह घटना एक चेतावनी की भांति है जो यह बताती है कि विवाह जैसे निर्णय अत्यंत सोच-विचार कर लिए जाने चाहिए और समाज में बढ़ते अपराधों के प्रति सतर्कता अनिवार्य है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान में 2026 का समय इस प्रकरण के लिए अत्यंत निर्णायक है। यद्यपि मुख्य अभियुक्त कारागार से बाहर है, किंतु कानूनी संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। न्यायालय में गवाहों की गवाही और साक्ष्यों का परीक्षण निरंतर जारी रहेगा। समाज की दृष्टि अब उच्च न्यायालय और ट्रायल कोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिकी है। राजा रघुवंशी के परिवार को अभी भी विश्वास है कि अंततः सत्य की विजय होगी और उनके पुत्र के हत्यारों को उनके कृत्य का दंड अवश्य मिलेगा। यह कहानी एक दुखद सत्य के साथ समाप्त नहीं होती, बल्कि यह न्याय की उस लंबी और कठिन डगर का प्रतीक बन गई है जिस पर आज भी भारत का एक साधारण परिवार न्याय की आस में चल रहा है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 17:04:14 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>यह डरावना है कि 7.95 लाख से ज़्यादा एग्ज़ीक्यूशन याचिकाएं 6 महीने से ज़्यादा समय से लंबित हैं</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पाया कि पूरे देश में लगभग 8 लाख एग्ज़ीक्यूशन याचिकाएं लंबित हैं, जो छह महीने से ज़्यादा पुरानी हैं। इस स्थिति को "बहुत डरावना और निराशाजनक" बताया। कोर्ट ने कहा, "आज की तारीख़ में स्थिति बहुत डरावनी और निराशाजनक लगती है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि आज की तारीख़ में पूरे देश में 7,95,981 एग्ज़ीक्यूशन याचिकाएं लंबित हैं, जो छह महीने पुरानी हैं।" </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस पंकज मित्तल की बेंच ने सभी हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वे एग्ज़ीक्यूशन याचिकाओं के जल्द निपटारे को सुनिश्चित करने के लिए</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176301/it-is-scary-that-more-than-795-lakh-execution-petitions"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supream-court4.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पाया कि पूरे देश में लगभग 8 लाख एग्ज़ीक्यूशन याचिकाएं लंबित हैं, जो छह महीने से ज़्यादा पुरानी हैं। इस स्थिति को "बहुत डरावना और निराशाजनक" बताया। कोर्ट ने कहा, "आज की तारीख़ में स्थिति बहुत डरावनी और निराशाजनक लगती है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि आज की तारीख़ में पूरे देश में 7,95,981 एग्ज़ीक्यूशन याचिकाएं लंबित हैं, जो छह महीने पुरानी हैं।" </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस पंकज मित्तल की बेंच ने सभी हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वे एग्ज़ीक्यूशन याचिकाओं के जल्द निपटारे को सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई व्यवस्था के बारे में उन्हें जानकारी दें।कोर्ट ने आदेश दिया, "अगली सुनवाई की तारीख़, यानी 07.10.2026 तक, हर हाईकोर्ट हमें संक्षेप में बताएगा कि एग्ज़ीक्यूशन याचिकाओं के प्रभावी और जल्द निपटारे के लिए उन्होंने क्या व्यवस्था बनाई या अपने-अपने ज़िला न्यायालयों को किस तरह के निर्देश जारी किए।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ऐसे मामलों के समय-सीमा के भीतर निपटारे के लिए दिए गए अपने निर्देशों के पालन की निगरानी कर रहा था। 16 अक्टूबर, 2025 तक पूरे देश में 8.82 लाख से ज़्यादा एग्ज़ीक्यूशन याचिकाएं लंबित थीं। उस समय कोर्ट ने इन आंकड़ों को बेहद निराशाजनक और चिंताजनक बताया था। हाईकोर्ट से छह महीने के भीतर निपटारा सुनिश्चित करने और प्रभावी निगरानी व्यवस्था बनाने का आग्रह किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अपने ताज़ा आदेश में कोर्ट ने पाया कि निपटारे में प्रगति के बावजूद, लंबित मामलों की संख्या अभी भी बहुत ज़्यादा है। कोर्ट ने पाया कि मौजूदा आंकड़े दिखाते हैं कि 7,95,981 एग्ज़ीक्यूशन याचिकाएं अभी भी छह महीने से ज़्यादा समय से लंबित हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने पाया कि 6 मार्च, 2025 से जब उसने एग्ज़ीक्यूशन याचिकाओं के समय-सीमा के भीतर निपटारे का निर्देश दिया था, तब से 10 अप्रैल, 2026 तक कुल 7,69,731 एग्ज़ीक्यूशन याचिकाओं का फ़ैसला किया गया और उनका निपटारा किया गया। इसमें 6 मार्च, 2025 के निर्देशों के बाद पहले चरण में निपटाए गए 3,38,685 मामले और 16 अक्टूबर, 2025 के बाद निपटाए गए 4,31,046 अन्य मामले शामिल हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कोर्ट ने राज्य-वार आंकड़ों पर प्रकाश डाला, जो यह दिखाते हैं कि मामले अभी भी लंबित हैं। उत्तर प्रदेश में 26,943 एग्ज़ीक्यूशन याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें से 3,057 मामलों में कार्यवाही ऊपरी अदालतों द्वारा रोक दी गई। महाराष्ट्र में, 3,95,960 एग्ज़ीक्यूशन याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें से 11,966 मामलों पर रोक लगी हुई है। पश्चिम बंगाल में 28,192 लंबित एग्ज़ीक्यूशन याचिकाओं में से 1,008 मामलों में कार्यवाही पर रोक है। मध्य प्रदेश में, 50,579 लंबित एग्ज़ीक्यूशन याचिकाओं में से 2,537 मामले रोक के अंतर्गत हैं</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट  ने इलाहाबाद हाईकोर्ट, बॉम्बे हाईकोर्ट, कलकत्ता हाईकोर्ट और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से अनुरोध किया कि वे उन मामलों की जांच करें, जिनमें कार्यवाही पर रोक लगी हुई और यह सुनिश्चित करें कि ऐसे मामलों को जल्द-से-जल्द उठाया जाए ताकि एग्ज़ीक्यूशन की कार्यवाही में देरी न हो। </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 21:19:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मामलों के लंबित रहने के लिए केवल न्यायाधीशों को दोष न दें: न्यायमूर्ति अमानुल्लाह</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने शनिवार को कहा कि भारत में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए केवल न्यायाधीशों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी अक्सर वकीलों की बहस और कानूनी प्रक्रिया के तरीके से प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘न्यायाधीश और मामले के निपटारे की दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह वकीलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी देर तक बहस करना चाहते हैं।’’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में देरी के लिए वकीलों और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175923/dont-blame-judges-alone-for-pendency-of-cases-justice-amanullah"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supreme-court-judge.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने शनिवार को कहा कि भारत में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए केवल न्यायाधीशों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी अक्सर वकीलों की बहस और कानूनी प्रक्रिया के तरीके से प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘न्यायाधीश और मामले के निपटारे की दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह वकीलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी देर तक बहस करना चाहते हैं।’’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में देरी के लिए वकीलों और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों को भी आत्ममंथन करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि लंबी-लंबी बहसें करना और बार-बार तारीख लेना जैसी आदतें मामलों के निपटारे में देरी का कारण बनती हैं, इसलिए इन पर विचार कर सुधार करना जरूरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">‘वैश्वीकरण के युग में मध्यस्थता’ विषय पर आईसीए के पांचवें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि न्यायाधीश पहले से ही प्रतिदिन बहुत बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘‘निचली अदालत के स्तर पर, किसी भी न्यायाधीश के पास प्रतिदिन 400-500 से कम मामलों की सूची नहीं होती है। उच्च न्यायालयों में यह संख्या और भी अधिक है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि हालांकि न्यायाधीशों को तय घंटों के लिए अदालत में बैठना और उनके सामने सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई करना अनिवार्य है, लेकिन वे वकीलों द्वारा की गई बहस के समय को हमेशा कम नहीं कर सकते।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि हालांकि न्यायाधीश कभी-कभी वकीलों को अपनी दलीलों को दोहराने से रोक सकते हैं, लेकिन वे उन्हें अपना मामला पूरी तरह से प्रस्तुत करने की अनुमति देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 21:42:38 +0530</pubDate>
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