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                <title>Breaking Legal News - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>मामलों के लंबित रहने के लिए केवल न्यायाधीशों को दोष न दें: न्यायमूर्ति अमानुल्लाह</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने शनिवार को कहा कि भारत में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए केवल न्यायाधीशों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी अक्सर वकीलों की बहस और कानूनी प्रक्रिया के तरीके से प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘न्यायाधीश और मामले के निपटारे की दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह वकीलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी देर तक बहस करना चाहते हैं।’’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में देरी के लिए वकीलों और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175923/dont-blame-judges-alone-for-pendency-of-cases-justice-amanullah"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/supreme-court-judge.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने शनिवार को कहा कि भारत में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए केवल न्यायाधीशों को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कहा कि न्याय में देरी अक्सर वकीलों की बहस और कानूनी प्रक्रिया के तरीके से प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘न्यायाधीश और मामले के निपटारे की दर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। यह वकीलों पर निर्भर करता है कि वे कितनी देर तक बहस करना चाहते हैं।’’ उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था में देरी के लिए वकीलों और कानूनी पेशे से जुड़े लोगों को भी आत्ममंथन करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि लंबी-लंबी बहसें करना और बार-बार तारीख लेना जैसी आदतें मामलों के निपटारे में देरी का कारण बनती हैं, इसलिए इन पर विचार कर सुधार करना जरूरी है।</p>
<p style="text-align:justify;">‘वैश्वीकरण के युग में मध्यस्थता’ विषय पर आईसीए के पांचवें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि न्यायाधीश पहले से ही प्रतिदिन बहुत बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘‘निचली अदालत के स्तर पर, किसी भी न्यायाधीश के पास प्रतिदिन 400-500 से कम मामलों की सूची नहीं होती है। उच्च न्यायालयों में यह संख्या और भी अधिक है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि हालांकि न्यायाधीशों को तय घंटों के लिए अदालत में बैठना और उनके सामने सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई करना अनिवार्य है, लेकिन वे वकीलों द्वारा की गई बहस के समय को हमेशा कम नहीं कर सकते।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने कहा कि हालांकि न्यायाधीश कभी-कभी वकीलों को अपनी दलीलों को दोहराने से रोक सकते हैं, लेकिन वे उन्हें अपना मामला पूरी तरह से प्रस्तुत करने की अनुमति देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 21:42:38 +0530</pubDate>
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                <title>मतदाता सूची पर बड़ा फैसला: गुजरात हाईकोर्ट ने कहा— राज्य निर्वाचन आयोग नाम जोड़ने-हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं रखता</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। आयोग केवल विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची को ही अपनाने (प्रतिरूपित करने) का काम करता है।</p><p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक महिला ने अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में भाग लेने के लिए अपनी नामावली में नाम शामिल करने की मांग की थी। बता दें, महिला का नाम पहले प्रारंभिक सूची में शामिल नहीं किया गया, जबकि बाद में उसका आवेदन स्वीकार कर लिया गया।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175916/big-decision-on-voter-list-gujarat-high-court-said-%E2%80%93"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/gujarat-high-court-1764609941926.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>गुजरात हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि राज्य निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। आयोग केवल विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची को ही अपनाने (प्रतिरूपित करने) का काम करता है।</p><p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें एक महिला ने अहमदाबाद नगर निगम चुनाव में भाग लेने के लिए अपनी नामावली में नाम शामिल करने की मांग की थी। बता दें, महिला का नाम पहले प्रारंभिक सूची में शामिल नहीं किया गया, जबकि बाद में उसका आवेदन स्वीकार कर लिया गया।</p><p style="text-align:justify;">जस्टिस एन.एस. संजय गौड़ा और जस्टिस जे.एल. ओदेदरा की खंडपीठ ने कहा, “राज्य निर्वाचन आयोग का यह तर्क कि याचिकाकर्ता का नाम प्रारंभिक सूची प्रकाशित होने के बाद जोड़ा गया, इसलिए उसे शामिल नहीं किया जा सकता यह तर्क असंगत और निरर्थक है। आयोग का कार्य केवल विधानसभा की मतदाता सूची को अपनाना है, न कि उसमें स्वतंत्र रूप से बदलाव करना।”</p><p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार महिला का नाम पहले संबंधित विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में नहीं था, जो नगर निगम की मतदाता सूची का आधार होती है। उसने 23 मार्च, 2026 को अपना नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया, जिसे 1 अप्रैल, 2026 को स्वीकार कर लिया गया।</p><p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा कि कानूनी रूप से इसका अर्थ यह है कि महिला का नाम विधानसभा की मतदाता सूची में मान्य माना जाएगा। चूंकि नगर निगम की सूची उसी पर आधारित होती है, इसलिए उसे मतदान और चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार मिल जाता है।</p><p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि महिला का आवेदन नामांकन की अंतिम तिथि से पहले स्वीकार कर लिया गया, इसलिए उसे चुनाव में भाग लेने से वंचित नहीं किया जा सकता।</p><p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ने अपना पक्ष मजबूत तरीके से साबित किया है और उसका नाम साबरमती वार्ड संख्या 4 की मतदाता सूची में शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही उसे चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार भी मिलेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 21:31:17 +0530</pubDate>
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