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                <title>Women Reservation Bill India - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Women Reservation Bill India RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>सांसदों के 'अपमान' पर पीएम के ख़िलाफ़ प्रिविलेज नोटिस- ‘सत्ता का खुला दुरुपयोग</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रिविलेज नोटिस यानी विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। विशेषाधिकार हनन का मतलब है कि संसद के सदस्य के अधिकारों का अपमान किया गया या गलत आरोप लगाया गया। कांग्रेस का आरोप है कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में सांसदों की स्वतंत्रता और ईमानदारी पर उंगली उठाई और उनकी वोटिंग पर गलत मंशा बताई, जो संसद के नियमों का साफ़-साफ़ उल्लंघन है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने मंगलवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को यह नोटिस भेजा। नोटिस में कहा गया है कि प्रधानमंत्री का 18 अप्रैल को राष्ट्र</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177021/privilege-notice-against-pm-for-insulting-mps-blatant-abuse"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(2)6.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रिविलेज नोटिस यानी विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। विशेषाधिकार हनन का मतलब है कि संसद के सदस्य के अधिकारों का अपमान किया गया या गलत आरोप लगाया गया। कांग्रेस का आरोप है कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में सांसदों की स्वतंत्रता और ईमानदारी पर उंगली उठाई और उनकी वोटिंग पर गलत मंशा बताई, जो संसद के नियमों का साफ़-साफ़ उल्लंघन है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने मंगलवार को लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को यह नोटिस भेजा। नोटिस में कहा गया है कि प्रधानमंत्री का 18 अप्रैल को राष्ट्र के नाम 29 मिनट का संबोधन 'सत्ता का खुला दुरुपयोग' है और यह संसद की गरिमा को ठेस पहुँचाता है।लोकसभा में 17 अप्रैल को संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 पर वोटिंग हुई। यह विधेयक महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% आरक्षण जल्द लागू करने और लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 करने से जुड़ा था। लेकिन इसे दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला। 528 सांसदों में से 298 ने पक्ष में और 230 ने विपक्ष में वोट किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत न मिलने से विधेयक पास नहीं हो सका। इसके अगले दिन यानी 18 अप्रैल की रात प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया। उन्होंने कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, समाजवादी पार्टी जैसे विपक्षी दलों पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने महिलाओं के अधिकारों की ‘भ्रूण हत्या’ कर दी है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि उन्होंने संकीर्ण राजनीति के कारण महिलाओं के सपनों को कुचल दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस प्रिविलेज नोटिस को एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा है, 'मेरे लोकसभा में वरिष्ठ सहयोगी के.सी. वेणुगोपाल ने प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया है। प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अपनी बुरी योजना के विफल होने के बाद राष्ट्र के नाम संबोधन दिया था। उन्हें इस हार की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। हार की वजह थी- पूरे विपक्ष का एकजुट होकर साथ खड़ा होना। प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्र को संबोधन हमेशा सिर्फ देश की एकता और लोगों में विश्वास बढ़ाने के लिए ही दिया जाता रहा है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में खुलेआम पक्षपातपूर्ण और भड़काऊ भाषण दिया। उन्होंने कांग्रेस पार्टी पर 59 बार अलग-अलग हमले किए। यह उनके प्रधानमंत्री काल पर एक और स्थायी दाग होगा।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">के.सी. वेणुगोपाल ने नोटिस में लिखा, 'प्रधानमंत्री ने विपक्षी सांसदों के वोटिंग पैटर्न पर सीधा टिप्पणी की और उनकी मंशा पर सवाल उठाया। सांसदों पर यह कहना कि उन्होंने संविधान की रक्षा नहीं की, बल्कि महिलाओं के साथ अन्याय किया– यह सांसदों की स्वतंत्रता और ईमानदारी पर अस्पष्ट टिप्पणी है।'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने आगे कहा, 'संसद की पुरानी परंपरा और अनुच्छेद 105 के तहत किसी भी सदस्य के आचरण या वोटिंग पर बाहर से टिप्पणी नहीं की जा सकती है, खासकर प्रधानमंत्री जैसे उच्च पद वाले व्यक्ति द्वारा। यह संसद की गरिमा और सांसदों के स्वतंत्र रूप से काम करने के अधिकार का उल्लंघन है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 22:11:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>पीएम मोदी का संबोधन भारत के संविधान का घोर अपमान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने पीएम मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने आधिकारिक संबोधन को राजनीतिक भाषण में बदल दिया, जो कीचड़ उछालना और सरासर झूठ भरा था।</p><p style="text-align:justify;">खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए लिखा, "एक हताश और निराश पीएम मोदी, जिनके पास पिछले 12 सालों में दिखाने के लिए कुछ भी ठोस नहीं है, उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन को राजनीतिक भाषण में बदल दिया। आचार संहिता पहले से लागू है, फिर भी पीएम मोदी ने सरकारी मशीनरी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176645/pm-modis-address-is-a-gross-insult-to-the-constitution"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/116259-20260416223f.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने पीएम मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने आधिकारिक संबोधन को राजनीतिक भाषण में बदल दिया, जो कीचड़ उछालना और सरासर झूठ भरा था।</p><p style="text-align:justify;">खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए लिखा, "एक हताश और निराश पीएम मोदी, जिनके पास पिछले 12 सालों में दिखाने के लिए कुछ भी ठोस नहीं है, उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन को राजनीतिक भाषण में बदल दिया। आचार संहिता पहले से लागू है, फिर भी पीएम मोदी ने सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर अपने विरोधियों पर हमला किया। यह लोकतंत्र और भारत के संविधान का घोर अपमान है।"</p><p style="text-align:justify;">खड़गे ने कहा कि पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कांग्रेस का जिक्र 59 बार किया, जबकि महिलाओं का जिक्र बमुश्किल कुछ ही बार किया। इससे उनकी प्राथमिकताएं साफ हो जाती हैं। उन्होंने दावा किया कि महिलाएं बीजेपी की प्राथमिकता नहीं हैं; कांग्रेस ही महिलाओं के साथ खड़ी है।</p><p style="text-align:justify;">कांग्रेस अध्यक्ष ने याद दिलाया कि कांग्रेस ने हमेशा महिला आरक्षण का समर्थन किया है। 2010 में राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पास करवाया था, ताकि वह लैप्स न हो जाए। लेकिन बीजेपी उस बिल को लोकसभा में पास नहीं करवा पाई। 2023 में लाए गए बिल का भी कांग्रेस ने समर्थन किया। खड़गे ने कहा कि असल बिल अभी भी मौजूद है और 16 अप्रैल को नोटिफाई किया गया था।</p><p style="text-align:justify;">खड़गे ने सरकार से मांग की कि 2023 के कानून के तहत मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत लागू करें। परिसीमन बिलों को महिला आरक्षण बिल के साथ जोड़ना बंद करें। यह परिसीमन बिल था, महिला आरक्षण का संशोधन नहीं।</p><p style="text-align:justify;">खड़गे ने कांग्रेस की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस ने हरित क्रांति, श्वेत क्रांति, अंतरिक्ष कार्यक्रम, परमाणु शक्ति, 1991 की आर्थिक उदारीकरण, आरटीआई, आरटीई, मनरेगा, और खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे कई ऐतिहासिक कानून पास किए। उन्होंने हिंदू कोड बिल, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, और आपराधिक कानूनों में सुधार जैसे महिला-हितैषी कानूनों का भी उल्लेख किया।</p><p style="text-align:justify;">खड़गे ने बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी अपने कामों और रवैये दोनों में महिला-विरोधी रही है। उन्होंने हाथरस, उन्नाव, हरियाणा की महिला पहलवानों, बिलकिस बानो और अपनी पार्टी के बलात्कारियों को बचाने के मामलों का जिक्र किया। एनसीआरबी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बीजेपी शासित राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराध सबसे ज्यादा होते हैं।</p><p style="text-align:justify;">अंत में खड़गे ने कहा कि 12.5 साल सत्ता में रहने के बाद भी सरकार के पास महंगाई, बिगड़ती अर्थव्यवस्था और जनता की तकलीफों का कोई समाधान नहीं है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 20:36:30 +0530</pubDate>
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                <title>नारी बन्दन बिल के सहारे  बीजेपी बंगाल जीतना चाहती थी या चीन मॉडल लागू करना चाहती थी </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176611/bjp-wanted-to-win-bengal-with-the-help-of-nari"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश में एक तरफचुनाव का वातावरण बना था पांच राज्यों में चुनाव हो रहा था ।तीन राज्यों का चुनाव भी एक चरण में पूरा होगया है ।दो मजबूत राज्यों बंगाल और तामिलनाडु में तीन चरणों में चुनाव होने वाला है।बंगाल के चुनाव में नब्बे लाख वैध मतदान का नाम चुनाव आयोग हटा दिया है । चुनाव आयोग के इस कृत्य को देश की जनता सब देख रही है। सुन रही जान रही पर मौन है।मौन जब तुटता है तो तूफ़ान  आ जाता है । भारत की जनता  कब अपना मौन तोड़ेगी यह समय बतायेगा।पर बंगाल के चुनाव में जो भी वोटर लिस्ट में धांधली हो रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">  यह एक लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ संकेत नहीं है।  अपने ही नागरिकों का वोट का अधिकार छीन कर उनको विदेशी नागरिक कहना उचित नहीं है पर 2014से एक धर्म विशेष के लोगों को हर राज्य में नया नामकरण दिया गया घूसपैठिये और आज तक यानि 2014से अब तक कितने घुसपैठिए हर राज्य में मिले भारत सरकार जनता को चुनाव में नहीं बता पा रही है।  बस एक नरेटिव कि बंगाल में ममता चुनाव घुसपैठियों के वोट से जीत रही है एक धर्म के वोट से जीत रही  है उनको वोट के अधिकार से वंचित करना है । जो चुनाव आयोग सरकार का कठपुतली बन कर कर दिया। नब्बे लाख का नाम काट दिया।  अब चुनाव में वोट नहींदेगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष का आरोप सही कि देश की सभी सम्वैधानिक संस्थानों पर व  न्यायालय हो चुनाव आयोग हो ई डी सी बी आई हर पर एक पार्टी एक विचार धारा का कब्जा हो गया है।यह बात भारत के जनमानस के  साथ  विश्व के जनमानस में भी यही गुज रहा है कि 2014के बाद भारत में लोकतंत्र कमजोर होगया।  बस एक नेता एक पार्टी कीबात होनेलगी है विपक्ष कहीं जिन्दा नहीं  रहे।उसको संसद से सड़क तक लड़ने का अधिकार नहीं जब जब संसद से सड़क पर आया लड़ने उसको देशद्रोही पाक परस्त छदम सेकुलर अवसर वादी न जाने किन किन अलंकरणों से भारतीय मिडिया भाजपा का आईटी सेल सोशल मिडिया अलंकृत करता रहता है ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल के चुनाव में एक और बात बहुत दिलचप्स  हो रही की कभी ममता के विधायक रहे हुमाऊ कबीर ममता को छोड़ कर भाजपा में गये फिर वहां से सौदे बाजी करके अलग पार्टी बनाया। भाजपा ने ममता को हराने के लिए एक हजार करोड़ और उपमुख्यमंत्री के पद पर समझौता किया यह बात एक स्टिंग ऑपरेशन करके किसी ने खुलासाकर दिया  विडियो बनाकर  सोशल मिडिया में चला रहा है। मैं यह नहीं कह सकता हूं दावे के साथ की यह विडियो सही या ग़लत  है।जो सोशल मिडिया पर चल रहा उसी की बात कर रहा हूं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सच क्या है जांच हो तो सब जनता जाने ।इसी विडियो से  परेशान होकर देश की सरकार  जो हर समय बस  चुनाव में रहती हैं परेशान हो ग ई जीत का सपना जो बंगाल में  देख रही थी  काबफूर होने लगा। तब वह  एक नया गेम प्लान लेकर आई कि बीच चुनाव में ही संसद का विशेष सत्र तीन दिन का बुला लिया कि अब देश की नारी आधी आबादी शायद बंगाल जीतादे।  जो  नारी शक्ति वन्दन बिल यानि महिला आरक्षण 2023मे पास हो चुका है और 2029के चुनाव में लागू होगा  जिसमें जनगणना और परिसीमन की बात थी ।उसको बदलने के लिए ही विशेष सत्र को बुलाया जो गलत है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र में संख्या बल का खेल है। तो सरकार सत्ता में संसद का विशेष सत्र बुला लिया।और तीन अलग अलग बिल पेश कर दिया। 16अप्रैल से बहस चल रही है 17शाम चार बजे के बाद वोटिंग होगी  इस में भी सरकारकिस नियम से वोटिंग करायेगी।इस महिला बिल का विपक्ष समर्थन कर रहा उनका कहना है महिलाओं को आरक्षण 545सासद के वर्तमान नम्बर में से कर दिया जाये।  लेकिन भाजपा कह रही हम देश में नये राजाओं की संख्या बढायेंगे वह 850करके उस संख्या में से महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने की बात कर रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस आरक्षण में भी एक खेल होगया अनुसुचित जाति और अनुसूचितजन जाति को तो लिया है परन्तु पिछड़ी जाति को आरक्षण में नहीं लिया है।विपक्ष का कहना है फिर परिसीमन  नहीं हो गा तबतक जब तक  जनगणना नही हो जायेगी जनगणना जातिय आधार पर होगी उसके बाद ही महिलाओं को आरक्षण और संसदों तथा प्रदेश में विधानसभा में विधायकों की संख्या बढ़ेगी। भाजपा परिसीमन को जनगणना से नहीं जोड़ना चाहती है भाजपा कि एक मंशा यह भी होगी कि परिसीमन बिल पास कराले। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">न ई जनगणना में जातियों की गणना नहीं करायेगे यह आशंका है कि जातिय जनगणाना भाजपा नहीं करना चाहती है।अगर जातिय जन गणना देश की होगी तो बहुत कुछ देश में बदल जायेगा राजनिति का सन्तुलन भी गड़बड़ होगा फिर नारा वहीं चलेगा जिसकी जितनी सख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी ।इसी कारण से यह तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया गया।है या इस सत्र के परिणाम को जनता में ले जाकर सहानभूति लेने का राजनिति चाल  था।  बंगाल के चुनाव प्रचार में पता चलेगा बिल के पीछे का असली मकसद  क्या था या नकली चेहरा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी कारण भाजपा 2011या किसी भी जनगणना से किसी भी राज्य की संसदों की सख्या निर्धारित करने का एकाधिकार चाहती है। जो बहुत ग़लत है विपक्ष विरोध कर रहा यह तो निश्चित है जिस राज्य में जन संख्या कम होगी वहां सांसद कम होंगे इस बिल से उत्तर भारत में यूं पी बिहार राजस्थान  एम पी में सांसदों की संख्या बढ़ेगी और इन राज्यो  की तुलना में दक्षिण राज्यों में कम संख्या सांसदों की होगी पूर्वोत्तर राज्यों में भी कामोवेश यही होगा ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब एक न ई लड़ाई इस बिल से उत्तर भारत और दक्षिण भारत में शुरू होगया है यह सब एक सुनियोजित चाल से भारत में लोकतंत्र को चीनी लोकतंत्र में बदलने का कुचक्र  तो नहीं चल रहा है कि चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिले सम्विधान बदले और चीनी राष्ट्रपति की प्रणाली बना कर  भाजपा सत्ता में सदा के लिए बनी रहे  अगर मंशा साफ होता तो  महिलाओं को आरक्षण  तो2024मे दे दिया होता। पर नारी के पीछे छिपकर देश में नया लोकतंत्र स्थापित करने की एक मंशा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु इस बिल में एक बात और है कि राज्य सभा कि सीट नहीं बढ़ाया जा रहा अनुपातिक तौर पर राज्य सभा में भी सीट बढ़े।  कारण अगर विधानसभा में हर राज्य में पचास प्रतिशत सीट बढ़ रही है तो राज्य सभा का क्योंनही बढ़ेगी। यह और तरह का खेल है कि अगर राज्य सभा में बहुमत नहीं होगा तो दोनों सदनों को मिलाकर कोई बिल‌विधेयक पास हो जायेगा विपक्ष यहां क्यौ मौन है राज्य  सभा में बढ़े पचास प्रतिशत।विपक्ष यह चाल भाजपा का समझ गया और या जाल मेंनही फंसा उस कबुतर की तरह । इस बिल से आभास हो रहा है नाम नारी शक्ति वन्दन पर खेल कुछ और है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब बंगाल का चुनाव बिल पास होगा तब भी नहीं पास होगा तब भी नारीशक्ति वन्दन के सहारे चलेगा सारा फोकस भाजपा का यही होगा  कि हम नारी सम्मान करतेहै  बिल आपके लिए शक्ति देगा नहीं पास हुआ तो  विपक्ष नारी विरोधी है यही गुंजेगा।परन्तु एक बात जो जनता को पूछना होगा अपने नेताओं से कि हम भारत के नागरिक इतने अमीर हो गये है कि 545राजा ससद के चार हजार विधानसभा के राजाओं  के ऐशो आराम के लिए जो अभी टैक्स दे रहे हैं। फिर 307सासदो और 2100 विधायको को जो बिल पास होने के बाद आयेंगे इनको पालने के लिए कितना और टैक्स देंगे लगभग हर वर्ष सभी राजाओं को पालने ऐशो आराम के लिए पन्द्रह हजार करोड़ लगेगा कहा से आयेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कैसे आयेगा क्या और टैक्स लगेगा कोई राजनेता संसद में यह बात नहीं कर रहा नहीं सत्ता पक्ष यह जनता को बता रहा हैं कि इन सभी राजाओं को पालने का खर्च किस मद से होगा बस नारी शक्ति वन्दन हो रहा है। इन राजाओं के साथ साथ देश की जनता पूर्व सांसदों विधायकों को भी पाल रही है।इनके लालनपालन पर हर वर्ष ग्यारह हजार करोड़ खर्च होता पेंशन और मुफ्त यात्रा में यह सब गरीब भारत की जनता है पांच किलो मुफ्त राशन वाले असृसी करोड़ भी इनके लालपाल में अपना योगदान दे रहे हैं।अब भारत इतना अमीर तो नहीं है कि हजारों राजाओं को अपने। जनता के टैक्स पर पाले जा रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश के उस समय अटल की सरकार ने 2003मे सरकारी कर्मचारियों का पेंशन यह कह कर बन्द कर दिया कि देश की जीडीपी पेंशन के भार को नहीं उठा पायेगी परन्तु इन राजाओं का  पेंशन वेतन मुफ्त आवास चिकित्सा यात्रा भत्ता देश  उठा रहा है।पर हम जनता मौन है। अपने लड़कों के हक में नहीं बोल रहे हैं।यह बिल जो लाया गया है देश हित में नहीं है जितनी पहले सांसदों की सख्या है उसी में से महिलाओं को आरक्षण दिया जाये सांसदों और विधायकों की सख्या न बढ़ाई जाये नहीं तो जनता कभी भी सड़क पर आयेगी तो क्या दृश्य होगा इसकी कल्पना कोई राजनेता या ज्योतिषी नहीं कर सकता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि नये राजाओं की संख्या देश में बढ़ी तो शायद फिर देश में कोई नया गांधी सुभाष आजाद भगत बनकर जरूर आयेगा इन राज्यों से मुक्ति जनता को मिलेगी जैसे मुगलों से अग्रेजो से देशी राजाओं से मिला था उसी तरह फिर लड़ना होगा नये राजाओ को हटाने के लिए ।भाजपा का मकसद नारी के नाम को चुनाव में लेकर सत्ता तक पहुचना है। वह नारी सम्मान कितना किये है और करेंगे संसद में  दिये गये भाषण को जनता याद कर रही कि आज वही व्यक्ति नारी वन्दन कर रहा जो कभी किसी नारी को विधवा न जाने कैसे कैसे अलंकरणों से सुशोभित किया था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के ऊपर जो तमाम आरोप लग रहे हैं उसी से जनता और महिलाओं के ध्यान को हटाने के लिए बंगाल तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए यह बिल लाया गया भाजपा को पता है बिल पास नहीं होगा फिर भी यह खेल किया कि चुनाव में विपक्ष को महिलाओं के विरोधी के रुप में स्थापित करके अपनी छबि को बचाने का नया कुचक्र  है।विपक्ष जब मांग कर रहा था कि ईरान अमेरिका इजरायल युद्ध और देश की ऊर्जा सुरक्षा पर बहस के लिए विशेष संसद का सत्र बुलाने की मांग नहीं माना और चर्चा नहीं हुआ वह ईरान पर मौन बस इजरायल अमेरिका के साथ खड़े हैं अब क्यों अमेरिका इजरायल के साथ है यह कूटनिती की कोई भाषा होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कल संसद में मोदी गारंटी दे रहे थे बिल की पर शायद वह हर चुनाव में गारंटी देते आरहे है क्यो पूरा नहीं हुआ दोकरोड रोजगार बिहार में उघोग सौ स्मार्ट सीटी सब कहां  है।अब तो बिल पास नहीं हुआ। यह जो बिल गिरा भारत बच गया अगर बिल पास होगया होता तो 2029मेका आखिरी चुनाव होता या 2027मे मध्यावधि चुनाव कराकर सम्विधान बदले देते की भारत में एक दलित प्रणाली ही होगी।पर विपक्ष की गजब की एक जुटता कल देखने को मिला बिल गिर गया देश बच गया।अब  पांच राज्योचुनाव परिणाम का इन्तजार करे वैसे महंगाई के लिए भी जनता कमर कस ले।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">29अप्रैल शाम पांच बजे देश का मौसम गुलाबी होगा जब तेल के दाम बढ़ेंगे यानही बढ़ेंगे  तब भी  भी मौसम गुलाबी रहेगा कारण पांच राज्यों का एक्जिट पोल पर बहस होगी कौन मुख्य मंत्री बनेगा तमाम बातें होंगी फिर लोग नारी शक्ति वन्दन भूल जायेंगे। इस माडल को हराने में दक्षिण के राज्य तृणमूल कांग्रेस के सहयोग की सराहना होनी चाहिए भाजपा समर्थक ससद दक्षिण के जो थे जनता उनसे हिसाब ले क्यों दक्षिण से धोखा किया।।अभी इसे जीत न माने न खुशी माने यह तो बस आरम्भ है।अभी सत्ता से विपक्ष को और लड़ना होगा जनता को भी  लड़ना होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:55:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>परिसीमन के पेंच में फंसा आधी आबादी का हक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आधी आबादी की आकांक्षाओं को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। सरकार द्वारा प्रस्तुत संविधान (131वां संशोधन) विधेयक का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2023 में पारित कानून को धरातल पर उतारने के लिए एक स्पष्ट रूपरेखा तैयार करना था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु नियति और राजनीतिक मतभेदों को कुछ और ही स्वीकार्य था। यह विधेयक मात्र एक विधायी दस्तावेज नहीं था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह 2029 के आम चुनावों से पूर्व देश की राजनीतिक संरचना को पूरी तरह बदलने वाला एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा था। इस विधेयक के माध्यम से</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176578/rights-of-half-the-population-stuck-in-the-dilemma-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/amit-shah-35-2026-04-d896a51ce5dd4d168211944013262839.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आधी आबादी की आकांक्षाओं को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। सरकार द्वारा प्रस्तुत संविधान (131वां संशोधन) विधेयक का मुख्य उद्देश्य वर्ष 2023 में पारित कानून को धरातल पर उतारने के लिए एक स्पष्ट रूपरेखा तैयार करना था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु नियति और राजनीतिक मतभेदों को कुछ और ही स्वीकार्य था। यह विधेयक मात्र एक विधायी दस्तावेज नहीं था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह 2029 के आम चुनावों से पूर्व देश की राजनीतिक संरचना को पूरी तरह बदलने वाला एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा था। इस विधेयक के माध्यम से सरकार ने लोकसभा की सीटों की संख्या को वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो सीधे तौर पर परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संसद के इस विशेष सत्र की पृष्ठभूमि अत्यंत नाटकीय रही। सरकार का तर्क था कि महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सीटों में वृद्धि अनिवार्य है ताकि किसी भी वर्तमान प्रतिनिधित्व को क्षति पहुँचाए बिना महिलाओं को 33 प्रतिशत स्थान सुनिश्चित किया जा सके। इस रणनीति के पीछे तर्क यह था कि जब सीटों की कुल संख्या बढ़कर 850 हो जाएगी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का आंकड़ा स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा और पुरुषों के प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों में भी भारी कटौती की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> सत्ता पक्ष ने इसे एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम बताते हुए प्रचारित किया कि यह नारी शक्ति के वास्तविक वंदन का समय है। प्रधानमंत्री ने सदन की कार्यवाही शुरू होने से पूर्व ही यह स्पष्ट कर दिया था कि उनकी सरकार महिलाओं को उनका उचित अधिकार दिलाने के लिए कृतसंकल्प है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को व्यक्तिगत रूप से पत्र लिखकर इस पवित्र कार्य में सहयोग की अपील की थी। प्रधानमंत्री के उस पत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि विपक्षी दल इस विधेयक का समर्थन करते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो सरकार उन्हें इस सफलता का पूरा श्रेय देने के लिए एक कोरे धनादेश जैसा अधिकार देने को तैयार है। उनका आशय स्पष्ट था कि वे राजनीति से ऊपर उठकर इस सामाजिक सुधार को देखना चाहते थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु विपक्षी खेमे में इस विधेयक को लेकर भारी संशय और विरोध की स्थिति बनी हुई थी। कांग्रेस</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">समाजवादी दल और विभिन्न क्षेत्रीय दलों के गठबंधन ने सरकार की नीयत पर गंभीर प्रश्न उठाए। विपक्ष का सबसे प्रबल विरोध परिसीमन के आधार को लेकर था। सरकार ने इस संशोधन में सीटों के निर्धारण के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने का प्रस्ताव रखा था। विपक्षी नेताओं का तर्क था कि वर्ष 2026 में 2011 की जनगणना के आधार पर भविष्य की राजनीति तय करना न केवल अतार्किक है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह उन राज्यों के साथ अन्याय है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मल्लिकार्जुन खड़गे ने सदन में अपने संबोधन के दौरान अत्यंत तल्ख लहजे में कहा कि सरकार की मंशा महिलाओं को आरक्षण देने की कम और चुनावी लाभ लेने की अधिक प्रतीत होती है। उन्होंने इसे एक छलावा करार देते हुए मांग की कि जब तक नई जाति आधारित जनगणना नहीं हो जाती और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए इस 33 प्रतिशत के भीतर अलग से कोटा निर्धारित नहीं किया जाता</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक यह विधेयक सामाजिक न्याय की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">विपक्ष की इस मांग ने सदन के भीतर और बाहर एक नई बहस को जन्म दे दिया। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए तो आरक्षण का प्रावधान पहले से ही प्रस्तावित था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग श्रेणी की मांग ने सत्ता पक्ष को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया। उत्तर भारत के प्रमुख क्षेत्रीय दलों ने इस मुद्दे पर लामबंदी तेज कर दी और यह स्पष्ट कर दिया कि बिना जातिगत डेटा के परिसीमन करना अंधेरे में तीर चलाने जैसा होगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> अमित शाह ने सरकार का पक्ष रखते हुए विपक्ष के इन तर्कों को विकास की राह में रोड़ा अटकाने वाला बताया। उन्होंने सदन में जोर देकर कहा कि सरकार महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में किसी भी प्रकार की देरी नहीं चाहती और परिसीमन ही वह एकमात्र वैधानिक मार्ग है जिसके माध्यम से सीटों का न्यायोचित वितरण संभव है। उन्होंने विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि इतिहास उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा यदि उन्होंने इस अवसर को केवल राजनीतिक द्वेष के कारण गंवा दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">घटनाक्रम अपनी चरम सीमा पर तब पहुँचा जब 16 अप्रैल को इस विधेयक पर मतदान की घोषणा हुई। संसद के गलियारों में तनाव स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता था। उस दिन कुल 528 सांसद सदन में उपस्थित थे। नियम के अनुसार</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत आवश्यक था। जब मतों की गणना हुई</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो परिणाम सरकार के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> विधेयक के पक्ष में 298 मत पड़े</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि विपक्ष में 230 सांसदों ने मतदान किया। गणितीय दृष्टि से देखें तो दो-तिहाई बहुमत के लिए सरकार को कम से कम 352 मतों की आवश्यकता थी। इस प्रकार</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मात्र 54 मतों के अंतर से यह ऐतिहासिक विधेयक गिर गया। यह भारतीय संसदीय इतिहास की एक विरल घटना थी क्योंकि 1990 के दशक के बाद यह पहला अवसर था जब कोई संविधान संशोधन विधेयक सदन में आवश्यक बहुमत न मिल पाने के कारण असफल हुआ हो।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस असफलता ने देश की राजनीतिक दिशा को एक नया मोड़ दे दिया। मतदान के तुरंत बाद सदन के भीतर और बाहर आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर शुरू हो गया। विपक्षी नेताओं ने इसे अपनी नैतिक विजय बताया और कहा कि सरकार को अब यह समझ लेना चाहिए कि वे बिना आम सहमति के देश की लोकतांत्रिक संरचना के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते। दूसरी ओर</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सत्ता पक्ष ने इस हार को जनता की अदालत में ले जाने का निर्णय लिया। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार के प्रवक्ताओं ने इसे महिलाओं के अधिकारों पर विपक्ष का प्रहार बताया। उन्होंने जनता के बीच यह संदेश प्रसारित करना शुरू किया कि कैसे एक प्रगतिशील कानून को केवल संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए बलि चढ़ा दिया गया। विशेष रूप से 850 सीटों वाली नई संसद की परिकल्पना पर जो ग्रहण लगा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उसने भविष्य के चुनावों के लिए एक नया विमर्श तैयार कर दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पूरे विवाद में परिसीमन की तकनीकी जटिलताएं सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरीं। 543 से 850 सीटों की छलांग कोई सामान्य प्रशासनिक बदलाव नहीं था। इसके लिए राज्यों के बीच सीटों के पुनर्वितरण की आवश्यकता थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे दक्षिण भारतीय राज्यों में असंतोष की लहर उठने की संभावना थी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> विपक्ष ने इसी बिंदु को अपनी ढाल बनाया और इसे क्षेत्रीय असंतुलन का मुद्दा बना दिया। उनका तर्क था कि यदि 2011 की जनगणना को ही आधार माना गया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो उत्तर भारत के राज्यों की सीटें अत्यधिक बढ़ जाएंगी और दक्षिण भारत का राजनीतिक प्रभाव कम हो जाएगा। इस क्षेत्रीय अस्मिता और जातिगत आरक्षण के दोहरे पेच ने महिला आरक्षण जैसे सर्वमान्य मुद्दे को भी विवादित बना दिया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद भी इसकी गूंज शांत नहीं हुई। समाज के विभिन्न वर्गों में इस पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। महिला संगठनों ने जहाँ इस विधेयक के गिरने पर दुख व्यक्त किया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं कुछ विशेषज्ञों ने इसे संवैधानिक शुचिता की जीत बताया। </span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उनका मानना था कि बिना व्यापक विचार-विमर्श और पारदर्शी जनगणना के सीटों की संख्या में इतना बड़ा बदलाव करना भविष्य में संवैधानिक संकट उत्पन्न कर सकता था। प्रधानमंत्री मोदी ने इस परिणाम पर अपनी संक्षिप्त लेकिन गंभीर प्रतिक्रिया में कहा कि उनकी सरकार हार मानने वालों में से नहीं है और वे महिलाओं को उनके संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए भविष्य में और अधिक दृढ़ता के साथ प्रयास करेंगे।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कर्षतः 131वें संशोधन विधेयक की यह विफलता मात्र एक विधायी प्रक्रिया का थम जाना नहीं है अपितु यह उन गहन सामाजिक और क्षेत्रीय विषमताओं का प्रतिबिंब है जो हमारी राजनीति की आधारशिला रही हैं। क्या यह वास्तव में विपक्षी दलों की एकजुटता का ठोस परिणाम था अथवा शासन के रणनीतिक आकलन में कोई बड़ी चूक रह गई थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">? </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इन जिज्ञासाओं के समाधान तो भविष्य की गर्त में छिपे हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> परंतु वर्तमान का यथार्थ यही है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का पूर्ण क्रियान्वयन अब एक अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गया है। यह संपूर्ण घटनाक्रम इस सत्य को रेखांकित करता है कि लोकतंत्र में केवल संख्या बल ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि संविधान की मर्यादा और सामाजिक न्याय की मांगें उससे कहीं अधिक ऊँचा स्थान रखती हैं। 16 अप्रैल की उस संध्या जब सदन की कार्यवाही समाप्त हुई तो वह अपने पीछे ऐसे अनेक अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गई जिनका उत्तर हम सभी को आने वाले समय में खोजना होगा।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 18:24:57 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>संसद में बहस के बीच आधी रात को लागू हुआ महिला आरक्षण कानून 2023</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश की संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े मुद्दों पर देर रात तक जोरदार बहस हुई। इसी बीच महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले महिला आरक्षण अधिनियम-2023 को गुरुवार से लागू कर दिया गया है। इस संबंध में केंद्रीय कानून मंत्रालय ने आधिकारिक अधिसूचना जारी की है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">अधिनियम लागू होने के बावजूद इसका लाभ मौजूदा लोकसभा में महिलाओं को तुरंत नहीं मिलेगा। अधिकारियों के अनुसार, महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था अगली जनगणना के आधार पर होने वाली परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही प्रभावी होगी। केंद्रीय कानून मंत्रालय</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176456/womens-reservation-act-2023-came-into-force-at-midnight-amid"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/69e162c77f821-women-reservation-bill-090026691-16x9.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> देश की संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े मुद्दों पर देर रात तक जोरदार बहस हुई। इसी बीच महिलाओं को संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले महिला आरक्षण अधिनियम-2023 को गुरुवार से लागू कर दिया गया है। इस संबंध में केंद्रीय कानून मंत्रालय ने आधिकारिक अधिसूचना जारी की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अधिनियम लागू होने के बावजूद इसका लाभ मौजूदा लोकसभा में महिलाओं को तुरंत नहीं मिलेगा। अधिकारियों के अनुसार, महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था अगली जनगणना के आधार पर होने वाली परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही प्रभावी होगी। केंद्रीय कानून मंत्रालय की अधिसूचना में कहा गया है कि संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 के प्रावधान 16 अप्रैल 2026 से प्रभावी माने जाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण कानून पर कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह तो बिल्कुल ही अजीब है। सितंबर 2023 में पारित 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' आज से लागू हो गया है, जबकि इसमें किए जाने वाले संशोधनों पर अभी भी बहस चल रही है और उन पर मतदान होगा। मैं तो पूरी तरह से हैरान हूँ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सितंबर 2023 में संसद ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित किया था, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। हालांकि, कानून में पहले ही स्पष्ट कर दिया गया था कि यह आरक्षण 2027 की जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लागू किया जा सकेगा। फिलहाल लोकसभा में जिन तीन विधेयकों पर चर्चा चल रही है, उनका उद्देश्य इस आरक्षण को वर्ष 2029 से लागू करने का रास्ता तैयार करना है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:44:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>राहुल गांधी बोले- महिला आरक्षण के नाम पर ओबीसी का हिस्सा चोरी करना चाहते हैं- प्रधानमंत्री मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong></span>लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को आरोप लगाया कि पीएम मोदी महिला आरक्षण के नाम पर अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) का हिस्सा चोरी करना चाहते हैं, जो ‘राष्ट्र विरोधी गतिविधि’ है। राहुल गांधी ने लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किए जाने से एक दिन पहले जारी वीडियो संदेश में कहा कि अगर सरकार महिला आरक्षण लागू करना चाहती है,</p>
<p style="text-align:justify;">  तो वह वर्तमान नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू कर सकती है और परिसीमन भी नयी जनगणना के आधार पर होना चाहिए, क्योंकि उसमें ओबीसी की आबादी का आंकड़ा होगा।कांग्रेस</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176407/rahul-gandhi-said-wants-to-steal-obcs-share-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/154086465.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong></span>लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को आरोप लगाया कि पीएम मोदी महिला आरक्षण के नाम पर अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) का हिस्सा चोरी करना चाहते हैं, जो ‘राष्ट्र विरोधी गतिविधि’ है। राहुल गांधी ने लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़ा संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किए जाने से एक दिन पहले जारी वीडियो संदेश में कहा कि अगर सरकार महिला आरक्षण लागू करना चाहती है,</p>
<p style="text-align:justify;"> तो वह वर्तमान नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू कर सकती है और परिसीमन भी नयी जनगणना के आधार पर होना चाहिए, क्योंकि उसमें ओबीसी की आबादी का आंकड़ा होगा।कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि उनकी पार्टी महिला आरक्षण का पूरी तरह से समर्थन करती है, लेकिन सरकार इसके नाम पर कुछ और करना चाहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने दावा किया, ‘‘अब बहुत बड़ी बेईमानी की जा रही है। प्रधानमंत्री नहीं चाहते हैं कि जाति जनगणना और नयी जनगणना के आधार पर यह (महिला आरक्षण) निर्णय लिया जाए। प्रधानमंत्री आपकी (ओबीसी) भागीदारी आप से छीन रहे हैं। वह चाहते हैं कि 2011 की जनगणना का इस्तेमाल किया जाए, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्गों की संख्या नहीं है। वह आपकी (ओबीसी) भागीदारी छीनना चाहते हैं।’’</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल गांधी ने कहा, ‘‘प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी के लोग घबरा गए हैं, क्योंकि जाति जनगणना के आंकड़े आना शुरू हो गए हैं। उन्हें पता लग गया है कि पिछड़ों की कितनी आबादी है। वे नहीं चाहते कि आपको (ओबीसी) आबादी के हिसाब से भागीदारी मिले। यह राष्ट्र-विरोधी गतिविधि है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस नेता ने प्रस्तावित परिसीमन को ‘‘खतरनाक’’ करार दिया और कहा, ‘‘सच्चाई यह है कि मोदी जी जो चाहते हैं, अगर वह हो जाए, तो उससे दक्षिण के राज्यों, पश्चिम के छोटे राज्यों और पूर्वोत्तर के राज्यों को भयंकर नुकसान होगा। यह राष्ट्र-विरोधी गतिविधि है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमारा रुख है कि आप (प्रधानमंत्री) 2026 में हो रही जनगणना के आधार पर (परिसीमन) कीजिए और 2011 की जनगणना के आधार पर मत कीजिए, क्योंकि उसमें ओबीसी का आंकड़ा नहीं है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल गांधी ने कहा, ‘‘अगर आप (प्रधानमंत्री) महिला आरक्षण अधिनियम लागू करना चाहते हैं, तो आपके पास एक अधिनियम पड़ा हुआ है, उसे लागू कीजिए। हम पूरा समर्थन करेंगे। मगर हम आपको अन्य पिछड़ा वर्गों, दक्षिण भारतीय राज्यों और छोटे प्रदेशों के खिलाफ काम नहीं करने देंगे।’’</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘‘मोदी जी, मैं समझता हूं कि आप देश को यह संदेश देना चाहते हैं कि आप महिला समर्थक हैं। मैं जानता हूं कि आप एप्स्टीन फाइल से डरे हुए हैं।’ राहुल गांधी ने कहा, ‘‘आप चाहते हैं कि आपके मुताबिक सीटें बढ़ें, आपके मुताबिक परिसीमन हो और ओबीसी को कुछ नहीं मिले। हम आपको ऐसा नहीं करने देंगे।’’</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 21:01:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मील का पत्थर साबित होगा नारी शक्ति वंदन अधिनियम </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">नारी शक्ति वंदन अधिनियम आज लोकसभा के पटल पर चर्चा के लिए रख दिया गया है। यह भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए मील का पत्थर साबित होगा। देश की राजनीति और भविष्य निर्माण में महिलाओं की भूमिका हमेशा से उल्लेखनीय रही है। भारतीय संविधान सभा में कुल 15 महिला सदस्य थीं। इन महिलाओं ने संविधान के मसौदे को तैयार करने और देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संविधान सभा के बाद महिलाओं ने संसद में भी एंट्री ली। भारतीय लोकतंत्र के सात दशकों के सफर में संसद की संरचना में</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176346/nari-shakti-vandan-act-will-prove-to-be-a-milestone"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas14.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नारी शक्ति वंदन अधिनियम आज लोकसभा के पटल पर चर्चा के लिए रख दिया गया है। यह भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए मील का पत्थर साबित होगा। देश की राजनीति और भविष्य निर्माण में महिलाओं की भूमिका हमेशा से उल्लेखनीय रही है। भारतीय संविधान सभा में कुल 15 महिला सदस्य थीं। इन महिलाओं ने संविधान के मसौदे को तैयार करने और देश के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। संविधान सभा के बाद महिलाओं ने संसद में भी एंट्री ली। भारतीय लोकतंत्र के सात दशकों के सफर में संसद की संरचना में कई बदलाव आए हैं, लेकिन अब एक बड़ा बदलाव अंतिम चरण में है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि महिलाएं सशक्त देती हैं और देश के शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी बढ़ती है, तो हमारे लोकतंत्र और समाज के लिए इससे बेहतर भला और क्या होगा। आधी आबादी को उनका हक मिलना सिर्फ न्याय नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति के लिए अनिवार्य है। लेकिन जब हम महिला आरक्षण से जुड़े हालिया घटनाक्रमों और इसके कानूनी पेचीदगियों को देखते हैं, तो साफ नजर आता है कि सरकार की मंशा इस मुद्दे पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसा लगता है कि इसे वास्तविक सशक्तिकरण के बजाय एक राजनीतिक हथियार के तौर पर अधिक इस्तेमाल किया जा रहा है। इस कानून की सबसे बड़ी और बुनियादी कमी इसका शतों में बंधा होना है। सरकार ने बिल तो पास कर दिया, लेकिन इसके साथ एक ऐसी शतं जोड़ दी जिसने इसे फिलहाल एक भविष्य का वादा बनाकर खेड़ दिया है। कानून के मुताबिक, आरक्षण तभी लागू होगा जब नई जनगणना होगी और उसके आधार पर सीटों का नया चंटवारा यानी परिसीमन होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के माध्यम से लोकसभा में महिलाओं को मिलने वाला 33 प्रतिशत आरक्षण केवल एक कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि उस असमानता को दूर करने का प्रयास है जो 1952 से लगातार चली आ रही है। लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ती रही है, हालांकि यह अब भी संतोषजनक स्तर तक नहीं पहुंची है। पहली लोकसभा में 22 महिलाएं चुनी गई थीं, जो कुल सदस्यों का 4.4 प्रतिशत थीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके बाद 1957 की दूसरी लोकसभा में यह संख्या बढ़कर 27 (5.4 प्रतिशत) हो गई और 1962 की तीसरी लोकसभा में 34 महिलाएं (6.7 प्रतिशत) सदन तक पहुंचीं।चौथी लोकसभा में यह संख्या थोड़ी घटकर 31 (5.9 प्रतिशत) रह गई, जबकि पांचवीं लोकसभा में केवल 22 महिलाएं (4.2 प्रतिशत) ही चुनी गईं। इसके बाद छठी लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी और कम होकर 19 (3.4 प्रतिशत) रह गई, लेकिन सातवीं लोकसभा में यह फिर बढ़कर 28 (5.1 प्रतिशत) हो गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आठवीं लोकसभा में महिलाओं की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई और 44 महिलाएं (8.11 प्रतिशत) चुनी गईं। हालांकि नौवीं लोकसभा में यह संख्या फिर घटकर 28 (5.3 प्रतिशत) रह गई, जबकि दसवीं लोकसभा में 36 महिलाएं (7 प्रतिशत) सांसद बनीं। इसके बाद 11वीं लोकसभा में 40 महिलाएं (7.4 प्रतिशत) और 12वीं लोकसभा में 44 महिलाएं (8 प्रतिशत) चुनी गईं। 13वीं लोकसभा में यह आंकड़ा बढ़कर 48 (8.8 प्रतिशत) हुआ, जबकि 14वीं लोकसभा में 45 महिलाएं (8.1 प्रतिशत) संसद पहुंचीं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">15वीं लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी पहली बार दो अंकों में पहुंची, जब 59 महिलाएं (10.9 प्रतिशत) सांसद बनीं। 16वीं लोकसभा में यह संख्या और बढ़कर 62 हो गई, जो कुल संख्याबल का लगभग 11 प्रतिशत है। वहीं, 2019 की 17वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या 78 रही जो कुल सांसदों का 14.3 प्रतिशत थी। वर्तमान 18वीं लोकसभा में मामूली बदलाव के साथ यह संख्या 74 पर है, जो पिछली बार से कम है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान 18वीं लोकसभा में मामूली बदलाव के साथ यह संख्या 74 पर है, जो पिछली बार से कम है। कुल मिला कर यह वृद्धि सुखद तो है, लेकिन भारत की उस आधी आबादी की आकांक्षाओं के सामने नाकाफी है, जो देश के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने में बराबर की हिस्सेदार है। हालांकि, साल 2026 की जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन ने महिला आरक्षण की राह को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार की नई योजना के अनुसार भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 की जा सकती है। इसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी, क्योंकि सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम लागू करने जा रही है। कानून के आने से ऐसा पहली बार होगा जब भारतीय संसद में महिला सांसदों की संख्या एक साथ लगभग 200 की बढ़त दर्ज करेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण के लागू होने से केवल संख्या बल नहीं बदलेगा, बल्कि विधायी प्रक्रिया और नीति-निर्माण के मुद्दों में भी व्यापक बदलाव आने की उम्मीद है। शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सुरक्षा जैसे विषयों पर सदन के भीतर अब और अधिक प्रखर और संवेदनशील बहसें देखने को मिलेंगी।जानकारों का मानना है कि इस लंबी प्रक्रिया के कारण यह आरक्षण 2029 या शायद 2034 तक खिंच सकता है। सवाल यह उठता है कि अगर नीयत साफ थी, तो इसे तुरंत मौजूदा सीटों पर ही क्यों लागू नहीं किया गया?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जनगणना और परिसीमन जैसी उलझी हुई प्रक्रियाओं के साथ जोड़कर सरकार ने इसे एक ऐसे रास्ते पर डाल दिया है, जिसकी मंजिल का फिलहाल कोई पता नहीं है। जैसे ही सरकार सीटों के नए बंटवारे की बात करती है, दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता बढ़ जाती है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने पिछले कई सालों में जनसंख्या को काबू करने के लिए बहुत अच्छा काम किया है। अब तकनीकी दिक्कत यह है कि यदि सीटों का फैसला केवल आबादी के आधार पर होता है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की लोकसभा सीटें बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगी और दक्षिण का राजनीतिक बजन कम हो जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आंकड़ों के हिसाब से देखें तो उत्तर भारत के कुछ राज्यों में सीटें अस्सी प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं, जबकि दक्षिण में यह बढ़ोतरी बहुत कम होगी। दक्षिण के राज्यों का कहना है कि उन्हें अच्छा काम करने की सजा दी जा रही है। सरकार ने इस क्षेत्रीय विवाद को सुलझाने का कोई पका रास्ता बताए बिना ही महिला आरक्षण को सीटों के बंटवारे से जोड़ दिया। इससे यह डर पैदा हो गया है कि महिलाओं को हक देने के नाम पर कहीं देश के अलग-अलग हिस्सों के बीच का तालमेल ही न बिगड़ जाए। इस बिल की एक और बड़ी व्यावहारिक चिंता प्रॉक्सी संस्कृति और रसूखदार राजनीतिक घरानों का कब्जा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसे आसान भाषा में समों तो यह नाम महिला का और काम पुरुष का वाली स्थिति है। गाँवों की पंच्चायतों में हमने अक्सर देखा है कि महिला चुनाव तो जीत जाती है, लेकिन दफ्तर में उसके पति, पिता या भाई बैठते हैं और सारे फैसले बही लेते हैं। इसे ही पति-सरपंच संस्कृति कहा जाता है। अब डर यह है कि विधानसभा और संसद में भी यही होगा। राजनीतिक पार्टियां जमीन से जुड़ी संघर्षशील महिलाओं के बजाय उन्हीं महिलाओं को टिकट देंगी जो पहले से ताकतवर राजनीतिक परिवारों से आती हैं। यानी एक आम महिला के लिए संसद के दरवाजे अभी भी बंद रह सकते हैं, क्योंकि आज के दौर में चुनाव लड़ना बहुत महंगा हो चुका है और महिलाओं के पास अपने खर्च के लिए पैसे नहीं होते।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बिना सरकारी मदद या चुनावी खर्च में छूट के, यह आरक्षण केवल अमीर वर्ग की महिलाओं तक सिमट कर रह जाएगा।गौरतलब है कि आज से लोकसभा सभा का तीन दिवसीय विशेष सत्र शुरू हो रहा है। इस दौरान केंद्र सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर चर्चा कर इसे लागू करेगी। इसके लागू होने के बाद 2029 की लोकसभा में संसद में महिला सांसदों की संख्या 273 तक पहुंचने की उम्मीद है। यह आरक्षण केवल सीटों का बंटवारा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के निर्माण में महिलाओं की बराबरी की दावेदारी का प्रमाण है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 19:26:49 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर लोकसभा में मंथन और राजनीति का नया दौर</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">लोकसभा में महिला आरक्षण कानून से जुड़े तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश होने के साथ ही देश की राजनीति एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। इन विधेयकों पर चर्चा के लिए सदन में लंबा समय तय किया गया है और इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन का बड़ा प्रश्न बन चुका है। चर्चा के लिए पहले मतदान हुआ जिसमें बहुमत ने इस विषय पर बहस को मंजूरी दी और अब सभी दल अपने अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं।</div>
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<div style="text-align:justify;">यह पूरा घटनाक्रम</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176340/brainstorming-in-lok-sabha-on-womens-reservation-amendment-bill-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/lok-sabha.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">लोकसभा में महिला आरक्षण कानून से जुड़े तीन महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पेश होने के साथ ही देश की राजनीति एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। इन विधेयकों पर चर्चा के लिए सदन में लंबा समय तय किया गया है और इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक कानून नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन का बड़ा प्रश्न बन चुका है। चर्चा के लिए पहले मतदान हुआ जिसमें बहुमत ने इस विषय पर बहस को मंजूरी दी और अब सभी दल अपने अपने तर्कों के साथ मैदान में हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह पूरा घटनाक्रम उस पृष्ठभूमि में हो रहा है जब वर्ष 2023 में महिला आरक्षण कानून को संसद से मंजूरी मिली थी। उस समय इसे नारी सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया था लेकिन इसके लागू होने की समयसीमा जनगणना और परिसीमन से जुड़ी शर्तों के कारण आगे खिसकती नजर आ रही थी। अब सरकार ने संशोधन के जरिए इन प्रक्रियाओं को सरल बनाने और लागू करने की समयसीमा को आगे लाने की कोशिश की है ताकि वर्ष 2029 के आम चुनावों तक इसका प्रभाव दिखाई दे सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नए प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करने की योजना है। वर्तमान में यह संख्या 543 है। इस विस्तार के साथ ही महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है जिससे लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित होंगी। यह बदलाव केवल संख्या का नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व के स्वरूप का भी संकेत देता है क्योंकि इससे संसद में महिलाओं की भागीदारी में बड़ा उछाल आ सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार का तर्क है कि यह संशोधन सामाजिक न्याय और समान भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। उनका कहना है कि संविधान में संशोधन करने का अधिकार संसद को है और समय समय पर देश की जरूरतों के अनुसार ऐसे बदलाव जरूरी होते हैं। इस दृष्टिकोण के साथ सरकार यह भी स्पष्ट कर रही है कि परिसीमन की प्रक्रिया को नई जनगणना के बजाय 2011 के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा जिससे देरी कम हो और कानून जल्दी लागू हो सके।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वहीं विपक्ष ने इस पूरे प्रस्ताव पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि महिला आरक्षण का वे समर्थन करते हैं लेकिन परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने के तरीके पर आपत्ति है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए राज्यों के बीच संतुलन बिगाड़ने की कोशिश हो रही है और यह संघीय ढांचे के लिए चुनौती बन सकता है। कुछ नेताओं ने इसे समाज को वर्गों में बांटने की साजिश भी बताया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक बहस का एक और महत्वपूर्ण पहलू मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने की मांग को लेकर सामने आया है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने यह मुद्दा उठाते हुए कहा कि अगर महिलाओं को आरक्षण दिया जा रहा है तो उसमें सभी वर्गों की महिलाओं को समान रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इसके जवाब में सरकार की ओर से यह कहा गया कि धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ है और यह संभव नहीं है। इस पर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे विवाद में परिसीमन सबसे अहम मुद्दा बनकर उभरा है। परिसीमन का मतलब है चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण ताकि जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। अभी तक सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर किया जा रहा था लेकिन अब इसमें बदलाव का प्रस्ताव है। नए प्रस्ताव के तहत संसद को यह अधिकार दिया जाएगा कि वह तय करे कि किस जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन किया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बदलाव का असर राज्यों पर अलग अलग तरीके से पड़ सकता है। अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों को सीटों में बढ़ोतरी का लाभ मिलेगा जबकि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में सीटों का अनुपात घट सकता है। यही कारण है कि तमिलनाडु और अन्य राज्यों के नेताओं ने इसका विरोध किया है और इसे क्षेत्रीय असंतुलन की ओर कदम बताया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण के प्रभाव को समझने के लिए वर्तमान स्थिति पर नजर डालना जरूरी है। अभी लोकसभा में महिलाओं की संख्या बहुत कम है और कुल सदस्यों का लगभग चौदह प्रतिशत ही महिलाएं हैं। राज्यसभा में भी यह प्रतिशत बहुत ज्यादा नहीं है। वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत इस मामले में काफी पीछे है और कई छोटे देश भी महिलाओं के प्रतिनिधित्व में आगे हैं। ऐसे में यह कानून भारत को इस दिशा में आगे ले जाने की क्षमता रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि इसके साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। आरक्षित सीटों का रोटेशन हर चुनाव में होगा जिससे नेताओं को अपने क्षेत्र बदलने पड़ सकते हैं। इसके अलावा राजनीतिक दलों को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा और अधिक संख्या में महिला उम्मीदवारों को तैयार करना होगा। यह बदलाव केवल कानून से नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति में परिवर्तन से ही सफल हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संविधान संशोधन होने के कारण इस विधेयक को पारित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता है। इसका मतलब है कि केवल साधारण बहुमत से काम नहीं चलेगा बल्कि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो तिहाई समर्थन जरूरी होगा। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार सरकार के पास बहुमत है लेकिन दो तिहाई समर्थन के लिए उसे अन्य दलों से भी सहयोग लेना पड़ सकता है। यही कारण है कि बैक चैनल बातचीत और राजनीतिक सहमति इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण का मुद्दा नया नहीं है बल्कि यह पिछले तीन दशकों से चर्चा में रहा है। कई बार इसे संसद में पेश किया गया लेकिन विभिन्न कारणों से यह पारित नहीं हो सका। वर्ष 2010 में इसे राज्यसभा से मंजूरी मिली थी लेकिन लोकसभा में पेश नहीं किया जा सका। अंततः वर्ष 2023 में इसे कानून का रूप मिला और अब संशोधन के जरिए इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि महिला आरक्षण केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। इसके जरिए महिलाओं को राजनीति में अधिक अवसर मिलेंगे और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। हालांकि इसके साथ जुड़े विवाद और चुनौतियां भी कम नहीं हैं और आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि संसद इस पर किस तरह सहमति बनाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंत में यह कहा जा सकता है कि यह विधेयक भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। यह तय करेगा कि देश सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों को किस हद तक लागू करने के लिए तैयार है। अगर यह सफल होता है तो यह आने वाले वर्षों में राजनीति के स्वरूप को बदल सकता है और महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम साबित हो सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 19:14:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन प्रतिनिधित्व के स्तर पर यह लंबे समय तक आधा अधूरा रहा है क्योंकि जनसंख्या का लगभग आधा हिस्सा होने के बावजूद महिलाएं राजनीतिक संस्थाओं में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हो पाई हैं। इसी ऐतिहासिक असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से 2023 में पारित संविधान का 106वां संशोधन अधिनियम</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया। यह अधिनियम लोकसभा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176334/the-future-of-womens-participation-in-democracy"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas14.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन प्रतिनिधित्व के स्तर पर यह लंबे समय तक आधा अधूरा रहा है क्योंकि जनसंख्या का लगभग आधा हिस्सा होने के बावजूद महिलाएं राजनीतिक संस्थाओं में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हो पाई हैं। इसी ऐतिहासिक असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से 2023 में पारित संविधान का 106वां संशोधन अधिनियम</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहा जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सामने आया। यह अधिनियम लोकसभा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान करता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए भी उप आरक्षण शामिल है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह कानून लगभग 27 वर्षों से चल रही बहस और राजनीतिक प्रयासों का परिणाम है। 19 सितंबर 2023 को इसे लोकसभा में प्रस्तुत किया गया और 20 तथा 21 सितंबर को दोनों सदनों से पारित कर दिया गया। 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह संविधान का हिस्सा बन गया। यह घटना न केवल विधायी दृष्टि से महत्वपूर्ण थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह इस बात का संकेत भी थी कि भारतीय राजनीति अब महिलाओं की भागीदारी को एक संरचनात्मक आवश्यकता के रूप में स्वीकार कर रही है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि इस अधिनियम का उद्देश्य स्पष्ट है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसकी वास्तविकता को समझने के लिए वर्तमान स्थिति पर नजर डालना जरूरी है। आज लोकसभा की 543 सीटों में से केवल 74 सीटों पर महिलाएं हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो लगभग 13.6 प्रतिशत है। यह संख्या 2019 के 78 से थोड़ी कम है। वहीं देशभर में कुल 4666 सांसदों और विधायकों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत के आसपास है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 8360 उम्मीदवारों में केवल 797 महिलाएं थीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यानी लगभग 9.6 प्रतिशत</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और लगभग 28 प्रतिशत सीटों पर कोई महिला प्रत्याशी ही नहीं था। यह आंकड़े इस बात को स्पष्ट करते हैं कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अभी भी संरचनात्मक बाधाओं से घिरी हुई है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके विपरीत यदि पंचायती राज संस्थाओं को देखा जाए तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। यहां महिलाओं की भागीदारी लगभग 46.6 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है और कई राज्यों में यह 50 प्रतिशत से भी अधिक है। उत्तराखंड लगभग 56 प्रतिशत के साथ अग्रणी है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ भी इस दिशा में उल्लेखनीय हैं। यह अनुभव इस बात का प्रमाण है कि जब आरक्षण को सही तरीके से लागू किया जाता है तो महिलाएं न केवल प्रतिनिधित्व प्राप्त करती हैं बल्कि प्रभावी नेतृत्व भी प्रस्तुत करती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो 1957 में लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 5.46 प्रतिशत थी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो धीरे धीरे बढ़कर 2024 में 13.6 प्रतिशत तक पहुंची है। यह वृद्धि महत्वपूर्ण जरूर है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। वैश्विक तुलना में भी भारत पीछे है। रवांडा में संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 64 प्रतिशत है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्यूबा में 53 प्रतिशत</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निकारागुआ में 52 प्रतिशत और संयुक्त अरब अमीरात में 50 प्रतिशत। इस परिप्रेक्ष्य में भारत का आंकड़ा अपेक्षाकृत कम है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो यह दर्शाता है कि केवल लोकतांत्रिक ढांचा पर्याप्त नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समावेशी नीतियों की भी आवश्यकता होती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नारी शक्ति वंदन अधिनियम इस कमी को दूर करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इसके कार्यान्वयन से जुड़ी शर्तें इसे जटिल बना देती हैं। अधिनियम में जोड़ा गया अनुच्छेद 334</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">A </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह स्पष्ट करता है कि महिलाओं के लिए आरक्षण तब तक लागू नहीं होगा जब तक अगली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। इसका अर्थ यह है कि कानून पारित होने के बावजूद इसका प्रभाव तुरंत नहीं दिखेगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यही बिंदु इस अधिनियम की सबसे बड़ी आलोचना का कारण भी बना हुआ है। 2021 की जनगणना पहले ही टल चुकी है और अब यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि नई जनगणना 2026 के बाद होगी। इसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया भी समय लेगी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि महिलाओं का आरक्षण 2029 या उससे भी बाद के चुनावों में लागू हो सकता है। इस देरी को कई विशेषज्ञ न्याय में विलंब के रूप में देखते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि सरकार और कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का तर्क है कि बिना अद्यतन जनसंख्या आंकड़ों के सीटों का पुनर्वितरण करना उचित नहीं होगा। संविधान के अनुसार परिसीमन एक आवश्यक प्रक्रिया है ताकि प्रतिनिधित्व समान और संतुलित रहे। यदि पुराने आंकड़ों के आधार पर आरक्षण लागू किया जाता है तो भविष्य में इसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। इस प्रकार यह बहस केवल राजनीतिक नहीं बल्कि संवैधानिक भी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस अधिनियम के साथ एक और महत्वपूर्ण मुद्दा जुड़ा हुआ है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वह है संघीय संतुलन। परिसीमन की प्रक्रिया जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण करती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व का अनुपात बदल सकता है। दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए उन्हें यह आशंका है कि उनकी सीटें घट सकती हैं जबकि उत्तर भारत की सीटें बढ़ सकती हैं। यह स्थिति राजनीतिक तनाव को जन्म दे सकती है और संघीय ढांचे को चुनौती दे सकती है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक न्याय के दृष्टिकोण से भी यह अधिनियम पूरी तरह निर्विवाद नहीं है। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए उप आरक्षण का प्रावधान है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से कोई व्यवस्था नहीं की गई है। कई राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन इसे अधूरा कदम मानते हैं और </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">OBC </span><span lang="hi" xml:lang="hi">महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग करते हैं। यह मुद्दा भविष्य में राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके अतिरिक्त यह अधिनियम केवल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं तक सीमित है। राज्यसभा और विधान परिषद जैसे उच्च सदनों में महिलाओं के लिए कोई आरक्षण नहीं है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या यह सुधार वास्तव में व्यापक है या केवल आंशिक।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">व्यावहारिक स्तर पर भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। राजनीतिक दलों के भीतर महिलाओं को टिकट देने की प्रवृत्ति अभी भी सीमित है। चुनावी फंडिंग</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संगठनात्मक समर्थन और नेतृत्व प्रशिक्षण जैसी व्यवस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी कम है। पंचायत स्तर पर देखे गए प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व के उदाहरण</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की जगह उनके परिजन निर्णय लेते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह भी एक संभावित खतरा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी इस अधिनियम के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। यह भारतीय लोकतंत्र में एक संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में कदम है। पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी ने यह सिद्ध कर दिया है कि अवसर मिलने पर महिलाएं प्रभावी नेतृत्व कर सकती हैं और नीति निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं। यह अधिनियम उस अनुभव को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का प्रयास है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="en-us" xml:lang="en-us"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस प्रकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक ऐसा कानून है जो सिद्धांत रूप में अत्यंत प्रगतिशील है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन व्यवहार में कई जटिलताओं से घिरा हुआ है। यह महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">परंतु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी शीघ्रता और प्रभावशीलता के साथ लागू किया जाता है। यदि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रियाओं को समय पर पूरा कर लिया जाता है और राजनीतिक इच्छाशक्ति बनी रहती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो यह अधिनियम भारत के लोकतंत्र को अधिक समावेशी और संतुलित बना सकता है। अन्यथा यह केवल एक अधूरी संभावना बनकर रह सकता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 19:03:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महिला शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में मानव श्रृंखला व हस्ताक्षर अभियान आयोजित</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज।</strong> सोमवार को हेमवती नंदन बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय नैनी में सोमवार को महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. ओम प्रकाश के निर्देशन में मिशन शक्ति फेज-5 एवं राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के संयुक्त तत्वावधान में महिला शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के समर्थन में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।कार्यक्रम के अंतर्गत छात्र-छात्राओं द्वारा मानव श्रृंखला का निर्माण किया गया तथा अधिनियम के समर्थन में व्यापक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय की छात्राएं, प्राध्यापक एवं कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकारों के प्रति जागरूकता</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176060/human-chain-and-signature-campaign-organized-in-support-of-mahila"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260413-wa0261.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>नैनी, प्रयागराज।</strong> सोमवार को हेमवती नंदन बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय नैनी में सोमवार को महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. ओम प्रकाश के निर्देशन में मिशन शक्ति फेज-5 एवं राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के संयुक्त तत्वावधान में महिला शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के समर्थन में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया।कार्यक्रम के अंतर्गत छात्र-छात्राओं द्वारा मानव श्रृंखला का निर्माण किया गया तथा अधिनियम के समर्थन में व्यापक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय की छात्राएं, प्राध्यापक एवं कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाना था। मानव श्रृंखला के माध्यम से छात्राओं ने एकजुटता का संदेश देते हुए यह स्पष्ट किया कि आज की नारी अपने अधिकारों के प्रति सजग है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए प्रतिबद्ध है। इस दौरान वक्ताओं ने महिला सशक्तिकरण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महिला शक्ति वंदन अधिनियम 2023 महिलाओं को राजनीतिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हस्ताक्षर अभियान के माध्यम से छात्राओं एवं शिक्षकों ने अधिनियम के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया और समाज के अन्य वर्गों को भी जागरूक करने का संकल्प लिया। प्राध्यापकों ने छात्राओं को प्रेरित करते हुए कहा कि शिक्षा ही वह सशक्त माध्यम है, जिससे महिलाएं अपने अधिकारों को समझकर समाज में प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने महिला सम्मान और सुरक्षा के प्रति जागरूक रहने तथा दूसरों को भी जागरूक करने की शपथ ली। पूरे आयोजन में उत्साह और जागरूकता का माहौल देखने को मिला, जो युवाओं की महिला सशक्तिकरण के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। कार्यक्रम का सफल संचालन राजनीति शास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. हेमलता द्वारा किया गया।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 21:37:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>क्या महिला आरक्षण बिल 2029 में लागू होगा या पंचायत के चुनाव में ही  सिर्फ लागू रहेगा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> भारतीय लोकतंत्र में १६अप्रैल के बाद नया अध्याय शुरू होगा।भारत में वैसे तो पंचायती राज  संस्थाओं में ७३ वे और ७५वे सम्बिधान संशोधन से महिलाओं को पंचायती राज के तीनों स्तर पर आरक्षण दे दिया गया था । परन्तु संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात पुरी नहीं हो पाई थी। कारण कि पुरूष सांसदों को अपनी संख्या कम हो जाने का भय था और महिलाओं के आरक्षण में अनु, सूचित जाति जन जाति मुसलमान और पिछड़े वर्गों की मांग के कारण  महिला आरक्षण विधेयक नहीं पास हो पाया  था । उस समय गठबन्धन की</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176045/will-the-womens-reservation-bill-be-implemented-in-2029-or"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/women-reservation-bill-3.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> भारतीय लोकतंत्र में १६अप्रैल के बाद नया अध्याय शुरू होगा।भारत में वैसे तो पंचायती राज  संस्थाओं में ७३ वे और ७५वे सम्बिधान संशोधन से महिलाओं को पंचायती राज के तीनों स्तर पर आरक्षण दे दिया गया था । परन्तु संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात पुरी नहीं हो पाई थी। कारण कि पुरूष सांसदों को अपनी संख्या कम हो जाने का भय था और महिलाओं के आरक्षण में अनु, सूचित जाति जन जाति मुसलमान और पिछड़े वर्गों की मांग के कारण  महिला आरक्षण विधेयक नहीं पास हो पाया  था । उस समय गठबन्धन की सरकार थी दो तिहाई बहुमत लोक सभा  में बिल पास कराने लायक नहीं था।भाजपा बिल का विरोध कर रही थी।  वह महिलाओं के आरक्षण में जातिगत आरक्षण के पक्ष में नहीं थी। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विपक्ष जातिगत आरक्षण चाहता था।आरक्षण में आरक्षण कैसे लागू हो महिलाओं का इस पर सहमति नहीं बन पाई थी। कांग्रेस ने मनमोहन सरकार में महिलाओं के आरक्षण के लिए लोकसभा में बिल लाया पर भाजपा के विरोध तथा सत्ता में गठबन्धन साथियों के कारण बिल नहीं पास हुआ फिर ठंडे बस्ते में रख दिया गया।उस समय संसद में सांसदों की संख्या बढ़ाने की बात भी नहीं हो रही थी कि पुरूष सांसदों की संख्या कम नहीं होंगी।फिर भी कांग्रेस ने महिलाओं के आरक्षण बिल को दूसरी बार लोक सभा में नहीं राज्य सभा से पास करवा दिया जहां पर वह बहुमत में थी।इस आशा विश्वास से अगर २०१४मे लोक सभा में बहुत मिलेगा तो बिल पास हो जायेगा और महिलाओं के लिए आरक्षण विधानसभा से सांसद तक हो जायेगा । </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">परन्तु २०१४मे भाजपा की सरकार बन ग ई।  फिर भी   विपक्ष के बार बार आग्रह पर बिल नहीं पास हुआ ।भाजपा कांग्रेस के उस बिल को नहीं पास करवाना चाहती थी।फिर २०२२दोबारा भाजपा सरaकार में वापस आई तो महिला विधेयक को नये तरीक़े से बनाया गया और विधेयक का नाम नारी वन्दन विधेयक  दिया गया । लोक सभा राज्य सभा में  सार्थक रूप मेंबहस हुआ सुझाव व कुछ संशोधन भी किये गये फिर दोनों सदनों में बहुमत के साथ २०२३मे बिल पास  कर दिया गया।  जोअब एक काननी विधेयक बन गया है। परन्तु लागू करने की  समय सीमा पर सत्ता और विपक्ष में बहुत विवाद हुआ । विपक्ष चाहता था २०२४के चुनाव में लागू हो लेकिन सत्ता पक्ष ने नहीं माना और कहा जब न ई जनगणना हो जायेगी हर सीट का परसिमन होगा। तथा संसदों और विधानसभाओ की संख्या तैंतीस प्रतिशत बढ़ जायेगा  प्रदेश की आबादी के अनुसार संसद की सीटों की संख्या निर्धारित होगी। तभी नारी वन्दन आरक्षण लागू होगा ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संसदों की सख्या ८१६ होगी जिसमे२७३महिला सांसदों की संख्या होगी । यह पहले पन्द्रह साल के लिए ही लागू होगा फिर आगे बढ़ाने पर विचार होंगा।संसद और विधानसभाओं में आबादी के अनुसार जो सीटों को बढ़ाने की बात हो रही वह भी एक जटिल समस्या बन गया है  वर्तमान सरकार का कहना है जिस राज्य में जन संख्या कम है।  जो राज्य जनसंख्या वृद्धि दर को कम किया है उस राज्य में सांसदों की संख्या कम होगी । जिस राज्य में जन संख्या ज्यादा है उस राज्य में सांसदों की संख्या बढ़ जायेगी इस निती से दक्षिण के संसद की सीटों में वर्तमान की अपेक्षा बहुत कम संसद संख्या बढ़ेगी जो उनके लिए  नुकसानदायक होगा वह अपने राज्यों में अधिक संसदों की सख्या चाहते  हैं  उनका कहना जनसंख्या वृद्धि दर रोकर कोई अपराध नहीं किया है कि हमारे प्रदेश में संसदों की सख्या उत्तर-भारत के अनुसार कम हो उसी अनुपात में दक्षिण राज्यों की संसद की संख्या बढ़े।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसे नियम से यूं भी कहें उत्तर भारत के प्रदेशों में सांसदों की सख्या दक्षिण भारत की अपेक्षा ज्यादा होगी और दक्षिण भारत का जो अभी वर्चस्व है वह कम हो जायेगा।यह भी विशेष सत्र में चर्चा में आयेगा साथ में दक्षिण भारत से कम महिलाओं का संसद में प्रतिनिधित्व होगा।२०२९मे होने वाले संसद के चुनाव में लागू करना है पर अभी संशय बना हुआ हैं अब यह स्वयं १६अप्रैल को होने वाले विशेष संसद के सत्र में ही दूर होगा कि महिला आरक्षण कब और कैसे देश में लागु होगा आरक्षण संसदीय सीटों और विधानसभा में किस तरह लागू होगा महिलाओं को पंचायती राज की तरह जाति-आधारित आरक्षण होगा याआरक्षण में आरक्षण का क्या होगा कैसे होगा। विपक्ष शुरुआत से ही महिलाओं को जातिगत आधार पर आरक्षण मांगताआ रहा है। मुसलमान सांसद  मुस्लिम महिलाओं के लिए भी अलग से आरक्षण मांग रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अभी भारत में जनगणना शुरू हो रही  है।इस जनगणना में पहली बार जातियों की भी गणना होगी जो महिलाओं को जातिगत आरक्षण के लिए लाभ दायक होगा ‌यह जनगणना होने के बाद ही सही तौर पर पता चलेगा।अभी तो बस सबकी नजर संसद के विशेष सत्र पर टीका है।वैसे यह भाजपा की एक नई चाल है वह बंगाल के चुनाव को ध्यान में रख कर ही इस नारी वन्दन बिल के लिए विशेष सत्र बुलाया है।  वह बंगाल की सत्ता चाहता है।अगर वास्तव में महिलाओं को आरक्षण देने में ईमानदार होते तो २०२३मे  बिल पास होगया था पर २०२४मे लागू नहीं किया क्यों यह सवाल तो जनता में  है।अब क्या २०२९मे लागू होगा या उसके बाद यह अभी स्पष्ट नहीं है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सम्बिधानमे१२८वा संशोधन करके महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत आरक्षण दिया गया है आरक्षण मे ही अनुसूति जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण देने का प्रवधान है लेकिन इस आरक्षण में पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए पंचायती राज की तरह आरक्षण नहीं दिया गया है।इस पर विशेष सत्र में बात उठेगी यह अभी पता नहीं है परन्तु विपक्ष पिछड़े वर्ग की महिलाओ के लिए आरक्षण बराबर माग करता आ रहा है।और मुसलमान भी मांग रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नारी वन्दन बिल से आम नारी को बहुत लाभ नहीं मिलेगा जेबा कि पंचायती राज चुनाव में बहुत कम आम महिलाएं चुनाव जीत पाती है या लगती अधिकांश आरक्षित सीटों पर पहले से राजनीति में स्थापित परिवार कि महिलाओं को ही जीत मिलती है।यह बात संसद और विधानसभाओं के चुनाव में आरक्षण लागू होने के बाद होगा। आम महिलाएं  आरक्षण के सहारे संसद विधायक बनती है या पहले से स्थापित राजनेताओं की पत्नियां बेटी बहू ही आयेगी आरक्षण में।अभी तो लोग पति प्रधान बन कर चलते बाद विधायक पति गाड़ी प्पर लिख कर चलेंगे।महिला पीछे रहेगी पति आगे से विधायक संसद रहेगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 21:14:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डा.अंबेडकर का महिला अधिकारों के लिए समर्पण </title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
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<div style="text-align:justify;">संसद से लेकर समाज  तक आज महिला अधिकारों और सशक्तिकरण की चर्चा जोरों पर है। क्या हम जानते हैं कि इसकी वैचारिक और विधायी नींव स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में ही डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा रख दी गई थी?। डॉ. अंबेडकर स्वतंत्र भारत के उन विरले और दूरदर्शी राजनेताओं में अग्रणी थे, जिन्होंने महिलाओं की समानता को केवल एक सामाजिक सुधार का विषय न मानकर इसे राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य शर्त के रूप में देखा। उनका सुस्पष्ट मत था कि किसी भी समुदाय की प्रगति का आकलन वहां की महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175969/dr-bhimrao-ambedkar-creator-of-the-constitution-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(1)5.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;"><strong>प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संसद से लेकर समाज  तक आज महिला अधिकारों और सशक्तिकरण की चर्चा जोरों पर है। क्या हम जानते हैं कि इसकी वैचारिक और विधायी नींव स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में ही डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा रख दी गई थी?। डॉ. अंबेडकर स्वतंत्र भारत के उन विरले और दूरदर्शी राजनेताओं में अग्रणी थे, जिन्होंने महिलाओं की समानता को केवल एक सामाजिक सुधार का विषय न मानकर इसे राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य शर्त के रूप में देखा। उनका सुस्पष्ट मत था कि किसी भी समुदाय की प्रगति का आकलन वहां की महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है। इसी दृष्टि के साथ उन्होंने न केवल सैद्धांतिक विमर्श किया, बल्कि विधायी और नीतिगत धरातल पर भी महिलाओं के उत्थान के लिए निर्णायक कदम उठाए और सतत् प्रयास किए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​भारतीय संविधान के निर्माण के दौरान डॉ. अंबेडकर ने यह सुनिश्चित किया कि महिलाओं को पुरुष के समान नागरिक अधिकार प्राप्त हों। अनुच्छेद 14 और 15 के माध्यम से कानून के समक्ष समानता और लिंग आधारित भेदभाव के विरुद्ध सुरक्षा जैसे प्रावधान ऐतिहासिक मील के पत्थर साबित हुए। अंबेडकर का सबसे क्रांतिकारी और साहसिक प्रयास 'हिंदू कोड बिल' के रूप में सामने आया, जिसके माध्यम से उन्होंने महिलाओं को संपत्ति में अधिकार, विवाह और तलाक में समानता तथा उत्तराधिकार के न्यायसंगत प्रावधान देने की पुरजोर वकालत की। उस दौर में इस विधेयक का रूढ़िवादी वर्गों द्वारा इतना तीव्र विरोध हुआ कि अंबेडकर ने अपने सिद्धांतों की रक्षा हेतु कानून मंत्री के पद से त्यागपत्र देना बेहतर समझा। हालांकि, कालांतर में इसी बिल के विभिन्न अंशों ने उन कानूनों का रूप लिया, जो आज भारतीय नारी के सम्मान और अधिकारों की आधारशिला बने हुए हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​विधिक समानता के साथ-साथ डॉ. अंबेडकर ने श्रमिक महिलाओं के जीवन में भी गरिमापूर्ण परिवर्तन लाने की पहल की। उन्होंने मातृत्व लाभ, कार्य के निश्चित घंटे और खदानों व कारखानों में कार्यरत महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे प्रावधानों को श्रम कानूनों का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि आर्थिक सशक्तिकरण के बिना सामाजिक स्वतंत्रता अधूरी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">​वर्तमान समय में भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी दलों की केंद्र सरकार द्वारा 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के माध्यम से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करना उसी लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव प्रतीत होता है, जिसकी परिकल्पना दशकों पहले अंबेडकर ने की थी। हालांकि, इस कानून के क्रियान्वयन को आगामी जनगणना और परिसीमन से जोड़ने के कारण इसकी समय-सीमा को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस जारी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानूनी ढांचा तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा अपितु इसके लिए सभी राजनीतिक दलों की वास्तविक इच्छाशक्ति और सामाजिक मानसिकता में आमूल-चूल परिवर्तन भी अपरिहार्य है। डॉ. अंबेडकर का संघर्ष आज भी हमें यह स्मरण कराता है कि वास्तविक प्रगति केवल नीतियों के निर्माण से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन और समाज की व्यापक स्वीकार्यता से ही संभव होगी।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 19:01:22 +0530</pubDate>
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