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                <title>संसद सीट वृद्धि - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>संसद सीट वृद्धि RSS Feed</description>
                
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                <title>लोकतंत्र की पुनर्रचना: आरक्षण, परिसीमन और भारत का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत का लोकतंत्र सदैव एक जीवंत और गतिशील प्रयोग रहा है ऐसा प्रयोग जो अपनी विविधता, अपनी जटिलता और अपनी अंतर्विरोधों के साथ भी निरंतर आगे बढ़ता रहा है। स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्षों से अधिक की यात्रा में यह लोकतंत्र अनेक परीक्षाओं से गुजरा है, अनेक संकटों को पार किया है और अनेक ऐतिहासिक मोड़ों पर खड़ा रहा है। किंतु वर्तमान समय जो प्रश्न उठा रहा है, वह केवल नीति या विधान का प्रश्न नहीं है यह उस मूलभूत प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास है कि क्या भारत अपनी आधी जनसंख्या को वास्तविक शासन-सत्ता में भागीदार बनाने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175829/reconstruction-of-democracy-reservation-delimitation-and-the-future-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/celebrating-indian-democracy-and-leadership.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत का लोकतंत्र सदैव एक जीवंत और गतिशील प्रयोग रहा है ऐसा प्रयोग जो अपनी विविधता, अपनी जटिलता और अपनी अंतर्विरोधों के साथ भी निरंतर आगे बढ़ता रहा है। स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्षों से अधिक की यात्रा में यह लोकतंत्र अनेक परीक्षाओं से गुजरा है, अनेक संकटों को पार किया है और अनेक ऐतिहासिक मोड़ों पर खड़ा रहा है। किंतु वर्तमान समय जो प्रश्न उठा रहा है, वह केवल नीति या विधान का प्रश्न नहीं है यह उस मूलभूत प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास है कि क्या भारत अपनी आधी जनसंख्या को वास्तविक शासन-सत्ता में भागीदार बनाने के लिए सचमुच तत्पर है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह प्रश्न महिला आरक्षण और परिसीमन के उस संयुक्त विमर्श से उभरा है, जो आज भारतीय राजनीति के केंद्र में है। इसे समझने के लिए पहले उस स्थिति को देखना आवश्यक है जो दशकों से बनी हुई है। स्वतंत्रता के पश्चात जब प्रथम लोकसभा गठित हुई, तब उसमें केवल बाईस महिला सदस्य थीं। यह संख्या तब से अत्यंत धीमी गति से बढ़ी है। 17वीं लोकसभा में यह लगभग 15% के आसपास ही पहुँची। राज्य विधानसभाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ अनेक राज्यों में महिला विधायकों का औसत दस प्रतिशत से भी कम है। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक संसद का सत्र बुलाया बुलाया है। इस दौरान संविधान संशोधन बिल लाने की तैयारी है। सरकार महिलाओं को 33% आरक्षण देने के साथ लोकसभा और विधानसभा सीटों में 50% तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव ला सकती है। इसके तहत लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 816 हो जाएगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसी असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से संसद ने वह ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन पारित किया जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से जाना जाता है। इसके अंतर्गत लोकसभा और समस्त राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई अर्थात तैंतीस प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। यह आरक्षण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पहले से आरक्षित सीटों पर भी लागू होगा, जिसका अर्थ यह है कि सामाजिक न्याय की दोहरी परत इस व्यवस्था में समाहित है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह बताता है कि जब किसी विधायिका में महिलाओं की भागीदारी तीस प्रतिशत के आसपास पहुँचती है, तो स्वास्थ्य, शिक्षा, बाल कल्याण और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों पर नीति-निर्माण की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा जाता है। रवांडा जैसे देश, जहाँ संसद में महिलाओं की भागीदारी साठ प्रतिशत से अधिक है, इसके जीवंत उदाहरण हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">किंतु इस अधिनियम का सबसे विवादास्पद पक्ष इसका कार्यान्वयन है। यह स्पष्ट किया गया है कि यह आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होगा, बल्कि इसे आगामी जनगणना और उसके पश्चात होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू किया जाएगा। वर्तमान संकेतों के अनुसार इसे वर्ष दो हजार उनतीस के आम चुनाव तक लागू करने की योजना है। इस विलंब ने अनेक राजनीतिक दलों और महिला संगठनों में असंतोष उत्पन्न किया है। उनका तर्क है कि जो अधिकार न्यायसंगत है और जिसकी आवश्यकता स्वीकार की जा चुकी है, उसे किसी तकनीकी प्रक्रिया के अधीन क्यों बनाया जाए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">परिसीमन की प्रक्रिया स्वयं में एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील विषय है। इसका सरल अर्थ है जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण, ताकि प्रत्येक प्रतिनिधि लगभग समान जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे और लोकतंत्र की मूल भावना एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य सुनिश्चित हो सके। भारत में अंतिम व्यापक परिसीमन उन्नीस सौ इकहत्तर की जनगणना के आधार पर किया गया था। उसके बाद यह प्रक्रिया इस उद्देश्य से स्थगित कर दी गई कि यदि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में सीटें बढ़ाई गईं, तो परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक लागू करने वाले राज्यों को राजनीतिक हानि उठानी पड़ेगी। यह स्थगन एक नैतिक निर्णय था, किंतु अब जब पाँच दशक से अधिक समय बीत चुका है और जनसंख्या का वितरण नाटकीय रूप से बदल चुका है, तो परिसीमन की अनिवार्यता से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वर्तमान जनसंख्या आँकड़ों पर दृष्टि डालें तो उत्तर प्रदेश की जनसंख्या लगभग पच्चीस करोड़ से अधिक है, बिहार की लगभग तेरह करोड़, जबकि केरल की जनसंख्या लगभग साढ़े तीन करोड़ और तमिलनाडु की लगभग साढ़े सात करोड़ है। यदि परिसीमन पूर्णतः जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उत्तर भारत के राज्यों को संसद में अनेक अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत घट सकती है। दक्षिण के राज्यों का तर्क यह है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, राज्य की नीतियों का अनुपालन किया और अब उन्हें इसी अनुपालन के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी का सामना करना पड़ रहा है। यह केवल संख्याओं का विवाद नहीं है यह उस संघीय भावना का प्रश्न है जिसके आधार पर भारत का ताना-बाना बुना गया है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस संकट से निपटने के लिए एक प्रस्ताव यह आया है कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की जाए। वर्तमान में लोकसभा में पाँच सौ तैंतालीस निर्वाचित सीटें हैं। परिसीमन के बाद यह संख्या आठ सौ या इससे भी अधिक तक जा सकती है। इस वृद्धि का तर्क यह है कि यदि सीटों की कुल संख्या बढ़ाई जाए, तो किसी भी राज्य की वर्तमान सीटें घटाए बिना नई जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। इससे दक्षिण भारत के राज्यों की आशंका कुछ हद तक कम हो सकती है। किंतु इसके साथ यह प्रश्न भी उठता है कि क्या आठ सौ या उससे अधिक सदस्यों वाली संसद प्रभावी ढंग से कार्य कर सकती है, क्या विधायी विमर्श की गुणवत्ता बनी रह सकती है और क्या नई संसद भवन इतनी बड़ी संख्या को समायोजित करने में सक्षम होगा। नए संसद भवन में एक हजार से अधिक सदस्यों की बैठने की व्यवस्था इस दिशा में एक दूरदर्शी तैयारी के रूप में देखी जा सकती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण और सीट-वृद्धि का यह संयोजन भारतीय दलीय राजनीति के भीतर भी गहरे परिवर्तन उत्पन्न करेगा। प्रत्येक दल को अपनी एक-तिहाई सीटें महिला प्रत्याशियों के लिए सुनिश्चित करनी होंगी। यह व्यवस्था उन महिलाओं के लिए अवसर का द्वार खोलेगी जो प्रतिभावान हैं, सक्रिय हैं, किंतु दलीय संरचना के भीतर टिकट पाने में असमर्थ रही हैं। साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि दल किन महिलाओं को आगे लाएँगे, क्या वे वास्तव में स्वतंत्र और सशक्त नेत्रियाँ होंगी, या केवल परिवारवाद के विस्तार के रूप में उन्हें मैदान में उतारा जाएगा। पंचायत स्तर का अनुभव इस संदर्भ में मिश्रित रहा है। एक ओर लाखों महिला प्रतिनिधियों ने ग्रामीण प्रशासन में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है, पेयजल, स्वच्छता और विद्यालयों के विषय में निर्णय लिए हैं; तो दूसरी ओर अनेक स्थानों पर परिवार के पुरुष सदस्य ही वास्तविक निर्णय-कर्ता बने रहे और महिला प्रतिनिधि केवल प्रतीकात्मक भूमिका तक सीमित रहीं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसीलिए यह समझना आवश्यक है कि केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक दलों के भीतर महिलाओं को वास्तविक निर्णय प्रक्रिया में स्थान मिलना चाहिए। संसदीय समितियों में, मंत्रिमंडल में, नीति-निर्माण के हर स्तर पर उनकी भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। आरक्षण द्वार खोलता है, किंतु उस द्वार से होकर जो यात्रा होती है, वह वातावरण, व्यवस्था और सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर निर्भर करती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि अन्य पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए इस आरक्षण के भीतर उनकी पर्याप्त भागीदारी कैसे सुनिश्चित होगी, यह प्रश्न अभी विमर्श की प्रतीक्षा में है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत इस समय एक ऐसे ऐतिहासिक सन्धिकाल पर खड़ा है, जहाँ से दो मार्ग जाते हैं। एक मार्ग वह है जहाँ यह सारी व्यवस्था महिला आरक्षण, परिसीमन, सीट-वृद्धि - एक समग्र, संतुलित और संवेदनशील ढंग से लागू होती है और भारतीय लोकतंत्र वास्तव में अधिक समावेशी, अधिक प्रतिनिधिक और अधिक न्यायपूर्ण बनता है। दूसरा मार्ग वह है जहाँ ये प्रावधान केवल कागजी रह जाते हैं, क्षेत्रीय असंतुलन और सामाजिक विभाजन गहरे होते हैं और एक ऐतिहासिक अवसर व्यर्थ चला जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक परिपक्वता इसी में प्रकट होगी कि वह इन जटिलताओं के बीच संतुलन साध सके, संघीय भावना की रक्षा करते हुए महिलाओं को वास्तविक सत्ता-भागीदारी दे सके और यह सुनिश्चित कर सके कि प्रतिनिधित्व केवल एक संख्यात्मक उपलब्धि न बनकर सामाजिक परिवर्तन का सेतु बने। यह बहस केवल एक अधिनियम या एक प्रक्रिया की बहस नहीं है - यह उस प्रश्न की बहस है कि भारत किस लोकतंत्र का निर्माण करना चाहता है।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:45:22 +0530</pubDate>
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