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                <title>महिला आरक्षण - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>महिला आरक्षण RSS Feed</description>
                
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                <title>&quot;महिला आरक्षण और परिसीमन के लिए बहुमत की तलाश में एनडीए की नई राजनीतिक चाल&quot;</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां संसद के भीतर संख्या बल सबसे बड़ी ताकत बन गया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार महिला आरक्षण कानून को लागू करने और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को संसद से पारित कराना चाहती है। इन दोनों विषयों पर संविधान संशोधन आवश्यक है और इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए लगातार अपना संख्याबल बढ़ाने में जुटे हैं। इसी रणनीति के तहत अब महाराष्ट्र</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183677/ndas-new-political-move-in-search-of-majority-for-women"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/women-reservation-bil-final-1776339283956_m.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां संसद के भीतर संख्या बल सबसे बड़ी ताकत बन गया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार महिला आरक्षण कानून को लागू करने और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को संसद से पारित कराना चाहती है। इन दोनों विषयों पर संविधान संशोधन आवश्यक है और इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए लगातार अपना संख्याबल बढ़ाने में जुटे हैं। इसी रणनीति के तहत अब महाराष्ट्र की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों को फिर से एक करने और उन्हें एनडीए में शामिल करने की कोशिशों की चर्चा तेज हो गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा नेतृत्व ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों के बीच समझौते का रास्ता निकालने का सुझाव दिया है। चर्चा यह भी है कि यदि दोनों गुट एक हो जाते हैं और एनडीए का हिस्सा बनते हैं तो केंद्र सरकार में दो कैबिनेट पद देने का प्रस्ताव भी सामने रखा गया है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम पर किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरी कवायद के पीछे सबसे बड़ा कारण संसद में दो तिहाई बहुमत का लक्ष्य है। संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता। सरकार को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विशेष बहुमत चाहिए। पिछले विशेष सत्र में सरकार को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया था जिसके बाद भाजपा ने अपने सहयोगियों का दायरा बढ़ाने और विपक्षी दलों में नए राजनीतिक समीकरण बनाने की रणनीति तेज कर दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार आज भी सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। पांच दशक से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने राज्य की राजनीति की दिशा कई बार बदली है। वे चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और केंद्र में रक्षा मंत्री तथा कृषि मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद भी संभाल चुके हैं। सहकारी क्षेत्र चीनी मिलों कृषि संस्थाओं और ग्रामीण राजनीति पर उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है। यही वजह है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी राजनीतिक उपयोगिता कम नहीं हुई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना शरद पवार ने 10 जून 1999 को पी ए संगमा और तारिक अनवर के साथ की थी। वर्ष 2023 में पार्टी दो हिस्सों में बंट गई जब उनके भतीजे अजित पवार अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हो गए और बाद में भाजपा तथा शिवसेना शिंदे गुट की सरकार में शामिल हो गए। फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने मूल एनसीपी का नाम और घड़ी चुनाव चिन्ह अजित पवार गुट को दे दिया। इसके बाद शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी का नाम एनसीपी शरदचंद्र पवार रखा गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी शरदचंद्र पवार राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा मानी जाती है। महाराष्ट्र में भी यह दल महा विकास अघाड़ी के साथ रहा है जिसमें कांग्रेस और शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट शामिल हैं। हालांकि हाल के दिनों में ऐसी खबरें सामने आई हैं कि पार्टी के भीतर भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर अलग अलग राय है। कुछ नेता भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ जाने के पक्ष में बताए जा रहे हैं जबकि कुछ कांग्रेस के साथ और मजबूत संबंध चाहते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकसभा में शरद पवार की पार्टी के पास फिलहाल 8 सांसद हैं जबकि महाराष्ट्र विधानसभा में उसके लगभग 10 विधायक हैं। संख्या बहुत बड़ी नहीं है लेकिन संविधान संशोधन जैसे मामलों में हर वोट की अहमियत बढ़ जाती है। यदि शरद पवार का पूरा दल एनडीए के साथ आता है तो लोकसभा और राज्यसभा दोनों में सरकार की स्थिति और मजबूत हो सकती है। यही वजह है कि भाजपा इस संभावना को गंभीरता से देख रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सूत्रों के अनुसार भाजपा की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि यदि दोनों एनसीपी गुट एक हो जाते हैं तो सत्ता और संगठन में उचित भागीदारी दी जाएगी। वहीं दूसरी ओर शरद पवार गुट के भीतर भी अलग अलग मांगों की चर्चा है। सुप्रिया सुले को बड़ी भूमिका देने की बात हो रही है जबकि कुछ रिपोर्टों में केंद्रीय मंत्री पद और अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों पर भी बातचीत का दावा किया गया है। हालांकि इन सभी बातों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक किसी पक्ष ने नहीं की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में अजित पवार गुट की भूमिका भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पहले से ही महाराष्ट्र की एनडीए सरकार का हिस्सा है। यदि दोनों गुटों का विलय होता है तो सत्ता और संगठन में संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच पदों और जिम्मेदारियों को लेकर मतभेद की खबरें भी सामने आई हैं। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण कानून और परिसीमन दोनों ही ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा संबंध देश की भविष्य की राजनीतिक संरचना से है। महिला आरक्षण लागू होने के बाद लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित होंगी। वहीं परिसीमन के बाद जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की संख्या तथा सीमाओं में बदलाव हो सकता है। इन दोनों विषयों पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाना सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकसभा में एनडीए के पास बहुमत तो है लेकिन संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो तिहाई संख्या तक पहुंचने के लिए अभी भी अतिरिक्त समर्थन चाहिए। राज्यसभा में भी स्थिति लगभग यही है। ऐसे में छोटे और क्षेत्रीय दलों का महत्व अचानक बढ़ गया है। यही वजह है कि भाजपा केवल नए सहयोगी जोड़ने पर ही नहीं बल्कि विपक्षी दलों के प्रभावशाली नेताओं से भी संवाद बनाए हुए है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शरद पवार की खासियत यह रही है कि उन्होंने हमेशा परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक फैसले लिए हैं। वे कई बार विरोधी दलों के साथ भी काम कर चुके हैं और अलग अलग विचारधाराओं के नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंध अच्छे माने जाते हैं। इसी अनुभव और प्रभाव के कारण आज भी वे महाराष्ट्र की राजनीति में सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि शरद पवार अपनी पार्टी को किस दिशा में ले जाते हैं। यदि वे विपक्षी गठबंधन में बने रहते हैं तो महाराष्ट्र की राजनीति का मौजूदा संतुलन कायम रह सकता है। लेकिन यदि वे किसी नए राजनीतिक समझौते की ओर बढ़ते हैं तो इसका असर केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि संसद में भी सरकार के संख्याबल और राष्ट्रीय राजनीति पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल इतना तय है कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े विधेयकों को पारित कराने की कोशिशों ने शरद पवार और उनकी पार्टी को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 22:39:00 +0530</pubDate>
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                <title>विधायक विनय वर्मा के नेतृत्व में  महिलाओं ने आक्रोश पदयात्रा निकाल भरी हुंकार</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर। </strong>नगर पंचायत शोहरतगढ़ में रविवार शाम को विधानसभा क्षेत्र शोहरतगढ़ विधायक विनय वर्मा व पत्नी बबिता वर्मा के साथ हजारों महिलाओं ने विधायक आवास संत रविदास नगर टीचर्स कॉलोनी से महिला आक्रोश पद यात्रा निकाल नारी शक्ति वंदन, नारी शक्ति, जिन्दाबाद, महिलाओं के अधिकार को लेकर आवाज़ बुलंद किया।  </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">सांसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुहिम को रोकने वाले विरोधियों पर महिलाएं व विधायक खूब गरजे। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में महिलाओं ने यात्रा में हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में अपनी एकजुटता</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178051/under-the-leadership-of-mla-vinay-verma-women-took-out"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/1777819120315.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर। </strong>नगर पंचायत शोहरतगढ़ में रविवार शाम को विधानसभा क्षेत्र शोहरतगढ़ विधायक विनय वर्मा व पत्नी बबिता वर्मा के साथ हजारों महिलाओं ने विधायक आवास संत रविदास नगर टीचर्स कॉलोनी से महिला आक्रोश पद यात्रा निकाल नारी शक्ति वंदन, नारी शक्ति, जिन्दाबाद, महिलाओं के अधिकार को लेकर आवाज़ बुलंद किया।  </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सांसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुहिम को रोकने वाले विरोधियों पर महिलाएं व विधायक खूब गरजे। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में महिलाओं ने यात्रा में हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर नारी शक्ति वंदन अधिनियम के समर्थन में अपनी एकजुटता दिखाई। पद यात्रा विधायक आवास से शुरू होकर  नगर पंचायत शोहरतगढ़ के तिरंगा तिराहा, पुलिस पिकेट, गोलघर, सोनारी मोहल्ला, भारत माता चौक, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आदि का भ्रमण करते हुए पुनः वापस लौटी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विधायक ने कहा कि यह अधिनियम महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया कि वे महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर दोहरा रवैया अपनाते हैं और जब अधिकार देने की बात आती है तो विरोध की राजनीति करते हैं। विधायक ने कहा कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का आरक्षण कोई नहीं रोक पायेगा आधी आवादी अपना हक लेकर रहेगी विधायक पत्नी बबिता वर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए निरंतर कार्य हो रहा है और नारी शक्ति वंदन अधिनियम इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने इस महत्वपूर्ण कानून का विरोध कर महिलाओं के अधिकारों के साथ अन्याय किया है, जिसे देश की मातृशक्ति कभी माफ नहीं करेगी। पद यात्रा में दौरान विधायक विनय वर्मा, विधायक पत्नी बबिता वर्मा, एसडीएम विवेकानंद मिश्रा, सीओ मयंक द्विवेदी, तहसीलदार प्रकाश सिंह, प्रभारी निरीक्षक नवीन कुमार सिंह ,शैलेन्द्र कौशल, विजय गुप्ता, अरविंद वर्मा, हरीश वर्मा , राजकुमारी, मुन्नी देवी आदि सहित हजारों की संख्या में महिलाओं की सहभागिता रही।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 20:17:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>लोकतंत्र की पुनर्रचना: आरक्षण, परिसीमन और भारत का भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत का लोकतंत्र सदैव एक जीवंत और गतिशील प्रयोग रहा है ऐसा प्रयोग जो अपनी विविधता, अपनी जटिलता और अपनी अंतर्विरोधों के साथ भी निरंतर आगे बढ़ता रहा है। स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्षों से अधिक की यात्रा में यह लोकतंत्र अनेक परीक्षाओं से गुजरा है, अनेक संकटों को पार किया है और अनेक ऐतिहासिक मोड़ों पर खड़ा रहा है। किंतु वर्तमान समय जो प्रश्न उठा रहा है, वह केवल नीति या विधान का प्रश्न नहीं है यह उस मूलभूत प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास है कि क्या भारत अपनी आधी जनसंख्या को वास्तविक शासन-सत्ता में भागीदार बनाने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175829/reconstruction-of-democracy-reservation-delimitation-and-the-future-of-india"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/celebrating-indian-democracy-and-leadership.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>महेन्द्र तिवारी </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत का लोकतंत्र सदैव एक जीवंत और गतिशील प्रयोग रहा है ऐसा प्रयोग जो अपनी विविधता, अपनी जटिलता और अपनी अंतर्विरोधों के साथ भी निरंतर आगे बढ़ता रहा है। स्वतंत्रता के पचहत्तर वर्षों से अधिक की यात्रा में यह लोकतंत्र अनेक परीक्षाओं से गुजरा है, अनेक संकटों को पार किया है और अनेक ऐतिहासिक मोड़ों पर खड़ा रहा है। किंतु वर्तमान समय जो प्रश्न उठा रहा है, वह केवल नीति या विधान का प्रश्न नहीं है यह उस मूलभूत प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास है कि क्या भारत अपनी आधी जनसंख्या को वास्तविक शासन-सत्ता में भागीदार बनाने के लिए सचमुच तत्पर है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह प्रश्न महिला आरक्षण और परिसीमन के उस संयुक्त विमर्श से उभरा है, जो आज भारतीय राजनीति के केंद्र में है। इसे समझने के लिए पहले उस स्थिति को देखना आवश्यक है जो दशकों से बनी हुई है। स्वतंत्रता के पश्चात जब प्रथम लोकसभा गठित हुई, तब उसमें केवल बाईस महिला सदस्य थीं। यह संख्या तब से अत्यंत धीमी गति से बढ़ी है। 17वीं लोकसभा में यह लगभग 15% के आसपास ही पहुँची। राज्य विधानसभाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है, जहाँ अनेक राज्यों में महिला विधायकों का औसत दस प्रतिशत से भी कम है। सरकार ने 16 से 18 अप्रैल तक संसद का सत्र बुलाया बुलाया है। इस दौरान संविधान संशोधन बिल लाने की तैयारी है। सरकार महिलाओं को 33% आरक्षण देने के साथ लोकसभा और विधानसभा सीटों में 50% तक बढ़ोतरी का प्रस्ताव ला सकती है। इसके तहत लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 816 हो जाएगी।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसी असंतुलन को दूर करने के उद्देश्य से संसद ने वह ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन पारित किया जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से जाना जाता है। इसके अंतर्गत लोकसभा और समस्त राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई अर्थात तैंतीस प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। यह आरक्षण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पहले से आरक्षित सीटों पर भी लागू होगा, जिसका अर्थ यह है कि सामाजिक न्याय की दोहरी परत इस व्यवस्था में समाहित है। अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह बताता है कि जब किसी विधायिका में महिलाओं की भागीदारी तीस प्रतिशत के आसपास पहुँचती है, तो स्वास्थ्य, शिक्षा, बाल कल्याण और सामाजिक सुरक्षा जैसे विषयों पर नीति-निर्माण की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा जाता है। रवांडा जैसे देश, जहाँ संसद में महिलाओं की भागीदारी साठ प्रतिशत से अधिक है, इसके जीवंत उदाहरण हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">किंतु इस अधिनियम का सबसे विवादास्पद पक्ष इसका कार्यान्वयन है। यह स्पष्ट किया गया है कि यह आरक्षण तत्काल प्रभाव से लागू नहीं होगा, बल्कि इसे आगामी जनगणना और उसके पश्चात होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू किया जाएगा। वर्तमान संकेतों के अनुसार इसे वर्ष दो हजार उनतीस के आम चुनाव तक लागू करने की योजना है। इस विलंब ने अनेक राजनीतिक दलों और महिला संगठनों में असंतोष उत्पन्न किया है। उनका तर्क है कि जो अधिकार न्यायसंगत है और जिसकी आवश्यकता स्वीकार की जा चुकी है, उसे किसी तकनीकी प्रक्रिया के अधीन क्यों बनाया जाए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">परिसीमन की प्रक्रिया स्वयं में एक अत्यंत जटिल और संवेदनशील विषय है। इसका सरल अर्थ है जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण, ताकि प्रत्येक प्रतिनिधि लगभग समान जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करे और लोकतंत्र की मूल भावना एक व्यक्ति, एक मत, एक मूल्य सुनिश्चित हो सके। भारत में अंतिम व्यापक परिसीमन उन्नीस सौ इकहत्तर की जनगणना के आधार पर किया गया था। उसके बाद यह प्रक्रिया इस उद्देश्य से स्थगित कर दी गई कि यदि जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में सीटें बढ़ाई गईं, तो परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक लागू करने वाले राज्यों को राजनीतिक हानि उठानी पड़ेगी। यह स्थगन एक नैतिक निर्णय था, किंतु अब जब पाँच दशक से अधिक समय बीत चुका है और जनसंख्या का वितरण नाटकीय रूप से बदल चुका है, तो परिसीमन की अनिवार्यता से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वर्तमान जनसंख्या आँकड़ों पर दृष्टि डालें तो उत्तर प्रदेश की जनसंख्या लगभग पच्चीस करोड़ से अधिक है, बिहार की लगभग तेरह करोड़, जबकि केरल की जनसंख्या लगभग साढ़े तीन करोड़ और तमिलनाडु की लगभग साढ़े सात करोड़ है। यदि परिसीमन पूर्णतः जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उत्तर भारत के राज्यों को संसद में अनेक अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत घट सकती है। दक्षिण के राज्यों का तर्क यह है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, राज्य की नीतियों का अनुपालन किया और अब उन्हें इसी अनुपालन के कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी का सामना करना पड़ रहा है। यह केवल संख्याओं का विवाद नहीं है यह उस संघीय भावना का प्रश्न है जिसके आधार पर भारत का ताना-बाना बुना गया है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इस संकट से निपटने के लिए एक प्रस्ताव यह आया है कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की जाए। वर्तमान में लोकसभा में पाँच सौ तैंतालीस निर्वाचित सीटें हैं। परिसीमन के बाद यह संख्या आठ सौ या इससे भी अधिक तक जा सकती है। इस वृद्धि का तर्क यह है कि यदि सीटों की कुल संख्या बढ़ाई जाए, तो किसी भी राज्य की वर्तमान सीटें घटाए बिना नई जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। इससे दक्षिण भारत के राज्यों की आशंका कुछ हद तक कम हो सकती है। किंतु इसके साथ यह प्रश्न भी उठता है कि क्या आठ सौ या उससे अधिक सदस्यों वाली संसद प्रभावी ढंग से कार्य कर सकती है, क्या विधायी विमर्श की गुणवत्ता बनी रह सकती है और क्या नई संसद भवन इतनी बड़ी संख्या को समायोजित करने में सक्षम होगा। नए संसद भवन में एक हजार से अधिक सदस्यों की बैठने की व्यवस्था इस दिशा में एक दूरदर्शी तैयारी के रूप में देखी जा सकती है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण और सीट-वृद्धि का यह संयोजन भारतीय दलीय राजनीति के भीतर भी गहरे परिवर्तन उत्पन्न करेगा। प्रत्येक दल को अपनी एक-तिहाई सीटें महिला प्रत्याशियों के लिए सुनिश्चित करनी होंगी। यह व्यवस्था उन महिलाओं के लिए अवसर का द्वार खोलेगी जो प्रतिभावान हैं, सक्रिय हैं, किंतु दलीय संरचना के भीतर टिकट पाने में असमर्थ रही हैं। साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि दल किन महिलाओं को आगे लाएँगे, क्या वे वास्तव में स्वतंत्र और सशक्त नेत्रियाँ होंगी, या केवल परिवारवाद के विस्तार के रूप में उन्हें मैदान में उतारा जाएगा। पंचायत स्तर का अनुभव इस संदर्भ में मिश्रित रहा है। एक ओर लाखों महिला प्रतिनिधियों ने ग्रामीण प्रशासन में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है, पेयजल, स्वच्छता और विद्यालयों के विषय में निर्णय लिए हैं; तो दूसरी ओर अनेक स्थानों पर परिवार के पुरुष सदस्य ही वास्तविक निर्णय-कर्ता बने रहे और महिला प्रतिनिधि केवल प्रतीकात्मक भूमिका तक सीमित रहीं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">इसीलिए यह समझना आवश्यक है कि केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं है। राजनीतिक दलों के भीतर महिलाओं को वास्तविक निर्णय प्रक्रिया में स्थान मिलना चाहिए। संसदीय समितियों में, मंत्रिमंडल में, नीति-निर्माण के हर स्तर पर उनकी भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। आरक्षण द्वार खोलता है, किंतु उस द्वार से होकर जो यात्रा होती है, वह वातावरण, व्यवस्था और सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर निर्भर करती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि अन्य पिछड़े वर्गों की महिलाओं के लिए इस आरक्षण के भीतर उनकी पर्याप्त भागीदारी कैसे सुनिश्चित होगी, यह प्रश्न अभी विमर्श की प्रतीक्षा में है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत इस समय एक ऐसे ऐतिहासिक सन्धिकाल पर खड़ा है, जहाँ से दो मार्ग जाते हैं। एक मार्ग वह है जहाँ यह सारी व्यवस्था महिला आरक्षण, परिसीमन, सीट-वृद्धि - एक समग्र, संतुलित और संवेदनशील ढंग से लागू होती है और भारतीय लोकतंत्र वास्तव में अधिक समावेशी, अधिक प्रतिनिधिक और अधिक न्यायपूर्ण बनता है। दूसरा मार्ग वह है जहाँ ये प्रावधान केवल कागजी रह जाते हैं, क्षेत्रीय असंतुलन और सामाजिक विभाजन गहरे होते हैं और एक ऐतिहासिक अवसर व्यर्थ चला जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक परिपक्वता इसी में प्रकट होगी कि वह इन जटिलताओं के बीच संतुलन साध सके, संघीय भावना की रक्षा करते हुए महिलाओं को वास्तविक सत्ता-भागीदारी दे सके और यह सुनिश्चित कर सके कि प्रतिनिधित्व केवल एक संख्यात्मक उपलब्धि न बनकर सामाजिक परिवर्तन का सेतु बने। यह बहस केवल एक अधिनियम या एक प्रक्रिया की बहस नहीं है - यह उस प्रश्न की बहस है कि भारत किस लोकतंत्र का निर्माण करना चाहता है।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sun, 12 Apr 2026 18:45:22 +0530</pubDate>
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