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                <title>west bengal politics - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>टूटती तृणमूल कांग्रेस और ममता: संगठनात्मक कमजोरी और जनविश्वास का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p>पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीन दशक से छाई तृणमूल कांग्रेस आज अंदरूनी दरारों और संगठनात्मक टूटन के दौर से गुजर रही है। 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चे को उखाड़ फेंकने वाली पार्टी अब खुद अपने ही वजन तले डगमगा रही दिखती है। तृणमूल की सबसे बड़ी समस्या बन गई है नेताओं की लगातार नाराजगी और दल-बदल। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी कई विधायक, सांसद और जिला स्तर के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों में चले गए। शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, राजीव बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं का जाना संगठन में भरोसे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181935/disintegrating-trinamool-congress-and-mamta-organizational-weakness-and-crisis-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(4).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p>पश्चिम बंगाल की राजनीति में तीन दशक से छाई तृणमूल कांग्रेस आज अंदरूनी दरारों और संगठनात्मक टूटन के दौर से गुजर रही है। 2011 में 34 साल पुराने वाम मोर्चे को उखाड़ फेंकने वाली पार्टी अब खुद अपने ही वजन तले डगमगा रही दिखती है। तृणमूल की सबसे बड़ी समस्या बन गई है नेताओं की लगातार नाराजगी और दल-बदल। 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी कई विधायक, सांसद और जिला स्तर के नेता पार्टी छोड़कर भाजपा, कांग्रेस और वाम दलों में चले गए। शुभेंदु अधिकारी, मुकुल रॉय, राजीव बनर्जी जैसे कद्दावर नेताओं का जाना संगठन में भरोसे की कमी को दर्शाता है। नीचे के स्तर पर भी ब्लॉक और पंचायत स्तर पर गुटबाजी खुलकर सामने आ रही है।</p>
<p><br />नियोग, कोयला, गोरू तस्करी और राशन घोटाले जैसे मामलों में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के नाम सामने आए। ED और CBI की कार्रवाई ने संगठन की साख को नुकसान पहुंचाया। आम लोगों में यह धारणा मजबूत हुई है कि सत्ता के साथ भ्रष्टाचार भी जड़ें जमा चुका है। इससे जमीनी कार्यकर्ता हतोत्साहित हैं और मतदाता का एक हिस्सा विकल्प तलाश रहा है।<br />                  टीएमसी आज भी पूरी तरह ममता बनर्जी के व्यक्तित्व पर टिकी है। पार्टी का ढांचा संस्थागत कम, परिवार और करीबी नेताओं के इर्द-गिर्द ज्यादा केंद्रित है। अभिषेक बनर्जी के बढ़ते कद ने भी पुराने नेताओं में असहजता पैदा की है। जब कोई संगठन एक व्यक्ति पर निर्भर हो जाता है, तो उस व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और राजनीतिक रणनीति ही पार्टी का भविष्य तय करने लगती है। फिलहाल ताजा खबर यह है कि टीएमसी एक और बड़ी टूट की कगार पर खड़ी है और यह निश्चित हो गया है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद अब टीएमसी को उभरने का मौका शायद ही मिल सके। कल सोमवार को नई दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में ममता बनर्जी उपस्थित नज़र आईं तो वहीं दावा है कि उनकी पार्टी के 20 सांसदो ने बगावत कर दी है। सूचना है कि पार्टी के कई सांसद भाजपा नेताओं से मिलकर बगावत की रणनीति बना रहे थे।</p>
<p>केन्द्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के घर पर सोमवार को ही टीएमसी के कई सांसदों ने मुलाकात के बाद अलग गुट बनाने का दावा किया है। पता चला है कि इस बैठक में टीएमसी के पांच सांसद मौजूद रहे। इनमें शर्मिला सरकार, प्रसून बनर्जी, जगदीश बसुनिया, कालिपद सोरेन व अनूप चक्रवर्ती शामिल हैं। टीएमसी के लोकसभा में 28 व राज्यसभा में 12 सांसद हैं। सूत्र बताते हैं कि बागी सांसदों ने रविवार को एक बैठक की थी, और उसी वक्त अलग गुट बनाने का ऐलान कर टीएमसी को झटका दिया जाने पर विचार हुआ है।</p>
<p>जब विधायक दल में टूट हुई थी तो सांसदों के बग़ावत की चर्चाओं ने तूल पकड़ लिया था। ऐसा बताया जा रहा है कि बाग़ी सांसद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के भी संपर्क में हैं और बहुत ही जल्द एक नये गुट का ऐलान हो सकता है। टीएमसी की सांसद काकोली घोष ने दावा किया है कि बागी सांसदों ने एनडीए का समर्थन करने का फैसला किया है और लोकसभा स्पीकर को अपने फैसले से अवगत करा दिया है। कोई भी पार्टी जब चुनाव हारती है तब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है</p>
<p>अपनी पार्टी को टूट से बचाने की क्यों कि हर कोई सत्ता के लड्डू खाना चाहता है, बेकार में विपक्ष में अब कोई बैठना नहीं चाहता है। इसके लिए केंद्र में कांग्रेस में टूट, दिल्ली में आप में टूट उत्तर प्रदेश में सपा में टूट और महाराष्ट्र का उदाहरण देखा जा सकता है। यही संकट अब इस समय टीएमसी के ऊपर मंडरा रहा है। अब देखना यह है कि ममता बनर्जी अपनी पार्टी को टूटने से कितना बचा पातीं हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:45:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डैमोग्राफी बदलाव भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जनसांख्यिकीय बदलाव के कारणों के अध्ययन, अवैध प्रवासन की जांच और समाधान हेतु भारत सरकार ने हाल ही में जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में एक हाई-लेवल कमेटी का गठन किया है। यह समिति राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संतुलन पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन कर रही है।इसके अतिरिक्त, डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) का लाभ उठाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए मुख्य कदम निम्नलिखित हैं. डीसीयुवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए स्किल इंडिया मिशन और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना  चलाई जा रही है।रोजगार और उद्यमिता  और मुद्रा योजना के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा दिया</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180812/demographic-change-is-a-serious-threat-to-indias-security"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जनसांख्यिकीय बदलाव के कारणों के अध्ययन, अवैध प्रवासन की जांच और समाधान हेतु भारत सरकार ने हाल ही में जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर की अध्यक्षता में एक हाई-लेवल कमेटी का गठन किया है। यह समिति राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संतुलन पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन कर रही है।इसके अतिरिक्त, डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभांश) का लाभ उठाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए मुख्य कदम निम्नलिखित हैं. डीसीयुवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए स्किल इंडिया मिशन और प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना  चलाई जा रही है।रोजगार और उद्यमिता  और मुद्रा योजना के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है।शिक्षा : नई शिक्षा नीति  2020 के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित की जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको बता दें डेमोग्राफिक चेंज पर केंद्र सरकार ने हाई लेवल कमेटी का गठन किया है।   बता दें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और घुसपैठ बड़ा मुद्दा था। इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार का घेराव किया था। इसी आधार पर भाजपा ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मात दी और पूर्व बहुमत से सत्ता हासिल की। ऐसे में अब केंद्र सरकार द्वारा डेमोग्राफिक चेंज पर हाई लेवल कमेटी गठित करना अहम माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डेमोग्राफिक चेंज पर केंद्र सरकार ने हाई लेवल कमेटी का गठन किया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार (26 मई 2026) को इसकी घोषणा की. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट कर कहा कि घुसपैठ और अन्य कारणों से किसी भी राष्ट्र के वर्तमान व भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. इसी चुनौती से निपटने के लिए 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डेमोग्राफिक चेंज पर 'हाई लेवल कमेटी' बनाने की घोषणा की थी. गृह मंत्री अमित शाह ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा, 'मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि सरकार ने इस कमेटी का गठन कर लिया है. जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नावलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी में जनगणना आयुक्त के साथ दुर्गा शंकर मिश्रा (रिटायर्ड आईएएस), बालाजी श्रीवास्तव (रिटायर्ड आईपीएस) और डॉ. शमिका रवि समिति के सदस्य होंगे. संयुक्त सचिव (फॉरेनर्स-I), गृह मंत्रालय, इस समिति के सदस्य सचिव होंगे.'</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और घुसपैठ बड़ा मुद्दा था. इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार का घेराव किया था. इसी आधार पर बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मात दी और पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल की. ऐसे में अब केंद्र सरकार द्वारा डेमोग्राफिक चेंज पर हाई लेवल कमेटी गठित करना अहम माना जा रहा है. </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको याद हो कि पीएम मोदी ने 15 अगस्त 2025 कहा था कि भारत अवैध घुसपैठ से निपटने के लिए जनसांख्यिकीय मिशन शुरू करेगा. उन्होंने लोगों को अवैध घुसपैठ के माध्यम से देश की जनसांख्यिकी को बदलने की सोची-समझी साजिश के बारे में चेतावनी दी और कहा कि कोई भी राष्ट्र घुसपैठियों को बर्दाश्त नहीं कर सकता, क्योंकि उन्होंने इस समस्या से निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय जनसांख्यिकीय मिशन की घोषणा की.उनहोने कहा था आज देश के सामने एक चिंता, एक चुनौती के संबंध में आगाह करना चाहता हूं.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">षड्यंत्र के तहत, सोची समझी साजिश के तहत देश की डेमोग्राफी को बदला जा रहा है. एक नए संकट के बीच बोए जा रहे हैं और यह घुसपैठिए, मेरे देश के नौजवानों के रोजी-रोटी छीन रहे हैं. यह घुसपैठिए मेरे देश की बहन बेटियों को निशाना बना रहे हैं, यह बर्दाश्त नहीं होगा. यह घुसपैठिए भोले भाले आदिवासियों को भ्रमित करके उनकी जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं. यह देश सहन नहीं करेगा और इसलिए मेरे प्यारे देशवासियों जब डेमोग्राफी परिवर्तन होता है, सीमावर्ती क्षेत्रों में डेमोग्राफी में परिवर्तन होता है, तब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संकट पैदा होता है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">देश की एकता, अखंडता और प्रगति के लिए यह संकट पैदा करता है. सामाजिक तनाव के बीज बो देता है और कोई देश अपना देश घुसपैठियों के हवाले नहीं कर सकता है. दुनिया का कोई देश नहीं कर सकता है, तो हम भारत को कैसे कर सकते हैं हमारे पूर्वजों ने त्याग और बलिदान से आजादी पाई है. हमें स्वतंत्र भारत दिया है, उन महापुरुषों के प्रति हमारा कर्तव्य हैं कि हम हमारे देश में ऐसी हरकतों को स्वीकार न करें, उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी और इसलिए मैं आज लाल किले को प्राचीर से कहना चाहता हूं.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हमने एक हाई पावर डेमोग्राफी मिशन शुरू करने का निर्णय किया है. यह मिशन, इस मिशन के द्वारा यह जो भीषण संकट नजर आ रहा है, भारत पर मंडरा रहा है यह जो संकट है, उसको निपटाने के लिए तय समय में सुविचारित निश्चित रूप से अपने कार्य को करेगा, उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं.  भारत में धर्म के अनुसार जनसंख्या का प्रतिशत लगातार हिन्दू आबादी के गिरावट होने का संकेत देता है 1951 2011 2001 1991 1981 1971 1961 ह1951 हिंदू -4.30% 79.80% 80.50% 81.50% 82.30% 82.70% 83.50% 84.10% मुस्लिम 4.40% 14.20% 13.40% 12.60% 11.80% 11.20% 10.70% 9.80%।  1951 से 2011 तक की जनगणना में जो सभी धर्मों की जनसंख्या वृद्धि में असमानता दिखती है, उसका प्रमुख कारण घुसपैठ है. इस देश में 1951, 1971, 1991 और 2011 में जनगणना हुई, जिनमें शुरू से ही धर्म पूछने की परंपरा रही है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">1951 की जनगणना में हिंदू आबादी 84 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम आबादी 9.8 प्रतिशत थी. 1971 में हिंदू आबादी 82 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 11 प्रतिशत हो गई. 1991 में हिंदू आबादी 81 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 12.2 प्रतिशत हो गई.वहीं, 2011 में हिंदू आबादी 79 प्रतिशत और मुस्लिम आबादी 14.2 प्रतिशत हो गई. मुस्लिम आबादी में 24.6 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है, जबकि हिंदू आबादी में 4.5 प्रतिशत की कमी आई है. मोदी सरकार की घुसपैठ विरोधी 3डी नीति- पहचान करना मतदाता सूची से हटवाना , उन्हें वापस भेजना है. सबसे गौरतलब बात है कि भारत में मुस्लिम समुदाय की आबादी हिंदू आबादी की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है. साल 2010 में 14.4% से बढ़कर 2050 में 18.4% होने का अनुमान है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा था कि झारखंड की आदिवासी आबादी में गिरावट के पीछे बांग्लादेशी घुसपैठ का हाथ है. उन्होंने मांग की थी कि राज्य के कुछ हिस्सों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों और बिहार के किशनगंज और कटिहार को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया जाए ताकि क्षेत्र में "बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों" की बढ़ती संख्या से उत्पन्न चुनौती से निपटा जा सके, जिसके कारण, उनके अनुसार, आदिवासी आबादी में काफी कमी आई है.</div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने ने लोकसभा में शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाया और कहा कि झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासियों की आबादी बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढ़ती संख्या के कारण घट रही है. उन्होंने कहा कि संथाल परगना क्षेत्र में आदिवासी आबादी 2000 में 36% थी, जो अब घटकर 26% रह गई है. उन्होंने पूछा, 'ये आदिवासी कहां चले गए?'2014 से, भारत की सीमाओं पर घुसपैठ के 8,500 से अधिक प्रयासों का पता चला है, जबकि 20,000 से अधिक घुसपैठियों को गिरफ्तार किया गया है.</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर सुरक्षा, अर्थशास्त्र और नीति निर्माण के स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। केंद्र सरकार और सुरक्षा विश्लेषकों का एक वर्ग इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक संतुलन के लिए गंभीर चुनौती मानता है, जबकि अर्थशास्त्री और जनसांख्यिकी विशेषज्ञ इसे गिरती प्रजनन दर और बुजुर्ग होती आबादी से जुड़ी आर्थिक चुनौती के रूप में देखते हैं।इस विषय को मुख्य रूप से अलग-अलग दृष्टिकोणों के माध्यम से समझा जा सकता है: सुरक्षा और सामाजिक संतुलन का दृष्टिकोण इस दृष्टिकोण के तहत, देश के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों, विशेषकर सीमावर्ती इलाकों में हो रहे "अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव" को एक बड़ा खतरा माना जाता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, अवैध घुसपैठ और अनियमित प्रवासन के कारण सीमावर्ती राज्यों (जैसे असम, पश्चिम बंगाल, और बिहार) की जनसंख्या बनावट में असामान्य बदलाव आए हैं, जो कानून-व्यवस्था और संप्रभुता के लिए चिंता का विषय हैं।सरकार को गंभीरता से सख्त कदम उठाने चाहिए ।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 07 Jun 2026 18:25:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सत्ता जाते ही ममता के अपने ही बागी हो गए! </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आपने एक पुरानी कहावत तो जरूर सुनी होगी कंगाली में आटा गीला। यह ममता बनर्जी के साथ बिल्कुल खरी साबित हो रही है एक ओर वह सत्ता से बाहर हो गयीं हैं दूसरे ओर उनके अपने ही उनके खिलाफ मुखर हो गएं हैं। आपको बता दें पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक और कानूनी परेशानियां मई 2026 में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद से लगातार बढ़ रही हैं। पार्टी के भीतर बड़ी बगावत और कानूनी मुकदमों ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">ममता बनर्जी की बढ़ती परेशानियों की</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180755/as-soon-as-she-lost-power-mamatas-own-people-became"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/6a1fc76a46895-mamata-banerjee-031916703-16x9.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपने एक पुरानी कहावत तो जरूर सुनी होगी कंगाली में आटा गीला। यह ममता बनर्जी के साथ बिल्कुल खरी साबित हो रही है एक ओर वह सत्ता से बाहर हो गयीं हैं दूसरे ओर उनके अपने ही उनके खिलाफ मुखर हो गएं हैं। आपको बता दें पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक और कानूनी परेशानियां मई 2026 में हुए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद से लगातार बढ़ रही हैं। पार्टी के भीतर बड़ी बगावत और कानूनी मुकदमों ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ममता बनर्जी की बढ़ती परेशानियों की वजह ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस  अपने 28 साल के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से जूझ रही है। पार्टी के 58 विधायकों ने बागी रुख अपनाते हुए निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष  चुन लिया है, जिसे विधानसभा स्पीकर ने मंजूरी भी दे दी है। इसके साथ ही, लगभग 20 से अधिक टीएमसी सांसदों के भी भाजपा  के संपर्क में होने की खबरें सामने आ रही हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पार्टी पर पकड़ ढीली होने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संकट के बीच ममता बनर्जी द्वारा बुलाई गई हाई-लेवल बैठक में 80 में से केवल 8 विधायक और 41 में से सिर्फ 6 सांसद ही शामिल हुए। ज्यादातर निर्वाचित प्रतिनिधियों ने इस बैठक से दूरी बना ली, जो उनके नेतृत्व को एक सीधा चैलेंज माना जा रहा है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजनीतिक मोर्चे के साथ-साथ ममता बनर्जी अब कानूनी पचड़े में भी फंस गई हैं। चुनाव के दौरान दिए गए उनके बयानों और "बांग्लादेश में हुई राजनीतिक हत्या के मामले को केंद्र सरकार से जोड़ने" को लेकर उनके खिलाफ सिलीगुड़ी और कोलकाता में राजद्रोह  और हेट स्पीच की शिकायतें व पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराई गई हैं। याचिकाकर्ताओं ने इसे देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सत्ता हाथ से जाने के बाद जमीनी स्तर पर भी भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण भगदड़ मची हुई है। उनके बेहद करीबी माने जाने वाले कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम और बिधाननगर की मेयर कृष्णा चक्रवर्ती ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसके अलावा राज्यभर में 100 से ज्यादा टीएमसी पार्षदों और स्थानीय नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ममता बनर्जी को अपने ही गढ़ भवानीपुर सीट से भाजपा के सुवेंदु अधिकारी के हाथों 15,105 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। राज्य में 15 साल पुराने टीएमसी शासन का अंत हो गया है और सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की नई सरकार का गठन हो चुका है।  ममता बनर्जी इन सभी विपरीत हालातों के खिलाफ सड़कों से लेकर हाइकोर्ट तक कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़ रही हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आपको पता है कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के परिणाम एक माह पूर्व 4 मई को सामने आए थे। इनमें ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को निराशा का मुंह देखना पड़ा था। 294 सीटों वाली इस विधानसभा में उसे 80 सीटें ही मिली थीं। इस तरह 15 वर्ष तक प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं ममता का शासन खत्म हो गया था। ममता ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लम्बी अवधि तक वह इसके साथ जुड़ी रहीं, परन्तु 28 वर्ष पूर्व 1998 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस (टी.एम.सी.) का गठन किया था और कम्युनिस्ट पार्टियों के तीन दशकों से भी अधिक प्रदेश में चले आ रहे लम्बे शासन को खत्म करने के लिए बड़ी दिलेरी और दृढ़ता से उसका मुकाबला किया था। इस समय लोकसभा में इनके 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं, परन्तु विगत लम्बी अवधि से इस पार्टी के भीतर ममता की तानाशाही और टकराव वाली नीतियों के कारण असंतोष और असहमति चल रही थी, परन्तु उनकी प्रशासन पर सख्त पकड़ और कठोर फैसलों से यह बग़ावत अंदर-अंदर ही सुलगती रही थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ममता ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को अपने साथ राजनीति में लाकर उसे अधिक शक्तियां दे दी थीं। बनर्जी के काम करने के ढंग-तरीके से भी पार्टी गलियारों में असंतोष था, जिसके संबंध में ममता को लगातार उनकी पार्टी के नेताओं द्वारा अवगत करवाया जाता रहा था परन्तु ममता ने इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया। अपनी ताकत के दम पर उन्होंने बड़ी राष्ट्रीय नेता होने का भ्रम भी पाल लिया था, जिस कारण राष्ट्रीय स्तर पर दर्जनों ही पार्टियों द्वारा बनाए गए 'इंडिया गठबंधन' की वह सदस्य ज़रूर बनी रही थीं, परन्तु इसमें शामिल अलग-अलग पार्टियों के सभी नेताओं से ऊंचा कद होने का भ्रम उन्होंने पाल रखा था।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसलिए विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने अपनी किसी भी सहयोगी पार्टी के साथ गठबंधन करने से इन्कार कर दिया था। उनके शासन के समय प्रदेश की आर्थिकता भी बेहद कमज़ोर हो गई थी और यह पूरी तरह कर्ज में डूब चुका था। केन्द्र के साथ लगातार टकराव रहने के कारण और उद्योग को समर्थन न मिलने के कारण प्रदेश की आर्थिकता डावांडोल हो गई थी। इसके साथ ही बेरोज़गारी की दर भी बढ़ चुकी थी, परन्तु पिछला पूरा समय केन्द्र और अन्य पार्टियों के साथ टकराव बने रहने के कारण भी उनकी प्रशासनिक तौर पर पकड़ ढीली पड़ चुकी थी। ऐसी स्थिति लोगों के भीतर निराशा में बदलती गई। लगातार सरकार विरोधी भावनाओं के बढ़ने का अनुमान लगाने में वह असमर्थ रहीं और न ही वह दीवार पर लिखे को पढ़ सकीं, जिस कारण उन्हें चुनाव में निराशा का मुंह देखना पड़ा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हार के बाद भी उन्होंने खुले मन से आत्म-मंथन करने की बजाए अपनी पार्टी के भीतर असंतोष को अनदेखा किए रखा जो अंत में उनके लिए हानिकारक सिद्ध हुई। आंतरिक यह चिंगारी उस समय लपटें बन गई, जब उन्होंने ज्यादातर पार्टी नेताओं को अनदेखा करके अभिषेक बनर्जी के कहने पर विधानसभा में विपक्ष के नेता के लिए सैमन देव का नाम स्पीकर को भेज दिया, परन्तु ज्यादातर विधायक इस पद के लिए रिताव्रता बनर्जी के पक्ष में थे, परन्तु ममता ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और इस पद के लिए स्पीकर को विधायकों के हस्ताक्षर वाला एक पत्र भेज दिया, जिस कारण ज्यादातर नेताओं ने बग़ावत का मार्ग अपना लिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस मामले को लेकर ही बुधवार को पार्टी के 80 विधायकों में से 59 विधायकों ने विधानसभा के स्पीकर से सम्पर्क किया। अपने हस्ताक्षरों वाला पत्र उन्हें सौंपा और अपने गुट को असली तृणमूल कांग्रेस बताया। पार्टी के 28 वर्ष के के इतिहास में ममता पर पहली बार इतना बड़ा हमला हुआ है। इसकी उदाहरण महाराष्ट्र से मिलती है, जब 20 जून, 2022 को वहां शिव सेना के 55 में से 40 विधायकों ने एकनाथ शिंदे का उस समय साथ दिया था, जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे। उसके सप्ताह भर बाद ही शिंदे वहां भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए थे। अब दो तिहाई सदस्यों के एकजुट होने से विधानसभा में ममता के समर्थक सदस्य 2 दर्जन से भी कम रह गए हैं, जिससे उनकी राजनीतिक हालत और भी दयनीय हो गई प्रतीत होती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी तरफ भाजपा को बड़ी जीत प्राप्त होने के कारण उसके नेताओं ने तृणमूल कांग्रेस के बागियों के साथ कोई भी समझौता करने से इंकार कर दिया है। रिताव्रता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत वामपंथी विद्यार्थी संगठन से की थी। 34 वर्ष की उम्र में वह राज्यसभा के सदस्य बन गए थे और बाद में वह टी.एम.सी. में शामिल हो गए थे। ममता ने ही उन्हें वर्ष 2024 में राज्यसभा में भेजा था। विधानसभा चुनाव में वह उलबेरिया सीट से विधायक चुने गए हैं। चाहे ममता ने इस बड़ी चुनौती के समक्ष भी अपना हौसला कायम रखते हुए इन बागियों और भाजपा को ललकारा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही उन्होंने भाजपा विरोधी पार्टियों से सम्पर्क करने की बात भी की है, परन्तु अब यह देखना शेष होगा, कि वह निकट भविष्य में प्रदेश और देश की राजनीति में किस तरह विचरण करेंगी।स्पष्ट है कि आज की राजनीति में साम दाम दंड भेद सब का चलन बढ़ गया है सत्ता में सबको समेट रखने की ताकत है लेकिन सत्ता से बाहर होते ही अपने सगे साथियों की हकीकत सामने आ जाती है कि उनके दिल में कितना खार छुपाए बैठे थे यह बदलते दौर की राजनीति की नंगी तस्वीर है इस को स्वीकार करना ही होगा।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 18:53:46 +0530</pubDate>
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                <title>पश्चिम बंगाल: अभिषेक बनर्जी के बाद TMC सांसद कल्याण बनर्जी पर हमला, सिर पर लगी चोट</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> प्रदर्शनकारियों ने सांसद कल्याण बनर्जी का रास्ता रोका। बड़ी संख्या में लोग उनके खिलाफ नारे लगा रहे थे। इस दौरान कथित रूप से उनके सिर पर चोट लगी। वे थोड़ी देर बाद जमीन पर गिर गए। हमले के बाद जमीन पर लेटे कल्याण बनर्जी फोन पर बात करते हुए नजर आए। पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी के बाद तृणमूल कांग्रेस के एक और सांसद पर कथित रूप से हमला हुआ है। सांसद कल्याण बनर्जी चंडीतला पुलिस स्टेशन में ज्ञापन सौंपने जा रहे थे। आरोप है कि स्थानीय लोगों ने उन्हें घेर लिया और कथित तौर पर मारपीट की।</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180387/tmc-mp-kalyan-banerjee-attacked-after-west-bengal-abhishek-banerjee"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/attack-on-kalyan-banerjee-1780211370965.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज-</strong> प्रदर्शनकारियों ने सांसद कल्याण बनर्जी का रास्ता रोका। बड़ी संख्या में लोग उनके खिलाफ नारे लगा रहे थे। इस दौरान कथित रूप से उनके सिर पर चोट लगी। वे थोड़ी देर बाद जमीन पर गिर गए। हमले के बाद जमीन पर लेटे कल्याण बनर्जी फोन पर बात करते हुए नजर आए। पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी के बाद तृणमूल कांग्रेस के एक और सांसद पर कथित रूप से हमला हुआ है। सांसद कल्याण बनर्जी चंडीतला पुलिस स्टेशन में ज्ञापन सौंपने जा रहे थे। आरोप है कि स्थानीय लोगों ने उन्हें घेर लिया और कथित तौर पर मारपीट की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रदर्शनकारियों ने सांसद कल्याण बनर्जी का रास्ता रोकते हुए उन्हें काले झंडे दिखाए। तस्वीरों में नजर आया कि कल्याण बनर्जी भीड़ का सामना कर रहे थे। बड़ी संख्या में लोग उनके खिलाफ नारे लगा रहे थे। इस दौरान कथित रूप से उनके सिर पर चोट लगी। वे थोड़ी देर बाद जमीन पर गिर गए। हमले के बाद जमीन पर लेटे कल्याण बनर्जी फोन पर बात करते हुए नजर आए। इस दौरान सुरक्षाबलों को स्थिति को संभालने का प्रयास करते हुए भी देखा गया। वहीं, टीएमसी समर्थकों ने कल्याण बनर्जी को संभाला और उन्हें भीड़ से दूर ले जाने का प्रयास किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कल्याण बनर्जी ने मीडिया से बात करते हुए कहा, "मैं अकेला आ रहा था। मेरे साथ कोई नहीं था। बीजेपी सदस्यों ने गाली-गलौज की और मेरे सिर पर बॉल से मारा। मेरे सिर से खून बह रहा है।" उन्होंने कहा, "अब लोग तय करेंगे कि यह सही है या गलत कि सांसदों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है।"</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इससे पहले, शनिवार को पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के सोनारपुर में टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी के साथ कथित तौर पर मारपीट की गई। वे चुनाव के बाद शनिवार को हिंसा में मारे गए एक तृणमूल कार्यकर्ता के परिवार से मिलने सोनारपुर गए थे। इसी दौरान कुछ लोगों ने उनका विरोध किया। प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने उनके काफिले पर अंडे व ईंट के टुकड़े फेंके और नारे लगाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस मामले में अब तक 6 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना को लेकर बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा, "फिलहाल इलाज घर पर ही किया जाएगा। जितनी जरूरत होगी, सलाइन और ऑक्सीजन घर पर ही दी जाएगी। यदि आवश्यकता पड़ी तो अभिषेक को इलाज के लिए हैदराबाद ले जाया जाएगा।"पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया है कि हमले के बाद अभिषेक बनर्जी के सीने में ब्लड क्लॉट जम गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर उस समय अभिषेक के सिर पर हेलमेट नहीं होता, तो घटना जानलेवा साबित हो सकती थी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>अन्य राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 19:06:53 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अखिलेश यादव का हमला, कहा- बीजेपी और निर्वाचन आयोग ने उपचुनाव में किए गए ‘ट्रायल’ को पश्चिम बंगाल में लागू किया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव कराने के लिए एक समानांतर व्यवस्था स्थापित करने का आरोप लगाते हुए रविवार को कहा कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और निर्वाचन आयोग ने मिलकर साढ़े तीन साल पहले उत्तर प्रदेश के रामपुर उपचुनाव में जो ‘ट्रायल’ किया था, उसे हू-ब-हू बंगाल में लागू कर दिया।अखिलेश यादव ने पार्टी मुख्यालय में एक प्रेस वार्ता में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में केंद्रीय बलों के दखल के बारे में पूछे गए एक सवाल पर कहा कि उत्तर प्रदेश में जब 2022 में रामपुर लोकसभा और विधानसभा का उपचुनाव</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178174/akhilesh-yadavs-attack-said-bjp-and-election-commission-implemented-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/download.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव कराने के लिए एक समानांतर व्यवस्था स्थापित करने का आरोप लगाते हुए रविवार को कहा कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और निर्वाचन आयोग ने मिलकर साढ़े तीन साल पहले उत्तर प्रदेश के रामपुर उपचुनाव में जो ‘ट्रायल’ किया था, उसे हू-ब-हू बंगाल में लागू कर दिया।अखिलेश यादव ने पार्टी मुख्यालय में एक प्रेस वार्ता में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में केंद्रीय बलों के दखल के बारे में पूछे गए एक सवाल पर कहा कि उत्तर प्रदेश में जब 2022 में रामपुर लोकसभा और विधानसभा का उपचुनाव हुआ था, तब सबने देखा कि किस तरीके से वहां चुनाव अधिकारियों और पुलिसकर्मियों की नियुक्ति की गई थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा, “शायद भारतीय जनता पार्टी ने आयोग के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में एक ‘ट्रायल’ किया था और उसे हू-ब-हू बंगाल में उतार दिया। मुझे जानकारी मिली है कि उन्होंने केंद्रीय बलों और अर्धसैनिक बलों का एक समानांतर ढांचा बना दिया था। इसके अलावा पुलिस व्यवस्था के समानांतर भी एक व्यवस्था बना दी गई थी।”समाजवादी पार्टी प्रमुख ने हालांकि पश्चिम बंगाल में एक बार फिर ममता बनर्जी की अगुवाई में सरकार बनने का विश्वास जताते हुए कहा, “दीदी थी, दीदी रहेंगी। वह लड़ेंगी भी और जीतेंगी भी।”उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में गड़बड़ी की आशंका जताते हुए एक बार फिर कहा कि अगर स्मार्ट मीटर में बेईमानी हो सकती है तो ईवीएम में क्यों नहीं हो सकती?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अखिलेश यादव ने समाजवादी विधायक प्रभु नारायण की आशंका का जिक्र करते हुए कहा कि वह प्रदेश की जनता को सावधान करना चाहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी के कुछ लोग कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर झगड़ा कराएंगे। उन्होंने कहा कि विधायक प्रभु नारायण का कहना है कि चुनाव के दौरान भाजपा के लोग गांव-गांव में खूब डीजे बजवाएंगे जिससे नफरत फैले और झगड़ा हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समाजवादी पार्टी के प्रमुख ने आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी के लोग बड़े पैमाने पर जगह-जगह डीजे बजवाकर झगड़ा करवाने की तैयारी कर रहे हैं लेकिन सपा ने जनता को पहले ही सावधान कर दिया है। उन्होंने बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा कि यह पार्टी ‘झूठ की सोन पापड़ी’ बनाती है और वह झूठ की एक परत के ऊपर असत्य की दूसरी परत चढ़ा देती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 21:58:41 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पश्चिम बंगाल में भाजपा—तो मुख्यमंत्री कौन </title>
                                    <description><![CDATA[<p>  </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">  देश के इतिहास में पहली बार</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में विधानसभा चुनाव के दौरान </span>92 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत से अधिक रिकॉर्ड मतदान ने सभी पूर्वानुमानों और एग्जिट पोल को नई दिशा दे दी है। अधिकांश सर्वेक्षणों में प्रमुख विपक्षी दल</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय जनता पार्टी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के राज्य में पहली बार सरकार बनाने के दावे सामने आ रहे हैं। यह परिदृश्य न केवल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राज्य की बदलती जन-चेतना का भी संकेत देता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव पूर्व मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण को लेकर राज्य की मुख्यमंत्री</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ममता बनर्जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और न्यायिक चुनौतियाँ भी पेश कीं। हालांकि</span>,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178003/bjp-in-west-bengal-%E2%80%93-then-who-is-the-chief"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/abhinav-shukla.webp" alt=""></a><br /><p> </p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> देश के इतिहास में पहली बार</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में विधानसभा चुनाव के दौरान </span>92 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत से अधिक रिकॉर्ड मतदान ने सभी पूर्वानुमानों और एग्जिट पोल को नई दिशा दे दी है। अधिकांश सर्वेक्षणों में प्रमुख विपक्षी दल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय जनता पार्टी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के राज्य में पहली बार सरकार बनाने के दावे सामने आ रहे हैं। यह परिदृश्य न केवल राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राज्य की बदलती जन-चेतना का भी संकेत देता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव पूर्व मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण को लेकर राज्य की मुख्यमंत्री</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ममता बनर्जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और न्यायिक चुनौतियाँ भी पेश कीं। हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सर्वोच्च न्यायालय</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के हस्तक्षेप के बाद प्रक्रिया आगे बढ़ी। अनुमान है कि लाखों ऐसे लोग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अपने नागरिकता संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मतदान सूची से बाहर रह गए। इस पृष्ठभूमि में हुई बंपर वोटिंग को कई विश्लेषक मतदाता सूची के शुद्धिकरण का परिणाम मान रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे सूची में शामिल मतदाताओं ने निर्भीक होकर मतदान किया।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">     ऐतिहासिक रूप से देखें तो</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम बंगाल</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की कर्मभूमि और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">श्यामाप्रसाद मुखर्जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की जन्मस्थली रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी यह विडंबना ही रही कि भाजपा को अब तक राज्य में सत्ता का अवसर नहीं मिला। </span>2014 <span lang="hi" xml:lang="hi">के बाद पार्टी ने यहां अपनी पकड़ मजबूत की और एक दशक के भीतर वाम दलों तथा कांग्रेस को पीछे छोड़ते हुए मुख्य विपक्षी दल बन गई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अगर मतगणना के नतीजे भाजपा के पक्ष में आते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो सबसे बड़ा प्रश्न होगा—राज्य का पहला भाजपा मुख्यमंत्री कौन बनेगा</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">इस दौड़ में कई नाम चर्चा में हैं। तृणमूल कांग्रेस से आए प्रभावशाली नेता</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सुवेंदु अधिकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रदेश अध्यक्ष</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सामिक भट्टाचार्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवा सांसद</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">निशीथ प्रमाणिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और लोकप्रिय महिला चेहरा</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लॉकेट चटर्जी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रमुख दावेदारों के रूप में देखे जा रहे हैं।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">    हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाजपा की कार्यशैली को देखते हुए किसी नए या अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरे को आगे लाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इतना निश्चित है कि यदि भाजपा सत्ता में आती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो मुख्यमंत्री का चेहरा ऐसा होगा जो बंगाल की माटी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संस्कृति और सामाजिक संरचना से गहराई से जुड़ा हो। पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की संभावना भर नहीं है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह राज्य की राजनीतिक दिशा में संभावित बड़े बदलाव का संकेत भी है। अब सबकी निगाहें मतगणना पर टिकी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां यह तय होगा कि बंगाल की जनता किसे अपना नेतृत्व सौंपती है।</span></p>
<p><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>                                                                                             अरविंद रावल</strong></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/178003/bjp-in-west-bengal-%E2%80%93-then-who-is-the-chief</link>
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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 18:16:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पश्चिम बंगाल-तमिलनाडु में थमा चुनाव प्रचार, 23 अप्रैल को मतदान, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को होने वाले मतदान से 48 घंटे पहले मंगलवार शाम को चुनाव प्रचार थम गया। पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 152 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होनी है, जबकि तमिलनाडु में सभी 234 सीटों के लिए मतदान होने हैं। इसको लेकर चुनाव आयोग ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी कड़ी निगरानी रखी जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">चुनाव प्रचार थमने से पहले दोनों राज्यों में शीर्ष नेताओं और उम्मीदवारों ने समर्थकों को आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं, चुनाव प्रचार थमने के बाद</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177019/election-campaign-stopped-in-west-bengal-tamil-nadu-strong-arrangements-for"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(1)10.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 23 अप्रैल को होने वाले मतदान से 48 घंटे पहले मंगलवार शाम को चुनाव प्रचार थम गया। पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 152 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होनी है, जबकि तमिलनाडु में सभी 234 सीटों के लिए मतदान होने हैं। इसको लेकर चुनाव आयोग ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी कड़ी निगरानी रखी जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">चुनाव प्रचार थमने से पहले दोनों राज्यों में शीर्ष नेताओं और उम्मीदवारों ने समर्थकों को आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं, चुनाव प्रचार थमने के बाद अब कोई भी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवार के समर्थन में जनसभा या रैली नहीं कर सकेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> पश्चिम बंगाल की तो यहां इस बार दो चरणों में चुनाव संपन्न कराया जाना है। पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होना है। इस चरण में कुल 1,478 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। वहीं, तीन करोड़ 60 लाख 77 हजार 171 मतदाता उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे। इन मतदाताओं में एक करोड़ 75 लाख 77 हजार 210 महिलाएं अपने मत का इस्तेमाल करेंगी। आरक्षण को लेकर बने माहौल के बीच इस बार पश्चिम बंगाल में महिलाओं की भूमिका काफी अहम मानी जा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बंगाल में पहले चरण में जहां मतदान होने हैं, उनमें उत्तर बंगाल के आठ, दक्षिण बंगाल के तीन और जंगलमहल अंचल के पांच जिले शामिल हैं।इनमें मुर्शिदाबाद की 22, कूचबिहार की 9, जलपाईगुड़ी की 7, अलीपुरद्वार की 5, कलिंपोंग की एक, दार्जिलिंग की 5, उत्तर दिनाजपुर की 9, दक्षिण दिनाजपुर की 6, मालदा की 12, बीरभूम की 11, पश्चिम ब‌र्द्धमान की 9, पूर्व मेदिनीपुर की 16, पश्चिम मेदिनीपुर की 15, झारग्राम की 4, पुरुलिया की 9 और बांकुड़ा की 12 सीटें शामिल हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">तमिलनाडु  राज्य में सभी सीटों पर एक चरण में ही चुनाव संपन्न कराया जाना है। 23 अप्रैल को ही सभी 234 सीटों पर मतदान होना है। तमिलनाडु में इस बार 4,023 उम्मीदवार मैदान में हैं। चुनाव में कुल 5.73 करोड़ मतदाता अपने मत का इस्तेमाल कर उम्मीदवारों की किस्मत लिखेंगे।इस बार चुनाव में सबकी निगाहें अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी टीवीके पर टिकी हैं, क्योंकि कई सीटों पर उनको लोगों का काफी समर्थन मिल रहा है, इसलिए चुनाव में उनकी भूमिका काफी अहम हो सकती है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 22:08:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>परिसीमन की सियासत, अस्मिता का उभार और चुनावी हवा का बदलता रुख</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176589/politics-of-delimitation-rise-of-identity-and-changing-direction-of"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img_20260417_2100471.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में चुनाव केवल मतों का गणित नहीं होता, बल्कि यह भावनाओं, पहचान, रणनीतियों और समय-समय पर बदलते नैरेटिव का एक जटिल मिश्रण होता है। हाल के घटनाक्रमों में महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन बिल का संसद में गिरना और परिसीमन बिल का पेश न होना, दो ऐसे मोड़ साबित हुए हैं जिन्होंने चुनावी राजनीति की दिशा और भाषा दोनों को बदल दिया है। विशेषकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जहां सत्तारूढ़ और विपक्षी दल अपने-अपने हिसाब से नए मुद्दे गढ़ रहे हैं और पुराने विमर्शों को पीछे छोड़ रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने जिस तेजी से अपनी चुनावी रणनीति को बदला है, वह उनकी राजनीतिक समझ और समय की नब्ज पकड़ने की क्षमता को दर्शाता है। महिला आरक्षण बिल के गिरने के बाद उन्होंने परिसीमन को केंद्र में रखकर एक नया आक्रामक अभियान शुरू किया है। पहले जहां एसआईआर जैसे मुद्दे को बंगाल की अस्मिता से जोड़ा जा रहा था, वहीं अब परिसीमन को “देश को तोड़ने की साजिश” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह बदलाव केवल भाषाई नहीं बल्कि पूरी राजनीतिक दिशा को बदलने वाला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उत्तर बंगाल, जहां भाजपा ने पिछली बार मजबूत प्रदर्शन किया था, अब इस नए नैरेटिव का केंद्र बन गया है। चाय बागानों में काम करने वाले लाखों मजदूरों तक पहुंचने के लिए तृणमूल कांग्रेस ने घर-घर अभियान शुरू किया है। यहां अब रोजगार, मजदूरी और जमीन के अधिकार जैसे मुद्दों की जगह परिसीमन को लेकर भय और असुरक्षा का माहौल बनाया जा रहा है। ममता बनर्जी यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि यदि परिसीमन लागू होता, तो कई जिलों की पहचान ही खत्म हो जाती। यह एक ऐसा भावनात्मक तर्क है जो सीधे जनता के मन में अस्मिता के सवाल को जगाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर अभिषेक बनर्जी जैसे नेता इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की कमजोरी के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि संसद में जो हुआ, वह केवल शुरुआत है और इसका असर राज्यों में भी दिखेगा। यह बयान न केवल आत्मविश्वास दर्शाता है बल्कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने का प्रयास भी है।तमिलनाडु में स्थिति और भी रोचक है। यहां द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने बेहद तेजी से चुनावी हवा को अपने पक्ष में मोड़ने का काम किया है। तीन दिन पहले तक परिसीमन बिल सबसे बड़ा मुद्दा था, लेकिन अब “तमिल अस्मिता” चुनाव का केंद्रीय विषय बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एम. के. स्टालिन को इस पूरे घटनाक्रम में एक विजेता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, मानो उन्होंने केंद्र के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई जीत ली हो। डीएमके के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर “द्रविड़ गौरव” के पर्चे बांट रहे हैं और यह संदेश दे रहे हैं कि यह केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं बल्कि तमिल पहचान की रक्षा का प्रश्न है। इस रणनीति का असर यह हुआ है कि चुनावी विमर्श पूरी तरह बदल गया है। अब यह केवल सीटों के बंटवारे का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन गई है। के. अन्नामलाई लगातार यह कह रहे हैं कि परिसीमन से तमिलनाडु को कोई नुकसान नहीं होता, लेकिन उनकी बात उतनी प्रभावी तरीके से जनता तक नहीं पहुंच पा रही है। इसके विपरीत डीएमके का संदेश ज्यादा संगठित और भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, जिससे वह ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।एनडीए की सहयोगी एआईएडीएमके एक असमंजस की स्थिति में है। वह न तो खुलकर परिसीमन बिल के खिलाफ बोल पा रही है और न ही तमिल अस्मिता के मुद्दे पर पूरी तरह डीएमके का विरोध कर पा रही है। यह स्थिति उसे चुनावी मैदान में कमजोर बनाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू उभरकर सामने आया है, वह है नए चेहरों का उदय। अभिनेता विजय ने इस मुद्दे को एक अवसर के रूप में लिया है और अपनी पार्टी के जरिए “तमिलनाडु का हक” जैसे संदेशों को डिजिटल माध्यम से फैलाया है। यह दिखाता है कि कैसे बदलते राजनीतिक माहौल में नए खिलाड़ी भी अपनी जगह बना सकते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यदि व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह पहली बार नहीं है जब चुनाव से ठीक पहले मुद्दों में इतना बड़ा बदलाव आया हो। पश्चिम बंगाल में 2011 में “परिवर्तन” का नारा और 2021 में “खेला होबे” जैसे अभियान यह साबित करते हैं कि सही समय पर सही नैरेटिव चुनाव की दिशा बदल सकता है। इसी तरह तमिलनाडु में 1967 और 2016 के चुनावों में भी आखिरी समय में मुद्दों के बदलने से परिणाम प्रभावित हुए थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस बार भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है, लेकिन एक अंतर के साथ। इस बार मुद्दे केवल स्थानीय नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय नीतियों से जुड़े हुए हैं। परिसीमन जैसे विषय को लेकर क्षेत्रीय अस्मिता का उभार यह दिखाता है कि भारत की संघीय राजनीति में राज्य और केंद्र के बीच संतुलन का सवाल कितना संवेदनशील है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भाजपा की स्थिति भी दिलचस्प है। एक तरफ वह संसद में बिल गिरने के बावजूद इसे अपनी रणनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ राज्यों में उसे नए नैरेटिव का सामना करना पड़ रहा है। यह विरोधाभास उसके लिए चुनौती बन सकता है। दूसरी ओर विपक्ष, जो इस घटनाक्रम से उत्साहित है, कहीं न कहीं आंतरिक असंतोष और भ्रम का भी शिकार दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह स्पष्ट है कि आने वाले चुनाव केवल नीतियों या वादों पर नहीं बल्कि भावनाओं, पहचान और धारणा की लड़ाई पर आधारित होंगे। परिसीमन का मुद्दा केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक हथियार बन चुका है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में जिस तरह से इसे अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह भारतीय राजनीति की विविधता और जटिलता दोनों को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब सबकी नजर चुनावी परिणामों पर है। क्या भाजपा इस बदलती हवा के बावजूद अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी, या विपक्ष की नई रणनीतियां उसे पीछे छोड़ देंगी—यह सवाल अभी खुला है। लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श के नए स्वरूप का भी संकेत देगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Apr 2026 19:11:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>हुमायूं कबीर से ओवैसी ने तोड़ा गठबंधन, बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने हुमायूं कबीर की पार्टी के साथ अपना गठबंधन समाप्त करने का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने साफ कहा है कि अब वह पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ेगी। यह फैसला कबीर के एक कथित वायरल वीडियो के बाद उठे विवाद के बीच लिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एआईएमआईएम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट जारी करते हुए कहा कि हुमायूं कबीर के हालिया खुलासों ने बंगाल के मुसलमानों की असुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 'हुमायूं कबीर के खुलासों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175793/owaisi-breaks-alliance-with-humayun-kabir-and-announces-to-contest"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/humayun-kabir-owaisijpg_1775789314059.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने हुमायूं कबीर की पार्टी के साथ अपना गठबंधन समाप्त करने का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने साफ कहा है कि अब वह पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ेगी। यह फैसला कबीर के एक कथित वायरल वीडियो के बाद उठे विवाद के बीच लिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एआईएमआईएम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट जारी करते हुए कहा कि हुमायूं कबीर के हालिया खुलासों ने बंगाल के मुसलमानों की असुरक्षा से जुड़े गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 'हुमायूं कबीर के खुलासों ने बंगाल के मुसलमानों की असुरक्षा को उजागर किया है। एआई एमआईएम ऐसे किसी भी बयान का समर्थन नहीं कर सकती, जिससे मुसलमानों की गरिमा पर सवाल उठे। आज से एआईएमआईएम ने कबीर की पार्टी से अपना गठबंधन वापस ले लिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरुवार (9 अप्रैल) को हुमायूं कबीर का एक कथित वीडियो सामने आने के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई। वीडियो में वह कथित तौर पर BJP नेताओं से संपर्क और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सत्ता से हटाने की रणनीति पर चर्चा करते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो को लेकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर गंभीर आरोप लगाए और मामले की जांच की मांग की। पार्टी ने विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और प्रधानमंत्री कार्यालय से कबीर की कथित नजदीकियों की जांच कराने की मांग उठाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">वीडियो में यह भी दावा किया जा रहा है कि हुमायूं कबीर अल्पसंख्यक वोटों को सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस से अलग करने की रणनीति पर का एकम कर रहे थे, जिससे चुनावी समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही कथित तौर पर उन्होंने इस योजना को लागू करने के लिए बड़ी धनराशि की जरूरत का भी जिक्र किया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजनीति</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>राजनीति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 22:49:05 +0530</pubDate>
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