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                <title>democracy in india - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>राजनीति में जनता के असली मुद्दे</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में है कि यहां सत्ता से सवाल पूछे जा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों की आलोचना की जा सकती है और विपक्ष सरकार के फैसलों पर अपना विरोध दर्ज करा सकता है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह सरकार को भी अपने निर्णयों का पक्ष रखने और विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब राजनीति का केंद्र जनहित के मुद्दों से हटकर केवल आरोप-प्रत्यारोप बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर पड़ने लगती है। आज भारतीय राजनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दल जनता के वास्तविक सवालों</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/185148/real-issues-of-public-in-politics"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/hindi-divas5.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में है कि यहां सत्ता से सवाल पूछे जा सकते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों की आलोचना की जा सकती है और विपक्ष सरकार के फैसलों पर अपना विरोध दर्ज करा सकता है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसी तरह सरकार को भी अपने निर्णयों का पक्ष रखने और विपक्ष के आरोपों का जवाब देने का पूरा अधिकार है। लेकिन जब राजनीति का केंद्र जनहित के मुद्दों से हटकर केवल आरोप-प्रत्यारोप बन जाता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब लोकतंत्र की मूल भावना कमजोर पड़ने लगती है। आज भारतीय राजनीति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजनीतिक दल जनता के वास्तविक सवालों को उतनी प्राथमिकता दे रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी प्राथमिकता वे एक-दूसरे पर आरोप लगाने को देते हैं</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">चुनावी राजनीति में आरोप लगना कोई नई बात नहीं है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक बहस का अधिकांश हिस्सा इस बात पर खर्च होने लगे कि किस नेता ने किस पर क्या आरोप लगाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसने किस बयान का जवाब दिया और किसने किसे कठघरे में खड़ा किया। ऐसे वातावरण में महंगाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसानों की आय</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">छोटे कारोबार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानून-व्यवस्था और न्याय में देरी जैसे मुद्दे अक्सर राजनीतिक शोर में दब जाते हैं। एक आम नागरिक के लिए राजनीति का महत्व संसद या विधानसभा की बहसों से कहीं अधिक उसके रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देता है। परिवार का बजट बिगड़ता है तो उसे महंगाई की चिंता होती है। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">युवा नौकरी की तलाश करता है तो उसके लिए रोजगार सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। किसान को फसल का उचित मूल्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सिंचाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मौसम और बाजार की चिंता रहती है। व्यापारी के लिए कारोबार की लागत और नियमों की सरलता महत्वपूर्ण होती है। गरीब परिवार के लिए बेहतर सरकारी अस्पताल और स्कूल किसी भी राजनीतिक भाषण से अधिक मायने रखते हैं। यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">क्या उनकी राजनीतिक भाषा जनता की इन समस्याओं को पर्याप्त स्थान दे रही है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या चुनावी घोषणाओं के बाद भी उन वादों की लगातार समीक्षा होती है</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">क्या संसद और विधानसभाओं में उन विषयों पर उतनी गंभीर चर्चा होती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जितनी राजनीतिक आरोपों पर</span>? <span lang="hi" xml:lang="hi">यदि जवाब संतोषजनक नहीं है तो यह केवल किसी एक दल की समस्या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरी राजनीतिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। आरोप जरूरी हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन प्रमाण और समाधान उससे भी जरूरी विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है। यदि किसी सरकारी योजना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीति या निर्णय में खामी दिखाई देती है तो विपक्ष को उसे सामने लाना चाहिए। भ्रष्टाचार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशासनिक लापरवाही या किसी गंभीर अनियमितता का संदेह हो तो जांच की मांग भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन आरोप और प्रमाण में अंतर होता है। राजनीति में किसी आरोप को बार-बार दोहराना उसे स्वतः सत्य नहीं बना देता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आरोपों की जांच संस्थाओं को करनी होती है और दोष या निर्दोष होने का फैसला निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए। इसी तरह सरकार को भी विपक्ष के हर सवाल को राजनीतिक षड्यंत्र बताकर खारिज करने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र में स्वस्थ व्यवस्था वही होगी जहां आरोप के साथ प्रमाण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विरोध के साथ वैकल्पिक नीति और आलोचना के साथ समाधान प्रस्तुत किया जाए।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">संसद केवल राजनीतिक मुकाबले का मंच नहीं</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च विधायी मंच है। वहां सरकार की नीतियों पर चर्चा होनी चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कानूनों की समीक्षा होनी चाहिए और जनता से जुड़े मुद्दों पर गंभीर बहस होनी चाहिए। संसद में राजनीतिक असहमति होना जरूरी है। लेकिन असहमति और गतिरोध में फर्क है। सरकार यदि विपक्ष की बात नहीं सुनती तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है। दूसरी ओर विपक्ष यदि हर विषय को विरोध का अवसर बना दे और चर्चा की संभावना ही समाप्त कर दे तो उससे भी जनता का नुकसान होता है। जनता ने अपने प्रतिनिधियों को केवल नारे लगाने के लिए नहीं चुना है। उनसे अपेक्षा है कि वे कानून बनाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों की समीक्षा करें और जनता की समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाएं। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सदन में बिताया गया समय केवल सत्ता पक्ष या विपक्ष की जीत-हार तय नहीं करता</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">उसका सीधा संबंध देश के करोड़ों नागरिकों के भविष्य से होता है। भारत दुनिया की बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है। ऐसे में रोजगार का सवाल केवल आर्थिक मुद्दा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता का भी विषय है। हर साल बड़ी संख्या में युवा शिक्षा पूरी करके नौकरी की तलाश में निकलते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों युवाओं के लिए परीक्षा की पारदर्शिता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समय पर परिणाम और नियुक्ति प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में राजनीतिक बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि किस सरकार ने कितनी नौकरियां देने का दावा किया। असली सवाल यह होना चाहिए कि स्थायी और गुणवत्तापूर्ण रोजगार कितने पैदा हुए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">युवाओं की आय कितनी बढ़ी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजी क्षेत्र में अवसर कैसे बढ़ेंगे और कौशल प्रशिक्षण को वास्तविक रोजगार से कैसे जोड़ा जाएगा। यदि राजनीतिक दल इस विषय पर ठोस और मापने योग्य योजनाएं सामने रखें तो यह लोकतांत्रिक बहस को एक नई दिशा दे सकता है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 17:13:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>कांग्रेस ने वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने की मांग की।</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस ने रविवार को वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग की। पार्टी का तर्क है कि ऐसा करने से वोटरों को दबाने और मनमाने ढंग से अयोग्य ठहराने के खिलाफ़ मज़बूत सुरक्षा मिलेगी। स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (</span>SIR) <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रक्रिया के तहत अलग-अलग राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि भारत के चुनाव आयोग का "साफ़ तौर पर पक्षपाती कामकाज" - जिसके बारे में उन्होंने आरोप लगाया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर काम कर</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181819/congress-demanded-that-the-right-to-vote-be-given-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas20.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">स्वतंत्र प्रभात ब्यूरो प्रयागराज।</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस ने रविवार को वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने की मांग की। पार्टी का तर्क है कि ऐसा करने से वोटरों को दबाने और मनमाने ढंग से अयोग्य ठहराने के खिलाफ़ मज़बूत सुरक्षा मिलेगी। स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (</span>SIR) <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रक्रिया के तहत अलग-अलग राज्यों में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आए हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि भारत के चुनाव आयोग का "साफ़ तौर पर पक्षपाती कामकाज" - जिसके बारे में उन्होंने आरोप लगाया कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारे पर काम कर रहा था - "पूरी तरह से बेनकाब" हो गया है। उन्होंने कहा कि अब वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा देने का समय आ गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि इसे न्यायिक समीक्षा और सुरक्षा का सर्वोच्च स्तर मिल सके।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का ज़िक्र किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें दो जजों की बेंच ने फुटपाथ पर चलने के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया था। उन्होंने सवाल किया कि वोट देने के अधिकार को - जिसे उन्होंने लोकतंत्र के लिए बहुत ज़रूरी बताया - वैसी ही मान्यता क्यों नहीं मिलनी चाहिए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस नेता ने याद दिलाया कि संविधान सभा ने सरदार पटेल की अध्यक्षता में मौलिक अधिकारों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अल्पसंख्यकों और आदिवासी व बहिष्कृत क्षेत्रों पर एक सलाहकार समिति बनाई थी। </span>21-22<span lang="hi" xml:lang="hi"> अप्रैल</span>, 1947<span lang="hi" xml:lang="hi"> को हुई बैठक के दौरान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समिति ने इस बात पर विस्तार से चर्चा की थी कि क्या वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया जाना चाहिए।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डॉ. बी.आर. अंबेडकर और बाबू जगजीवन राम ने वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने का ज़ोरदार समर्थन किया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि सरदार पटेल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सी. राजगोपालाचारी और अन्य लोगों का तर्क था कि ऐसा करने से रियासतें भारतीय संघ में शामिल होने में हिचकिचा सकती हैं। उनका मानना था कि संविधान में सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार (यूनिवर्सल एडल्ट फ्रेंचाइजी) देना ही काफ़ी होगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">सरदार पटेल का खुद यह मानना था कि सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार अपने आप में एक अंतर्निहित मौलिक अधिकार है। यही अनुच्छेद </span>326<span lang="hi" xml:lang="hi"> की पृष्ठभूमि है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो सभी वयस्कों को वोट देने के अधिकार के आधार पर चुनाव कराने का प्रावधान करता है।" उन्होंने कहा कि वोट देने का अधिकार </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">जन प्रतिनिधित्व अधिनियम</span>, 1951' <span lang="hi" xml:lang="hi">के तहत एक कानूनी अधिकार है या एक स्पष्ट मौलिक अधिकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर बहस सात दशकों से ज़्यादा समय से चल रही है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">अलग-अलग राय सामने आई हैं। हाल ही में</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च </span>2023<span lang="hi" xml:lang="hi"> के </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">मामले में जस्टिस अजय रस्तोगी ने अपनी असहमति वाली राय में कहा कि वोट देने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है।"</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने वोटिंग से जुड़े कई अधिकारों को पहले ही मान्यता दी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें उम्मीदवारों के आपराधिक बैकग्राउंड</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उनके आर्थिक हितों और राजनीतिक फंडिंग के स्रोतों को जानने का मतदाताओं का अधिकार शामिल है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने तर्क दिया</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">इसने वोट की गोपनीयता की रक्षा की है और </span>NOTA <span lang="hi" xml:lang="hi">के ज़रिए सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार को मान्यता दी है। इसलिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह और भी अजीब बात है कि वोट देने का अधिकार अभी भी सिर्फ़ एक कानूनी अधिकार बना हुआ है। इससे जुड़े सभी अधिकारों को मौलिक घोषित किया गया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन मुख्य अधिकार - जिसके बिना बाकी अधिकार मौजूद नहीं रह सकते - अभी भी कानूनी अधिकार ही बना हुआ है।"रमेश ने कहा कि वोट देने के अधिकार का दर्जा बढ़ाने से लोकतांत्रिक सुरक्षा उपाय मज़बूत होंगे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री के इशारे पर काम करने वाले भारत के चुनाव आयोग के खुले तौर पर पक्षपाती कामकाज के बुरी तरह बेनकाब होने के बाद</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अब समय आ गया है कि वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे इसे न्यायिक समीक्षा और सुरक्षा का उच्चतम स्तर मिल सके।"</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">रमेश ने आगे कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">यह मतदाताओं को दबाने या मनमाने ढंग से अयोग्य ठहराने के खिलाफ़ सुरक्षा उपाय लागू करने की दिशा में एक मज़बूत कदम होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो </span>SIR (<span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष गहन संशोधन) प्रक्रिया के तहत अलग-अलग राज्यों में बहुत बड़ी संख्या में हुए हैं। इसका मतलब यह भी होगा कि चुनाव आयोग के कामकाज पर सुप्रीम कोर्ट की ज़्यादा निगरानी रहेगी।"</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 19:24:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पार्टियों की टूट व टूटता भरोसा: लोकतंत्र में सबसे बड़ा नुकसान यही है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181509/the-biggest-loss-in-democracy-is-the-breakdown-of-parties"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चुनाव बाद पार्टियों का टूटना या ये कहिए कि दलबदल होना अब आम बात हो चली है। यह दलबदल क्षेत्रीय पार्टियों में सबसे अधिक होती है। लेकिन यहां नेताओं से लोगों का भरोसा टूट चुका होता है। क्योंकि लोगों ने अपने नेता को दूसरी पार्टी में रहते वोट दिया था जबकि नेताजी चुनाव बाद अन्य पार्टी में शामिल हो जाते हैं। पिछले 10 साल में भारत में 25 से ज्यादा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां टूटीं। महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी, NCP दो फाड़ हुई, बिहार में JDU ने कई बार पाला बदला। हर बार कारण एक ही बताया जाता है - "सिद्धांतों से समझौता", "जनता के हित में फैसला"। लेकिन नतीजा एक ही निकलता है - वोटर का भरोसा टूटना।</p><p style="text-align:justify;"><br />टूट क्यों रही हैं पार्टियां? इस पर हमारी सोच वही है जो लगभग सभी की होती है। सत्ता और पद का गणित- पार्टी टूटने का 80% कारण विधायकों और सांसदों की टिकट और मंत्री पद की भूख है। जब हाईकमान टिकट काटता है या किसी और को आगे बढ़ाता है, तो नाराज नेता दूसरी पार्टी या नई पार्टी बना लेते हैं। परिवारवाद और हाईकमान कल्चर-<br />कई क्षेत्रीय पार्टियां एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जब दूसरी पीढ़ी तैयार होती है, तो पुराने नेता खुद को साइडलाइन महसूस करते हैं और बगावत करते हैं।</p><p style="text-align:justify;"><br />विचारधारा का कमजोर होना- पहले पार्टियों की पहचान किसी विचारधारा से होती थी। अब ज्यादातर पार्टियां "पावर ब्लॉक" बन गई हैं। विचारधारा बदलते देर नहीं लगती, क्योंकि एजेंडा सत्ता है। वोटर का भरोसा कैसे टूटता है?- जब तुमने 2019 में किसी पार्टी को वोट दिया था, तुमने उसके घोषणापत्र, नेता और विचारधारा पर भरोसा किया था। 2023 में वही विधायक दूसरी पार्टी में चला जाए और 2024 में तीसरी पार्टी में, तो सवाल उठता है। मैंने वोट किसको दिया था? व्यक्ति को, सिंबल को, या पार्टी को?</p><p style="text-align:justify;"><br />क्या मेरा वोट मायने रखता है? अगर चुनाव के बाद गठबंधन बदल जाए तो जनादेश का मतलब क्या रहा? सब एक जैसे हैं- ये सनक नहीं, टूटे भरोसे की उपज है। 2023 के कर्नाटक और महाराष्ट्र चुनाव के बाद CSDS के सर्वे में 47% लोगों ने कहा कि "दलबदल से लोकतंत्र कमजोर होता है"। इसका असर कहां दिखता है? चुनावी राजनीति पर- लोग अब स्थानीय उम्मीदवार देखने लगे हैं, पार्टी नहीं। "पार्टी कोई भी हो, मेरा काम करे" वाला ट्रेंड बढ़ रहा है। नीति निर्माण पर- सरकारें अस्थिर हो जाती हैं। 5 साल का प्लान 2 साल में बदल जाता है क्योंकि गठबंधन बदल गया। युवा राजनीति से दूर हो रहे हैं- कॉलेज चुनावों में भी भागीदारी घट रही है। युवाओं को लगता है कि राजनीति सिर्फ सौदेबाजी है। नोटा का बढ़ना- 2019 के बाद से कई सीटों पर नोटा को मिले वोट 2-3% तक पहुंच गए हैं। ये विरोध का साइलेंट तरीका है।</p><p style="text-align:justify;"><br />               दलबदल कानून कहां फेल हुआ?- 1985 में 52वां संविधान संशोधन लाकर दलबदल विरोधी कानून बनाया गया। मकसद था कि विधायक पार्टी न बदलें। लेकिन कानून में एक खामी छोड़ दी गई - अगर 2/3 विधायक साथ छोड़ दें तो वो "विलय" कहलाता है और अयोग्यता नहीं लगती। इसी खामी का फायदा लेकर महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश में सरकारें गिरीं। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि स्पीकर का फैसला समय पर नहीं आता, जिससे कानून का मकसद ही खत्म हो जाता है। क्या हो सकता है समाधान?- 2/3 वाली छूट हटाओ- अगर पार्टी टूटती है तो सबको अयोग्य ठहराओ। फिर जनता के पास जाओ और दोबारा चुनाव लड़ो।</p><p style="text-align:justify;"><br />फंडिंग में पारदर्शिता-  चुनाव आयोग को हर लेन-देन का हिसाब मिले ताकि नेताओं को खरीद-फरोख्त न हो सके। आंतरिक लोकतंत्र-  पार्टियों में चुनाव हों, युवा और कार्यकर्ताओं की सुनवाई हो। जब अंदर लोकतंत्र होगा तो बाहर टूट कम होगी। वोटर एजुकेशन-  लोगों को समझाना होगा कि वोट सिंबल को जाता है, व्यक्ति को नहीं। ये बात स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई जाए। स्थानीय मुद्दों पर वोट-  लोग अब पानी, सड़क, स्कूल को देखकर वोट कर रहे हैं, न कि बड़े नेता के नाम पर। सोशल मीडिया पर जवाबदेही- विधायक अगर पाला बदलता है तो अगले 6 महीने तक ट्रोल होता है। ये डर कुछ हद तक काम कर रहा है। नए विकल्प की तलाश AAP जैसे दल इसी भरोसे के संकट से पैदा हुए। पार्टियों का टूटना लोकतंत्र में स्वाभाविक है, लेकिन जब हर 2 साल में गठबंधन और दल बदल जाएं, तो जनता को लगता है कि उसका वोट सिर्फ सत्ता का सीढ़ी है।</p><p style="text-align:justify;"><br />लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं है, ये भरोसे का कॉन्ट्रैक्ट है। जब पार्टियां उस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ती हैं, तो नुकसान वोटर को होता है। और एक बार भरोसा टूट जाए, तो उसे दोबारा जोड़ने में 10 साल लग जाते हैं।<br />अगली बार जब कोई नेता पाला बदले, तो सवाल पूछो: "तुम पार्टी बदले, मेरी समस्या बदली क्या?"</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 20:39:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>रिकॉर्ड मतदान, बदलता भारत — लोकतंत्र अब जनता की मुट्ठी में</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी इतिहास शोर से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतारों में खड़ी खामोश भीड़ के संकल्प से लिखा जाता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा ही दिन था। असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और पुडुचेरी में भोर से पहले ही मतदान केंद्रों के बाहर जनसैलाब उमड़ पड़ा। कहीं भीगे हाथों में छाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं तपती सुबह से पहले ही चेहरों पर जिद चमक रही थी। कोई कांपते कदमों और झुकी कमर के साथ पहुंचा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई पहली बार वोट देने का उत्साह आंखों में लिए खड़ा था। चेहरे अलग थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषाएं अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थितियां अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सबको एक ही</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175691/record-turnout-is-changing-india-%E2%80%93-democracy-now-in-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">कभी-कभी इतिहास शोर से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कतारों में खड़ी खामोश भीड़ के संकल्प से लिखा जाता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>9 <span lang="hi" xml:lang="hi">अप्रैल </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसा ही दिन था। असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और पुडुचेरी में भोर से पहले ही मतदान केंद्रों के बाहर जनसैलाब उमड़ पड़ा। कहीं भीगे हाथों में छाते थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कहीं तपती सुबह से पहले ही चेहरों पर जिद चमक रही थी। कोई कांपते कदमों और झुकी कमर के साथ पहुंचा था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो कोई पहली बार वोट देने का उत्साह आंखों में लिए खड़ा था। चेहरे अलग थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">भाषाएं अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिस्थितियां अलग थीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सबको एक ही विश्वास जोड़ रहा था—लोकतंत्र को और मजबूत करने का विश्वास। शाम तक आंकड़ों ने बता दिया कि जनता ने केवल मतदान नहीं किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">चुनाव आयोग के अनुसार मतदान समाप्ति से एक घंटे पहले (शाम </span>5 <span lang="hi" xml:lang="hi">बजे तक) के आंकड़े चौंकाने वाले ही नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि लोकतंत्र की नई ताकत का ऐलान करने वाले हैं—असम में </span>84.42 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल में </span>75.01 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत और पुडुचेरी में </span>86.92 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान। ये केवल संख्या नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उस जागते भारत की तस्वीर हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अब राजनीति को दूर से देखना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे अपनी मुट्ठी में लेना चाहता है। लगभग </span>5.3 <span lang="hi" xml:lang="hi">करोड़ मतदाताओं की इस भागीदारी ने साफ कर दिया कि जनता अब भाषणों और नारों के पीछे चलने वाली भीड़ नहीं रही। वह सवाल करती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जवाब मांगती है और अपने वोट से बता रही है कि सत्ता का असली मालिक नागरिक है। यही वजह है कि ये चुनाव केवल तीन राज्यों की घटना नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक भविष्य की दिशा बन गए हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असम में इस बार का चुनाव कई अर्थों में ऐतिहासिक रहा। </span>126 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों वाले राज्य में </span>84.42 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। </span>2023 <span lang="hi" xml:lang="hi">के परिसीमन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों के बीच यह पहला चुनाव था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इसलिए लोगों की भागीदारी भी बढ़ी। भाजपा-एनडीए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में सत्ता बचाने में जुटा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि कांग्रेस और अन्य दल वापसी की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि मतदाता दलों से अधिक अपने मुद्दों पर केंद्रित दिखा। भूमि अधिकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांस्कृतिक पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमा सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी और विकास जैसे सवाल लोगों को बूथ तक ले आए। डलगांव जैसे क्षेत्रों में </span>94 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत से अधिक मतदान ने बता दिया कि असम अब केवल सरकार नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अपना भविष्य चुन रहा है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असम की जनता ने इस बार केवल वोट नहीं डाला</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपनी राजनीतिक चेतना भी दिखा दी। पहचान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घुसपैठ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सीमाई तनाव और अवसरों की कमी से लंबे समय तक जूझते रहे इस राज्य ने साफ कर दिया कि अब उसे केवल वादे नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ठोस जवाब चाहिए। गांवों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पहाड़ी इलाकों और सीमा से लगे क्षेत्रों में जिस तरह महिलाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुजुर्ग और युवा मतदान के लिए निकले</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसने साबित कर दिया कि लोकतंत्र की ताकत शहरों तक सीमित नहीं है। असम ने यह भी दिखाया कि पूर्वोत्तर अब राष्ट्रीय राजनीति का किनारा नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उसकी दिशा तय करने वाली मजबूत आवाज बन चुका है। वहां की जनता ने बता दिया कि लोकतंत्र सबसे मजबूत तब होता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब सबसे दूर बैठा नागरिक भी अपने वोट की कीमत समझने लगे।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केरल में तस्वीर अलग थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन संदेश उतना ही मजबूत। </span>140 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों पर हुए चुनाव में </span>75.01 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ। यह आंकड़ा असम और पुडुचेरी से कम जरूर है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद जागरूक केरल में यह भागीदारी अपने आप में असाधारण है। एलडीएफ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूडीएफ और भाजपा गठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुकाबले ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया। पलक्कड़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कोझीकोड और कई जिलों में </span>80 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत के आसपास मतदान हुआ। स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यावरण और महंगाई जैसे मुद्दों पर जनता ने खुलकर अपनी राय दी। यहां मतदाता केवल दल नहीं देखता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उनके काम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नीतियों और भविष्य की दिशा को भी परखता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केरल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि वहां लोकतंत्र केवल प्रक्रिया नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सामाजिक संस्कृति बन चुका है। बारिश के बावजूद बूथों पर लगी लंबी कतारों ने बता दिया कि यहां का नागरिक मतदान को अधिकार से अधिक कर्तव्य मानता है। बड़ी संख्या में महिलाएं और पहली बार वोट डालने वाले युवा मतदान के लिए पहुंचे। युवाओं ने बेरोजगारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तकनीकी शिक्षा और बेहतर अवसरों के सवाल उठाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जबकि महिलाओं ने स्वास्थ्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दी। केरल के मतदाता ने साफ कर दिया कि अब राजनीति केवल विचारधारा तक सीमित नहीं रहेगी। जनता का विश्वास उसी दल को मिलेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो उसकी उम्मीदों पर खरा उतरेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन चुनावों में अगर किसी ने पूरे देश को सबसे ज्यादा चौंकाया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह पुडुचेरी था। केवल </span>9.5 <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख मतदाताओं वाले इस छोटे केंद्र शासित प्रदेश में </span>86.92 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत मतदान ने लोकतंत्र की नई मिसाल कायम कर दी। </span>30 <span lang="hi" xml:lang="hi">सीटों वाले पुडुचेरी में एनडीए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कांग्रेस-डीएमके गठबंधन और अन्य दलों के बीच मुकाबला था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन सबसे बड़ी जीत जनता की भागीदारी की रही। कराईकल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पुडुचेरी और आसपास के इलाकों में सुबह से शाम तक मतदान केंद्रों पर भीड़ उमड़ी रही। स्थानीय रोजगार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पर्यटन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुनियादी सुविधाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकास और स्वायत्तता जैसे मुद्दों ने लोगों को बूथ तक पहुंचाया। इस छोटे प्रदेश ने पूरे देश को बता दिया कि लोकतंत्र की ताकत आबादी से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागरिकों की जागरूकता से तय होती है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">असम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">केरल और पुडुचेरी के चुनावों ने भारत को एक बड़ा संदेश दिया है। चुनाव आयोग की तैयारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कड़ी सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईवीएम पर बढ़ा भरोसा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल अभियान और सोशल मीडिया से बढ़ी जागरूकता ने मतदान को जन-आंदोलन बना दिया। लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि भारत का मतदाता अब बदल चुका है। वह चुप रहने वाला नागरिक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि अपने अधिकारों और भविष्य के प्रति सजग प्रहरी बन गया है। </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">मई को नतीजे आएंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकारें बनेंगी और समीकरण बदलेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन इन चुनावों की सबसे बड़ी जीत पहले ही सामने आ चुकी है। वह जीत है जनता का यह विश्वास कि उसकी उंगली पर लगी स्याही केवल निशान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 18:12:26 +0530</pubDate>
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