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                <title>मणिपुर हिंसा - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>मणिपुर हिंसा RSS Feed</description>
                
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                <title>हिंसा के दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए भरोसे संवाद और न्याय की सबसे बड़ी जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">पूर्वोत्तर भारत का सुंदर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य मणिपुर पिछले कई वर्षों से अशांति और हिंसा की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक बार फिर कांगपोकपी जिले में हुई दर्दनाक घटना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर मणिपुर की आग कब बुझेगी।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">हथियारबंद हमलावरों द्वारा एक गांव पर किए गए हमले में चर्च से जुड़े तीन लोगों की हत्या कर दी गई जिनमें सात माह की गर्भवती महिला भी शामिल थी। कई लोग घायल हुए और अनेक घर जलकर राख हो गए। यह घटना केवल तीन व्यक्तियों की मृत्यु भर नहीं है बल्कि</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180759/the-biggest-need-for-trust-dialogue-and-justice-is-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/shutterstock_2461989209-scaled.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">पूर्वोत्तर भारत का सुंदर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य मणिपुर पिछले कई वर्षों से अशांति और हिंसा की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक बार फिर कांगपोकपी जिले में हुई दर्दनाक घटना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर मणिपुर की आग कब बुझेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हथियारबंद हमलावरों द्वारा एक गांव पर किए गए हमले में चर्च से जुड़े तीन लोगों की हत्या कर दी गई जिनमें सात माह की गर्भवती महिला भी शामिल थी। कई लोग घायल हुए और अनेक घर जलकर राख हो गए। यह घटना केवल तीन व्यक्तियों की मृत्यु भर नहीं है बल्कि उस गहरे सामाजिक विभाजन और अविश्वास का प्रतीक है जिसने मणिपुर को लंबे समय से अपनी गिरफ्त में ले रखा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मणिपुर की समस्या को केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे ऐतिहासिक विवाद जातीय असुरक्षाएं राजनीतिक मतभेद और संसाधनों पर अधिकार को लेकर लंबे समय से चली आ रही प्रतिस्पर्धा भी शामिल है। राज्य में विभिन्न समुदायों के बीच संबंध समय के साथ जटिल होते गए हैं। जब भी कोई हिंसक घटना होती है तो उसका प्रभाव केवल प्रभावित परिवारों तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा हो जाता है। बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। व्यापार और रोजगार पर असर पड़ता है। सामान्य जनजीवन बाधित हो जाता है और विकास की गति थम जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हाल की घटना ने एक बार फिर यह दिखाया है कि हिंसा का कोई धर्म जाति या समुदाय नहीं होता। गोली और आग केवल जान लेती है। वह यह नहीं देखती कि सामने कौन है और उसकी पहचान क्या है। जब एक गर्भवती महिला हिंसा का शिकार होती है तो उसके साथ एक अजन्मा जीवन भी समाप्त हो जाता है। यह किसी भी सभ्य समाज के लिए गहरी पीड़ा और आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। ऐसे समय में संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मणिपुर में लंबे समय से चल रहे संघर्ष ने दोनों प्रमुख समुदायों के बीच अविश्वास की ऐसी खाई पैदा कर दी है जिसे केवल सुरक्षा बलों की तैनाती से नहीं भरा जा सकता। सुरक्षा व्यवस्था जरूरी है क्योंकि नागरिकों की रक्षा राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है। लेकिन स्थायी शांति केवल हथियारों के बल पर स्थापित नहीं की जा सकती। शांति तब आती है जब लोग एक दूसरे को दुश्मन नहीं बल्कि पड़ोसी और साथी नागरिक के रूप में देखने लगते हैं। इसके लिए संवाद और मेलमिलाप की प्रक्रिया को मजबूत करना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार की भूमिका इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य और केंद्र दोनों सरकारों को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जिसमें सभी समुदाय अपनी बात खुलकर रख सकें और उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए। केवल राजनीतिक बयान पर्याप्त नहीं हैं। जमीनी स्तर पर विश्वास बहाली के ठोस प्रयास आवश्यक हैं। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है उन्हें न्याय मिलना चाहिए। दोषियों की पहचान कर निष्पक्ष कार्रवाई की जानी चाहिए। जब लोगों को यह भरोसा होगा कि कानून सभी के लिए समान है तभी व्यवस्था में विश्वास लौटेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि केवल सरकार के प्रयासों से समस्या का समाधान संभव नहीं है। समाज के विभिन्न वर्गों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। धार्मिक संगठन सामाजिक संस्थाएं बुद्धिजीवी युवा और स्थानीय नेतृत्व शांति की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। चर्च मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल केवल पूजा के केंद्र नहीं बल्कि समाज को जोड़ने वाले मंच भी बन सकते हैं। यदि विभिन्न समुदायों के धार्मिक और सामाजिक नेता मिलकर शांति का संदेश दें तो उसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मणिपुर की वर्तमान स्थिति यह भी बताती है कि अफवाहें और नफरत फैलाने वाली सूचनाएं कितनी खतरनाक हो सकती हैं। डिजिटल युग में सोशल मीडिया के माध्यम से गलत जानकारी तेजी से फैलती है और लोगों की भावनाओं को भड़का सकती है। इसलिए जिम्मेदार संवाद और तथ्य आधारित जानकारी का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। मीडिया को भी अपनी भूमिका संतुलित और संवेदनशील ढंग से निभानी होगी ताकि तनाव कम हो और समाज में सकारात्मक संदेश पहुंचे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">युवाओं को हिंसा से दूर रखना भी समय की मांग है। संघर्ष और अशांति का सबसे अधिक प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ता है। यदि उन्हें शिक्षा रोजगार और सकारात्मक अवसर नहीं मिलेंगे तो वे निराशा और कट्टरता की ओर बढ़ सकते हैं। इसलिए विकास और शांति को एक दूसरे का पूरक मानते हुए आगे बढ़ना होगा। स्कूलों कॉलेजों और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से सामाजिक सद्भाव और आपसी सम्मान की भावना को बढ़ावा देना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मणिपुर का इतिहास केवल संघर्ष का इतिहास नहीं है। यह सांस्कृतिक विविधता परंपराओं और सहअस्तित्व की समृद्ध विरासत का भी इतिहास है। सदियों से विभिन्न समुदायों ने यहां साथ रहकर अपनी पहचान को विकसित किया है। आज आवश्यकता इस बात की है कि उस साझा विरासत को याद किया जाए और उसे भविष्य की नींव बनाया जाए। विभाजन की राजनीति और हिंसा का रास्ता अंततः सभी को नुकसान पहुंचाता है जबकि संवाद और सहयोग सभी के लिए बेहतर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कांगपोकपी की घटना ने एक बार फिर पूरे देश को झकझोर दिया है। निर्दोष लोगों की हत्या और घरों का जलना केवल समाचार नहीं बल्कि उन परिवारों का असहनीय दर्द है जिनकी दुनिया एक पल में बदल गई। इस पीड़ा को समझना और उससे सीख लेना जरूरी है। यदि हर नई घटना के बाद केवल शोक व्यक्त किया जाए और फिर सब कुछ पहले जैसा चलता रहे तो समाधान कभी नहीं निकलेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मणिपुर की आग तब बुझेगी जब भय की जगह विश्वास लेगा। जब प्रतिशोध की जगह संवाद होगा। जब राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ सामाजिक सहभागिता भी जुड़ेगी। जब हर समुदाय यह महसूस करेगा कि उसकी सुरक्षा सम्मान और अधिकार सुरक्षित हैं। और सबसे महत्वपूर्ण तब जब इंसान की पहचान किसी जातीय या सामुदायिक खांचे से पहले एक नागरिक और एक मानव के रूप में की जाएगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शांति कोई एक दिन में हासिल होने वाली उपलब्धि नहीं है। यह धैर्य समझदारी और निरंतर प्रयासों का परिणाम होती है। मणिपुर को आज इसी सामूहिक संकल्प की आवश्यकता है। सरकार समाज और दोनों समुदायों को मिलकर आगे बढ़ना होगा। हिंसा का प्रत्येक नया अध्याय राज्य को और पीछे धकेलता है जबकि सुलह और संवाद का हर कदम उसे स्थायी शांति और विकास की दिशा में आगे ले जाता है। अब समय आ गया है कि बंदूक की आवाज को बातचीत की आवाज से बदला जाए ताकि आने वाली पीढ़ियां एक सुरक्षित शांत और समृद्ध मणिपुर देख सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 19:02:00 +0530</pubDate>
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                <title>आखिर मणिपुर में हिंसा कब रूकेगी? </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">मणिपुर फिर अशांत है। मणिपुर एक बार फिर से हिंसा की आग में झुलस रहा है और यह केवल एक राज्य का संकट नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुका है। केंद्र और राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद हालात काबू में आते नहीं दिख रहे हैं। मोहरांग क्षेत्र में हुए रॉकेट हमले में दो मासूम बच्चों की मौत ने इस संकट को और भयावह बना दिया है। यह घटना सिर्फ एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि उस अस्थिर सामाजिक डांचे का प्रतीक है, जो पिछले कई महीनों से भीतर ही भीतर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175516/when-will-the-violence-stop-in-manipur"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/grief-amid-destruction-in-manipur.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मणिपुर फिर अशांत है। मणिपुर एक बार फिर से हिंसा की आग में झुलस रहा है और यह केवल एक राज्य का संकट नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गहरी चिंता का विषय बन चुका है। केंद्र और राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद हालात काबू में आते नहीं दिख रहे हैं। मोहरांग क्षेत्र में हुए रॉकेट हमले में दो मासूम बच्चों की मौत ने इस संकट को और भयावह बना दिया है। यह घटना सिर्फ एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि उस अस्थिर सामाजिक डांचे का प्रतीक है, जो पिछले कई महीनों से भीतर ही भीतर सुलग रहा था। इस दर्दनाक घटना ने न केवल स्थानीय लोगों के मन में भय और आक्रोश पैदा किया है, बल्कि पूरे देश के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर मणिपुर में में शांति कब और कैसे लौटेगी। इस प्रदेश में स्थायी शांति का इंतजार काफी लंबा होता जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रात के सन्नाटे में एक घर पर रॉकेट हमला होना, जिसमें एक पांच महीने की बच्ची और एक पांच साल के बच्चे की जान चली जाती है, यह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक और अस्वीकार्य है। यह आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि उन परिवारों की टूटती दुनिया की कहानी है, जिनके लिए जीवन अब कभी पहले जैसा नहीं रहेगा। बिष्णुपुर जिले में इस घटना के बाद जो प्रतिक्रिया देखने को मिली, वह इस बात का संकेत है कि जनता का धैर्य अब जवाब दे रहा है। सड़कों पर उत्तरी भौड़, कर्फ्यू का लागू होना, पांच जिलों में इंटरनेट सेवाओं का बंद होना और सुरक्षा बलों की बढ़ती तैनाती ये सभी हालात की गंभीरता को दर्शाते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रदर्शनकारियों द्वारा सुरक्षा बलों के खिलाफ हिंसक प्रतिक्रिया और जवाब में हुई फायरिंग, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई, यह बताता है। है कि हालात कितने नाजुक और विस्फोटक हो चुके हैं। मणिपुर में मई 2023 से जारी जातीय हिंसा का यह नया अध्याय है, जिसकी जड़ें कहीं गहरी हैं। मैतेई और कुकी जो समुदायों के बीच बढ़ती दूरी और अविश्वास ने इस संघर्ष को लगातार हवा दी है। 27 मार्च 2023 को हाई कोर्ट के उस निर्देश के बाद, जिसमें मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने पर विचार करने की बात कही गई थी, स्थिति और भी संवेदनशील हो गई। कुकी और अन्य आदिवासी समुदायों को यह डर सताने लगा कि उनके अधिकारों और संसाधनों पर असर पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके बाद 3 मई 2023 को शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे हिंसा में बदल गया और आज तक यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। सरकार ने हालात को काबू में करने के लिए कई कदम उठाए हैं। अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती, कर्फ्यू, इंटरनेट सेवाओं का निलंबन, शांति समिति का गठन और राहत शिविरों का संचालन ये सभी प्रयास इस बात का संकेत हैं कि प्रशासन स्थिति को संभालने के लिए सक्रिय है। लेकिन इसके बावजूद हिंसा का दौर जारी है। समुदायों के बीच लंबे समय से जारी हिंसा में तीन सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और 1500 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 50 हजार से ज्यादा लोग अब भी विभिन्न राहत शिविरों में रह रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ऐसे में हिंसा रोकने के लिए जो कदम उठा गए हैं, उसको लेकर सवाल न सवाल यह है कि क्या ये कदम पर्याप्त हैं? क्या ये केवल तात्कालिक समाधान हैं या वास्तव में स्थायी शांति की दिशा में कोई ठोस पहल ? फरवरी 2026 में राष्ट्रपति शासन हटने और नई सरकार के गठन के बाद यह उम्मीद जगी थी कि मणिपुर में हालात सामान्य होंगे। लेकिन हालिया घटनाएं यह दर्शाती हैं कि राजनीतिक बदलाव से ज्यादा जरूरी है सामाजिक विधास का पुनर्निर्माण। जब तक विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और विश्वास की प्रक्रिया मजबूत नहीं होगी, तब तक शांति केवल एक सपना बनी रहेगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस संकट ने राजनीतिक स्तर पर भी कई सवाल खड़े किए हैं। 'डबल इंजन सरकार' की अवधारणा, जो केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय का दावा करती है, इस समय कठघरे में खड़ी नजर आ रही है। विपक्ष लगातार सरकार पर आरोप लगा रहा है कि वह इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही। वहीं सत्तारूढ़ दल के लिए भी यह चुनौती कम नहीं है, क्योंकि उसे न केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखनी है, बल्कि सामाजिक संतुलन भी कायम करना है। कुकी-जो समुदाय की अलग प्रशासन की मांग इस पूरे संकट को और जटिल बना रही है। यह मांग सीधे तौर पर राज्य की एकता और अखंडता के सवाल से जुड़ी है। ऐसे में सरकार के लिए संतुलन बनाना बेहद कठिन हो गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक तरफ उसे समुदायों की भावनाओं को समझना है, वहीं दूसरी ओर उसे संविधान और राष्ट्रीय एकता की रक्षा भी करनी है। मणिपुर की मौजूदा स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या केवल सुरक्षा बलों के दम पर शांति कायम की जा सकती है? इसका जवाब स्पष्ट है नहीं। शांति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि संवाद, विश्वास और न्याय से स्थापित होती है। सरकार को चाहिए कि वह सभी पक्षों को एक मंच पर लाए, उनकी बात सुने और एक ऐसा समाधान निकाले जो सभी के लिए स्वीकार्य हो। इसके साथ ही, पुनर्वास और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जिन लोगों ने इस हिंसा में अपने घर, परिवार और आजीविका खो दी है, उनके लिए केवल राहत शिविर पर्याप्त नहीं हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्हें एक सम्मानजनक जीवन वापस दिलाने के लिए दीर्घकालिक योजनाओं की आवश्यकता है। मीडिया और नागरिक समाज की भूमिका भी इस समय बेहद महत्वपूर्ण है। उन्हें जिम्मेदारी के साथ काम करते हुए ऐसी खबरों और संदेशों को बढ़ावा देना चाहिए, जो शांति और एकता को मजबूत करें। अफवाहों और भड़काऊ सामग्री से बचना इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है। अंततः मणिपुर का यह संकट हमें यह सिखाता है कि विविधता में एकता केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक सतत प्रयास है। जब तक हम एक-दूसरे के दर्द को समझने और साझा करने की कोशिश नहीं करेंगे, तब तक ऐसी घटनाएं बार-बार हमें झकझोरती रहेंगी। सबसे बड़ा संकट भरोसे का है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज मणिपुर में लोग एक-दूसरे पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। समुदाय अपने-अपने इलाकों में सिमट गए हैं। राहत शिविरों में रह रहे हजारों विस्थापित लोग अपने घर लौटने से डरते हैं। ऐसे माहौल में केवल पुलिस या सेना के बल पर शांति कायम नहीं की जा सकती। शांति के लिए जरूरी है संवाद सच्चा, ईमानदार और निरंतर संवाद। सरकार को सभी समुदायों के प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाकर उनकी चिंताओं को समझना होगा। केवल राजनीतिक समाधान नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय समाधान की भी आवश्यकता है। इसके साथ ही, सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लूटे गए हथियारों की बरामदगी, सीमावर्ती इलाकों में निगरानी, और हिंसक तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई ये कदम जरूरी हैं। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि सख्ती और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बना रहे, ताकि आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस करें, न कि भयभीत। मीडिया और नागरिक समाज की भी इस समय महत्वपूर्ण भूमिका है। अफवाहों और नफरत फैलाने वाले संदेशों को रोकना, सही जानकारी लोगों तक पहुंचाना और शांति के लिए माहौल बनाना ये सभी जिम्मेदारियां साझा हैं। आज जरूरत है एक व्यापक, संवेदनशील और समावेशी दृष्टिकोण की। सरकार, राजनीतिक दलों, नागरिक समाज और आम जनता सभी को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा, क्योंकि मणिपुर की शांति केवल वहां के लोगों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश की एकता और स्थिरता के लिए जरूरी है।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 18:40:20 +0530</pubDate>
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