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                <title>समाज चिंतन - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>समाज चिंतन RSS Feed</description>
                
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                <title>धर्म और समानता का द्वंद्व अदालत और परंपरा के बीच संतुलन की तलाश</title>
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                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत जैसे बहुलतावादी समाज में धर्म, आस्था और परंपरा का गहरा स्थान रहा है। यहां विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और उनके रीति-रिवाजों की विविधता ही इसकी पहचान है। ऐसे में जब किसी धार्मिक परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के बीच टकराव उत्पन्न होता है, तो यह केवल एक कानूनी विवाद नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विमर्श का विषय बन जाता है। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही बहस इसी जटिल द्वंद्व का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें अदालत, सरकार, धार्मिक संस्थाएं और समाज के विभिन्न वर्ग अपनी-अपनी दृष्टि प्रस्तुत कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175395/the-conflict-between-religion-and-equality-the-search-for-balance"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas5.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत जैसे बहुलतावादी समाज में धर्म, आस्था और परंपरा का गहरा स्थान रहा है। यहां विभिन्न धर्मों, संप्रदायों और उनके रीति-रिवाजों की विविधता ही इसकी पहचान है। ऐसे में जब किसी धार्मिक परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के बीच टकराव उत्पन्न होता है, तो यह केवल एक कानूनी विवाद नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विमर्श का विषय बन जाता है। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रही बहस इसी जटिल द्वंद्व का एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें अदालत, सरकार, धार्मिक संस्थाएं और समाज के विभिन्न वर्ग अपनी-अपनी दृष्टि प्रस्तुत कर रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सरकार का यह कहना कि अदालतों को धार्मिक मामलों में सीमित दखल देना चाहिए, इस बहस को एक नया आयाम देता है। केंद्र का तर्क है कि सबरीमाला में एक विशेष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक किसी भेदभाव की भावना से नहीं, बल्कि उस मंदिर की विशिष्ट धार्मिक परंपरा के कारण है। भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है, और इसी मान्यता के आधार पर यह परंपरा विकसित हुई है। सरकार का यह भी कहना है कि यदि इस परंपरा को बदला जाता है, तो इससे न केवल उस मंदिर की पूजा पद्धति प्रभावित होगी, बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक विविधता पर भी प्रभाव पड़ेगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, इस मुद्दे को समानता और मौलिक अधिकारों के संदर्भ में देखा जा रहा है। संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार देता है और किसी भी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार्य मानता है। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या किसी धार्मिक प्रथा के नाम पर महिलाओं को प्रवेश से वंचित रखना उचित है। विशेष रूप से तब, जब समाज में महिलाओं की भूमिका और अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, यह बहस और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत के समक्ष यह चुनौती है कि वह धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करे। एक ओर अनुच्छेद 25और 26 धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन का अधिकार प्रदान करते हैं, वहीं अनुच्छेद 14और 15 समानता और भेदभाव के निषेध की गारंटी देते हैं। इन प्रावधानों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है, क्योंकि दोनों ही संवैधानिक मूल्यों के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस मामले में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि अदालत किस हद तक यह तय कर सकती है कि कौन सी धार्मिक प्रथा आवश्यक है और कौन सी नहीं। ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ की अवधारणा लंबे समय से न्यायपालिका के लिए एक जटिल विषय रही है। आस्था और विश्वास को तर्क और प्रमाण के आधार पर परखना अपने आप में कठिन कार्य है। यही कारण है कि कुछ लोग यह मानते हैं कि अदालतों को इस प्रकार के मामलों में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए और केवल उन्हीं स्थितियों में हस्तक्षेप करना चाहिए, जब कोई प्रथा सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के विरुद्ध हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिलाओं के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह मुद्दा केवल मंदिर में प्रवेश का नहीं, बल्कि सम्मान और समानता का है। यदि किसी महिला को केवल उसके जैविक कारणों के आधार पर किसी धार्मिक स्थल में प्रवेश से रोका जाता है, तो यह उसके अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है। न्यायाधीशों द्वारा भी इस बात पर सवाल उठाया गया कि क्या मासिक धर्म जैसी प्राकृतिक प्रक्रिया के आधार पर महिलाओं को ‘अछूत’ मानना उचित है। यह तर्क इस बहस को और अधिक संवेदनशील और गहन बनाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साथ ही यह भी सच है कि भारत में धार्मिक आस्थाएं अत्यंत गहरी हैं और लोग अपनी परंपराओं से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं। किसी भी परंपरा में बदलाव का प्रयास अक्सर सामाजिक विरोध को जन्म देता है। इसलिए यह आवश्यक है कि ऐसे मामलों में केवल कानूनी दृष्टिकोण ही नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और समझदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। केरल सरकार द्वारा यह सुझाव कि किसी भी बदलाव से पहले धार्मिक विद्वानों और समाज सुधारकों से सलाह ली जानी चाहिए, इसी दिशा में एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे विवाद का एक व्यापक पहलू यह भी है कि यह केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित प्रथाएं और पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार जैसे कई मुद्दे भी इसी बहस का हिस्सा हैं। इसका अर्थ है कि अदालत का निर्णय भविष्य में विभिन्न धर्मों और उनके अनुयायियों के अधिकारों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए यह मामला केवल एक निर्णय नहीं, बल्कि एक दिशा तय करने जैसा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">समाज के लिए भी यह एक आत्ममंथन का अवसर है। क्या परंपराएं समय के साथ बदलनी चाहिए या उन्हें यथावत बनाए रखना चाहिए। क्या आस्था और समानता एक साथ चल सकते हैं या उनमें टकराव अनिवार्य है। इन प्रश्नों के उत्तर सरल नहीं हैं, लेकिन इन पर विचार करना आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार के मामलों में किसी एक पक्ष को पूरी तरह सही या गलत ठहराना उचित नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि एक ऐसा संतुलन स्थापित किया जाए, जिसमें धार्मिक आस्थाओं का सम्मान भी बना रहे और संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और अधिकारों की रक्षा भी हो। अदालत, सरकार और समाज तीनों को मिलकर इस दिशा में संवेदनशील और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह विवाद केवल कानून की किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की सोच, हमारी परंपराओं और हमारे भविष्य की दिशा को भी प्रभावित करेगा। इसलिए इसका समाधान भी उतना ही व्यापक और संतुलित होना चाहिए, जिसमें सभी पक्षों की भावनाओं और अधिकारों का सम्मान किया जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 18:26:55 +0530</pubDate>
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                <title>शुद्ध आहार से स्वस्थ जीवन और धर्म साधना का मार्ग</title>
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                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;">मानव जीवन को यदि गहराई से समझा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि शरीर केवल भोग का साधन नहीं बल्कि धर्म साधना का आधार है। प्राचीन वचनों में कहा गया है कि शरीर ही धर्म का पहला साधन है। जब तक शरीर स्वस्थ और समर्थ है तभी तक मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है और आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसलिए शरीर की रक्षा और उसका संतुलन बनाए रखना प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम दायित्व बन जाता है। इसी संदर्भ में आहार का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जैसा आहार होगा वैसा</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175391/path-to-healthy-life-and-religious-practice-through-pure-diet"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/path-to-spiritual-nourishment.png" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मानव जीवन को यदि गहराई से समझा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि शरीर केवल भोग का साधन नहीं बल्कि धर्म साधना का आधार है। प्राचीन वचनों में कहा गया है कि शरीर ही धर्म का पहला साधन है। जब तक शरीर स्वस्थ और समर्थ है तभी तक मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन कर सकता है और आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इसलिए शरीर की रक्षा और उसका संतुलन बनाए रखना प्रत्येक व्यक्ति का प्रथम दायित्व बन जाता है। इसी संदर्भ में आहार का विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जैसा आहार होगा वैसा ही विचार और व्यवहार भी होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज के समय में आहार को लेकर अनेक प्रकार की भ्रांतियां समाज में फैली हुई हैं। कुछ लोग यह मानते हैं कि शरीर को बलवान बनाने के लिए मांसाहार आवश्यक है। यह धारणा केवल अज्ञान और भ्रम का परिणाम है। वास्तव में मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है और उसकी शारीरिक संरचना भी इस बात की ओर संकेत करती है कि वह शाकाहार के लिए अधिक उपयुक्त है। शाकाहार न केवल शरीर को आवश्यक पोषण देता है बल्कि मन को भी शुद्ध और शांत बनाए रखता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इतिहास और परंपरा के अनेक उदाहरण इस सत्य को प्रमाणित करते हैं कि शाकाहार अपनाकर भी व्यक्ति अत्यंत शक्तिशाली और तेजस्वी बन सकता है। हमारे देश के अनेक महापुरुषों ने शाकाहार को अपनाकर न केवल आत्मिक ऊंचाई प्राप्त की बल्कि समाज को भी दिशा दी। उनके जीवन से यह स्पष्ट होता है कि शुद्ध आहार केवल शरीर को ही नहीं बल्कि आत्मा को भी पवित्र करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आहार के विषय में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि केवल क्या खाया जाए यह ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि कितना और कैसे खाया जाए यह भी उतना ही आवश्यक है। हिताहार मिताहार और अल्पाहार का सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि भोजन संतुलित और संयमित होना चाहिए। अधिक भोजन शरीर को रोगी बनाता है जबकि संतुलित भोजन शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखता है। जो व्यक्ति अपने आहार पर नियंत्रण रखता है वह स्वयं ही अपना वैद्य बन जाता है और उसे बार बार चिकित्सा की आवश्यकता नहीं पड़ती।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आधुनिक जीवन शैली में आहार की शुद्धता धीरे धीरे समाप्त होती जा रही है। बाजार में मिलने वाली अनेक वस्तुएं देखने में तो आकर्षक होती हैं लेकिन उनमें ऐसे तत्व मिलाए जाते हैं जो शाकाहार की श्रेणी में नहीं आते। कई बार लोग अनजाने में ऐसी वस्तुओं का सेवन कर लेते हैं जो उनके सिद्धांतों के विपरीत होती हैं। इसलिए आज के समय में सजगता अत्यंत आवश्यक हो गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हर व्यक्ति को यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि वह जो खा रहा है वह वास्तव में शुद्ध है या नहीं। इसके साथ ही जल और वायु की शुद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। शुद्ध हवा जीवन का आधार है और उसके बाद जल का स्थान आता है। भोजन तीसरे स्थान पर आता है। यदि वायु और जल शुद्ध नहीं होंगे तो उत्तम भोजन भी शरीर को पूर्ण लाभ नहीं दे पाएगा। इसलिए स्वस्थ जीवन के लिए इन तीनों का संतुलन आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज विश्व में जो अशांति और असंतुलन देखने को मिल रहा है उसका एक कारण आहार में आया परिवर्तन भी है। तामसिक भोजन मन में उग्रता और असंयम को बढ़ाता है जबकि सात्विक भोजन शांति और संतुलन को प्रोत्साहित करता है। यदि समाज को शांत और संतुलित बनाना है तो आहार की शुद्धता पर ध्यान देना अनिवार्य है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में बच्चों और युवाओं में भी खानपान की आदतों में तेजी से बदलाव आ रहा है। आकर्षक विज्ञापन और आधुनिक जीवन शैली के प्रभाव में आकर वे ऐसी वस्तुओं का सेवन करने लगे हैं जो उनके स्वास्थ्य और संस्कार दोनों के लिए हानिकारक हैं। इस स्थिति को सुधारने के लिए परिवार और समाज दोनों को मिलकर प्रयास करना होगा। बच्चों को प्रारंभ से ही शुद्ध और संतुलित आहार के महत्व के बारे में जागरूक करना आवश्यक है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शाकाहार केवल एक खानपान की पद्धति नहीं है बल्कि यह एक जीवन दर्शन है। यह हमें दया करुणा और अहिंसा का संदेश देता है। जब हम शाकाहार अपनाते हैं तो हम केवल अपने शरीर की रक्षा नहीं करते बल्कि अन्य जीवों के प्रति भी संवेदना प्रकट करते हैं। यही संवेदना आगे चलकर समाज में प्रेम और सौहार्द का वातावरण बनाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल विचारों तक सीमित न रहें बल्कि व्यवहार में भी परिवर्तन लाएं। शुद्ध आहार को अपनाकर हम अपने जीवन को स्वस्थ और संतुलित बना सकते हैं। इसके साथ ही समाज में भी जागरूकता फैलाकर एक सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यदि हम सभी मिलकर इस दिशा में प्रयास करें तो एक ऐसा समाज निर्मित हो सकता है जिसमें शांति संतुलन और करुणा का वास हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि शुद्ध आहार ही स्वस्थ जीवन और धर्म साधना का आधार है। शरीर की रक्षा और उसकी पवित्रता बनाए रखने के लिए हमें अपने आहार पर विशेष ध्यान देना होगा। यही मार्ग हमें न केवल शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करेगा बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति की ओर भी ले जायगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 18:14:27 +0530</pubDate>
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                <title>वैचारिकता से मजबूत होती मानसिकता</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;">मनुष्य के जीवन में अध्ययन जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक मनन और चिंतन भी है। केवल पुस्तक पढ़ना ही संपूर्ण मानवीय उद्देश्य ना होकर उससे प्राप्त ज्ञानामृत का मनन एवं चिंतन भी अत्यंत आवश्यक है। किसी भी पुस्तक का अध्ययन मनन एवं उस पर चिंतन मनुष्य के संस्कारों को परिष्कृत करता है एवं जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त करने में सदैव सहायक सिद्ध होता है। अतः मनुष्य को सदैव निरंतर ज्ञानवर्धक पुस्तकों से न सिर्फ ज्ञान प्राप्त करना चाहिए अपितु  उसका निरंतर मनन तथा चिंतन भी करना होगा तब जाकर हमारे संस्कार,संस्कृति एवं जीवन के उद्देश्य सफल होंगे।</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175387/mentality-becomes-stronger-through-ideology"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1688671870119.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मनुष्य के जीवन में अध्ययन जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक मनन और चिंतन भी है। केवल पुस्तक पढ़ना ही संपूर्ण मानवीय उद्देश्य ना होकर उससे प्राप्त ज्ञानामृत का मनन एवं चिंतन भी अत्यंत आवश्यक है। किसी भी पुस्तक का अध्ययन मनन एवं उस पर चिंतन मनुष्य के संस्कारों को परिष्कृत करता है एवं जीवन के उच्च आदर्शों को प्राप्त करने में सदैव सहायक सिद्ध होता है। अतः मनुष्य को सदैव निरंतर ज्ञानवर्धक पुस्तकों से न सिर्फ ज्ञान प्राप्त करना चाहिए अपितु  उसका निरंतर मनन तथा चिंतन भी करना होगा तब जाकर हमारे संस्कार,संस्कृति एवं जीवन के उद्देश्य सफल होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">महात्मा गांधी ने कहा है कि पुराने वस्त्र पहनों पर नई पुस्तकें खरीदोl उन्होंने यह भी कहा कि पुस्तकों का महत्व रत्नों से कहीं अधिक है, क्योंकि पुस्तकें अंतःकरण को उज्जवल करती हैं। सच्चाई भी यही है कि पुस्तकें ज्ञान के अंतःकरण और सच्चाईयों का भंडार होती है। आत्मभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भी होती हैं। जिन्होंने पुस्तके नहीं पढी हैं या जिन्हें पुस्तक पढ़ने में रूचि नहीं है वे जीवन की कई सच्चाईयों से अनभिज्ञ रह जाते हैं। पुस्तकें पढ़ने का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि हम जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझने की शक्ति से परिचित हो जाते हैं,और समस्या कितनी भी बड़ी हो हम उससे जीतकर निजात पा जाते हैं। कठिन से कठिन समय पर पुस्तकें हमारा मार्गदर्शन एवं दिग्दर्शन करती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन मनीषियों ने पुस्तक लिखी है और जिन्हें पुस्तकें पढ़ने का शौक है उन्हें ज्ञानार्जन के लिए इधर-उधर भटकने की आवश्यकता नहीं होतीहैं। पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे कलाम साहब ने कहा है कि एक पुस्तक कई मित्रों के बराबर होती है और पुस्तकें सर्वश्रेष्ठ मित्र होती हैं। शिक्षाविद चार्ल्स विलियम इलियट ने कहा कि पुस्तके मित्रों में सबसे शांत व स्थिर हैं, वे सलाहकारों में सबसे सुलभ और बुद्धिमान होती हैं और शिक्षकों में सबसे धैर्यवान तथा श्रेष्ठ होती हैं। निसंदेह पुस्तकें ज्ञानार्जन करने मार्गदर्शन एवं परामर्श देने में में विशेष भूमिका निभाती है। पुस्तकें मनुष्य के मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक,नैतिक, चारित्रिक, व्यवसायिक एवं राजनीतिक विकास में अत्यंत सहायक एवं सफल दोस्त का फर्ज अदा करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राचीन काल से ही बच्चों तथा नौनिहालों के विकास के लिए पुस्तकें लिखे जाने का चलन तथा रिवाज रहा है। 'पंचतंत्र'तथा 'हितोपदेश' इसके बहुत बड़े उदाहरण हैं। पंचतंत्र,हितोपदेश में ज्ञानार्जन के लिए एवं संस्कृति सभ्यता और शिक्षा के उपयोग की बातें जो दैनिक जीवन में अत्यंत प्रभावशाली तथा उपयोगी होती है, लिखी गई हैं। और यही पुस्तकें इस देश की सभ्यता संस्कृति के संरक्षण तथा प्रचार प्रसार में अहम भूमिका निभाती आई है। इसी तरह की पुस्तकों ने ज्ञान का विस्तार भी किया है। विश्व की हर सभ्यता मे लेखन सामग्री का बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पुस्तकों के माध्यम से ही धर्म जाति संस्कृति एवं शिक्षा की मार्गदर्शिका से ही समाज आगे बढ़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अच्छी किताबें अच्छे मार्गदर्शक तथा शिक्षित तथा अशिक्षित समाज को चेतना तथा सद्गुणों से संचारित करती है, व्यक्ति के अंदर मानसिक क्षमता का विकास भी होता है। ऐतिहासिक किताबें हमें इतिहास, धर्म, राजनीति, संस्कृति के अनेक पहलुओं से अवगत भी कराती है,जिससे व्यक्तित्व विकास में अत्यंत सहायता मिलती है। पुस्तकों के महत्व को देखते हुए डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा कि पुस्तके वह साधन है जिसके माध्यम से हम विभिन्न संस्कृति एवं समाज के बीच सेतु का निर्माण कर सकते हैं। पुस्तके वह मित्र होती हैं जो हर परिस्थिति तत्काल में सहायक होती है, और यही कारण है कि अनेक लोग गुरुवाणी, हनुमान चालीसा अभी अपने पास रखते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान युग डिजिटल युग कहलाता है अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रिंट मीडिया के स्थान पर अपने पैर जमा लिए हैं। इस डिजिटल युग में इंटरनेट का महत्व काफी बढ़ गया है। पहले हम बचपन में चंदा मामा, नंदन, बालभारती और अन्य किताबों से ज्ञान से लेकर मनोरंजन तक प्राप्त करते थे। आज इंटरनेट के बढ़ते बाजार की दिशा में युवक पुस्तकों को विभिन्न साइटों मैं खंगाल कर पढ़ लेते हैं। अब डिजिटल किताबें भी आ गई है साथ ही डिजिटल लाइब्रेरी भी धीरे-धीरे विकसित हो रही है। पर कई कंपनियां विविध किताबों को साइट पर प्रकाशित कर बच्चों के पढ़ने के लिए उपलब्ध करा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ कर लाभान्वित हो रहे हैं। इस दिशा में भारत सरकार तथा राज्य सरकारों द्वारा डिजिटल कार्यक्रमों के अंतर्गत ई शिक्षा तथा ई पुस्तकों के पुस्तकालयों के माध्यम से उपलब्ध कराई जा रही पठन सामग्रियां बच्चों की जिज्ञासा को शांत करने का काम कर रही है। डिजिटल किताबों तथा पुस्तकालयों से यह लाभ है कि देश विदेश में किसी भी भाग में रहकर लोग अपनी इच्छा के अनुसार पुस्तकों पत्रिकाओं आदि को पढ़ सकते हैं। इंटरनेट अब अध्ययन का सुलभ साधन बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">पर दूसरी तरफ इससे कुछ नुकसान भी हो रहे हैं, उचित मार्गदर्शन वाली किताबें न पढ़कर भ्रामक पुस्तकों का अध्ययन कर अपने को दिग्भ्रमित कर रहे हैं और इससे बच्चों का भविष्य भी प्रभावित हो रहा है। इसके लिए छोटे बच्चों को अपनी निगरानी में इंटरनेट से किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना अन्यथा दिगभ्रमित साहित्य बच्चों की मानसिकता पर विकृत प्रभाव डाल सकता है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि पुस्तकें ज्ञान देने के साथ मार्गदर्शन तथा चरित्र निर्माण का सर्वोत्तम साधन है। पुस्तकों से राष्ट्र की युवा कर्ण धारों को नई दिशा दी जा सकती है तथा एकता और अखंडता का संदेश देकर एक महान और सशक्त राष्ट्र की पृष्ठभूमि रखी जा सकती है।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 18:03:29 +0530</pubDate>
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                <title>कहां गए शांति के कपोत उड़ाने वाले?</title>
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                        <![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की दुनिया बारूद से धधक रही  है। रूस-यूक्रेन  से लेकर मध्य पूर्व के रेगिस्तानों तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर तरफ मिसाइलों की गूँज है। शांति की बाते  अब सुनाई  नही देतीं। शांति के कपोत उड़ाने  वाले दिखाई देने बंद हो गए। युद्ध की विभिषिका के विरोध में प्रदर्शन करने और मोमबत्त्ती  जलाने वाले अब सड़कों से गायब है। युद्ध के विरोध के स्वर धीमे  ही नही हुए ,पूरी तरह खामोश  हो गए। बुद्ध के संदेश अब किताबों में ही बंद होकर रह गए है। युद्धों के विरोध की कही से बात नही उठ रही।  दुनिया में शांति स्थित करने</span></p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175385/where-have-those-who-fly-the-pigeons-of-peace-gone"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/pigeon.png" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की दुनिया बारूद से धधक रही  है। रूस-यूक्रेन  से लेकर मध्य पूर्व के रेगिस्तानों तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर तरफ मिसाइलों की गूँज है। शांति की बाते  अब सुनाई  नही देतीं। शांति के कपोत उड़ाने  वाले दिखाई देने बंद हो गए। युद्ध की विभिषिका के विरोध में प्रदर्शन करने और मोमबत्त्ती  जलाने वाले अब सड़कों से गायब है। युद्ध के विरोध के स्वर धीमे  ही नही हुए ,पूरी तरह खामोश  हो गए। बुद्ध के संदेश अब किताबों में ही बंद होकर रह गए है। युद्धों के विरोध की कही से बात नही उठ रही।  दुनिया में शांति स्थित करने के लिए बने संयुक्त  राष्ट्रसंघ  के मुंह पर टेप चिपक गया। वह देख  सकता है। न कुछ बोल सकता है।  न आदेश कर सकता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विडंबना देखिए कि इक्कीसवीं सदी में हम मंगल पर बस्तियां बसाने की बात कर रहे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन ज़मीन के चंद टुकड़ों और आपसी वर्चस्व के लिए हज़ारों बेगुनाहों का खून बहाने से भी पीछे नहीं हट रहे। युद्ध चाहे रूस और यूक्रेन के बीच हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">या इज़राइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान और अमेरिका के बीच का तनाव हो</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">जीत के झंडे चाहे जिस देश के हाथ आएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हारती  हमेशा मानवता  है।  इन युद्ध में विजयी कोई भी हो, सदा पराजित तो मानव होती है। मरती बस इंसानियत है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी समस्या का समाधान नहीं रहा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह नई समस्याओं का जन्मदाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के समय  भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी के कई  बार कहा कि दुनिया को युद्ध की नही , बुद्ध की जरूरत है। कई  मंचों से  उन्होंने यह मांग उठाई, किंतु किसी भी देश ने शांति का समर्थन नही किया। सब देश  गूंगे बन कर रह  गए।  आज भी  ये ही हाल है।  मरता  ईरान खाड़ी के उन देशों पर मिजाइल  और द्रोण  दाग कर तबाही मचा रहा है, जिनमे अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। अपनी बरबादी होते देख ये देश ईरान पर अमेरिकी हमलों का उस तरह विरोध नही कर रहे , जिस तरह कि करना चाहिए।   </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> रूस-यूक्रेन युद्ध के समय   जहाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संकट को जन्म दिया</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो मध्य पूर्व (इज़राइल-हमास-ईरान) के संघर्ष ने दुनिया को धार्मिक और कूटनीतिक ध्रुवीकरण के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। इन लड़ाइयों में टैंकों की गड़गड़ाहट के बीच जो आवाज़ दब जाती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह है</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">एक मासूम बच्चे की चीख और एक बेबस माँ की कराह।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध की सबसे बड़ी कीमत वे लोग चुकाते हैं जिनका राजनीति या सत्ता की लालसा से कोई लेना-देना नहीं होता। यूक्रेन के कीव से लेकर गाज़ा की गलियों और ईरान के गांव तक तक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हज़ारों औरतें और बच्चे मौत की नींद सो चुके हैं। जो उम्र खिलौनों से खेलने की थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस उम्र में बच्चे बमों के धमाकों को पहचानना सीख रहे हैं। हज़ारों बच्चे अनाथ हो चुके हैं और लाखों का भविष्य मलबे के नीचे दब गया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध के दौरान महिलाओं को न केवल विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि वे शारीरिक और मानसिक हिंसा का सबसे आसान लक्ष्य बनती हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध केवल इंसान को नहीं मारता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह सदियों से बनी-बनाई सभ्यताओं और बुनियादी ढांचे को भी नष्ट कर देता है। स्कूलों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">अस्पतालों और रिहायशी इमारतों पर गिरते बम यह दर्शाते हैं कि आधुनिक समाज कितना "असंवेदनशील" हो चुका है। जब एक अस्पताल पर मिसाइल गिरती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं ढहती</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि इंसानियत की आखिरी उम्मीद भी टूट जाती है। इन लड़ाइयों का असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने दुनिया भर में अनाज की आपूर्ति श्रृंखला</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">को तोड़ दिया</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे गरीब देशों में भुखमरी का खतरा बढ़ गया। ईंधन की बढ़ती कीमतें और खाद्य पदार्थों की कमी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। जो खरबों डॉलर शिक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में खर्च होने चाहिए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वे आज आधुनिक हथियार और मिसाइलें बनाने में झोंके जा रहे हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध का एक और खामोश शिकार हमारा पर्यावरण है। हज़ारों टन गोला-बारूद का इस्तेमाल वायुमंडल को ज़हरीला बना रहा है। जंगलों की आग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समुद्री प्रदूषण और ज़मीन में धंसे बारूदी सुरंग </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मौत का जाल बिछा रहे हैं। हम जिस धरती को बचाने की कसमें खाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसी को युद्ध की आग में झोंक रहे हैं। संसाधनों को  बरबाद कर रहे हैं।जब हम टीवी पर बमबारी के दृश्य देखते हैं और उन्हें केवल एक "न्यूज़ अपडेट" की तरह छोड़ देते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो समझ लीजिए कि हमारे भीतर की इंसानियत मर चुकी है। युद्ध हमें क्रूर बना देता है। हम मौतों को केवल </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">आंकड़ों</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">में गिनने लगते हैं। घृणा का यह बीज जो आज बोया जा रहा है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह भविष्य में और अधिक कट्टरपंथ और आतंकवाद को जन्म देगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अमेरिका आज दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह बन गया है। उसने इराक पर यह कह कर हमला किया था कि उसके पास कैमिकल और अन्य  घातक शस्त्र है। इराक हार गया। सद्दाम हुसैन पकड़े ही नही गए, उन्हें फांसी हो गई, किंतु अमेरिका इराक से कुछ भी बरामद नही कर पाया। उसका सब झूंठा  प्रचार रहा। अब ईरान पर यह कह कर इस्राइल और अमेरिका ने हमला किया कि वह परमाणु बम बनाने के नजदीक है। उसकी इस शक्ति को  खत्म करना  है। हमले जारी है।  इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने मीडिया से बात करते हुए  अपने मन की बात कह  दी कि उसे  ईरान के तेल पर कब्जा  करना  है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तीन </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जनवरी </span>2026 <span lang="hi" xml:lang="hi">को अमेरिकी सेना ने एक सैन्य ऑपरेशन के  दौरान वेनेजुयला  </span> <span lang="hi" xml:lang="hi">के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो</span> <span lang="hi" xml:lang="hi">और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को उनके देश (कराकस) से गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई नार्को-आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी के आरोपों के बाद की गई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इसके बाद उन्हें न्यूयॉर्क लाया गया।</span> <span lang="hi" xml:lang="hi"> बहाना मादक पदार्थो  की तस्करी रोकना था किंतु   अब अमेरिकी राष्ट्र पति ट्रंप  कह रहे हैं कि </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वेनेजुयला  का तेल वे बेचेंगे।  उनकी मर्जी से बिकेगा। इस सब का मतलब साफ है कि दुनिया के संसाधनों पर अमेरिका की नजर है। वह किसी ने किसी बहाने उन पर कब्जा करना   चाहता है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप  का एक बड़ा बयान सामने आया। ट्रंप ने कहा है कि अगर थोड़ा और समय मिला तो अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल सकता है और वहां से तेल लेकर बड़ा मुनाफा कमा सकता है। उनके इस बयान ने पहले से चल रहे संघर्ष को और संवेदनशील बना दिया है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">फिलहाल ईरान ने इस अहम समुद्री रास्ते को बंद कर दिया है। इस कारण दुनिया भर में तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है और कीमतों में तेजी देखी जा रही</span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह संघर्ष अब सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहा है। अमेरिका और इस्राइल ने ईरान और लेबनान में कई ठिकानों पर हमले किए हैं। इसके जवाब में ईरान ने भी कई खाड़ी देशें पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। हाल के दिनों में हमलों की संख्या कुछ कम हुई है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन पूरी तरह रुकी नहीं है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi"> ईरान के खिलाफ कार्रवाई में शामिल होने से इन्कार करने वाले ब्रिटेन जैसे वह  देश होर्मुज जलडमरूमध्य   के बंद होने  की वजह से जेट ईंधन नहीं पा रहे हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उनके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रप का  सुझाव है: पहला- अमेरिका से तेल खरीदो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हमारे पास बहुत है। दूसरा- हिम्मत जुटाओ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलडमरूमध्य पर जाओ और उसे अपने कब्जे में ले लो।  </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के पूर्व महानिदेशक मोहम्मद अल बारदेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ </span>48 <span lang="hi" xml:lang="hi">घंटे का अल्टीमेटम जारी करने के बाद खाड़ी देशों से हस्तक्षेप करने की तत्काल अपील की है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पूर्व आईएईए प्रमुख ने विनाशकारी सैन्य टकराव की संभावना का जिक्र किया। बारदेई ने एक्स पर एक पोस्ट में पड़ोसी खाड़ी देशों को संबोधित करते हुए कहा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">कृपया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एक बार फिर अपनी पूरी ताकत झोंक दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे पहले कि यह पागल शख्स इलाके को आग का गोला बना दे।"मोहम्मद अल बारदेई ने अपनी गुहार को वैश्विक मंच तक पहुंचाते हुए युद्ध को रोकने में अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाया। संयुक्त राष्ट्र के साथ रूस-चीन-फ्रांस को संबोधित एक अलग पोस्ट में उन्होंने पूछा कि क्या इस पागलपन को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है</span>?<br /><span lang="hi" xml:lang="hi"></span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध किसी समस्या का स्थायी हल नहीं है। इतिहास ने बार-बार सिखाया है कि युद्ध के मैदान में कभी कोई नहीं जीतता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस जो कम हारता है वह खुद को विजेता घोषित कर देता है। रूस</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यूक्रेन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इज़राइल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ईरान या अमेरिका</span>—<span lang="hi" xml:lang="hi">शक्ति का प्रदर्शन किसी को महान नहीं बनाता। महानता इस बात में है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसी दुनिया दें जहाँ बारूद की गंध नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि भाईचारे की मिठास हो। एक बार और अमेरिका वियतनाम और अफगानिस्तान में जाकर अपना अंजाम देख चुका है। बाद में बहुत कुछ गंवाकर वहां से भाग आया। ये ईरान है। यहां  के गांव वाले, युवाओं और बच्चों ने भी अब शस्त्रों से दोस्ती कर ली है। हथियार संभाल लिए है। अमेरिका के दो हैलिकोप्टर को मार गिराने वाला एक मामूली गडरिया है। इस गडरिए को तो युद्ध कला भी नही आती । सिर्फ  इतना जानता है कि ये हैलिकोप्टर  हमलावर अमेरिका के है।  जिस देश की जनता इतनी जुझारू और लड़ाका  हो ,  जिसके गडरिये अमेरिका जैसे देश के दो− दो आधुनिकतम  हैलिकोप्टर गिरा दें,उसे हराना संभव  नहीं।   </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्रों को अपनी ज़िम्मेदारी  समझनी होगी । उन्हें  युद्ध के उन्माद को रोकना होगा। नहीं रोका</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह दिन दूर नहीं जब </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इंसान</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">तो बचेगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन उसके भीतर की </span>'<span lang="hi" xml:lang="hi">इंसानियत</span>' <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरी तरह दफन हो चुकी होगी। हमें यह समझना होगा कि धरती पर सरहदें हमने खींची हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कुदरत ने नहीं। शांति की मेज़ पर बैठकर बात करना कमज़ोरी नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि सबसे बड़ी बहादुरी है। वक्त आ गया है कि हम "हथियारों की होड़" को छोड़कर "मानवता की जोड़" पर ध्यान दें। वरना इतिहास हमें उन लोगों के रूप में याद रखेगा ,जिनके पास सब कुछ था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस एक-दूसरे के लिए दया और प्रेम नहीं था।</span></p>]]>
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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 17:59:09 +0530</pubDate>
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