<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.swatantraprabhat.com/tag/69740/sustainable-agriculture-india" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Swatantra Prabhat RSS Feed Generator</generator>
                <title>Sustainable Agriculture India - Swatantra Prabhat</title>
                <link>https://www.swatantraprabhat.com/tag/69740/rss</link>
                <description>Sustainable Agriculture India RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>भारतीय कृषि एक अहम मोड़ पर: अब बदलने का समय</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">आज भारतीय खेती एक ऐसे दौर में खड़ी है, जहाँ बदलाव जरूरी हो गया है। मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा। कभी बारिश समय पर नहीं होती, कभी जरूरत से ज्यादा हो जाती है। तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। इन सबका सीधा असर खेती और किसानों की कमाई पर पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सिर्फ मौसम ही नहीं, हमारी कुछ खेती की आदतें भी परेशानी बढ़ा रही हैं। जैसे जरूरत से ज्यादा पानी इस्तेमाल करना, रासायनिक खादों पर ज्यादा निर्भर रहना और पराली जलाना। इससे मिट्टी कमजोर हो रही है और पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ रहा है। धीरे-धीरे इससे</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177724/indian-agriculture-is-at-a-critical-juncture-now-is-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/whatsapp-image-2026-04-30-at-8.20.18-pm-(1).jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज भारतीय खेती एक ऐसे दौर में खड़ी है, जहाँ बदलाव जरूरी हो गया है। मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा। कभी बारिश समय पर नहीं होती, कभी जरूरत से ज्यादा हो जाती है। तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। इन सबका सीधा असर खेती और किसानों की कमाई पर पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">सिर्फ मौसम ही नहीं, हमारी कुछ खेती की आदतें भी परेशानी बढ़ा रही हैं। जैसे जरूरत से ज्यादा पानी इस्तेमाल करना, रासायनिक खादों पर ज्यादा निर्भर रहना और पराली जलाना। इससे मिट्टी कमजोर हो रही है और पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ रहा है। धीरे-धीरे इससे फसल की पैदावार भी कम हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/whatsapp-image-2026-04-30-at-8.20.18-pm.jpeg" alt="भारतीय कृषि एक अहम मोड़ पर: अब बदलने का समय" width="527" height="351"></img></p>
<p style="text-align:justify;">भारत में बहुत बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। लेकिन यही क्षेत्र मौसम के बदलाव से सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। अगर मानसून कमजोर पड़ जाए या अचानक गर्मी बढ़ जाए, तो इसका असर सिर्फ खेत तक नहीं रहता—किसानों की आय, बाजार के दाम और पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में अब “जलवायु के हिसाब से खेती” अपनाना जरूरी हो गया है। इसका मतलब है पानी का सही इस्तेमाल, मौसम के अनुसार फसल चुनना, मिट्टी की सेहत बनाए रखना और पराली जलाने से बचना। ये छोटे-छोटे कदम आगे चलकर बड़ा फर्क ला सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अच्छी बात ये है कि इस दिशा में काम शुरू हो चुका है। कई संस्थाएं किसानों को नई तकनीकें सिखा रही हैं। सरकार भी कई योजनाओं के जरिए मदद कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत पानी बचाने पर जोर दिया जा रहा है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड से किसानों को पता चलता है कि खेत में किस तरह की खाद कितनी मात्रा में डालनी है। परंपरागत कृषि विकास योजना से जैविक खेती को बढ़ावा मिल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन मौसम के असर को कम करने पर काम करता है, और फसल बीमा योजना मुश्किल समय में किसानों को आर्थिक सहारा देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दिशा सही है, लेकिन काम को और तेजी से आगे बढ़ाने की जरूरत है। क्योंकि मौसम तेजी से बदल रहा है, तो हमें भी उतनी ही जल्दी कदम उठाने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">सीधी बात है—आज जो फैसले हम लेंगे, वही कल की खेती तय करेंगे। अगर अभी सही कदम उठाए गए, तो हम किसानों को मजबूत बना सकते हैं, खाने की सुरक्षा बनाए रख सकते हैं और गांव की अर्थव्यवस्था को बेहतर कर सकते हैं। अब समय है—किसानों का साथ देने का, पर्यावरण को बचाने का और सही दिशा में आगे बढ़ने का।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. नवाज़ अहमद खान<br />प्रोफेसर<br />आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/177724/indian-agriculture-is-at-a-critical-juncture-now-is-the</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/177724/indian-agriculture-is-at-a-critical-juncture-now-is-the</guid>
                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 20:52:22 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/whatsapp-image-2026-04-30-at-8.20.18-pm-%281%29.jpeg"                         length="165100"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ से बदली किसान की किस्मत</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर। </strong>उत्तर प्रदेश सरकार की ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना का असर अब गांवों में साफ दिखने लगा है। सरसौल ब्लॉक के पाली भोगीपुर गांव के प्रगतिशील किसान राम जीवन ने आधुनिक स्प्रिंकलर तकनीक अपनाकर न केवल अपनी आमदनी बढ़ाई है, बल्कि पानी और बिजली की बचत का भी उदाहरण पेश किया है। राम जीवन ने बताया कि पहले पारंपरिक सिंचाई पद्धति में काफी पानी बर्बाद हो जाता था, लेकिन अब स्प्रिंकलर प्रणाली से फसलों को जरूरत के अनुसार पानी मिल रहा है। इससे पानी की खपत में करीब 50 प्रतिशत तक कमी आई है और फसल की गुणवत्ता भी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/176242/farmers-fortunes-changed-with-per-drop-more-crop-up-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1001831608.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>कानपुर। </strong>उत्तर प्रदेश सरकार की ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ योजना का असर अब गांवों में साफ दिखने लगा है। सरसौल ब्लॉक के पाली भोगीपुर गांव के प्रगतिशील किसान राम जीवन ने आधुनिक स्प्रिंकलर तकनीक अपनाकर न केवल अपनी आमदनी बढ़ाई है, बल्कि पानी और बिजली की बचत का भी उदाहरण पेश किया है। राम जीवन ने बताया कि पहले पारंपरिक सिंचाई पद्धति में काफी पानी बर्बाद हो जाता था, लेकिन अब स्प्रिंकलर प्रणाली से फसलों को जरूरत के अनुसार पानी मिल रहा है। इससे पानी की खपत में करीब 50 प्रतिशत तक कमी आई है और फसल की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पहले जहां 8.5 बीघा खेत की सिंचाई के लिए 10 एचपी की मोटर घंटों चलानी पड़ती थी, अब वही काम 5 एचपी की मोटर से कम समय में पूरा हो रहा है। इससे बिजली खर्च में भी बड़ी बचत हुई है। स्प्रिंकलर के जरिए पानी सीधे पौधों तक पहुंचता है, जिससे कम पानी में अधिक क्षेत्र की सिंचाई संभव हो पा रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राम जीवन ने बताया कि इस सिस्टम को लगाने में सरकार की ओर से 90 प्रतिशत अनुदान मिला, जिससे लाखों रुपये की लागत वाला यह सिस्टम उन्हें मात्र 27 हजार रुपये में उपलब्ध हो गया। किसान की इस सफलता से क्षेत्र के अन्य किसानों में भी आधुनिक तकनीक अपनाने की रुचि बढ़ी है। यह पहल न केवल खेती को लाभकारी बना रही है, बल्कि गिरते भूजल स्तर को बचाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                            <category>किसान</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/176242/farmers-fortunes-changed-with-per-drop-more-crop-up-to</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/176242/farmers-fortunes-changed-with-per-drop-more-crop-up-to</guid>
                <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 19:14:46 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/1001831608.jpg"                         length="162023"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जलवायु-अनुकूल खेती : जब खेतों ने मौसम से हारना छोड़ दिया</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब आसमान आग उगलने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बादल कहर बनकर टूट पड़ें और धरती की दरारें किसान की हथेली से भी गहरी हो जाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब केवल फसल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरा जीवन उजड़ जाता है। बीते वर्षों में भारत के करोड़ों किसानों ने यही दर्द झेला है। </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">में करीब</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span>9.47 <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलियन हेक्टेयर</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फसल क्षेत्र सूखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाढ़ और लू जैसी चरम मौसम घटनाओं से प्रभावित हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे फसलों को भारी नुकसान हुआ। जहां कभी हरियाली लहराती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां निराशा का सन्नाटा छा गया। लेकिन इसी अंधेरे से एक नई उम्मीद उभरी है। जलवायु-अनुकूल खेती</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span>(<span lang="hi" xml:lang="hi">क्लाइमेट रेजिलिएंट फार्मिंग</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175383/climate-friendly-farming-when-fields-are-left-to-lose-to-the"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/124933457.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जब आसमान आग उगलने लगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बादल कहर बनकर टूट पड़ें और धरती की दरारें किसान की हथेली से भी गहरी हो जाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब केवल फसल नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरा जीवन उजड़ जाता है। बीते वर्षों में भारत के करोड़ों किसानों ने यही दर्द झेला है। </span>2025 <span lang="hi" xml:lang="hi">में करीब</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>9.47 <span lang="hi" xml:lang="hi">मिलियन हेक्टेयर</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">फसल क्षेत्र सूखा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाढ़ और लू जैसी चरम मौसम घटनाओं से प्रभावित हुआ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे फसलों को भारी नुकसान हुआ। जहां कभी हरियाली लहराती थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां निराशा का सन्नाटा छा गया। लेकिन इसी अंधेरे से एक नई उम्मीद उभरी है। जलवायु-अनुकूल खेती</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span>(<span lang="hi" xml:lang="hi">क्लाइमेट रेजिलिएंट फार्मिंग</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">अब केवल खेती का तरीका नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि किसान के भविष्य की सबसे मजबूत ढाल बन चुकी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रकृति से लड़कर नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसके साथ चलकर ही खेती सुरक्षित बनती है। वर्षों तक किसान एक खेत में केवल एक फसल बोते रहे। मौसम बिगड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो पूरी मेहनत एक झटके में खत्म हो गई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब खेतों में बदलाव दिख रहा है। गेहूं के साथ दालें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तिलहन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोटे अनाज और सब्जियां भी उगाई जा रही हैं। यदि गर्मी गेहूं को नुकसान पहुंचाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो दूसरी फसलें किसान की कमाई बचा लेती हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे मिट्टी की ताकत बनी रहती है और उत्पादन भी स्थिर रहता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में इस तरीके से फसल नुकसान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">काफी हद तक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">घटा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब किसान समझ रहे हैं— खेत में जितनी अधिक विविधता होगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उतनी ही अधिक सुरक्षा भी मिलेगी।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी बची रहे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तभी खेती की ताकत कायम रहेगी। वर्षों तक उपेक्षित यह मिट्टी रासायनिक उर्वरकों से कमजोर हो गई थी—नमी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उर्वरता और जीवन शक्ति खो गई थी। अब जलवायु-अनुकूल खेती ने इसे सुधारना शुरू किया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मिट्टी स्वास्थ्य पत्रक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ने किसानों को बताया कि किस खेत को किस पोषण की जरूरत है। गोबर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम्पोस्ट</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जैविक खाद और फसल अवशेषों से बनी खाद का प्रयोग तेजी से बढ़ा है। नतीजा साफ है—मिट्टी लंबे समय तक नमी रखती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कम बारिश में भी जड़ें सूखी नहीं होतीं। जैविक तत्व मिट्टी को इतना मजबूत बनाते हैं कि तेज धूप</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सूखा और अनियमित बारिश में भी फसल सुरक्षित रहती है। इसलिए आज मिट्टी केवल जमीन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह खेत की जीवित शक्ति और किसान की सबसे बड़ी सुरक्षा बन चुकी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां खेती बारिश पर निर्भर हो</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां पानी की हर बूंद अनमोल है। पहले एक हेक्टेयर खेत की सिंचाई में लगभग </span>10 <span lang="hi" xml:lang="hi">हजार लीटर पानी लगता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फिर भी फसल सुरक्षित नहीं रहती थी। अब ड्रिप और स्प्रिंकलर इरिगेशन ने यह तस्वीर बदल दी है—वही खेत अब केवल </span>4 <span lang="hi" xml:lang="hi">हजार लीटर पानी में सींचे जा रहे हैं। जलवायु-अनुकूल खेती हर बूंद बचाने की सीख देती है। वर्षा जल संचयन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खेत तालाब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलग्रहण और भूजल पुनर्भरण जैसे उपायों से सूखे क्षेत्रों में नई उम्मीद जगी है। किसान अब बारिश का पानी बहने नहीं देते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि कठिन दिनों के लिए सहेजते हैं। इससे पानी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिजली और सिंचाई की लागत घटती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और जहां पहले सूखा फसल नष्ट कर देता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां अब फसल बचने की संभावना दोगुनी हो गई है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">बदलते मौसम के सामने अब खेती ने हार मानना छोड़ दिया है। ऐसे गेहूं तैयार हुए हैं जो कम पानी में भी मजबूत रहते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ऐसे धान विकसित हुए हैं जो बाढ़ में भी नहीं डूबते</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और ऐसी दालें सामने आई हैं जो तेज गर्मी व लू झेल सकती हैं। इसी ने खेती में नई क्रांति पैदा की है। </span>2014 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>2024 <span lang="hi" xml:lang="hi">के बीच भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने</span> 2900 <span lang="hi" xml:lang="hi">फसल किस्में विकसित की हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनमें से </span>2661 <span lang="hi" xml:lang="hi">जलवायु-अनुकूल हैं। राष्ट्रीय जलवायु-अनुकूल कृषि नवाचार योजना के जरिए ये बीज गांव-गांव पहुंच रहे हैं। इनके साथ शून्य जुताई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">फसल अवशेष प्रबंधन और सामुदायिक बीज भंडार जैसी व्यवस्थाएं भी जुड़ रही हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पंजाब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर प्रदेश</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">के कई गांवों में इन उपायों से फसल हानि </span>25 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>35 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक घट चुकी है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब किसान अकेला नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरा गांव मौसम की मार से लड़ रहा है। जलवायु-अनुकूल खेती की सबसे बड़ी ताकत यही है। देश के </span>151 <span lang="hi" xml:lang="hi">जलवायु-संवेदनशील जिलों में </span>448 <span lang="hi" xml:lang="hi">जलवायु-अनुकूल गांव बन चुके हैं। किसान उत्पादक संगठन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्वयं सहायता समूह और ग्राम समितियां मिलकर मौसम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बाजार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बीज और पानी की जानकारी बांट रही हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि विज्ञान केंद्र</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">में महिलाएं और युवा प्रशिक्षण लेकर पशुपालन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मुर्गीपालन</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मधुमक्खी पालन और मत्स्यपालन जैसे काम भी कर रहे हैं। इससे आय के कई रास्ते खुल रहे हैं। एक फसल खराब हो जाए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब भी दूसरा काम परिवार को संभाले रखता है। यही कारण है कि यह मॉडल केवल खेती नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">गांव की नई ताकत बन गया है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब असर खेतों में साफ दिखाई दे रहा है। जहां पहले मौसम की मार से फसलों का नुकसान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">काफी अधिक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">होता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं जलवायु-अनुकूल खेती अपनाने वाले क्षेत्रों में नुकसान</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">काफी कम</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हो गया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">किसानों की आय </span>20 <span lang="hi" xml:lang="hi">से </span>30 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत तक बढ़ी है। मिट्टी फिर से उपजाऊ हो रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जलस्तर सुधर रहा है और खेतों में जैव विविधता लौट रही है। जिन खेतों से पक्षी और छोटे जीव गायब हो गए थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहां फिर जीवन दिखाई देने लगा है। मिट्टी की कार्बन रोकने की क्षमता भी बढ़ रही है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे पर्यावरण को लाभ मिल रहा है। </span>651 <span lang="hi" xml:lang="hi">जिलों में जलवायु जोखिम का अध्ययन हो चुका है और </span>310 <span lang="hi" xml:lang="hi">जिलों के लिए विशेष योजनाएं बन चुकी हैं। यह केवल खेती की जीत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आने वाले कल की सुरक्षा है।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अब समय आ गया है कि जलवायु-अनुकूल खेती कुछ इलाकों तक नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पूरे देश तक पहुंचे। हर खेत</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हर गांव और हर किसान इसका हिस्सा बने। सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कृषि वैज्ञानिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">किसान संगठन और स्थानीय संस्थाएं मिलकर काम करें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो भारत खेती का नया वैश्विक मॉडल बन सकता है। सबसे छोटे किसान तक बेहतर बीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पानी बचाने की तकनीक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता पहुंचनी चाहिए। जिस दिन देश का हर खेत मौसम की मार के सामने मजबूती से खड़ा होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उस दिन किसान केवल सुरक्षित नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">समृद्ध भी होगा। आने वाले वर्षों में यही मॉडल भारत को खाद्य सुरक्षा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था और विकसित भारत </span>2047 <span lang="hi" xml:lang="hi">की दिशा में सबसे आगे ले जाएगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रो. आरके जैन “अरिजीत”</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/175383/climate-friendly-farming-when-fields-are-left-to-lose-to-the</link>
                <guid>https://www.swatantraprabhat.com/article/175383/climate-friendly-farming-when-fields-are-left-to-lose-to-the</guid>
                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 17:50:36 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.swatantraprabhat.com/media/2026-04/124933457.webp"                         length="159592"                         type="image/webp"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        