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                <title>Justice JJ Munir Bench - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Justice JJ Munir Bench RSS Feed</description>
                
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                <title>दीवानी मामलों के लिए पुलिस के पास जाने की प्रवृत्ति कानून के शासन को कमज़ोर करती है</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात को 'परेशान करने वाला' बताया कि जनता दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और कलेक्टरों के पास जाती है, क्योंकि यह प्रवृत्ति कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करती है। ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दलजीत सिंह और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।उनकी याचिका में एक FIR को चुनौती दी</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175319/the-tendency-to-approach-the-police-for-civil-matters-undermines"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात को 'परेशान करने वाला' बताया कि जनता दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और कलेक्टरों के पास जाती है, क्योंकि यह प्रवृत्ति कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करती है। ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने दलजीत सिंह और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।उनकी याचिका में एक FIR को चुनौती दी गई, जो मूल रूप से एक व्यावसायिक विवाद से संबंधित थी। यह विवाद याचिकाकर्ताओं द्वारा अपने माल को अलग-अलग जगहों पर पहुंचाने के लिए किराए पर लिए गए वाहनों के भाड़े का भुगतान न करने को लेकर था।</p>
<p style="text-align:justify;">शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उस पर गोली चलाई गई, लेकिन गोली किसी को लगी नहीं। खंडपीठ ने गौर किया कि यह पहली नज़र में "दिखावटी आरोप" था, जिसे जान-बूझकर एक दीवानी विवाद को आपराधिक रंग देने के लिए गढ़ा गया।खंडपीठ ने टिप्पणी की, "यह बहुत परेशान करने वाली बात है कि समाज के हर तबके के लोग सभी प्रकार के दीवानी मामलों के समाधान के लिए पुलिस और ज़िलों के कलेक्टरों के पास जाने की ज़िद करते हैं, जबकि इन मामलों पर अधिकार क्षेत्र दीवानी अदालत का होता है। यह प्रवृत्ति, जिसे समाज के सभी वर्गों द्वारा बढ़ावा दिया जाता है, कानून के शासन की बुनियाद को कमज़ोर करने और ऐसे मामलों में समाधान के लिए उन गैर-कानूनी एजेंसियों को बढ़ावा देने की संभावना रखती है, जिनका उन मामलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होता।"</p>
<p style="text-align:justify;">इस पृष्ठभूमि में पहली नज़र में मामला बनता देख, अदालत ने याचिका स्वीकार कर ली और नोटिस जारी किए।खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दी और निर्देश दिया कि जब तक कोई अगला आदेश नहीं आ जाता, तब तक उन्हें BNS की धारा 109(1), 116(2) और 352 के तहत दर्ज FIR में गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।। अदालत ने मुरादाबाद के सीनियर पुलिस अधीक्षक से एक हलफनामा भी मांगा, जिसमें यह स्पष्टीकरण मांगा गया कि पुलिस ने यह FIR किस आधार पर दर्ज की। इस मामले को 15 अप्रैल को आदेश के लिए सूचीबद्ध किया गया।</p>]]>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 20:03:59 +0530</pubDate>
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                <title>गैर-जमानती वारंट पर IO को सस्पेंड करना भारी पड़ा: हाईकोर्ट ने बस्ती एसपी  को दी अवमानना की चेतावनी</title>
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                        <![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती के पुलिस अधीक्षक द्वारा एक जांच अधिकारी को निलंबित किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना करार दिया। बता दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह मामला उस समय सामने आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जांच अधिकारी ने आरोपियों की पेशी सुनिश्चित कराने के लिए गैर-जमानती वारंट प्राप्त किया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि एसपी द्वारा जारी निलंबन आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-2</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस्ती के आदेश की अवहेलना जैसा प्रतीत होता है। मजिस्ट्रेट ने जांच अधिकारी के आवेदन पर विचार कर वारंट जारी किया था।</span></p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175194/suspending-io-on-non-bailable-warrant-proved-costly-high-court-warns"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong><span lang="hi" xml:lang="hi">इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती के पुलिस अधीक्षक द्वारा एक जांच अधिकारी को निलंबित किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताते हुए इसे प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना करार दिया। बता दें</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह मामला उस समय सामने आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जब जांच अधिकारी ने आरोपियों की पेशी सुनिश्चित कराने के लिए गैर-जमानती वारंट प्राप्त किया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कहा कि एसपी द्वारा जारी निलंबन आदेश अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-2</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बस्ती के आदेश की अवहेलना जैसा प्रतीत होता है। मजिस्ट्रेट ने जांच अधिकारी के आवेदन पर विचार कर वारंट जारी किया था।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मामला रत्नेश कुमार उर्फ राजू शुक्ला की ओर से दायर आपराधिक रिट याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि जैसे ही जांच अधिकारी ने आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट के लिए आवेदन किया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे तुरंत निलंबित कर दिया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने पहले ही एसपी से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा था कि किन परिस्थितियों में यह कार्रवाई की गई और अब जांच कौन कर रहा है। हालांकि 2 अप्रैल को दाखिल हलफनामा अदालत को संतोषजनक नहीं लगा।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">याचिकाकर्ता की ओर से दाखिल अतिरिक्त हलफनामे में कहा गया कि जांच अधिकारी को इस आधार पर निलंबित किया गया कि उसने पर्याप्त साक्ष्य जुटाए बिना गैर-जमानती वारंट हासिल किया। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि गैर-जमानती वारंट जारी करना अदालत का विशेषाधिकार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि पुलिस अधीक्षक की राय का विषय।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अदालत ने कहा</span>, “<span lang="hi" xml:lang="hi">वारंट जारी करना अदालत का विवेकाधिकार है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि पुलिस अधीक्षक की राय पर निर्भर प्रक्रिया।” कोर्ट ने एसपी को एक सप्ताह के भीतर नया व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए पूछा कि जब वारंट अदालत ने अपने विवेक से जारी किया तो जांच अधिकारी पर बिना साक्ष्य वारंट लेने का आरोप कैसे लगाया गया।</span></p>
<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो एसपी के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है। मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल को निर्धारित की गई।</span></p>]]>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
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                <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 20:00:03 +0530</pubDate>
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