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                <title>child health concern school - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>अव्यवस्था की आग में झुलसता बचपन: टिकरा सामद के विद्यालय में गैस के बजाय चूल्हे पर बन रहा मिड-डे मील</title>
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                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ। </strong>उन्नाव जनपद के औरास ब्लॉक स्थित ग्राम पंचायत टिकरा सामद के एक उच्च प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर करती एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। जहां एक ओर सरकार डिजिटल शिक्षा और स्वच्छ भारत जैसे अभियानों का जोर-शोर से प्रचार कर रही है, वहीं दूसरी ओर इस विद्यालय में बच्चों का भविष्य धुएं और अव्यवस्था के बीच पक रहा है।</div>
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<div style="text-align:justify;">मामला विद्यालय में बनने वाले मिड-डे मील (MDM) से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, यहां बच्चों के लिए भोजन गैस चूल्हे पर नहीं, बल्कि लकड़ियों और गोबर के उपलों से जलने वाले पारंपरिक चूल्हों</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175023/childhood-is-burning-in-the-fire-of-chaos-in-tikra"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260403-wa0004.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>लखनऊ। </strong>उन्नाव जनपद के औरास ब्लॉक स्थित ग्राम पंचायत टिकरा सामद के एक उच्च प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर करती एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। जहां एक ओर सरकार डिजिटल शिक्षा और स्वच्छ भारत जैसे अभियानों का जोर-शोर से प्रचार कर रही है, वहीं दूसरी ओर इस विद्यालय में बच्चों का भविष्य धुएं और अव्यवस्था के बीच पक रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मामला विद्यालय में बनने वाले मिड-डे मील (MDM) से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, यहां बच्चों के लिए भोजन गैस चूल्हे पर नहीं, बल्कि लकड़ियों और गोबर के उपलों से जलने वाले पारंपरिक चूल्हों पर तैयार किया जा रहा है। यह स्थिति न केवल सरकारी दावों पर सवाल खड़े करती है, बल्कि बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विद्यालय में कार्यरत रसोइयों—मोती, सलोनी और बताशा—ने अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि पहले खाना गैस सिलेंडर पर बनाया जाता था, जिससे काम आसान होता था और समय की भी बचत होती थी। लेकिन अब गैस सिलेंडर उपलब्ध नहीं है, जिसके चलते उन्हें मजबूरी में चूल्हे का सहारा लेना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में बच्चों के लिए भोजन बनाना चूल्हे पर बेहद कठिन होता है और इससे निकलने वाला धुआं आंखों और फेफड़ों पर बुरा असर डाल रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रसोइयों का आरोप है कि मिड-डे मील के लिए गैस सिलेंडर का बजट सरकार द्वारा जारी किया जाता है और इसकी राशि सीधे ग्राम प्रधान के खाते में भेजी जाती है। इसके बावजूद विद्यालय तक सिलेंडर नहीं पहुंच रहा है, जिससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं कि आखिर आवंटित धनराशि कहां जा रही है।इस पूरी स्थिति का असर सीधे बच्चों पर पड़ रहा है। चूल्हे से उठने वाला जहरीला धुआं विद्यालय परिसर में फैल जाता है, जिससे छोटे-छोटे बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साथ ही, पढ़ाई का माहौल भी प्रभावित हो रहा है, क्योंकि धुएं और अव्यवस्था के बीच पढ़ाई करना बच्चों के लिए आसान नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बच्चे विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करेंगे या फिर इस तरह की लापरवाही और अव्यवस्था का शिकार बनते रहेंगे? ग्राम प्रधान और संबंधित अधिकारियों की इस उदासीनता पर आखिर कौन कार्रवाई करेगा? अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर मामले का संज्ञान कब लेता है और विद्यालय में दोबारा गैस सिलेंडर की व्यवस्था कब बहाल होती है। जब तक जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते, तब तक ऐसे ही हालात में बच्चों का बचपन और भविष्य दोनों प्रभावित होते रहेंगे।</div>]]>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 20:20:02 +0530</pubDate>
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