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                <title>ALLAHABAD HIGH COURT - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>ALLAHABAD HIGH COURT RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>नोएडा हिंसा मामला: 'हाईकोर्ट जाइए, यहां पहले ही 93000 केस लंबित'</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नोएडा में 13 अप्रैल को हुए मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार एक छात्रा को जमानत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने आकृति चौधरी की ओर से पेश वकील से कहा कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में जाएं। पीठ ने कहा, आप हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? हर कोई अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करके यहां आता है। सुप्रीम कोर्ट में 93 हजार मामले पहले से ही  लंबित हैं। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">आकृति चौधरी के वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178831/noida-violence-case-go-to-high-court-already-93000-cases"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/noida-1778235469797.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नोएडा में 13 अप्रैल को हुए मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार एक छात्रा को जमानत देने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने आकृति चौधरी की ओर से पेश वकील से कहा कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में जाएं। पीठ ने कहा, आप हाईकोर्ट क्यों नहीं जाते? हर कोई अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर करके यहां आता है। सुप्रीम कोर्ट में 93 हजार मामले पहले से ही  लंबित हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आकृति चौधरी के वकील ने अदालत को बताया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के कारण नहीं बताए और जमानत की मांग की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि आकृति चौधरी दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा हैं। शीर्ष कोर्ट ने केशव आनंद नाम के व्यक्ति की याचिका पर पुलिस अधिकारियों को नोटिस भी जारी किया, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस पर प्रताड़ना का आरोप लगाया गया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नोएडा की एक कोर्ट ने पहले तीन महिलाओं आकृति चौधरी, मनीषा चौहान और सृष्टि गुप्ता की शर्तों के साथ पुलिस रिमांड की अनुमति दी थी। इन पर 13 अप्रैल के औद्योगिक मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने का आरोप है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि जांच के दौरान उनके वकीलों को मौजूद रहने की अनुमति होगी। आकृति चौधरी और सृष्टि गुप्ता दोनों दिल्ली की रहने वाली हैं और उनकी उम्र 20 के आसपास है।चौधरी ने दौलत राम कॉलेज से इतिहास में स्नातकोत्तर किया है, जबकि मनीषा नोएडा की एक औद्योगिक इकाई में काम करती हैं।पुलिस ने हिरासत के लिए दायर आवेदन में कहा था कि आरोपियों के घर से अहम साक्ष्य मिलने की पूरी संभावना है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नोएडा में पिछले महीने फैक्टरी मजदूरों का विरोध प्रदर्शन वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हुआ था। अधिकारियों के अनुसार, कई औद्योगिक इकाइयों के मजदूर लंबे समय से वेतन संशोधन की मांग को लेकर इकट्ठा हुए और नारेबाजी की। हालांकि, यह प्रदर्शन बाद में हिंसक हो गया क्योंकि कुछ लोगों ने कथित तौर पर संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, पत्थर फेंके और एक वाहन में आग लगा दी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 09 May 2026 22:22:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नाबालिग स्टूडेंट को बुर्का पहनाने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव के आरोपी स्टूडेंट को इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली अग्रिम जमानत</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद।हाईकोर्ट ने स्कूली स्टूडेंट को अग्रिम जमानत दी, जिस पर आरोप है कि उसने नाबालिग स्टूडेंट का कथित रूप से ब्रेनवॉश कर उसे बुर्का पहनने और इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने आरोपी स्टूडेंट मालिश्का उर्फ मालिश्का फातमा को राहत देते हुए कहा कि पीड़िता के बयान के अतिरिक्त रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया स्थापित हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">आरोपी के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया गया। FIR पीड़िता</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178545/student-accused-of-forcing-minor-student-to-wear-burqa-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/download2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद।हाईकोर्ट ने स्कूली स्टूडेंट को अग्रिम जमानत दी, जिस पर आरोप है कि उसने नाबालिग स्टूडेंट का कथित रूप से ब्रेनवॉश कर उसे बुर्का पहनने और इस्लाम धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। जस्टिस अवनीश सक्सेना की पीठ ने आरोपी स्टूडेंट मालिश्का उर्फ मालिश्का फातमा को राहत देते हुए कहा कि पीड़िता के बयान के अतिरिक्त रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे आरोपी की संलिप्तता प्रथम दृष्टया स्थापित हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">आरोपी के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया गया। FIR पीड़िता के भाई ने दर्ज कराई। उसमें आरोप लगाया गया कि आरोपी ने उसकी नाबालिग बहन का धर्म परिवर्तन कराने के उद्देश्य से उसका ब्रेनवॉश किया। यह भी कहा गया कि 20 दिसंबर 2025 को उसे जबरन बुर्का दिया गया और लगातार धर्म बदलने का दबाव बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि पीड़िता के बयान से स्पष्ट है कि उस पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला जा रहा था। FIR दर्ज करने में देरी के संबंध में यह दलील दी गई कि पीड़िता आरोपी के प्रभाव में थी, इसलिए जानकारी मिलने में समय लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं आरोपी की ओर से कहा गया कि वह पीड़िता से पहले से उसी विद्यालय में पढ़ रही थी और उसके खिलाफ किसी अन्य छात्रा को धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने की कोई शिकायत नहीं है। अदालत को यह भी बताया गया कि मामले के मुख्य आरोप सह-अभियुक्त अलीना के खिलाफ हैं, जिसे हाईकोर्ट की समन्वय पीठ पहले ही अग्रिम जमानत दे चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने पाया कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और पीड़िता के बयान के अलावा उसके खिलाफ अन्य स्वतंत्र साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। साथ ही अदालत ने माना कि आरोपी के फरार होने की संभावना कम है तथा उसने जांच और ट्रायल में सहयोग का आश्वासन दिया है। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी स्टूडेंट को अग्रिम जमानत दी।।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:07:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तत्कालीन BJP MLA आरसी यादव के खिलाफ 2012 के दंगा मामले को वापस लेने की हाईकोर्ट ने दी अनुमति</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें राज्य सरकार के उस आवेदन को खारिज किया गया था, जिसमें 2012 की मूर्ति विसर्जन दंगा घटना के संबंध में BJP विधायक (रुदौली से) राम चंद्र यादव के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने की मांग की गई थी। मुकदमा वापस लेने के राज्य का अनुरोध स्वीकार करते हुए जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का आवेदन "रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद सद्भावना में" दायर किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश विधायक</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178543/high-court-gives-permission-to-withdraw-2012-riots-case-against"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hindi-divas1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें राज्य सरकार के उस आवेदन को खारिज किया गया था, जिसमें 2012 की मूर्ति विसर्जन दंगा घटना के संबंध में BJP विधायक (रुदौली से) राम चंद्र यादव के खिलाफ आपराधिक मुकदमा वापस लेने की मांग की गई थी। मुकदमा वापस लेने के राज्य का अनुरोध स्वीकार करते हुए जस्टिस राजीव सिंह की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि ट्रायल कोर्ट के समक्ष पब्लिक प्रॉसिक्यूटर का आवेदन "रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद सद्भावना में" दायर किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश विधायक यादव द्वारा दायर CrPC की धारा 482 के तहत याचिका और उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया। संक्षेप में मामला अभियोजन पक्ष के मूल मामले के अनुसार, 24 अक्टूबर, 2012 को मूर्तियां विसर्जन के लिए ले जा रहे कुछ ट्रैक्टरों के कारण रुदौली पुलिस स्टेशन के सामने ट्रैफिक जाम हो गया। हालांकि, पुलिस ने ड्राइवरों को आगे बढ़ने का निर्देश दिया, लेकिन उन्होंने इसका पालन नहीं किया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह दावा किया गया कि आवेदक उस समय स्थानीय विधायक थे। उन्होंने उन्हें निर्देश दिया था कि वे मूर्तियों को वहीं रोककर रखें, जब तक कि वह पुलिस स्टेशन के सामने न पहुंच जाएं। इसके कारण, घटनास्थल पर भारी भीड़ जमा हो गई। इसके बाद जब विधायक यादव घटनास्थल पर पहुंचे तो उन्होंने पुलिस को बताया कि जब श्रद्धालु एक मस्जिद के पास से गुजर रहे थे, तो दूसरे समुदाय का एक लड़का गलती से रंग से सराबोर हो गया। कथित तौर पर इसके कारण गाली-गलौज और झगड़ा हुआ, जिसके दौरान एक मूर्ति भी टूट गई।</p>
<p style="text-align:justify;">एफआईआर  में आरोप लगाया गया कि आवेदक ने भड़काऊ बयान दिए। यह मांग की कि जुलूस आगे बढ़ने से पहले दोषियों को दंडित किया जाए। हालांकि, बाद में उनकी सलाह पर ट्रैक्टरों की आवाजाही शुरू हो गई, लेकिन तब तक गाँव में लगभग 2,000 से 3,000 लोग जमा हो चुके थे। इसके बाद आवेदक की कथित उकसाहट पर 250-300 लोग उस गाँव की ओर बढ़ने लगे, जहां दूसरे समुदाय के लोगों के साथ विवाद हुआ था।</p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;"> </p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआत में, बेंच ने CrPC की धारा 321 के प्रावधानों के साथ-साथ इस प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों की जांच करते हुए पाया कि मुकदमा वापस लेने की अनुमति देने के लिए अंतिम मार्गदर्शक विचार हमेशा न्याय प्रशासन का हित ही होना चाहिए। बंसी लाल बनाम चंदन लाल और शिवनंदन पासवान बनाम बिहार राज्य जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एक पब्लिक प्रॉसिक्यूटर को स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए और किसी गलत मकसद से न्याय की सामान्य प्रक्रिया में दखल नहीं देना चाहिए। CrPC की धारा 482 के तहत अर्जी, मुकदमा वापस लेने की अर्जी, और साथ ही आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 May 2026 22:04:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अवैध जब्ती और जल्दबाज़ी में नीलामी पर राज्य सरकार को झटका</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाRकोर्ट ने कथित गौ-तस्करी के अप्रमाणित आरोप में वाहन जब्त कर जल्दबाज़ी में नीलाम करने पर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए वाहन स्वामी को कम-से-कम 2 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने जब्ती और ज़ब्ती से जुड़े आदेश रद्द करते हुए कहा कि राज्य की कार्रवाई मनमानी, अवैध और कानून के विपरीत थी। जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि यदि राज्य सरकार वाहन वापस नहीं कर सकती तो उसे वाहन स्वामी को अतिरिक्त 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के रूप में देने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार 8 सितंबर 2024 को चंदौली जिले</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178295/state-government-shocked-by-illegal-seizure-and-hasty-auction"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाRकोर्ट ने कथित गौ-तस्करी के अप्रमाणित आरोप में वाहन जब्त कर जल्दबाज़ी में नीलाम करने पर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए वाहन स्वामी को कम-से-कम 2 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने जब्ती और ज़ब्ती से जुड़े आदेश रद्द करते हुए कहा कि राज्य की कार्रवाई मनमानी, अवैध और कानून के विपरीत थी। जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि यदि राज्य सरकार वाहन वापस नहीं कर सकती तो उसे वाहन स्वामी को अतिरिक्त 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के रूप में देने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार 8 सितंबर 2024 को चंदौली जिले में पुलिस ने याचिकाकर्ता चंद्रभान कुमार के व्यावसायिक वाहन को कथित गौ-तस्करी की सूचना पर रोका था। वाहन से 10 जीवित गोवंश बरामद होने का दावा करते हुए पुलिस ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 तथा पशु क्रूरता निवारण कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">जिलाधिकारी ने यह कहते हुए वाहन जब्त कर लिया कि गोवंश को वध के लिए बिहार ले जाया जा रहा था, जबकि वाहन बिहार सीमा के निकट पकड़ा गया। बाद में आयुक्त ने भी जब्ती आदेश बरकरार रखा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी दौरान, अपील लंबित रहते हुए प्रशासन ने वाहन की नीलामी मात्र 85 हजार रुपये में कर दी जबकि याचिकाकर्ता के अनुसार वाहन का बाजार मूल्य 7 लाख रुपये से अधिक था।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश के भीतर गोवंश के परिवहन के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं है और केवल बिहार सीमा के निकट वाहन पकड़े जाने से यह मान लेना कि पशुओं को वध हेतु बाहर ले जाया जा रहा था उचित नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने टिप्पणी की, “संदेह चाहे कितना भी प्रबल हो, वह कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।” अदालत ने यह भी कहा कि कार्यवाही लंबित रहते वाहन की नीलामी करना और वह भी इतनी कम कीमत पर प्रशासन की स्पष्ट मनमानी को दर्शाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने माना कि इससे याचिकाकर्ता को गंभीर आर्थिक नुकसान हुआ, क्योंकि वाहन उसकी आजीविका का मुख्य साधन है। पशुओं के प्रति क्रूरता के आरोपों पर भी अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने ऐसा कोई ठोस निष्कर्ष दर्ज नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि पशुओं को ऐसी शारीरिक चोट पहुंची थी, जिससे उनके जीवन को खतरा है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार जब्ती की तारीख से वाहन वापसी तक 15 हजार रुपये प्रतिमाह आर्थिक क्षति के रूप में और 20 हजार रुपये मानसिक पीड़ा व उत्पीड़न के लिए अदा करे।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि वाहन वापस नहीं किया जाता है तो सरकार को 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के अतिरिक्त अधिकतम 12 माह की अवधि तक मासिक क्षतिपूर्ति भी देनी होगी। अदालत ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह यह राशि उन अधिकारियों से वसूल सकती है, जिन्होंने मनमानी कार्रवाई को मंजूरी दी थी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 22:56:38 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मौजूद ही नहीं जो कानून, उसी के तहत दे दिया तलाक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक डिक्री रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि अदालत ने ऐसे कानून के तहत तलाक दिया, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के फैसले को अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक बताते हुए उसकी कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने यह आदेश पति की अपील पर पारित किया, जिसने जनवरी 2026 में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए तलाक आदेश को चुनौती दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में पत्नी ने अपनी याचिका मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178293/divorced-under-a-law-that-does-not-exist"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/allahabad_high_court_1733678481057_1777910120637.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बांदा फैमिली कोर्ट द्वारा पारित तलाक डिक्री रद्द करते हुए कड़ी टिप्पणी की कि अदालत ने ऐसे कानून के तहत तलाक दिया, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के फैसले को अत्यंत लापरवाह और अनौपचारिक बताते हुए उसकी कार्यप्रणाली पर नाराज़गी जताई।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सारन की खंडपीठ ने यह आदेश पति की अपील पर पारित किया, जिसने जनवरी 2026 में फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए तलाक आदेश को चुनौती दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">मामले में पत्नी ने अपनी याचिका मुस्लिम स्त्री विवाह विच्छेद अधिनियम, 1986 के तहत दायर की थी जबकि ऐसा कोई कानून अस्तित्व में ही नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि संभवतः याचिका में मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 का उल्लेख होना चाहिए, जो मुस्लिम महिलाओं को तलाक मांगने का अधिकार देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा कि केवल याचिका में गलत कानून का उल्लेख होने से आदेश स्वतः अवैध नहीं हो जाता, यदि ट्रायल कोर्ट सही कानून के तहत अधिकार प्रयोग करे। हालांकि, इस मामले में फैमिली कोर्ट ने स्वयं अपने पूरे निर्णय में बार-बार उसी गैर-मौजूद कानून का उल्लेख किया और उसी के तहत राहत भी प्रदान की।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा, “यह सुनिश्चित करना अदालत का दायित्व है कि जिस कानून का वह उल्लेख कर रही है, वह वास्तव में अस्तित्व में हो। केवल याचिका में हुई त्रुटि ट्रायल कोर्ट को वही गलती दोहराने का अधिकार नहीं देती।”</p>
<p style="text-align:justify;">खंडपीठ ने कहा कि अस्तित्वहीन कानून के आधार पर दिया गया निर्णय विधि और तथ्य दोनों की दृष्टि से दोषपूर्ण है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए मामला पुनः उसी अदालत को भेज दिया और निर्देश दिया कि वह सही कानूनी प्रावधानों के तहत नया निर्णय पारित करे।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने स्पष्ट किया कि नए सिरे से पूरा ट्रायल नहीं होगा और फैमिली कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों व रिकॉर्ड के आधार पर ही निर्णय दे सकती है, जब तक उसे अतिरिक्त साक्ष्य की आवश्यकता न लगे। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को तीन माह के भीतर नया फैसला देने का निर्देश दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 22:54:31 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मस्जिद ध्वस्तीकरण नोटिस पर हाईकोर्ट सख्त</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में मस्जिद ध्वस्तीकरण नोटिस को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने फिलहाल मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देते हुए प्रशासन को किसी भी प्रकार की कार्रवाई करने से रोक दिया है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह याचिका वक्फ मस्जिद कमेटी की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी ध्वस्तीकरण नोटिस को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया गया और यह कार्रवाई मनमानी तथा अवैध है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान कोर्ट ने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178183/high-court-strict-on-mosque-demolition-notice"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20260504-wa0086-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाईकोर्ट में मस्जिद ध्वस्तीकरण नोटिस को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने फिलहाल मामले में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देते हुए प्रशासन को किसी भी प्रकार की कार्रवाई करने से रोक दिया है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह याचिका वक्फ मस्जिद कमेटी की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी ध्वस्तीकरण नोटिस को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया गया और यह कार्रवाई मनमानी तथा अवैध है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को गंभीरता से सुना। अदालत ने प्रशासन से यह स्पष्ट करने को कहा कि नोटिस जारी करने से पहले किन कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया। साथ ही, याचिकाकर्ताओं को भी अपने पक्ष में ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया, जिससे संबंधित स्थल पर किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या प्रशासनिक कार्रवाई पर फिलहाल रोक लग गई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 15 मई को निर्धारित की है। उस दिन दोनों पक्षों को विस्तृत रूप से अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया है। इस आदेश के बाद फिलहाल क्षेत्र में स्थिति शांत बनी हुई है, जबकि दोनों पक्ष अगली सुनवाई की तैयारी में जुट गए हैं।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 May 2026 22:06:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>अपमान की मंशा के बिना जाति से बुलाना अपराध नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के एक मामले में साफ तौर पर कहा है कि किसी को अपमानित करने की मंशा के बिना जाति से बुलाना एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस प्रकार के केस को जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप में एससी-एसटी एक्ट के अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं है। अभियोजन का दायित्व है कि पहली नजर में सबूतों के आधार पर अपराध होना साबित करे। इसी के साथ कोर्ट ने याची के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177978/calling-by-caste-without-intent-to-insult-is-not-a"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के एक मामले में साफ तौर पर कहा है कि किसी को अपमानित करने की मंशा के बिना जाति से बुलाना एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस प्रकार के केस को जारी रखना न्याय प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि मामले में लगाए गए आरोप में एससी-एसटी एक्ट के अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं है। अभियोजन का दायित्व है कि पहली नजर में सबूतों के आधार पर अपराध होना साबित करे। इसी के साथ कोर्ट ने याची के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। मारपीट और गाली-गलौज के आरोप में ही मामले में अब केस चलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इलाहाबाद हाई कोर्ट की ओर से अमय पांडेय एवं तीन अन्य की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश जारी किया गया है। हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह ने यह आदेश दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">याचियों की ओर से वकील गणेश शंकर श्रीवास्तव एवं अश्वनी कुमार ने अपनी बहस में कहा कि मामले में अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज किया गया था।एफआईआर में कहीं भी जाति को लेकर अपराध का आरोप नहीं था। बाद में सीआरपीसी की धारा 161 के बयान में कहानी जोड़ी गई।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह सिद्धार्थ नगर के अमय पांडेय के साथ ही अन्य तीन की अपील पर सुनवाई कर रहे थे. उन्होंने सभी के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी. लेकिन कोर्ट ने ये साफ कर दुया कि गाली-गलौज और मारपीट से जुड़े आरोपों में आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 22:45:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सार्वजनिक जमीन पर नमाज या बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि सार्वजनिक भूमि पर नमाज अदा करने या बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन करने का कोई अधिकार नहीं है. अदालत ने कहा कि संवैधानिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के अधिकारों के अधीन है. कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के संभल जिले के इकोना गांव में एक भूमि पर नमाज पढ़ने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए की.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने एक व्यक्ति आसीन द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी. याचिकाकर्ता का दावा था कि</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177976/allahabad-high-court-has-no-right-to-hold-namaz-or"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/images.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि सार्वजनिक भूमि पर नमाज अदा करने या बड़े पैमाने पर धार्मिक आयोजन करने का कोई अधिकार नहीं है. अदालत ने कहा कि संवैधानिक रूप से धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के अधिकारों के अधीन है. कोर्ट ने यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश के संभल जिले के इकोना गांव में एक भूमि पर नमाज पढ़ने की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए की.</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस गरिमा प्रसाद और जस्टिस सरल श्रीवास्तव की डिवीजन बेंच ने एक व्यक्ति आसीन द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी. याचिकाकर्ता का दावा था कि भूमि उसकी निजी संपत्ति है और वह वहां प्रार्थना करने के लिए अधिकारियों से सुरक्षा चाहता है. याचिकाकर्ता के अनुसार, 16 जून 2023 को दर्ज गिफ्ट डीड के माध्यम से भूमि उसके स्वामित्व में है.</p>
<p style="text-align:justify;">उसने तर्क दिया कि निजी संपत्ति पर नमाज पढ़ने के लिए किसी पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं है और इस पर रोक लगाना उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. उत्तर प्रदेश सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में यह भूमि आबादी भूमि के रूप में दर्ज है, जो सार्वजनिक उपयोग के लिए है. सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता ने कानूनी स्वामित्व साबित नहीं किया. गिफ्ट डीड में भूमि की स्पष्ट पहचान नहीं दी गई है और केवल अस्पष्ट सीमा विवरण दिए गए हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने अदालत को बताया कि उस जगह पर परंपरागत रूप से केवल ईद के मौके पर नमाज पढ़ी जाती रही है. किसी भी रिवाज पर रोक नहीं लगाई गई है. लेकिन याचिकाकर्ता गांव के अंदर और बाहर से लोगों को बुलाकर नियमित सामूहिक नमाज शुरू करने की कोशिश कर रहा है, जिससे स्थानीय सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है.</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, लेकिन यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है. सार्वजनिक भूमि का उपयोग आम लोगों के लिए है और इसे बार-बार धार्मिक गतिविधियों के लिए हड़पने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे आवागमन और नागरिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने निजी पूजा और संगठित धार्मिक सभाओं के बीच अंतर स्पष्ट किया. घर के अंदर या सीमित निजी जगह पर व्यक्तिगत प्रार्थना पूरी तरह संरक्षित है, लेकिन जब यह संगठित हो जाती है और बड़ी संख्या में लोग शामिल होने लगते हैं, तो यह सार्वजनिक चरित्र ग्रहण कर लेती है और राज्य सरकार द्वारा नियंत्रित की जा सकती है.</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों को वास्तविक उपद्रव होने का इंतजार करने की जरूरत नहीं है. यदि कोई गतिविधि सार्वजनिक व्यवस्था या सांप्रदायिक सद्भाव को प्रभावित करने की संभावना रखती है, तो वे निवारक कार्रवाई कर सकते हैं. चूंकि याचिकाकर्ता स्वामित्व साबित करने में असफल रहा और भूमि सार्वजनिक श्रेणी में ही दर्ज रही, इसलिए अदालत ने याचिका खारिज कर दी.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 22:43:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>महाकुंभ भगदड़: हाईकोर्ट ने कहा—मुआवजा दावों का फैसला 30 दिन में जिला प्रशासन करे, आयोग नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong></span>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 के महाकुंभ मेला भगदड़ मामले में स्पष्ट किया है कि पीड़ितों को अनुग्रह (ex gratia) मुआवजा देने के दावों का निपटारा राज्य द्वारा गठित न्यायिक जांच आयोग नहीं, बल्कि जिला प्रशासन और मेला प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा, और यह प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ संजय कुमार शर्मा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 29 जनवरी 2025 (मौनी अमावस्या) को हुई भगदड़ में उनके रिश्तेदार की मौत पर मुआवजा मांगा गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने न्यायिक जांच आयोग के सचिव</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177739/mahakumbh-stampede-high-court-said-%E2%80%93-compensation-claims-should-be"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court-11.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span style="font-family:mangal, serif;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong></span>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जनवरी 2025 के महाकुंभ मेला भगदड़ मामले में स्पष्ट किया है कि पीड़ितों को अनुग्रह (ex gratia) मुआवजा देने के दावों का निपटारा राज्य द्वारा गठित न्यायिक जांच आयोग नहीं, बल्कि जिला प्रशासन और मेला प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा, और यह प्रक्रिया 30 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस सत्य वीर सिंह की खंडपीठ संजय कुमार शर्मा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 29 जनवरी 2025 (मौनी अमावस्या) को हुई भगदड़ में उनके रिश्तेदार की मौत पर मुआवजा मांगा गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने न्यायिक जांच आयोग के सचिव द्वारा दाखिल हलफनामे का अवलोकन करते हुए कहा कि मुआवजा दावों का निपटारा करना आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। आयोग का कार्य केवल घटना के कारणों और परिस्थितियों की जांच करना, भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के सुझाव देना और प्रशासनिक समन्वय की समीक्षा करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने यह भी नोट किया कि राज्य सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल मनीष गोयल ने भगदड़ की घटना से इनकार नहीं किया और कुछ मृतकों के आश्रितों को पहले ही मुआवजा दिए जाने की बात सामने आई। ऐसे में आयोग द्वारा यह जांच करना कि भगदड़ हुई या नहीं, आवश्यक नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच में मतभेद प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए अदालत ने निर्देश दिए कि सभी मुआवजा दावे जिला प्रशासन/मेलाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किए जाएं, जहां प्रत्येक मामले में मृत्यु या क्षति के तथ्यों का सत्यापन किया जाएगा। पुलिस की इनक्वेस्ट रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को, जब तक विपरीत साक्ष्य न हो, प्रमाणिक माना जाएगा। साथ ही, मेलाधिकारी को प्रत्येक दावे पर 30 दिनों के भीतर अंतिम निर्णय लेना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान मामले में अदालत ने पाया कि मृतक की इनक्वेस्ट और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट उपलब्ध हैं और विवादित नहीं हैं। इसलिए कोर्ट ने मेलाधिकारी को तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने और 7 मई तक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 23:06:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने थारू समुदाय को दी राहत, कहा- वन अधिकार अधिनियम मौजूदा अधिकारों को मान्यता देता है</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि अधिकारी वन अधिकार अधिनियम, 2006 के लागू होने से पहले जारी किए गए अदालती आदेशों पर आँख मूंदकर भरोसा करके जंगल में रहने वालों के मौजूदा कानूनी अधिकारों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।  जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने इस तरह लखीमपुर की ज़िला स्तरीय समिति द्वारा 2021 में पारित आदेश रद्द किया। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">इस आदेश में समिति ने 'थारू' समुदाय के 107 सदस्यों के वन अधिकारों - विशेष रूप से अपनी आजीविका के लिए छोटे वन उत्पादों को इकट्ठा करने और उनका उपयोग करने</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177159/allahabad-high-court-gave-relief-to-tharu-community-and-said"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(2)7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि अधिकारी वन अधिकार अधिनियम, 2006 के लागू होने से पहले जारी किए गए अदालती आदेशों पर आँख मूंदकर भरोसा करके जंगल में रहने वालों के मौजूदा कानूनी अधिकारों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।  जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने इस तरह लखीमपुर की ज़िला स्तरीय समिति द्वारा 2021 में पारित आदेश रद्द किया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस आदेश में समिति ने 'थारू' समुदाय के 107 सदस्यों के वन अधिकारों - विशेष रूप से अपनी आजीविका के लिए छोटे वन उत्पादों को इकट्ठा करने और उनका उपयोग करने के अधिकार - के दावों को अंतिम रूप देने से इनकार किया था।  संक्षेप में कहें तो अपने आदेश में अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) नियम, 2007 के तहत गठित समिति ने याचिकाकर्ताओं के दावों को खारिज करने के लिए, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित एक अंतरिम आदेश पर भरोसा किया था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों और पारंपरिक वन निवासियों के लाभ के लिए बनाया गया। उन्होंने दलील दी कि अधिनियम की धारा 3 के तहत उनके अधिकारों में गाँव की सीमाओं के भीतर या बाहर पारंपरिक रूप से इकट्ठा किए जाने वाले छोटे वन उत्पादों का स्वामित्व, उन तक पहुंच और उनका उपयोग शामिल है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस संबंध में उन्होंने जनजातीय मामलों के मंत्रालय के 2013 के सर्कुलर का हवाला दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया कि 2006 का अधिनियम, जो बाद में बना कानून है, पिछली तारीख के सभी अदालती फैसलों या आदेशों को रद्द करता है।  बेंच ने उनके रुख में औचित्य पाया और कहा कि 2006 के अधिनियम का उद्देश्य जंगल में रहने वाली इन अनुसूचित जनजातियों को जंगल और वन भूमि पर उनके कब्ज़े को मान्यता देना और उन्हें सौंपना है, साथ ही उनकी आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अधिनियम की धारा 4 की शुरुआत 'नॉन-ऑब्स्टैन्टे' (किसी अन्य कानून के होते हुए भी प्रभावी) खंड से होती है। इसका अर्थ है कि केंद्र सरकार इन अधिकारों को मान्यता देती है और उन्हें सौंपती है, भले ही उस समय लागू किसी अन्य कानून में इसके विपरीत कुछ भी कहा गया हो। इस संबंध में कोर्ट ने यह साफ़ किया कि इस एक्ट के लागू होने से विधायिका ने इन जंगल में रहने वालों के लिए कोई नए अधिकार नहीं बनाए; बल्कि इसने इन लोगों के पहले से मौजूद अधिकारों और कब्ज़े को मान्यता दी थी, जो अलग-अलग कारणों से पारंपरिक रूप से जंगल में अपने रहने की इस जगह तक ही सीमित थे। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने विवादित आदेश में कमी पाई। बेंच ने कहा कि इस आदेश में 2006 के एक्ट के संबंधित प्रावधानों को ध्यान में नहीं रखा गया। इसमें सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के उस अंतरिम आदेश पर विचार किया गया, जो 2000 में यानी एक्ट के लागू होने से पहले पारित किया गया। इसी के मद्देनज़र, विवादित आदेश रद्द किया गया। साथ ही अधिकारियों को यह निर्देश दिया गया कि वे संबंधित व्यक्तियों को सुनवाई का अवसर दें।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 21:31:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>NCLT आदेश पर हाईकोर्ट की रोक, इलाहाबाद में दाखिल मामलों की जांच अब वहीं होगी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NCLT के प्रधान पीठ नई दिल्ली के उस आदेश पर आंशिक रोक लगाई, जिसमें इलाहाबाद पीठ में दाखिल याचिकाओं और आवेदनों की संयुक्त जांच का निर्देश दिया गया था।  जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने केंद्र सरकार के वकील द्वारा निर्देश लेने के लिए चार सप्ताह का समय मांगे जाने के बीच यह स्पष्ट किया कि इलाहाबाद में दाखिल याचिकाओं की जांच केवल वहीं की रजिस्ट्री द्वारा की जाएगी। यह मामला कंपनी लॉ बार एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">याचिका में 27 फरवरी, 2026 को जारी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177157/high-courts-stay-on-nclt-order-investigation-of-cases-filed"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/669281-750x450669236-nclt-allahabad-hc-1.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong> ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NCLT के प्रधान पीठ नई दिल्ली के उस आदेश पर आंशिक रोक लगाई, जिसमें इलाहाबाद पीठ में दाखिल याचिकाओं और आवेदनों की संयुक्त जांच का निर्देश दिया गया था।  जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने केंद्र सरकार के वकील द्वारा निर्देश लेने के लिए चार सप्ताह का समय मांगे जाने के बीच यह स्पष्ट किया कि इलाहाबाद में दाखिल याचिकाओं की जांच केवल वहीं की रजिस्ट्री द्वारा की जाएगी। यह मामला कंपनी लॉ बार एसोसिएशन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">याचिका में 27 फरवरी, 2026 को जारी उस सार्वजनिक सूचना को चुनौती दी गई, जिसमें राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) की प्रधान पीठ नई दिल्ली के रजिस्ट्रार ने निर्देश दिया कि इलाहाबाद पीठ में दाखिल मामलों की जांच संयुक्त रूप से की जाएगी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस आदेश के कारण भौतिक रूप से दस्तावेज इलाहाबाद में दाखिल किए जा रहे थे, जबकि ऑनलाइन फाइलिंग नई दिल्ली की प्रधान पीठ में हो रही थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके चलते फरवरी से ही प्रधान पीठ की रजिस्ट्री द्वारा फाइलों में बार-बार आपत्तियां लगाई जा रही थीं और खामियों को दूर नहीं किया जा रहा था।  यह भी दलील दी गई कि इस व्यवस्था में केवल इलाहाबाद पीठ को ही निशाना बनाया गया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रतिवादी पक्ष से सवाल किया कि जब याचिकाएं इलाहाबाद में दाखिल हो रही हैं, तो उनकी जांच किसी अन्य पीठ द्वारा क्यों की जानी चाहिए। मामले की अगली सुनवाई बाद में निर्धारित की जाएगी।।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.swatantraprabhat.com/article/177157/high-courts-stay-on-nclt-order-investigation-of-cases-filed</link>
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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 21:26:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सिर्फ दो मुकदमों से किसी को गुंडा नहीं कहा जा सकता- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आदेश रद्द किया</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल एक या दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें छह महीने के बाहरीकरण आदेश को चुनौती दी गई। यह आदेश बुलंदशहर के एडिशनल जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व) द्वारा पारित किया गया, जिसे मेरठ मंडल के आयुक्त ने भी बरकरार रखा था। </div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">प्रशासन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177155/no-one-can-be-called-a-goon-with-just-two"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/images-(2)7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज।</strong> इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल एक या दो आपराधिक मामलों के आधार पर किसी व्यक्ति को 'गुंडा' घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसा करना व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने यह टिप्पणी याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें छह महीने के बाहरीकरण आदेश को चुनौती दी गई। यह आदेश बुलंदशहर के एडिशनल जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व) द्वारा पारित किया गया, जिसे मेरठ मंडल के आयुक्त ने भी बरकरार रखा था। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्रशासन ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज दो आपराधिक मामलों के आधार पर उसे आदतन अपराधी बताते हुए समाज के लिए खतरा माना था। यह भी कहा गया कि उसकी गतिविधियों से इलाके में भय का माहौल बन गया, जिससे लोग उसके खिलाफ गवाही देने से कतराते हैं। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आदतन अपराधी साबित करने के लिए केवल कुछ अलग-थलग घटनाएं पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत कार्रवाई के लिए यह दिखाना जरूरी है कि व्यक्ति लगातार अपराधों में लिप्त रहा हो। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अदालत ने अपने पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक या दो मामलों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति आदतन अपराधी है। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि घटनाओं के बीच लंबा अंतर हो तो आदतन होने का तत्व और भी कमजोर हो जाता है। </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को केवल दो मामलों के आधार पर गुंडा घोषित करना उचित नहीं है। इसलिए उसके खिलाफ की गई पूरी कार्यवाही को अवैध ठहराते हुए रद्द कर दिया गया।।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
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                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 21:24:00 +0530</pubDate>
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