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                <title>Fraud Allegation - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Fraud Allegation RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>धोखाधड़ी के आरोपी महेंद्र गोयनका को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो, प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने जियोमिन इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड और यूरो प्रतीक इस्पात इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के बीच चल रहे विवाद में महेंद्र गोयनका से संबंधित याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से लगाए गए अंतरिम प्रतिबंध को फिलहाल जारी रखने का निर्देश दिया है। साथ ही जबलपुर की कमर्शियल कोर्ट को लंबित आवेदन पर दो माह के भीतर निर्णय लेने को कहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने 7 अगस्त को यह आदेश पारित किया। अदालत के समक्ष अधिवक्ता बलवीर सिंह</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184948/fraud-accused-mahendra-goenka-does-not-get-relief-even-from"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/mahendra-goenka-case_v_png--1280x720-4g.webp" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो, प्रयागराज। </strong>सुप्रीम कोर्ट ने जियोमिन इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड और यूरो प्रतीक इस्पात इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के बीच चल रहे विवाद में महेंद्र गोयनका से संबंधित याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से लगाए गए अंतरिम प्रतिबंध को फिलहाल जारी रखने का निर्देश दिया है। साथ ही जबलपुर की कमर्शियल कोर्ट को लंबित आवेदन पर दो माह के भीतर निर्णय लेने को कहा है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने 7 अगस्त को यह आदेश पारित किया। अदालत के समक्ष अधिवक्ता बलवीर सिंह और अधिवक्ता शर्मिला इराम फातिमा ने पक्ष रखा।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">मामला जियोमिन इंडस्ट्रीज द्वारा यूरो प्रतीक इस्पात इंडिया से करीब <strong>1.70 लाख टन आयरन ओर की खरीद के लिए किए गए अनुबंध</strong> से जुड़ा है। जियोमिन इंडस्ट्रीज ने अनुबंध के तहत खरीदे गए आयरन ओर की आपूर्ति नहीं किए जाने और समझौते की शर्तों का पालन नहीं होने का आरोप लगाते हुए जबलपुर की डिस्ट्रिक्ट जज कमर्शियल कोर्ट में वाद दायर किया है।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने कमर्शियल कोर्ट को सीपीसी के आदेश 39 के नियम 1 और 2 के तहत लंबित आवेदन पर दो माह के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया है। तब तक मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से लगाया गया अंतरिम प्रतिबंध प्रभावी रहेगा।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>मध्यस्थता की कोशिश रही विफल</strong></h6>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">जानकारी के अनुसार, जियोमिन इंडस्ट्रीज और यूरो प्रतीक इस्पात इंडिया के बीच विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की प्रक्रिया भी हुई, लेकिन इसमें समाधान नहीं निकल सका। विवाद के बीच जियोमिन इंडस्ट्रीज ने कमर्शियल कोर्ट का रुख किया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">यूरो प्रतीक इस्पात इंडिया प्राइवेट लिमिटेड में रायपुर निवासी महेंद्र गोयनका के प्रमुख शेयरधारक होने की बात सामने आई है। कंपनी से जुड़े विवादों को लेकर कटनी और माधवनगर थाने में भी अलग-अलग मामले दर्ज होने का दावा किया गया है। इन मामलों में धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और जाली दस्तावेजों से संबंधित धाराएं लगाई गई हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">शिकायतों में महेंद्र गोयनका के सहयोगी बताए गए हिमांशु श्रीवास्तव, सन्मति जैन और सुनील अग्रवाल समेत अन्य लोगों पर कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज और हस्ताक्षर के माध्यम से कंपनियों पर नियंत्रण हासिल करने के आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की पुष्टि संबंधित जांच और न्यायिक प्रक्रिया के परिणाम से ही होगी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">इसके अलावा कोलकाता में भी महेंद्र गोयनका के खिलाफ कथित वित्तीय अनियमितताओं और कंपनी के शेयरों से जुड़े मामले में प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी दी गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कोलकाता पुलिस ने जुलाई में उन्हें गिरफ्तार कर मामले में पूछताछ की थी।</p>
<p style="text-align:justify;">जियोमिन इंडस्ट्रीज का आरोप है कि जिस आयरन ओर की खरीद का अनुबंध उसके साथ हुआ था, उसे कथित तौर पर किसी अन्य कंपनी को बेच दिया गया। इसी विवाद को लेकर कंपनी ने न्यायालय का रुख किया था। अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामले की अगली सुनवाई कमर्शियल कोर्ट में होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 22:15:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>न्याय या साजिश ? एसडीएम हर्रैया का आदेश सवालों कघेरेमें - ऐसे आदेश ही बनते हैं खूनी संघर्ष का कारण।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले के तहसील हर्रैया के एसडीएम (न्यायिक) शशिबिंदु कुमार द्विवेदी इन दिनों अपने एक ऐसे कारनामे को लेकर चर्चा में हैं, जिसने न्याय व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला एक औद्योगिक भूमि का है, जिससे संबंधित भागीदार वर्ष 1992 में ही अपनी लायबिलिटी और एसेट से मुक्त हो चुके थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 34 साल बाद, 2026 में, उन्हीं को दोबारा नाजायज कब्जा दिलाने की कवायद शुरू कर दी  कि इस कार्रवाई में दो जालसाजों को उक्त औद्योगिक भूमि पर कब्जा दिलाने की मंशा से पहले से लागू स्टे को खत्म</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174998/justice-or-conspiracy-sdm-harraiyas-order-is-in-question"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260403-wa0028.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले के तहसील हर्रैया के एसडीएम (न्यायिक) शशिबिंदु कुमार द्विवेदी इन दिनों अपने एक ऐसे कारनामे को लेकर चर्चा में हैं, जिसने न्याय व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला एक औद्योगिक भूमि का है, जिससे संबंधित भागीदार वर्ष 1992 में ही अपनी लायबिलिटी और एसेट से मुक्त हो चुके थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 34 साल बाद, 2026 में, उन्हीं को दोबारा नाजायज कब्जा दिलाने की कवायद शुरू कर दी  कि इस कार्रवाई में दो जालसाजों को उक्त औद्योगिक भूमि पर कब्जा दिलाने की मंशा से पहले से लागू स्टे को खत्म करने की योजना बनाई गई। और इसके लिए 2016 के एक मुकदमे को ही खारिज करने का रास्ता चुना गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब जब नीयत पहले से तय हो, तो तर्क जुटाने में भला कितना समय लगता है! साहब ने एक नहीं, कई आधार गढ़े और आनन फानन में मुकदमा खारिज भी कमुकदमे की खारिजी के साथ ही स्टे भी समाप्त हो गया, जो इन कथित जालसाजों के लिए सबसे बड़ी बाधा था। अब आगे क्या होगा ? यह तो किसी घटना के घटित होने के बाद कानून-व्यवस्था ही तय करेगी !</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और साहब भी इसके लिए याद जरूर किए जाएंगे। लेकिन मुंसिफ बस्ती के आदेश के आधार पर दाखिल इस मुकदमे को खारिज करने के जो आधार दिए गए, वे खुद अपने आप में गम्भीर सवाल खड़े करते हैंअपने आदेश में साहब लिखते हैं, "खतौनी में पक्षकारों में किसी भी पक्षकार का नाम फर्म के पार्टनर के रूप में अंकित नहीं है। इस प्रकार इस वाद बिन्दु का निस्तारण वादी के पक्ष में नकारात्मक रूप में किया जाता है।अब सवाल यह उठता है कि, क्या किसी भी खतौनी में भूमिधर के नाम के साथ “किसान” या “मकान मालिक” आदि लिखा रहता है? जमीन का स्वरूप और उपयोग तो स्वतः स्पष्ट होता है, यह एक सामान्य समझ की बात है। लेकिन जब नीयत ही कुछ और हो, तो सामान्य समझ भी बेअसर हो जाती आगे आदेश में उल्लेख है, "प्रतिवादी श्री प्रवीश चन्द्र धर द्विवेदी द्वारा शपथ पत्र के साथ अवगत कराया है कि, प्रकीर्ण वाद संख्या 76/11/2024 श्रीश चंद्र धर द्विवेदी बनाम प्रवीश चन्द्र धर द्विवेदी को निरस्त किया जा चुका है।"हकीकत यह है कि ऐसा कोई मुकदमा अस्तित्व में ही नहीं है। और न ही इस कथित मुकदमे का इस आदेश से कोई सीधा संबंध ही हो सकता है। लेकिन "निरस्त" शब्द का जादू ऐसा चला कि उसे भी आधार बना लिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साहब आगे लिखते हैं, "वास्तव में एक ऐसे आदेश के आधार पर अनुतोष की मांग की गई है जो वर्तमान में माननीय न्यायालय में विचाराधीन है।" जबकि विधि का सामान्य सिद्धांत है कि किसी न्यायालय का आदेश तब तक प्रभावी रहता है, जब तक उस पर कोई नया आदेश पारित न हो जाए। केवल मुकदमे का विचाराधीन होना, आदेश को निष्प्रभावी नहीं करता। यहां जिस मुकदमे को आधार बताया गया, पात्रता के मुताबिक वह 2017 से अब तक केवल एडमिट अवस्था में ही पड़ा हुआ है। लेकिन आदेश लिखने के लिए आधार तो चाहिए थे, सो गढ़ लिएसाहब ने अपने आदेश में तर्क दिया कि, "वास्तव में प्रश्नगत वाद उभय पक्षों के मध्य भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के तहत साझेदारी विवाद से संबंधित है और वादी ने अभिलेखीय राजस्व दस्तावेजों से अपना कब्जा सिद्ध नहीं किया है।" साहब का यह तर्क स्पष्ट करता है कि, वे भी विपक्षियों की राह पर चलते हुए 'मुंसिफ बस्ती' के उस मूल आदेश को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं जो इस पूरे मुकदमे की बुनियाद है। ऐसे में साहब यह साबित करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि, सच चाहे जो भी हो वे उसे हरगिज नहीं देखेंगे। और विपक्षियों के हित में इस मुकदमे का गला घोंटकर ही मानेंसाहब ने आधार गढ़ते समय प्रतिवादी का हवाला देते हुए राजस्व संहिता की सीमाओं से बाहर निकलकर इंडियन पार्टनरशिप एक्ट 1932 आदि पर भी लंबा व्याख्यान दे डाला।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक्ट की धारा 63 का बाकायदा उल्लेख किया गया और प्रतिवादी की भाषा में यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि रिटायरमेंट की सूचना सार्वजनिक नहीं की गई।  आदेश पढ़ते समय कई जगह ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रतिवादी बोल रहा हो और साहब केवल उसे लिख रहे हों। हैरत की बात यह है कि न तो यह जांचने की जरूरत समझी गई कि मूल मुकदमा क्या है? ना ही 27 अगस्त 2025 को फर्म आदि से संबंधित नामांतरण के लिए जारी "परिषदादेश" का अनुपालन करने की जरूरत समझी गई। और ना ही वाद के आधार, मुंसिफ के आदेश/ डिग्री को तरजीह दी गई। और न ही यह देखा गया कि, जिन आधारों पर साहब का आदेश टिका है, वे प्रासंगिक भी हैं या नहीं। सबसे अहम सवाल यह कि, प्रतिवादी सच बोल रहा है या झूठ ? इस पर तो मानो विचार करना भी जरूरी नहीं समझा गया। विडंबना यह भी है कि जिस प्रतिवादी के नाम के आगे साहब “श्री” लगाते नहीं थक रहे, उन्हीं पर आरोप है कि, उन्होंने मुकदमे के दौरान ही खतौनी में दर्ज अपने नामों का जमकर दुरुपयोग किया। फर्म की विवादित जमीन का नामांतरण कराया, खारिज-दाखिल कराया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और यहां तक कि समानांतर न्यायालय में बंटवारे का मुकदमा दाखिल कर एकपक्षीय प्राइमरी डिग्री तक हासिल कर ली। लेकिन इन सब तथ्यों का जिक्र आदेश में कहीं नहीं मिलता। कार्रवाई तो दूर की बात है।स्पष्ट है कि, आदेश की शुरुआत ही मुकदमे को खारिज करने की मंशा से हुई थी। और अंत तक प्रतिवादी के पक्ष को साधते हुए वही परिणाम हासिल भी कर लिया गया। अदालत अपनी थी, अधिकार अपने थे, तो परिणाम भी मनमाफिक ही आया। कुल मिलाकर साहब ने वही कहा और किया, जिसकी उम्मीद जालसाज विपक्षी करते रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वादी के पक्ष में तो सिर्फ कृत्रिम कमियां ही गिनाई गईं। और उसके द्वारा प्रस्तुत तमाम साक्ष्यों को भी दबाकर साक्ष्यों का अभाव बता दिया जिला अदालत के कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस आदेश को देखकर मुंह बिचकाते हुए इसे “पूर्व नियोजित ऑर्डर” तक कह डाला।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और अंत में वही पुरानी बात याद आती है, "जब पैसे से वास्ता हो जाए, तो फिर इज्जत आबरू, न्याय अन्याय की चिंता भला कौन करता खैर, जीवन और जीविका की लड़ाई हर व्यक्ति पूरी ताकत से लड़ता है, और वादी भी लड़ेगा ही। यह जरूरी नहीं कि हर जगह ऐसे ही चेहरे बैठे हों। लेकिन असली चिंता इस बात की है कि, आखिर ये साहब कब तक न्यायिक चोला ओढ़कर न्याय का यूँ ही चीरहरण करते रहेंगे, और व्यवस्था देखती रहेगी ?</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 19:53:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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