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                <title>Legal Dispute - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Legal Dispute RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>डीएम के आदेश में BNS 316(5), FIR से गायब: आखिर किसके निर्देश पर हटी गंभीर धारा?</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>राज्य ब्यूरो - विपिन शुक्ला </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>अम्बेडकरनगर।</strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">धान खरीद केंद्र बी-पैक्स असाईदपुर कला के केंद्र प्रभारी दुर्गा प्रसाद पाण्डेय के खिलाफ दर्ज एफआईआर ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिलाधिकारी के स्पष्ट आदेश में जहां आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3/7 के साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(5) के तहत भी अभियोग दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे, वहीं थाना भीटी में दर्ज एफआईआर में केवल धारा 3 और 7 आवश्यक वस्तु अधिनियम ही दर्ज की गई।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">हैरानी की बात यह है कि एफआईआर के तथ्यात्मक विवरण में स्वयं यह उल्लेख किया गया है</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183667/bns-3165-missing-from-fir-as-per-dms-order-on"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1001123229-(1).jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>राज्य ब्यूरो - विपिन शुक्ला </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>अम्बेडकरनगर।</strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">धान खरीद केंद्र बी-पैक्स असाईदपुर कला के केंद्र प्रभारी दुर्गा प्रसाद पाण्डेय के खिलाफ दर्ज एफआईआर ने पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिलाधिकारी के स्पष्ट आदेश में जहां आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3/7 के साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(5) के तहत भी अभियोग दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे, वहीं थाना भीटी में दर्ज एफआईआर में केवल धारा 3 और 7 आवश्यक वस्तु अधिनियम ही दर्ज की गई।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हैरानी की बात यह है कि एफआईआर के तथ्यात्मक विवरण में स्वयं यह उल्लेख किया गया है कि कथित कूटरचित ऑनलाइन समर्पण पत्र BNS की धारा 316(5) के दायरे में आता है, लेकिन यही धारा एफआईआर के सेक्शन कॉलम से गायब है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">जिलाधिकारी कार्यालय के आदेश में अभियोजन कार्यालय की रिपोर्ट के आधार पर कहा गया था कि केंद्र प्रभारी द्वारा धान खरीद से जुड़े ऑनलाइन समर्पण पत्र में कथित अनियमितता और मूल्यवान कूटरचित दस्तावेज तैयार किए जाने के प्रथम दृष्टया तथ्य पाए गए हैं। इसी आधार पर धारा 3/7 आवश्यक वस्तु अधिनियम तथा BNS की धारा 316(5) के तहत मुकदमा दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके बावजूद 15 जुलाई 2026 को दर्ज एफआईआर में केवल आवश्यक वस्तु अधिनियम की धाराएं दर्ज की गईं। इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि जब जिलाधिकारी के आदेश और एफआईआर के कथानक दोनों में धारा 316(5) का उल्लेख है, तो फिर इसे एफआईआर की धाराओं में शामिल क्यों नहीं किया गया?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्या यह विवेचना के दौरान हुई तकनीकी चूक है, या फिर किसी स्तर पर गंभीर धारा जोड़ने से परहेज किया गया? यह सवाल अब प्रशासनिक और पुलिस महकमे में चर्चा का विषय बन गया है।</div>
<div style="text-align:justify;">पुलिस सूत्रों के अनुसार, धारा 316(5) को शामिल न किए जाने को लेकर विभाग के भीतर भी चर्चाएं हैं। हालांकि, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। इसलिए इस संबंध में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। अब निगाहें वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के जवाब पर टिकी हैं कि जिलाधिकारी के निर्देशों के बावजूद गंभीर धारा एफआईआर के सेक्शन से क्यों गायब रही।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> उठ रहे हैं ये बड़े सवाल</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">डीएम के आदेश में BNS की धारा 316(5) का स्पष्ट उल्लेख।</div>
<div style="text-align:justify;">एफआईआर के तथ्यों में भी धारा 316(5) का जिक्र।</div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन सेक्शन कॉलम में केवल धारा 3/7 आवश्यक वस्तु अधिनियम।</div>
<div style="text-align:justify;">क्या यह तकनीकी त्रुटि है या किसी स्तर पर लिया गया निर्णय?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्या पुलिस इस मामले में पूरक धाराएं जोड़ने की तैयारी कर रही है?</div>
<div style="text-align:justify;">यह संस्करण पत्रकारिता की दृष्टि से अधिक सशक्त है और दस्तावेज़ों पर आधारित सवाल उठाता है, जबकि अप्रमाणित आरोपों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 21:10:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रॉपर्टी विवाद में बुजुर्ग का दर्द बहू और उसके पिता ने संपत्ति हड़पने के लिए झूठे आरोप लगाए बुजुर्ग ने पुलिस पर भी लगाए गंभीर आरोप</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्लीः     </strong>हरियाणा के पलवल जिले के होडल क्षेत्र से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें एक बुजुर्ग ने अपनी पुत्रवधू, उसके पिता तथा स्थानीय पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ित रमेश चंद्र का कहना है कि पारिवारिक संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद के कारण उनके पूरे परिवार को सुनियोजित तरीके से परेशान किया जा रहा है। उनका आरोप है कि उनकी पुत्रवधू श्याम ने अपने पिता के साथ मिलकर संपत्ति हड़पने की नीयत से उनके बेटे वरुण के खिलाफ झूठा छेड़छाड़ का मामला दर्ज कराया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">रमेश चंद्र के अनुसार, उनके परिवार की पैतृक संपत्ति को लेकर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183239/old-mans-pain-in-property-dispute-daughter-in-law-and-her-father"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/img-20260712-wa0001.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्लीः     </strong>हरियाणा के पलवल जिले के होडल क्षेत्र से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें एक बुजुर्ग ने अपनी पुत्रवधू, उसके पिता तथा स्थानीय पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पीड़ित रमेश चंद्र का कहना है कि पारिवारिक संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद के कारण उनके पूरे परिवार को सुनियोजित तरीके से परेशान किया जा रहा है। उनका आरोप है कि उनकी पुत्रवधू श्याम ने अपने पिता के साथ मिलकर संपत्ति हड़पने की नीयत से उनके बेटे वरुण के खिलाफ झूठा छेड़छाड़ का मामला दर्ज कराया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रमेश चंद्र के अनुसार, उनके परिवार की पैतृक संपत्ति को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। उनका दावा है कि इसी विवाद का लाभ उठाकर उनकी पुत्रवधू और उसके पिता ने परिवार पर दबाव बनाने के लिए झूठे आपराधिक आरोप लगाने की रणनीति अपनाई। उनका कहना है कि इससे न केवल उनके बेटे की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची, बल्कि पूरे परिवार को मानसिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रमेश चंद्र ने आरोप लगाया कि 31 मार्च 2026 को उनके घर पर कथित रूप से हमला किया गया। इस दौरान मारपीट, तोड़फोड़ और लूटपाट जैसी घटनाएं हुईं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनका कहना है कि उन्होंने तत्काल पुलिस को शिकायत दी, लेकिन उनकी शिकायत पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इसके विपरीत, उनके और उनके बेटे के खिलाफ ही मामला दर्ज कर लिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पीड़ित बुजुर्ग का आरोप है कि मामले की जांच निष्पक्ष तरीके से नहीं की गई। उनका कहना है कि कई महत्वपूर्ण तथ्यों और साक्ष्यों को नजरअंदाज किया गया तथा उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है कि पुलिस निष्पक्ष भूमिका निभाने के बजाय प्रभावशाली लोगों का साथ दे रही है।रमेश चंद्र ने कहा, "खाकी का धर्म कानून और सत्य की रक्षा करना है, लेकिन हमारे मामले में ऐसा नहीं हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">हमें ऐसा लग रहा है कि पीड़ित की आवाज़ सुनने के बजाय दबंगों का साथ दिया जा रहा है। पुलिस को किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि कानून का साथ देना चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें भारतीय संविधान और न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है तथा उन्हें उम्मीद है कि सच्चाई अवश्य सामने आएगी। उन्होंने पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी या वरिष्ठ अधिकारियों से निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साथ ही उन्होंने यह भी मांग की कि यदि जांच में किसी पुलिस अधिकारी की लापरवाही, पक्षपात या भ्रष्टाचार सामने आता है तो उसके विरुद्ध भी सख्त कार्रवाई की जाए।पीड़ित परिवार का कहना है कि वे न्याय की लड़ाई कानूनी तरीके से लड़ेंगे और कानून के दायरे में रहकर अपने अधिकारों की रक्षा करेंगे। उनका कहना है कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को झूठे मामलों में फंसाना कानून और समाज दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दूसरे पक्ष का पक्ष समाचार लिखे जाने तक इस मामले में लगाए गए आरोपों पर पुत्रवधू श्याम, उनके पिता तथा संबंधित पुलिस अधिकारियों का पक्ष प्राप्त नहीं हो सका है। पत्रकारिता के सिद्धांतों के अनुसार उनका पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समान प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाएगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Jul 2026 19:24:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>न्याय या साजिश ? एसडीएम हर्रैया का आदेश सवालों कघेरेमें - ऐसे आदेश ही बनते हैं खूनी संघर्ष का कारण।</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले के तहसील हर्रैया के एसडीएम (न्यायिक) शशिबिंदु कुमार द्विवेदी इन दिनों अपने एक ऐसे कारनामे को लेकर चर्चा में हैं, जिसने न्याय व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला एक औद्योगिक भूमि का है, जिससे संबंधित भागीदार वर्ष 1992 में ही अपनी लायबिलिटी और एसेट से मुक्त हो चुके थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 34 साल बाद, 2026 में, उन्हीं को दोबारा नाजायज कब्जा दिलाने की कवायद शुरू कर दी  कि इस कार्रवाई में दो जालसाजों को उक्त औद्योगिक भूमि पर कब्जा दिलाने की मंशा से पहले से लागू स्टे को खत्म</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174998/justice-or-conspiracy-sdm-harraiyas-order-is-in-question"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260403-wa0028.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>बस्ती। </strong>बस्ती जिले के तहसील हर्रैया के एसडीएम (न्यायिक) शशिबिंदु कुमार द्विवेदी इन दिनों अपने एक ऐसे कारनामे को लेकर चर्चा में हैं, जिसने न्याय व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला एक औद्योगिक भूमि का है, जिससे संबंधित भागीदार वर्ष 1992 में ही अपनी लायबिलिटी और एसेट से मुक्त हो चुके थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि 34 साल बाद, 2026 में, उन्हीं को दोबारा नाजायज कब्जा दिलाने की कवायद शुरू कर दी  कि इस कार्रवाई में दो जालसाजों को उक्त औद्योगिक भूमि पर कब्जा दिलाने की मंशा से पहले से लागू स्टे को खत्म करने की योजना बनाई गई। और इसके लिए 2016 के एक मुकदमे को ही खारिज करने का रास्ता चुना गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अब जब नीयत पहले से तय हो, तो तर्क जुटाने में भला कितना समय लगता है! साहब ने एक नहीं, कई आधार गढ़े और आनन फानन में मुकदमा खारिज भी कमुकदमे की खारिजी के साथ ही स्टे भी समाप्त हो गया, जो इन कथित जालसाजों के लिए सबसे बड़ी बाधा था। अब आगे क्या होगा ? यह तो किसी घटना के घटित होने के बाद कानून-व्यवस्था ही तय करेगी !</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और साहब भी इसके लिए याद जरूर किए जाएंगे। लेकिन मुंसिफ बस्ती के आदेश के आधार पर दाखिल इस मुकदमे को खारिज करने के जो आधार दिए गए, वे खुद अपने आप में गम्भीर सवाल खड़े करते हैंअपने आदेश में साहब लिखते हैं, "खतौनी में पक्षकारों में किसी भी पक्षकार का नाम फर्म के पार्टनर के रूप में अंकित नहीं है। इस प्रकार इस वाद बिन्दु का निस्तारण वादी के पक्ष में नकारात्मक रूप में किया जाता है।अब सवाल यह उठता है कि, क्या किसी भी खतौनी में भूमिधर के नाम के साथ “किसान” या “मकान मालिक” आदि लिखा रहता है? जमीन का स्वरूप और उपयोग तो स्वतः स्पष्ट होता है, यह एक सामान्य समझ की बात है। लेकिन जब नीयत ही कुछ और हो, तो सामान्य समझ भी बेअसर हो जाती आगे आदेश में उल्लेख है, "प्रतिवादी श्री प्रवीश चन्द्र धर द्विवेदी द्वारा शपथ पत्र के साथ अवगत कराया है कि, प्रकीर्ण वाद संख्या 76/11/2024 श्रीश चंद्र धर द्विवेदी बनाम प्रवीश चन्द्र धर द्विवेदी को निरस्त किया जा चुका है।"हकीकत यह है कि ऐसा कोई मुकदमा अस्तित्व में ही नहीं है। और न ही इस कथित मुकदमे का इस आदेश से कोई सीधा संबंध ही हो सकता है। लेकिन "निरस्त" शब्द का जादू ऐसा चला कि उसे भी आधार बना लिया गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">साहब आगे लिखते हैं, "वास्तव में एक ऐसे आदेश के आधार पर अनुतोष की मांग की गई है जो वर्तमान में माननीय न्यायालय में विचाराधीन है।" जबकि विधि का सामान्य सिद्धांत है कि किसी न्यायालय का आदेश तब तक प्रभावी रहता है, जब तक उस पर कोई नया आदेश पारित न हो जाए। केवल मुकदमे का विचाराधीन होना, आदेश को निष्प्रभावी नहीं करता। यहां जिस मुकदमे को आधार बताया गया, पात्रता के मुताबिक वह 2017 से अब तक केवल एडमिट अवस्था में ही पड़ा हुआ है। लेकिन आदेश लिखने के लिए आधार तो चाहिए थे, सो गढ़ लिएसाहब ने अपने आदेश में तर्क दिया कि, "वास्तव में प्रश्नगत वाद उभय पक्षों के मध्य भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 के तहत साझेदारी विवाद से संबंधित है और वादी ने अभिलेखीय राजस्व दस्तावेजों से अपना कब्जा सिद्ध नहीं किया है।" साहब का यह तर्क स्पष्ट करता है कि, वे भी विपक्षियों की राह पर चलते हुए 'मुंसिफ बस्ती' के उस मूल आदेश को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं जो इस पूरे मुकदमे की बुनियाद है। ऐसे में साहब यह साबित करने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि, सच चाहे जो भी हो वे उसे हरगिज नहीं देखेंगे। और विपक्षियों के हित में इस मुकदमे का गला घोंटकर ही मानेंसाहब ने आधार गढ़ते समय प्रतिवादी का हवाला देते हुए राजस्व संहिता की सीमाओं से बाहर निकलकर इंडियन पार्टनरशिप एक्ट 1932 आदि पर भी लंबा व्याख्यान दे डाला।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">एक्ट की धारा 63 का बाकायदा उल्लेख किया गया और प्रतिवादी की भाषा में यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि रिटायरमेंट की सूचना सार्वजनिक नहीं की गई।  आदेश पढ़ते समय कई जगह ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रतिवादी बोल रहा हो और साहब केवल उसे लिख रहे हों। हैरत की बात यह है कि न तो यह जांचने की जरूरत समझी गई कि मूल मुकदमा क्या है? ना ही 27 अगस्त 2025 को फर्म आदि से संबंधित नामांतरण के लिए जारी "परिषदादेश" का अनुपालन करने की जरूरत समझी गई। और ना ही वाद के आधार, मुंसिफ के आदेश/ डिग्री को तरजीह दी गई। और न ही यह देखा गया कि, जिन आधारों पर साहब का आदेश टिका है, वे प्रासंगिक भी हैं या नहीं। सबसे अहम सवाल यह कि, प्रतिवादी सच बोल रहा है या झूठ ? इस पर तो मानो विचार करना भी जरूरी नहीं समझा गया। विडंबना यह भी है कि जिस प्रतिवादी के नाम के आगे साहब “श्री” लगाते नहीं थक रहे, उन्हीं पर आरोप है कि, उन्होंने मुकदमे के दौरान ही खतौनी में दर्ज अपने नामों का जमकर दुरुपयोग किया। फर्म की विवादित जमीन का नामांतरण कराया, खारिज-दाखिल कराया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और यहां तक कि समानांतर न्यायालय में बंटवारे का मुकदमा दाखिल कर एकपक्षीय प्राइमरी डिग्री तक हासिल कर ली। लेकिन इन सब तथ्यों का जिक्र आदेश में कहीं नहीं मिलता। कार्रवाई तो दूर की बात है।स्पष्ट है कि, आदेश की शुरुआत ही मुकदमे को खारिज करने की मंशा से हुई थी। और अंत तक प्रतिवादी के पक्ष को साधते हुए वही परिणाम हासिल भी कर लिया गया। अदालत अपनी थी, अधिकार अपने थे, तो परिणाम भी मनमाफिक ही आया। कुल मिलाकर साहब ने वही कहा और किया, जिसकी उम्मीद जालसाज विपक्षी करते रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वादी के पक्ष में तो सिर्फ कृत्रिम कमियां ही गिनाई गईं। और उसके द्वारा प्रस्तुत तमाम साक्ष्यों को भी दबाकर साक्ष्यों का अभाव बता दिया जिला अदालत के कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस आदेश को देखकर मुंह बिचकाते हुए इसे “पूर्व नियोजित ऑर्डर” तक कह डाला।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">और अंत में वही पुरानी बात याद आती है, "जब पैसे से वास्ता हो जाए, तो फिर इज्जत आबरू, न्याय अन्याय की चिंता भला कौन करता खैर, जीवन और जीविका की लड़ाई हर व्यक्ति पूरी ताकत से लड़ता है, और वादी भी लड़ेगा ही। यह जरूरी नहीं कि हर जगह ऐसे ही चेहरे बैठे हों। लेकिन असली चिंता इस बात की है कि, आखिर ये साहब कब तक न्यायिक चोला ओढ़कर न्याय का यूँ ही चीरहरण करते रहेंगे, और व्यवस्था देखती रहेगी ?</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 19:53:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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