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                <title>Crop Damage - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Crop Damage RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>बैराजों से छोड़े गए पानी का सीतापुर में असर शारदा-घाघरा उफान पर</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>सीतापुर-</strong>    जनपद सीतापुर में बैराजों से छोड़े गए करीब तीन लाख क्यूसेक पानी का असर सीतापुर में लगातार चौथे दिन भी देखने को मिल रहा है। शारदा और घाघरा नदियों के जलस्तर में लगातार 10 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है हालांकि दोनों नदियां अभी भी खतरे के निशान से नीचे बह रही हैं, लेकिन तटवर्ती क्षेत्रों में हालात धीरे-धीरे गंभीर होने लगे हैं। करीब 150 बीघा कृषि योग्य भूमि जलमग्न होने लगी है जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। प्रशासन ने नदी किनारे बसे गांवों को अलर्ट मोड पर रखते हुए निगरानी बढ़ा दी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> रामपुर</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184647/effect-of-water-released-from-barrages-on-sharda-ghaghra-spate-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/img-20260803-wa0006.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>सीतापुर-</strong>  जनपद सीतापुर में बैराजों से छोड़े गए करीब तीन लाख क्यूसेक पानी का असर सीतापुर में लगातार चौथे दिन भी देखने को मिल रहा है। शारदा और घाघरा नदियों के जलस्तर में लगातार 10 सेंटीमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है हालांकि दोनों नदियां अभी भी खतरे के निशान से नीचे बह रही हैं, लेकिन तटवर्ती क्षेत्रों में हालात धीरे-धीरे गंभीर होने लगे हैं। करीब 150 बीघा कृषि योग्य भूमि जलमग्न होने लगी है जिससे किसानों की चिंता बढ़ गई है। प्रशासन ने नदी किनारे बसे गांवों को अलर्ट मोड पर रखते हुए निगरानी बढ़ा दी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"> रामपुर मथुरा और रेउसा विकासखंड क्षेत्रों में जलस्तर बढ़ने का सबसे अधिक प्रभाव दिखाई दे रहा है नगेश्वरपुरवा और बचऊपुरवा गांवों के संपर्क मार्गों पर पानी भर जाने से ग्रामीणों का आवागमन प्रभावित हो गया है। लोगों को आने-जाने के लिए नावों का सहारा लेना पड़ रहा है। वहीं रेउसा क्षेत्र के 20 से अधिक गांवों पर बाढ़ का खतरा मंडराने लगा है, जिससे ग्रामीणों में चिंता का माहौल है। नदियों की तेज कटान जारी उधर, बेहटा विकासखंड के ग्राम खाना मंडोर क्षेत्र में नदियों की तेज कटान जारी है। </div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नदी का बढ़ता पानी गन्ने और धान की फसलों तक पहुंचने लगा है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान की आशंका सता रही है। प्रशासन स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। एसडीएम लहरपुर दामिनी एम. दास ने बताया कि कटान प्रभावित स्थानों पर सिंचाई विभाग की टीमों को लगाया गया है। बालू से भरी बोरियों और जियो बैग के माध्यम से कटान रोकने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि फिलहाल दोनों नदियां खतरे के निशान से नीचे बह रही हैं, जिससे तत्काल बाढ़ जैसी स्थिति नहीं है। इसके बावजूद प्रशासन पूरी तरह सतर्क है और लेखपालों की क्लस्टरवार ड्यूटी लगाकर जलस्तर की लगातार निगरानी कराई जा रही है!!</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 22:36:56 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मॉनसून का करिश्माई रूप और कुदरत की विराट शक्ति के सामने इंसान की सीमाएं तथा असम की बाढ़ से मिला प्रकृति का बड़ा संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
<div>
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<div style="text-align:justify;">असम में मॉनसून की पहली बड़ी बाढ़ ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि प्रकृति जब अपना स्वरूप बदलती है तब इंसान की सारी योजनाएं और सारी तैयारियां छोटी पड़ जाती हैं। जून का अधिकांश समय देश के अनेक हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार करते रहे। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे। कहीं खेत सूखे रहे तो कहीं जलाशय खाली दिखाई दिए। ऐसा लग रहा था कि इस बार मॉनसून सामान्य समय से पीछे चल रहा है। लेकिन जून के अंतिम दिनों में जैसे ही पूर्वोत्तर भारत में बादलों ने डेरा डाला वैसे ही असम</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/182342/the-charismatic-form-of-monsoon-and-the-limitations-of-humans"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/hindi-divas26.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
<div>
<div class="ii gt">
<div class="a3s aiL">
<div>
<div>
<div style="text-align:justify;">असम में मॉनसून की पहली बड़ी बाढ़ ने एक बार फिर यह याद दिला दिया कि प्रकृति जब अपना स्वरूप बदलती है तब इंसान की सारी योजनाएं और सारी तैयारियां छोटी पड़ जाती हैं। जून का अधिकांश समय देश के अनेक हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार करते रहे। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे रहे। कहीं खेत सूखे रहे तो कहीं जलाशय खाली दिखाई दिए। ऐसा लग रहा था कि इस बार मॉनसून सामान्य समय से पीछे चल रहा है। लेकिन जून के अंतिम दिनों में जैसे ही पूर्वोत्तर भारत में बादलों ने डेरा डाला वैसे ही असम और अरुणाचल प्रदेश में बारिश ने विकराल रूप धारण कर लिया। देखते ही देखते नदियां उफान पर आ गईं और हजारों परिवार बाढ़ की चपेट में आ गए। यह दृश्य केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं बल्कि यह संदेश भी है कि प्रकृति के अपने नियम हैं और उसके सामने मनुष्य की शक्ति सीमित है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम के अनेक जिलों में हजारों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। सैकड़ों गांव पानी में घिर गए हैं। खेतों में खड़ी फसलें डूब गई हैं। पशुधन भी संकट में है। रेल संपर्क बाधित हो गया है और लोगों का सामान्य जीवन अस्त व्यस्त हो गया है। यह केवल असम की समस्या नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय है क्योंकि प्राकृतिक आपदाएं किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहतीं। कभी पहाड़ों में बादल फटते हैं तो कभी मैदानों में नदियां उफान पर आ जाती हैं। कहीं समुद्र तूफान लेकर आता है तो कहीं सूखा लोगों की जिंदगी कठिन बना देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अरुणाचल प्रदेश में लगातार हो रही वर्षा ने भी स्थिति को गंभीर बना दिया है। पहाड़ों से उतरने वाला पानी असम की नदियों में पहुंचा और बाढ़ का स्वरूप और भी भयावह हो गया। यह प्रकृति का वही चक्र है जिसे मनुष्य पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। विज्ञान ने अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन आज भी बादलों को आदेश नहीं दिया जा सकता कि वे कहां बरसें और कितनी देर तक बरसें। यही कारण है कि कुदरत के सामने हर व्यक्ति समान रूप से असहाय दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मॉनसून भारत की जीवनरेखा माना जाता है। देश की कृषि का बड़ा हिस्सा आज भी वर्षा पर निर्भर है। अच्छी बारिश होती है तो खेतों में हरियाली छा जाती है और किसानों के चेहरे खिल उठते हैं। लेकिन यही बारिश जब सीमा से अधिक हो जाती है तब वही जीवनदायिनी जलधारा विनाश का कारण बन जाती है। इस बार भी यही देखने को मिला। जहां देश के कई हिस्सों में लोग बारिश का इंतजार करते रहे वहीं असम में इतनी अधिक वर्षा हुई कि लोगों के घर और खेत पानी में डूब गए। प्रकृति का यही विरोधाभास उसे रहस्यमयी और करिश्माई बनाता है।</div>
<div style="text-align:justify;">देश के अनेक किसान इस समय कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। कहीं बारिश नहीं होने से बुवाई प्रभावित हुई है तो कहीं अत्यधिक वर्षा ने तैयारियां बिगाड़ दी हैं। खेती पूरी तरह मौसम पर आधारित है और मौसम का मिजाज हर वर्ष बदलता रहता है। किसान मेहनत करता है लेकिन अंतिम निर्णय प्रकृति के हाथ में होता है। यही कारण है कि भारतीय किसान सदियों से धरती और आकाश दोनों को समान श्रद्धा से देखता आया है। उसे पता है कि मेहनत उसकी है लेकिन सफलता का आशीर्वाद प्रकृति देती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस वर्ष अधिक मास के कारण लोगों के बीच यह चर्चा भी रही कि मॉनसून देर से आया। चाहे इसके धार्मिक या सांस्कृतिक संदर्भ अलग हों लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से मॉनसून का आगमन समुद्री हवाओं तापमान और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। फिर भी भारतीय समाज में प्रकृति और आस्था का गहरा संबंध रहा है। लोग वर्षा को केवल मौसम नहीं बल्कि ईश्वर की कृपा भी मानते हैं। जब समय पर बारिश होती है तो खुशियां आती हैं और जब अत्यधिक या कम वर्षा होती है तो चिंता बढ़ जाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम की बाढ़ ने यह भी सिखाया है कि प्राकृतिक आपदाओं से मुकाबला केवल सरकारी प्रयासों से नहीं बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से भी संभव है। राहत और बचाव कार्य तेजी से चलना चाहिए। प्रभावित परिवारों तक भोजन दवाइयां और सुरक्षित आश्रय पहुंचाना सबसे पहली जिम्मेदारी है। बच्चों महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। जिन किसानों की फसलें और पशुधन प्रभावित हुए हैं उन्हें आर्थिक सहायता मिलनी चाहिए ताकि वे दोबारा अपने जीवन को संभाल सकें।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा राज्य सरकार से लगातार संपर्क बनाए रखना और राहत कार्यों की समीक्षा करना सकारात्मक पहल है। ऐसे समय में राजनीति से ऊपर उठकर केवल मानवता को प्राथमिकता देनी चाहिए। प्राकृतिक आपदा किसी दल या क्षेत्र को देखकर नहीं आती। उसका सामना पूरे समाज को मिलकर करना पड़ता है। यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत भी है कि संकट की घड़ी में लोग एक दूसरे का हाथ थाम लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आज आवश्यकता केवल राहत पहुंचाने की नहीं बल्कि भविष्य के लिए बेहतर तैयारी करने की भी है। नदियों के किनारे मजबूत सुरक्षा व्यवस्था जल निकासी की प्रभावी योजना समय पर चेतावनी प्रणाली और पर्यावरण संरक्षण जैसे उपाय भविष्य में नुकसान कम कर सकते हैं। जंगलों की अंधाधुंध कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित दोहन ने भी कई क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं को बढ़ाया है। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलेगा तो आपदाओं की तीव्रता को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">कुदरत का अपना अद्भुत स्वभाव है। वही धरती को हरियाली देती है वही नदियों को जीवन देती है वही अन्न उपजाती है और वही कभी कभी अपनी अपार शक्ति का परिचय भी देती है। मनुष्य ने ऊंची इमारतें बना लीं आधुनिक तकनीक विकसित कर ली और अंतरिक्ष तक पहुंच गया लेकिन बादलों की चाल और नदियों के वेग के सामने आज भी उसकी सीमाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। यही प्रकृति का सबसे बड़ा करिश्मा है कि वह जीवन भी देती है और समय आने पर विनम्रता का पाठ भी पढ़ाती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">असम की बाढ़ केवल एक समाचार नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी और सीख है। हमें प्रकृति का सम्मान करना होगा उसके संतुलन को बनाए रखना होगा और आपदाओं से निपटने की तैयारी को मजबूत करना होगा। बारिश जीवन का उत्सव भी है और जिम्मेदारी की परीक्षा भी। जब तक संतुलन बना रहता है तब तक वर्षा अमृत बनकर बरसती है लेकिन जब संतुलन बिगड़ता है तब वही जल प्रलय का रूप ले लेता है। इसलिए आवश्यक है कि हम प्रकृति को जीतने का नहीं बल्कि उसके साथ सामंजस्य बनाकर चलने का प्रयास करें क्योंकि कुदरत के विराट स्वरूप के सामने अंततः हर मनुष्य विनम्र और लाचार ही दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"><strong>          *कांतिलाल मांडोत*</strong></div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="WhmR8e"></div>
</div>
</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 16:09:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कंबाइन मशीन की चिंगारी से 80 बीघा गेहूं की फसल जलकर राख, 21 किसान परिवार प्रभावित</title>
                                    <description><![CDATA[<div><strong>बस्ती।</strong></div>
<div>  </div>
<div><strong> </strong>बस्ती जिले में आज का कहर जारी है गेहूं की कटाई के मौसम में कंबाइन मशीनों से लग रहे यार किसानों के लाखों के गेहूं जलकर राख हो गए तहसील प्रशासन ने अपना कोरम पूरा करने के लिए मौके पर पहुंच कर जांच कर रिपोर्ट लगाया लेकिन किसानों की संतुष्टि क्या हजार ₹2000 में हो जाएगी यह बड़ा सवाल खड़ा होता है अग्निकांड में किसानों की जमा पूंजी जलकर राख हो जाती है यहां तक उनके केसीसी के लोन भी नहीं जमा हो पाते हैं और खाने के लाले पड़ जाते हैं</div>
<div>  </div>
<div>ताजा मामलानगर थाना क्षेत्र के बढ़नी गांव</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174991/80-bigha-wheat-crop-burnt-to-ashes-due-to-spark"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260403-wa0027.jpg" alt=""></a><br /><div><strong>बस्ती।</strong></div>
<div> </div>
<div><strong> </strong>बस्ती जिले में आज का कहर जारी है गेहूं की कटाई के मौसम में कंबाइन मशीनों से लग रहे यार किसानों के लाखों के गेहूं जलकर राख हो गए तहसील प्रशासन ने अपना कोरम पूरा करने के लिए मौके पर पहुंच कर जांच कर रिपोर्ट लगाया लेकिन किसानों की संतुष्टि क्या हजार ₹2000 में हो जाएगी यह बड़ा सवाल खड़ा होता है अग्निकांड में किसानों की जमा पूंजी जलकर राख हो जाती है यहां तक उनके केसीसी के लोन भी नहीं जमा हो पाते हैं और खाने के लाले पड़ जाते हैं</div>
<div> </div>
<div>ताजा मामलानगर थाना क्षेत्र के बढ़नी गांव में उस समय हड़कंप मच गया जब कंबाइन मशीन से निकली चिंगारी ने भीषण आग का रूप ले लिया। देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया और करीब 80 बीघा खड़ी पकी गेहूं की फसल जलकर पूरी तरह राख हो गई। इस हादसे में 21 किसान परिवारों को भारी नुकसान झेलना पड़ा है।</div>
<div> </div>
<div>प्रभावित किसानों में गुड्डू लाल मिश्रा, काशीराम, सुग्रीव, रामनयन, उपेन्द्र कुमार मिश्रा, भूपेंद्र कुमार मिश्रा, केशवनंदन मिश्रा, मरूती मिश्रा, ब्रिज नंदन मिश्रा, विमलेश कुमार मिश्रा, बदलू शर्मा, राजेश शर्मा, परमेश्वर, शालिग्राम त्रिपाठी, रामकेवल, फताई, गया प्रसाद गौड़ और सत्यनाम धीरेंद्र मिश्रा सहित अन्य किसान शामिल हैं, जिनकी पूरी मेहनत कुछ ही पलों में राख में बदल गई।</div>
<div> </div>
<div>प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, खेत में कंबाइन मशीन से कटाई के दौरान निकली एक छोटी सी चिंगारी ने सूखी फसल को आग की चपेट में ले लिया। तेज हवा के कारण आग तेजी से फैलती चली गई और किसानों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। खेतों में खड़ी फसल, जो उनकी सालभर की आजीविका का आधार थी, पलभर में खत्म हो गई।घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक टीम मौके पर पहुंच गई। दमकल विभाग की तीन गाड़ियों ने ग्रामीणों के सहयोग से कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। मौके पर 112 पीआरबी टीम और नगर थाना अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह अपनी टीम के साथ मौजूद रहे। नेकपाल धीरेन्द्र सिंह ने भी मौके पर पहुंचकर नुकसान का प्रारंभिक आकलन शुरू कर दिया है, जबकि प्रधान प्रतिनिधि प्रशांत मिश्रा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण घटनास्थल पर मौजूद रहे।</div>
<div> </div>
<div>पीड़ित किसानों ने प्रशासन से तत्काल सर्वे कराकर उचित मुआवजा दिलाने की मांग की है। उनका कहना है कि यह फसल ही उनके परिवार के पूरे वर्ष के खर्च का आधार थी और इस नुकसान से वे आर्थिक संकट में आ गए हैं।</div>
<div> </div>
<div>यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब जिले भर में गेहूं की कटाई जोरों पर है। कंबाइन मशीनों के संचालन में लापरवाही के चलते इस तरह की आग की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, जिससे किसानों को लगातार भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 19:53:18 +0530</pubDate>
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