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                <title>global oil supply crisis - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>global oil supply crisis RSS Feed</description>
                
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                <title>संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में होर्मुज पर सैन्य कार्रवाई वाले प्रस्ताव पर रूस-चीन-फ्रांस का वीटो</title>
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                        <![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए सैन्य कार्रवाई की अनुमति देने वाले अहम प्रस्ताव पर बड़ा गतिरोध पैदा हो गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस, चीन और फ्रांस ने इस प्रस्ताव को समर्थन देने से इनकार कर दिया, जिसके चलते बहरीन और अन्य खाड़ी देशों द्वारा समर्थित यह पहल फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरीन द्वारा तैयार इस प्रस्ताव में सदस्य देशों और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक बलों को ‘सभी आवश्यक साधनों’ के उपयोग की अनुमति देने की मांग की गई थी,</p>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175054/russia-china-france-veto-the-resolution-for-military-action-on-hormuz-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/navjivanindia_2026-04-03_u6ccgbbw_unsc.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में होर्मुज स्ट्रेट को खोलने के लिए सैन्य कार्रवाई की अनुमति देने वाले अहम प्रस्ताव पर बड़ा गतिरोध पैदा हो गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, रूस, चीन और फ्रांस ने इस प्रस्ताव को समर्थन देने से इनकार कर दिया, जिसके चलते बहरीन और अन्य खाड़ी देशों द्वारा समर्थित यह पहल फिलहाल ठंडे बस्ते में चली गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरीन द्वारा तैयार इस प्रस्ताव में सदस्य देशों और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक बलों को ‘सभी आवश्यक साधनों’ के उपयोग की अनुमति देने की मांग की गई थी, ताकि समुद्री मार्गों पर अंतरराष्ट्रीय आवाजाही बाधित न हो। हालांकि, सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य रूस, चीन और फ्रांस ने स्पष्ट कर दिया कि वे सैन्य बल के इस्तेमाल की इजाजत देने वाली भाषा के पक्ष में नहीं हैं। इस प्रस्ताव पर शुक्रवार को वोटिंग की संभावना है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर सहमति बनना अभी मुश्किल दिख रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सैन्य कार्रवाई को ‘अवास्तविक’ बताते हुए चेतावनी दी कि इससे तट पर तैनात ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स और उनकी बैलिस्टिक मिसाइलों का खतरा और बढ़ सकता है। कई हफ्तों की बंद कमरे में चली बातचीत के बावजूद प्रस्ताव में सिर्फ चार संशोधन ही हो सके हैं, जबकि ‘सभी आवश्यक साधनों’ वाली धारा पर अब भी सहमति नहीं बन पाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल के साथ युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने इस रणनीतिक समुद्री मार्ग को बंद कर दिया था। दुनिया के लगभग 20% तेल और गैस की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है। इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर गहरा असर पड़ा है—तेल, शिपिंग और बीमा की लागत बढ़ गई है, जबकि कतर जैसे देशों को अपना उत्पादन रोकना पड़ा, जिससे उन्हें सालाना 20 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस नाकेबंदी के बीच ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों और बुनियादी ढांचों पर हजारों जवाबी हमले किए, जिनमें कम से कम 18 नागरिकों की मौत हुई है। बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लतीफ बिन राशिद अल ज़यानी ने ईरान पर ‘आक्रामक’ और ‘पूर्व नियोजित’ हमलों का आरोप लगाया है, जिसमें नागरिक ढांचों को निशाना बनाया गया। वहीं, ईरान ने संकेत दिया है कि वह जंग के बीच होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों की निगरानी जारी रखेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्ध ने ईरान और उसके पड़ोसी देशों के बीच सुधरते रिश्तों को झटका दिया है, जबकि अब मध्यस्थता की भूमिका ओमान और कतर के बजाय पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र निभा रहे हैं। सऊदी अरब स्थित थिंक टैंक गल्फ रिसर्च सेंटर के अध्यक्ष अब्दुलअजीज सागर ने कहा कि किसी भी संभावित युद्धविराम समझौते में ईरान की खाड़ी देशों पर हमले की क्षमता और होर्मुज के समुद्री यातायात पर उसके नियंत्रण को शामिल करना जरूरी होगा। उन्होंने साफ कहा कि “जो हुआ है, उसे भुलाया नहीं जा सकता।”</p>]]>
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                                                            <category>WORLD NEWS</category>
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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 21:06:43 +0530</pubDate>
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                <title>होर्मुज संकट के बीच वैश्विक तनाव और संवाद की आवश्यकता,होरमुज संकट का समाधान बातचीत से ही सम्भव</title>
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                        <![CDATA[<div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा वैश्विक संकट बन चुका है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, इस समय संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। यहां से गुजरने वाले तेल और गैस की आपूर्ति पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा प्रभाव वैश्विक बाजार, महंगाई और आम जनजीवन पर पड़ता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन बैठक</div>...]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174987/global-tension-amid-hormuz-crisis-and-need-for-dialogue-solution"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहा तनाव अब केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसा वैश्विक संकट बन चुका है जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, इस समय संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। यहां से गुजरने वाले तेल और गैस की आपूर्ति पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा प्रभाव वैश्विक बाजार, महंगाई और आम जनजीवन पर पड़ता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन बैठक में साठ से अधिक देशों ने भाग लिया, जिसमें इस संकट को सुलझाने के उपायों पर विचार किया गया। इस बैठक में भारत ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस पूरे संकट का समाधान केवल बातचीत और शांति के माध्यम से ही संभव है। भारत का यह रुख उसकी पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप है, जिसमें वह हमेशा संवाद, संयम और संतुलन को प्राथमिकता देता रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत द्वारा यह भी बताया गया कि इस संघर्ष में अब तक केवल भारतीय नागरिकों की मृत्यु हुई है, जो विदेशी जहाजों पर काम कर रहे थे। यह तथ्य इस संकट की गंभीरता को और बढ़ा देता है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि युद्ध का प्रभाव सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह निर्दोष लोगों की जान भी लेता है। भारत का यह बयान एक प्रकार से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चेतावनी भी है कि यदि समय रहते स्थिति को नियंत्रित नहीं किया गया तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">दूसरी ओर, अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस संघर्ष को अपनी रणनीतिक दृष्टि से देख रहे हैं। अमेरिकी नेतृत्व द्वारा दिए गए बयान इस बात का संकेत देते हैं कि वे इस युद्ध को अपनी शक्ति और प्रभुत्व स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। हालांकि उन्होंने बातचीत की बात भी की है, लेकिन उनके वक्तव्यों में कठोरता और चेतावनी का स्वर अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। इस प्रकार के विरोधाभासी संकेत स्थिति को और जटिल बना देते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">ईरान की ओर से भी कड़ा रुख अपनाया गया है। उसने स्पष्ट किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य उसके नियंत्रण में है और यह तभी खुलेगा जब उसकी शर्तों को स्वीकार किया जाएगा। यह स्थिति न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर तनाव को बढ़ाने वाली है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है, तो तेल की आपूर्ति में भारी कमी आ सकती है, जिससे विश्वभर में ऊर्जा संकट उत्पन्न हो सकता है। इस संघर्ष का एक और गंभीर पहलू मानवीय संकट है। विभिन्न देशों में हजारों लोगों की जान जा चुकी है और लाखों लोग घायल या विस्थापित हुए हैं। अस्पतालों, स्कूलों और अन्य बुनियादी ढांचों को भारी नुकसान पहुंचा है। यह स्थिति दर्शाती है कि युद्ध केवल सैनिकों के बीच नहीं होता, बल्कि इसका सबसे बड़ा खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इस स्थिति पर चिंता व्यक्त की है और युद्धविराम की अपील की है। उनका मानना है कि यदि यह संघर्ष जारी रहा तो इसके परिणामस्वरूप वैश्विक आर्थिक मंदी, खाद्य संकट और सामाजिक अस्थिरता जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। विशेष रूप से विकासशील देशों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर होगा, क्योंकि वे पहले से ही आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं।भारत का रुख इस पूरे परिदृश्य में संतुलित और दूरदर्शी दिखाई देता है। उसने न तो किसी पक्ष का समर्थन किया है और न ही किसी के खिलाफ आक्रामक बयान दिए हैं। इसके बजाय उसने शांति और संवाद का मार्ग अपनाने की अपील की है। यह नीति न केवल भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी आवश्यक है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं, इस प्रकार के संकट से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता पर पड़ता है। इसलिए भारत का यह प्रयास कि स्थिति को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाए, पूरी तरह से व्यावहारिक और आवश्यक है।वर्तमान परिस्थिति यह स्पष्ट संकेत देती है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इतिहास गवाह है कि युद्धों ने केवल विनाश और पीड़ा ही दी है। इसके विपरीत, संवाद और सहयोग के माध्यम से ही स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है। इसलिए सभी देशों को अपने मतभेदों को भुलाकर एक साथ बैठकर समाधान खोजने की आवश्यकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि होर्मुज संकट केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए एक चुनौती है। इस चुनौती का सामना केवल शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि समझदारी, संयम और संवाद से किया जा सकता है। यदि विश्व समुदाय समय रहते सही कदम उठाता है, तो इस संकट को टाला जा सकता है और एक स्थिर तथा शांतिपूर्ण भविष्य की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]>
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                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 18:54:39 +0530</pubDate>
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