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                <title>Internal Security India - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>मुख्यधारा की ओर लौटते कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक बार फिर बड़ी सफलता मिली है। राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मंगलवार को भाकपा (माओवादी) के 16 सक्रिय नक्सलियों ने हथियारों और 1,562 गोलियों के साथ झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें संगठन के कई महत्वपूर्ण कमांडर और दस्ता सदस्य शामिल हैं। यह केवल 16 लोगों का आत्मसमर्पण नहीं है बल्कि माओवादी संगठन की कमजोर होती पकड़ और मुख्यधारा की ओर बढ़ते विश्वास का</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184267/steps-back-towards-mainstream"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1200-675-27246097-thumbnail-16x9-naxal-aspera.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक बार फिर बड़ी सफलता मिली है। राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मंगलवार को भाकपा (माओवादी) के 16 सक्रिय नक्सलियों ने हथियारों और 1,562 गोलियों के साथ झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें संगठन के कई महत्वपूर्ण कमांडर और दस्ता सदस्य शामिल हैं। यह केवल 16 लोगों का आत्मसमर्पण नहीं है बल्कि माओवादी संगठन की कमजोर होती पकड़ और मुख्यधारा की ओर बढ़ते विश्वास का संकेत भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आत्मसमर्पण करने वालों में एक रीजनल कमेटी सदस्य, दो सब-जोनल कमेटी सदस्य, तीन एरिया कमेटी सदस्य, छह पार्टी सदस्य तथा चार दस्ता सदस्य शामिल हैं। इन सभी ने पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक के समक्ष हथियार डालकर हिंसा का रास्ता छोड़ने की घोषणा की। पुलिस के अनुसार अधिकांश नक्सली पश्चिमी सिंहभूम के कोल्हान और सारंडा क्षेत्र में सक्रिय थे जबकि दो सदस्य लातेहार क्षेत्र में सक्रिय रहे। यह सभी माओवादी संगठन के शीर्ष नेताओं मिसिर बेसरा उर्फ सागर  तथा केंद्रीय कमेटी सदस्य असीम मंडल के नेटवर्क से जुड़े हुए थे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड पुलिस का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में नक्सल विरोधी अभियानों ने संगठन की कमर तोड़ दी है। लगातार हो रही मुठभेड़ों, गिरफ्तारी और विकास कार्यों के कारण संगठन का जनाधार कमजोर हुआ है। दूसरी ओर संगठन के भीतर शोषण, संसाधनों की कमी, सुरक्षा बलों का बढ़ता दबाव और भविष्य की अनिश्चितता ने भी कई नक्सलियों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया है। सरकार की पुनर्वास नीति उन्हें सम्मानजनक जीवन और रोजगार का अवसर उपलब्ध करा रही है, जिससे उनका भरोसा बढ़ा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को राज्य सरकार की नीति के तहत आर्थिक सहायता, आवास, कौशल विकास प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर तथा समाज की मुख्यधारा में पुनर्वास की सुविधा दी जाएगी। गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को छोड़कर अन्य मामलों में कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप राहत भी दी जाती है। यही कारण है कि अब कई नक्सली संगठन छोड़कर सामान्य जीवन अपनाने का निर्णय ले रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 में अब तक 93 नक्सलियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसी अवधि में 45 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है जबकि सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ों में 22 नक्सली मारे गए हैं। ताजा आत्मसमर्पण के बाद इस वर्ष मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों की संख्या बढ़कर 61 हो गई है। यह दर्शाता है कि सरकार की रणनीति केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है बल्कि पुनर्वास के माध्यम से स्थायी समाधान की दिशा में भी आगे बढ़ रही है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यदि पिछले दो वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी स्पष्ट होती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा विभिन्न राज्यों की रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2025 और वर्ष 2026 के दौरान देशभर में लगभग 1,100 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा का रास्ता चुना है। इनमें सबसे अधिक आत्मसमर्पण छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना में हुए हैं। अकेले झारखंड में भी पिछले दो वर्षों के दौरान सौ से अधिक नक्सली हथियार छोड़ चुके हैं। यह संख्या बताती है कि माओवादी संगठन के भीतर लगातार असंतोष बढ़ रहा है और उसकी भर्ती तथा संचालन क्षमता पहले की तुलना में काफी कमजोर हुई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वर्ष 2025 में घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से वामपंथी उग्रवाद का प्रभाव लगभग समाप्त कर दिया जाएगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने संयुक्त अभियान चलाए। आधुनिक तकनीक, ड्रोन, बेहतर खुफिया तंत्र, विशेष बलों की तैनाती, सड़कों का निर्माण, मोबाइल नेटवर्क का विस्तार और विकास योजनाओं को तेजी से लागू किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जिन इलाकों में कभी माओवादी संगठन का मजबूत प्रभाव था वहां अब सरकारी योजनाएं पहुंच रही हैं और स्थानीय लोगों का विश्वास बढ़ रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल हथियारों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए सामाजिक और आर्थिक विकास भी उतना ही आवश्यक है। जिन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पेयजल और रोजगार की सुविधाएं पहुंची हैं वहां नक्सलवाद स्वतः कमजोर पड़ा है। आदिवासी युवाओं को रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसर मिलने से वे हिंसा के रास्ते से दूर हो रहे हैं। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में पूर्व नक्सली सामान्य जीवन अपनाकर खेती, व्यवसाय, नौकरी और अन्य कार्यों से जुड़ रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र तथा झारखंड के कुछ वन क्षेत्रों में माओवादी संगठन की सीमित मौजूदगी बनी हुई है। संगठन के शीर्ष नेता अभी भी नए सदस्यों की भर्ती और गतिविधियों को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए सुरक्षा बलों की सतर्कता और विकास कार्यों की निरंतरता दोनों आवश्यक हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड में हुए इस ताजा आत्मसमर्पण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि हिंसा का रास्ता अंततः विनाश की ओर ले जाता है जबकि लोकतंत्र और विकास का रास्ता सम्मानजनक जीवन प्रदान करता है। जो लोग कभी बंदूक के बल पर व्यवस्था बदलने का सपना देखते थे, वे आज समाज की मुख्यधारा में लौटकर नए जीवन की शुरुआत करना चाहते हैं। यह परिवर्तन केवल सरकार की सफलता नहीं बल्कि उन परिवारों की भी जीत है जो वर्षों से अपने बच्चों को हिंसा से दूर देखना चाहते थे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नक्सलवाद के खिलाफ अभियान की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब बंदूक की जगह शिक्षा होगी, बारूद की जगह विकास होगा और भय की जगह विश्वास का वातावरण बनेगा। झारखंड में लगातार बढ़ते आत्मसमर्पण इस दिशा में सकारात्मक संकेत हैं। यदि सुरक्षा अभियान, पुनर्वास नीति और विकास कार्य इसी गति से आगे बढ़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की पहचान हिंसा से नहीं बल्कि विकास, शिक्षा और समृद्धि से होगी। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत और देश के लिए सबसे सकारात्मक संदेश होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 21:45:24 +0530</pubDate>
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                <title>समृद्ध और सुरक्षित राष्ट्र के लिए घुसपैठियों से मुक्ति आवश्यक</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत एक प्राचीन सभ्यता और मजबूत लोकतंत्र है, जिसकी सीमाएं केवल भौगोलिक रेखाएं नहीं बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता की सुरक्षा दीवार हैं। इन सीमाओं को पार कर होने वाली अवैध घुसपैठ का सीधा असर देश के सामाजिक संतुलन, आर्थिक संसाधनों और आंतरिक सुरक्षा पर पड़ता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कोई भी राष्ट्र अवैध प्रवासन को स्वीकार नहीं करता, जिसका उदाहरण हाल के वर्षों में अमेरिका जैसे देशों द्वारा उठाए गए सख्त कदमों में देखा जा सकता है। भारत के लिए 'घुसपैठ मुक्त राष्ट्र' का संकल्प केवल सुरक्षात्मक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक विकसित और खुशहाल समाज</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175693/freedom-from-infiltrators-is-necessary-for-a-prosperous-and-secure"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas7.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">भारत एक प्राचीन सभ्यता और मजबूत लोकतंत्र है, जिसकी सीमाएं केवल भौगोलिक रेखाएं नहीं बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता की सुरक्षा दीवार हैं। इन सीमाओं को पार कर होने वाली अवैध घुसपैठ का सीधा असर देश के सामाजिक संतुलन, आर्थिक संसाधनों और आंतरिक सुरक्षा पर पड़ता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कोई भी राष्ट्र अवैध प्रवासन को स्वीकार नहीं करता, जिसका उदाहरण हाल के वर्षों में अमेरिका जैसे देशों द्वारा उठाए गए सख्त कदमों में देखा जा सकता है। भारत के लिए 'घुसपैठ मुक्त राष्ट्र' का संकल्प केवल सुरक्षात्मक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक विकसित और खुशहाल समाज की अनिवार्य शर्त है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">​भौगोलिक दृष्टि से भारत की सीमाएं अत्यंत संवेदनशील हैं, क्योंकि पड़ोस में स्थित कुछ देशों का रुख सदैव मित्रवत नहीं रहा है। घुसपैठ के साथ जुड़ा तस्करी, जाली मुद्रा और आतंकवादी गतिविधियों का नेटवर्क यह स्पष्ट करता है कि सीमा प्रबंधन केवल सैन्य चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नीति का अभिन्न हिस्सा है। जब अवैध रूप से आए लोग बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के भारत में बस जाते हैं, तो वे न केवल कानून-व्यवस्था को चुनौती देते हैं बल्कि देश के सीमित संसाधनों पर भी बोझ बढ़ाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ, जो वैध नागरिकों के लिए है, उन तक पहुँचने लगता है, जो अंततः भारतीय नागरिकों के अधिकारों का हनन है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">​राष्ट्र के प्रति समर्पण का अर्थ केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा और भविष्य के प्रति जिम्मेदारी है। एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत की केन्द्र सरकार देश की सीमाओं पर आधुनिक तकनीक, जैसे ड्रोन निगरानी, स्मार्ट सर्विलांस और सख्त पहचान प्रणाली को अंतिम रूप देने के लिए संकल्पित और प्रयासरत है।किंतु सीमाओं की लंबाई और जटिल भौगोलिक स्थितियां अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। अवैध प्रवासन न केवल सुरक्षा बल्कि सामाजिक असंतोष का कारण भी बनता है, जिससे स्थानीय डेमोग्राफी में बदलाव आता है तथा वहां की आबादी की सांस्कृतिक पहचान और आजीविका पर संकट खड़ा हो जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">​यद्यपि भारत 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना के साथ शरणार्थियों को आश्रय देने का पक्षधर रहा है, परंतु 'मानवीय आधार पर दी गई शरण' और 'अवैध घुसपैठ' के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है। शरणार्थियों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत संरक्षण दिया जा सकता है, लेकिन अवैध घुसपैठ को किसी भी स्थिति में वैधता नहीं दी जा सकती। इस समस्या के समाधान के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि जागरूक नागरिक और स्थानीय प्रशासन का सहयोग भी अनिवार्य है। राष्ट्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल सैनिकों की नहीं, बल्कि हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">​आज जब भारत वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, तब आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना समय की मांग है। सुरक्षित सीमाएं और स्पष्ट राष्ट्रीय नीति ही आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कर सकती हैं। यह संकल्प किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध नहीं बल्कि कानून के शासन को सुदृढ़ करने के लिए है। सीमावर्ती राज्यों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर इस समस्या पर ध्यान देना होगा तथा केन्द्र के साथ सहयोग करना होगा। क्योंकि जब राष्ट्र सुरक्षित होगा तभी विकास स्थायी होगा और भारत विश्व में एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित हो सकेगा। सुरक्षित सीमाएं ही विकसित भारत का मार्ग प्रशस्त करेंगी।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 18:19:53 +0530</pubDate>
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                <title>आतंकवाद और नक्सलवाद से मुक्ति के बाद भी सतर्कता बेहद जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर बीते वर्षों में जो परिवर्तन देखने को मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह निश्चित ही एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज किया जाएगा। केंद्र की</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नरेंद्र मोदी</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार ने एक बार फिर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि उसकी घोषणाएं केवल आश्वासन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संकल्प हैं जिन्हें समयबद्ध तरीके से पूरा किया जा सकता है। कश्मीर में आतंकवाद के प्रभाव में कमी और नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई ने लंबे समय से चले आ रहे सुरक्षा संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ वर्ष पहले तक</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लाल चौक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174874/even-after-freedom-from-terrorism-and-naxalism-vigilance-is-very"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/orpesnug_naxal-encounter-_640x480_30_april_24.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">देश की आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर बीते वर्षों में जो परिवर्तन देखने को मिला है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह निश्चित ही एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में दर्ज किया जाएगा। केंद्र की</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नरेंद्र मोदी</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार ने एक बार फिर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि उसकी घोषणाएं केवल आश्वासन नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि संकल्प हैं जिन्हें समयबद्ध तरीके से पूरा किया जा सकता है। कश्मीर में आतंकवाद के प्रभाव में कमी और नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई ने लंबे समय से चले आ रहे सुरक्षा संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कुछ वर्ष पहले तक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लाल चौक</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे संवेदनशील स्थानों पर आम नागरिकों का बेखौफ आना-जाना भी असंभव प्रतीत होता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन आज यहां सामान्य जीवन की वापसी एक सकारात्मक संकेत है। यह परिवर्तन केवल सैन्य कार्रवाई का परिणाम नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">रणनीतिक समन्वय और सुरक्षाबलों के सतत प्रयासों का समेकित प्रभाव है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">नक्सलवाद के संदर्भ में केंद्र और राज्यों के साझा प्रयासों ने निर्णायक मोड़ लाने का काम किया है। सरकार द्वारा निर्धारित समय सीमा </span>31 <span lang="hi" xml:lang="hi">मार्च </span>2026<span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तक इस समस्या को समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">और इसी दिशा में लगातार अभियान चलाए गए। सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुफिया तंत्र की सक्रियता और आत्मसमर्पण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन ने नक्सली संगठनों की जड़ों को कमजोर किया है। बड़ी संख्या में उग्रवादियों का आत्मसमर्पण इस बात का संकेत है कि हिंसा का रास्ता अब उनके लिए टिकाऊ विकल्प नहीं रह गया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">हालांकि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह उपलब्धि जितनी महत्वपूर्ण है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण इसे बनाए रखना है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी राष्ट्र ने सुरक्षा के मोर्चे पर ढिलाई बरती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब अस्थिरता ने पुनः सिर उठाया है। आतंकवाद और नक्सलवाद जैसी चुनौतियां केवल बंदूक की नोक से समाप्त नहीं होतीं</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">इनके पीछे वैचारिक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक और आर्थिक कारण भी होते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका निरंतर समाधान आवश्यक है।</span></p><p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सीमा पार से सक्रिय आतंकी ताकतें भारत की स्थिरता और प्रगति को सहज रूप से स्वीकार नहीं करेंगी। ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुफिया तंत्र की मजबूती और स्थानीय स्तर पर जनसहभागिता अत्यंत आवश्यक हो जाती है। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विकास की धारा को उन क्षेत्रों तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जहां कभी असंतोष ने उग्र रूप लिया था।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंततः</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि देश आज आतंकवाद और नक्सलवाद से मुक्ति की दिशा में एक मजबूत स्थिति में खड़ा है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि सुरक्षा एक सतत प्रक्रिया है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">न कि एक बार हासिल कर लेने वाली उपलब्धि। इसलिए सरकार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा बलों और आम नागरिकों सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि शांति और स्थिरता की यह उपलब्धि स्थायी बनी रहे</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> तभी देश वास्तव में एक सुरक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिर और समृद्ध भविष्य की ओर अग्रसर हो सकेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अरविंद रावल</span></strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 17:29:11 +0530</pubDate>
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