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                <title>अर्जुन - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>मैं सूतपुत्र कर्ण से नहीं करूंगी विवाह – द्रोपद पुत्री द्रौपदी</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखण्ड:-</strong> द्रौपदी के स्वयंवर सभा में जब अंगराज कर्ण ने नीचे पात्र में रखे तेल की छाया में मछली की आंख में निशान लगाने के लिए धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना चाहा तभी पांचाली बोल पड़ी—मैं नहीं करूंगी सूतपुत्र से विवाह। इस पर तर्क-वितर्क होने पर धृष्टद्युम्न ने कहा—स्वयंवर की घोषणा में बताया गया है कि कन्या की इच्छा पर निर्भर है कि वह किसे वरण करना चाहती है।</div>
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<div style="text-align:justify;">      पांचाली पांचाल देश के राजा द्रोपद की कन्या थी और वह अग्निकुंड से प्रकट हुई थी। इस कारण इन्हें अग्निसूता भी कहा जाता है। स्वयंवर सभा में वीर-महावीरों ने</div>
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<div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178243/i-will-not-marry-sutaputra-karna-%E2%80%93-draupada-daughter-draupadi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/news-2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>पाकुड़िया, पाकुड़, झारखण्ड:-</strong> द्रौपदी के स्वयंवर सभा में जब अंगराज कर्ण ने नीचे पात्र में रखे तेल की छाया में मछली की आंख में निशान लगाने के लिए धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना चाहा तभी पांचाली बोल पड़ी—मैं नहीं करूंगी सूतपुत्र से विवाह। इस पर तर्क-वितर्क होने पर धृष्टद्युम्न ने कहा—स्वयंवर की घोषणा में बताया गया है कि कन्या की इच्छा पर निर्भर है कि वह किसे वरण करना चाहती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   पांचाली पांचाल देश के राजा द्रोपद की कन्या थी और वह अग्निकुंड से प्रकट हुई थी। इस कारण इन्हें अग्निसूता भी कहा जाता है। स्वयंवर सभा में वीर-महावीरों ने भरपूर प्रयत्न करने के बाद भी प्रत्यंचा चढ़ाने में विफल रहे। तब ब्राह्मण वेषधारी कौंतेय ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर मछली की आंख को भेदते हुए सभी को अचंभित कर दिया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   कर्ण महावीर थे और मछली की आंख आसानी से भेद सकते थे, पर पांचाली ने विवाह नहीं करने की बात क्यों कही? क्या सूत होने के कारण ही द्रौपदी ने मना किया या इसके पीछे कई गूढ़ रहस्य छिपे हैं? यद्यपि उक्त प्रसंग हजारों वर्ष पूर्व का है, परन्तु प्रमाणिक तथ्यों की अनदेखी कर लोग, विशेषकर भारतीय ज्ञानपरक व राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा कर, उन गूढ़ रहस्यों को स्वार्थवश नहीं कहते और राष्ट्रीय जनजीवन को भ्रमित करते रहे हैं। इससे देश ही नहीं, भारत विरोधी तत्व भी देश की मान्य छवि को धुंधला करते रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   सनातन संस्कृति, धर्म एवं परम्पराओं में सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग में, ईसा की सातवीं सदी अर्थात भारत पर विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण से पूर्व तक, किसी प्रकार की जातीयता का प्रमाणिक उल्लेख नहीं मिलता। सनातन सांस्कृतिक मूल्य कर्म आधारित रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   कर्ण के संदर्भ में उल्लेखनीय है कि वे कौंतेय थे। गुरु द्वारा प्रदत्त सूर्य मंत्र का परीक्षण करने हेतु कुंती ने आह्वान किया और सूर्य भगवान प्रकट हुए। वहीं वरदान स्वरूप पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन उन्होंने कुंती को आशीर्वाद दिया कि वे कुमारी ही रहेंगी। लोकलाज के कारण उन्होंने बालक को गंगा में प्रवाहित कर दिया। कर्ण कवच-कुंडल लेकर जन्मे थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   दूसरी ओर कर्ण का पालन-पोषण एक सूत परिवार में हुआ और राधेय इनकी माता कही गईं। इसी कारण कर्ण राधेय भी कहलाए। उन दिनों रथ चलाने वाले को सूत कहा जाता था। जिस प्रकार आज वाहन चलाने वाले को चालक या ड्राइवर कहा जाता है, चाहे वह किसी भी वर्ग का हो।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   उपमा के तौर पर आज भी कोई सम्पन्न या रईस व्यक्ति किसी चालक से अपनी सुकन्या का विवाह करना पसंद नहीं करता। लोग कहते हैं कि द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के संकेत से ऐसा किया। पांचाली को कृष्णा भी कहा जाता है और भाई होने के नाते वे बहन के हित की ही सोचते।</div>
<div style="text-align:justify;">श्रीकृष्ण भगवान थे और पांचाली के पूर्व जन्मों के सभी कर्मों व इच्छाओं को भली-भांति जानते थे कि उनका परिणय किनके साथ होगा तथा भविष्य में कौन-कौन सी घटनाएं घटेंगी और उनका समाधान कैसे होगा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   कहा जाता है कि कौरव दल में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और कर्ण जैसे महारथी थे। इसे ध्यान में रखते हुए संजय ने धृतराष्ट्र से कहा—महाराज, विजय दुर्योधन की होगी, परन्तु दुर्योधन सहित पांच को छोड़कर सभी मारे जाएंगे और अंततः भारी पराजय होगी। इस पर धृतराष्ट्र ने कहा—संजय, तुमने मुझसे कभी झूठ नहीं कहा, पर ऐसा कैसे हो सकता है?</div>
<div style="text-align:justify;">इस पर संजय ने विनम्र होकर कहा—महाराज, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इसके मूल में श्रीकृष्ण थे और वे सदैव सत्य और धर्म का पक्ष लेते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">   सनातन धर्म और संस्कृति कर्म आधारित रही है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अवधारणा के साथ विश्व कल्याण की कामना करती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>बिहार/झारखंड</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 05 May 2026 20:53:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>राजा परीक्षित जन्म कथा सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज (रायबरेली)। </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">क्षेत्र के छमनीखेड़ा गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन भक्ति और आस्था का अद्भुत माहौल देखने को मिला। नैमिषारण्य तीर्थ से पधारे कथा व्यास पंडित बृजनंदन शास्त्री ने राजा परीक्षित के जन्म की मार्मिक कथा सुनाई। उनके भावपूर्ण शब्दों ने श्रोताओं को गहराई तक छू लिया। कथा प्रसंग सुनकर कई श्रद्धालुओं की आंखें श्रद्धा से नम हो गईं। कथा व्यास ने महाभारत का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भीष्म पितामह बाणों की शैया पर लेटे थे।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">उनके शरीर से रक्त बह चुका था। युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव उनसे मिलने पहुंचे। भगवान</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174864/devotees-became-emotional-after-hearing-the-birth-story-of-raja"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260331-wa0301.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज (रायबरेली)। </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">क्षेत्र के छमनीखेड़ा गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के चौथे दिन भक्ति और आस्था का अद्भुत माहौल देखने को मिला। नैमिषारण्य तीर्थ से पधारे कथा व्यास पंडित बृजनंदन शास्त्री ने राजा परीक्षित के जन्म की मार्मिक कथा सुनाई। उनके भावपूर्ण शब्दों ने श्रोताओं को गहराई तक छू लिया। कथा प्रसंग सुनकर कई श्रद्धालुओं की आंखें श्रद्धा से नम हो गईं। कथा व्यास ने महाभारत का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भीष्म पितामह बाणों की शैया पर लेटे थे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">उनके शरीर से रक्त बह चुका था। युद्ध समाप्त होने के बाद पांडव उनसे मिलने पहुंचे। भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन से संवाद के बाद भीष्म पितामह ने देह त्याग दी। उसी समय अर्जुन के धनुष से मां गंगा का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने आगे कहा कि भीष्म पितामह के पंचतत्व में विलीन होने पर पांडव शोक में डूब गए। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि किसी प्राणी के जाने पर विलाप नहीं करना चाहिए। ऐसे समय में संकीर्तन और गरुड़ पुराण का श्रवण करना चाहिए। यही सच्चा मार्ग है। कथा के दौरान राजा परीक्षित के जन्म का प्रसंग भी सुनाया गया। महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण द्वारका लौटे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसी बीच अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी ने एक बालक को जन्म दिया। पांडवों ने उसका नाम विष्णुरात रखा। बाद में वही बालक परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कथा के इस प्रसंग ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम में ग्राम प्रधान ऋतुराज सिंह, प्रोफेसर आरके सिंह, केशव प्रसाद तिवारी, संजय तिवारी, बच्चू दीक्षित, बेटऊनू भैया, आनंद तिवारी, सत्यम त्रिपाठी, झब्बू भैया, गोलू, शिवम, रज्जन तिवारी, संदीप तिवारी, धनंजय, शंकरजी, लल्लन, बच्चाबाबू, नयन, रतन तिवारी, मदन, रिंकू, राहुल, सूरज तिवारी, दुर्गाशंकर तिवारी, बसंत तिवारी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पश्चिमी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 19:53:01 +0530</pubDate>
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