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                <title>Kantilal Mandot Article - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Kantilal Mandot Article RSS Feed</description>
                
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                <title>&quot;नीट में बदलता सामाजिक परिदृश्य&quot;</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">परीक्षा यानी नीट अब केवल मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की परीक्षा भर नहीं रह गई है। यह देश के सामाजिक शैक्षणिक और आर्थिक बदलावों का भी आईना बन चुकी है। वर्ष 2026 के परिणामों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत में उच्च शिक्षा विशेषकर मेडिकल शिक्षा तक पहुंच का दायरा लगातार व्यापक हो रहा है। इस वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि ओबीसी वर्ग के छात्रों की सफलता सबसे अधिक रही है। वहीं अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर छोटे राज्यों और केंद्र</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183679/changing-social-scenario-in-neet"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/2042cbf4e6b79b201992fc2a0118d34f_original.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">परीक्षा यानी नीट अब केवल मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की परीक्षा भर नहीं रह गई है। यह देश के सामाजिक शैक्षणिक और आर्थिक बदलावों का भी आईना बन चुकी है। वर्ष 2026 के परिणामों ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भारत में उच्च शिक्षा विशेषकर मेडिकल शिक्षा तक पहुंच का दायरा लगातार व्यापक हो रहा है। इस वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि ओबीसी वर्ग के छात्रों की सफलता सबसे अधिक रही है। वहीं अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने सफलता प्रतिशत के मामले में बड़े राज्यों को पीछे छोड़कर यह साबित किया है कि गुणवत्तापूर्ण तैयारी और बेहतर शैक्षणिक वातावरण आकार से अधिक महत्वपूर्ण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस वर्ष नीट में सबसे बड़ा वर्ग अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी का रहा। कुल पंजीकरण में ओबीसी छात्रों की हिस्सेदारी 41.8 प्रतिशत रही जबकि सफल छात्रों में यह बढ़कर 45.7 प्रतिशत पहुंच गई। इसका अर्थ है कि लगभग हर दूसरा सफल छात्र ओबीसी वर्ग से है। यह केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव का मजबूत संकेत भी है। पिछले कई वर्षों में शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने वाली सरकारी योजनाओं छात्रवृत्तियों और आरक्षण व्यवस्था ने इस वर्ग के छात्रों को आगे बढ़ने का अवसर दिया है। अब उसका प्रभाव परिणामों में स्पष्ट दिखाई देने लगा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों की भागीदारी में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2019 की तुलना में अनुसूचित जाति के छात्रों की संख्या में 63.52 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जबकि अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या लगभग 57 प्रतिशत बढ़ी है। यह दर्शाता है कि देश के दूरदराज और सामाजिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों में भी शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। पहले जहां मेडिकल शिक्षा केवल कुछ वर्गों तक सीमित मानी जाती थी वहीं अब समाज के सभी वर्गों के छात्र इस क्षेत्र में अपनी जगह बना रहे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस के छात्रों की वृद्धि सबसे तेज रही है। वर्ष 2020 से 2026 के बीच इस वर्ग के परीक्षार्थियों की संख्या में 76.30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण और सहायता का लाभ बड़ी संख्या में छात्रों तक पहुंच रहा है। इससे ऐसे परिवारों के विद्यार्थियों को भी मेडिकल शिक्षा का सपना पूरा करने का अवसर मिल रहा है जिनके लिए पहले यह राह कठिन थी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सामान्य वर्ग के छात्रों की संख्या में भी वृद्धि हुई है लेकिन यह अन्य वर्गों की तुलना में काफी कम रही। वर्ष 2019 से 2026 के बीच सामान्य वर्ग के परीक्षार्थियों में लगभग 24.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे स्पष्ट होता है कि अब मेडिकल शिक्षा की दौड़ में नए सामाजिक वर्ग तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और प्रतियोगिता पहले की तुलना में अधिक व्यापक हो गई है।इन आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत में शिक्षा का लोकतंत्रीकरण तेजी से हो रहा है। मेडिकल जैसी प्रतिष्ठित शिक्षा अब केवल कुछ चुनिंदा वर्गों तक सीमित नहीं रही। सरकारी योजनाएं छात्रवृत्ति डिजिटल शिक्षा ऑनलाइन कोचिंग और ग्रामीण क्षेत्रों तक बढ़ती शैक्षणिक सुविधाओं ने इस परिवर्तन को गति दी है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राज्यों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो एक और दिलचस्प तस्वीर सामने आती है। सफलता प्रतिशत के मामले में छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सबसे आगे रहे। चंडीगढ़ में 2622 छात्रों में से 70 प्रतिशत से अधिक छात्रों ने परीक्षा उत्तीर्ण की। मिजोरम मणिपुर नगालैंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने भी शानदार प्रदर्शन किया। इन राज्यों में परीक्षार्थियों की संख्या कम होने के बावजूद सफलता का प्रतिशत काफी अधिक रहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">छोटे राज्यों की इस सफलता के पीछे कई कारण माने जा सकते हैं। वहां छात्रों की संख्या कम होने से शिक्षा व्यवस्था पर दबाव अपेक्षाकृत कम रहता है। शिक्षकों और छात्रों के बीच बेहतर संवाद होता है। कई राज्यों में सरकारी और निजी संस्थानों द्वारा प्रतियोगी परीक्षाओं की विशेष तैयारी भी कराई जाती है। इसके अलावा विद्यार्थियों में लक्ष्य के प्रति स्पष्टता और अनुशासन भी सफलता का महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बड़े राज्यों की स्थिति अलग रही। उत्तर प्रदेश से सबसे अधिक 3.28 लाख छात्रों ने परीक्षा दी लेकिन इनमें से लगभग 52 प्रतिशत ही सफल हो सके। महाराष्ट्र में लगभग 53 प्रतिशत और बिहार में लगभग 49 प्रतिशत छात्र सफल रहे। इन राज्यों में परीक्षार्थियों की संख्या बहुत अधिक होने के कारण प्रतियोगिता भी बेहद कठिन होती है। इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच संसाधनों का अंतर भी परिणामों को प्रभावित करता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राजस्थान इस मामले में सबसे बड़ा अपवाद बनकर सामने आया। लगभग 1.92 लाख परीक्षार्थियों में से 69.34 प्रतिशत छात्रों का सफल होना पूरे देश के लिए चर्चा का विषय है। पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान विशेषकर कोटा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यहां विकसित कोचिंग व्यवस्था अनुभवी शिक्षकों और प्रतिस्पर्धी माहौल का सकारात्मक प्रभाव परिणामों में दिखाई देता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">टॉप रैंक हासिल करने वाले छात्रों का विश्लेषण भी कई महत्वपूर्ण संकेत देता है। शीर्ष 138 छात्रों में 109 लड़के और 29 लड़कियां शामिल हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि लड़कियों की भागीदारी लगातार बढ़ने के बावजूद शीर्ष स्थानों पर अभी भी लड़कों का दबदबा बना हुआ है। आने वाले वर्षों में लड़कियों को और बेहतर अवसर तथा संसाधन उपलब्ध कराने की आवश्यकता बनी रहेगी।राज्यवार देखें तो शीर्ष रैंक प्राप्त करने वालों में राजस्थान सबसे आगे रहा। इसके बाद महाराष्ट्र तमिलनाडु दिल्ली पंजाब उत्तर प्रदेश गुजरात हरियाणा तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का स्थान रहा। यह सूची बताती है कि जहां मजबूत शैक्षणिक ढांचा और प्रतियोगी माहौल उपलब्ध है वहां से बड़ी संख्या में उत्कृष्ट परिणाम सामने आते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नीट 2026 के परिणाम केवल परीक्षा का परिणाम नहीं बल्कि भारत के बदलते सामाजिक और शैक्षणिक स्वरूप की कहानी भी हैं। पिछड़े वर्गों की बढ़ती भागीदारी आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की तेज प्रगति छोटे राज्यों का बेहतर प्रदर्शन और राजस्थान जैसे राज्यों की सफलता यह सभी संकेत देते हैं कि देश में प्रतिभा अब किसी एक क्षेत्र या वर्ग तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में यदि शिक्षा की गुणवत्ता समान रूप से पूरे देश में उपलब्ध कराई जाए ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर विद्यालय और विज्ञान शिक्षा को बढ़ावा मिले तथा आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को पर्याप्त सहायता मिलती रहे तो भारत को और अधिक योग्य डॉक्टर मिलेंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इससे केवल स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होगी बल्कि सामाजिक समानता और अवसरों की बराबरी का सपना भी और मजबूत होगा।नीट 2026 ने यह साबित कर दिया है कि मेहनत अवसर और सही नीतियां मिल जाएं तो देश का हर वर्ग और हर क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का परिचय दे सकता है। यही बदलते भारत की सबसे बड़ी पहचान है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 22:42:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>&quot;महिला आरक्षण और परिसीमन के लिए बहुमत की तलाश में एनडीए की नई राजनीतिक चाल&quot;</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">देश की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां संसद के भीतर संख्या बल सबसे बड़ी ताकत बन गया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार महिला आरक्षण कानून को लागू करने और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को संसद से पारित कराना चाहती है। इन दोनों विषयों पर संविधान संशोधन आवश्यक है और इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए लगातार अपना संख्याबल बढ़ाने में जुटे हैं। इसी रणनीति के तहत अब महाराष्ट्र</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/183677/ndas-new-political-move-in-search-of-majority-for-women"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/women-reservation-bil-final-1776339283956_m.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">देश की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां संसद के भीतर संख्या बल सबसे बड़ी ताकत बन गया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार महिला आरक्षण कानून को लागू करने और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयकों को संसद से पारित कराना चाहती है। इन दोनों विषयों पर संविधान संशोधन आवश्यक है और इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए लगातार अपना संख्याबल बढ़ाने में जुटे हैं। इसी रणनीति के तहत अब महाराष्ट्र की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों को फिर से एक करने और उन्हें एनडीए में शामिल करने की कोशिशों की चर्चा तेज हो गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भाजपा नेतृत्व ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के दोनों गुटों के बीच समझौते का रास्ता निकालने का सुझाव दिया है। चर्चा यह भी है कि यदि दोनों गुट एक हो जाते हैं और एनडीए का हिस्सा बनते हैं तो केंद्र सरकार में दो कैबिनेट पद देने का प्रस्ताव भी सामने रखा गया है। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम पर किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरी कवायद के पीछे सबसे बड़ा कारण संसद में दो तिहाई बहुमत का लक्ष्य है। संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता। सरकार को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विशेष बहुमत चाहिए। पिछले विशेष सत्र में सरकार को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया था जिसके बाद भाजपा ने अपने सहयोगियों का दायरा बढ़ाने और विपक्षी दलों में नए राजनीतिक समीकरण बनाने की रणनीति तेज कर दी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार आज भी सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। पांच दशक से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने राज्य की राजनीति की दिशा कई बार बदली है। वे चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और केंद्र में रक्षा मंत्री तथा कृषि मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद भी संभाल चुके हैं। सहकारी क्षेत्र चीनी मिलों कृषि संस्थाओं और ग्रामीण राजनीति पर उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है। यही वजह है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी राजनीतिक उपयोगिता कम नहीं हुई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की स्थापना शरद पवार ने 10 जून 1999 को पी ए संगमा और तारिक अनवर के साथ की थी। वर्ष 2023 में पार्टी दो हिस्सों में बंट गई जब उनके भतीजे अजित पवार अपने समर्थक विधायकों के साथ अलग हो गए और बाद में भाजपा तथा शिवसेना शिंदे गुट की सरकार में शामिल हो गए। फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने मूल एनसीपी का नाम और घड़ी चुनाव चिन्ह अजित पवार गुट को दे दिया। इसके बाद शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी का नाम एनसीपी शरदचंद्र पवार रखा गया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी शरदचंद्र पवार राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी इंडिया गठबंधन का हिस्सा मानी जाती है। महाराष्ट्र में भी यह दल महा विकास अघाड़ी के साथ रहा है जिसमें कांग्रेस और शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट शामिल हैं। हालांकि हाल के दिनों में ऐसी खबरें सामने आई हैं कि पार्टी के भीतर भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर अलग अलग राय है। कुछ नेता भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के साथ जाने के पक्ष में बताए जा रहे हैं जबकि कुछ कांग्रेस के साथ और मजबूत संबंध चाहते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकसभा में शरद पवार की पार्टी के पास फिलहाल 8 सांसद हैं जबकि महाराष्ट्र विधानसभा में उसके लगभग 10 विधायक हैं। संख्या बहुत बड़ी नहीं है लेकिन संविधान संशोधन जैसे मामलों में हर वोट की अहमियत बढ़ जाती है। यदि शरद पवार का पूरा दल एनडीए के साथ आता है तो लोकसभा और राज्यसभा दोनों में सरकार की स्थिति और मजबूत हो सकती है। यही वजह है कि भाजपा इस संभावना को गंभीरता से देख रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">सूत्रों के अनुसार भाजपा की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि यदि दोनों एनसीपी गुट एक हो जाते हैं तो सत्ता और संगठन में उचित भागीदारी दी जाएगी। वहीं दूसरी ओर शरद पवार गुट के भीतर भी अलग अलग मांगों की चर्चा है। सुप्रिया सुले को बड़ी भूमिका देने की बात हो रही है जबकि कुछ रिपोर्टों में केंद्रीय मंत्री पद और अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों पर भी बातचीत का दावा किया गया है। हालांकि इन सभी बातों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक किसी पक्ष ने नहीं की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम में अजित पवार गुट की भूमिका भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह पहले से ही महाराष्ट्र की एनडीए सरकार का हिस्सा है। यदि दोनों गुटों का विलय होता है तो सत्ता और संगठन में संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच पदों और जिम्मेदारियों को लेकर मतभेद की खबरें भी सामने आई हैं। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह प्रक्रिया आसान नहीं होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">महिला आरक्षण कानून और परिसीमन दोनों ही ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा संबंध देश की भविष्य की राजनीतिक संरचना से है। महिला आरक्षण लागू होने के बाद लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित होंगी। वहीं परिसीमन के बाद जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की संख्या तथा सीमाओं में बदलाव हो सकता है। इन दोनों विषयों पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाना सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकसभा में एनडीए के पास बहुमत तो है लेकिन संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो तिहाई संख्या तक पहुंचने के लिए अभी भी अतिरिक्त समर्थन चाहिए। राज्यसभा में भी स्थिति लगभग यही है। ऐसे में छोटे और क्षेत्रीय दलों का महत्व अचानक बढ़ गया है। यही वजह है कि भाजपा केवल नए सहयोगी जोड़ने पर ही नहीं बल्कि विपक्षी दलों के प्रभावशाली नेताओं से भी संवाद बनाए हुए है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">शरद पवार की खासियत यह रही है कि उन्होंने हमेशा परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक फैसले लिए हैं। वे कई बार विरोधी दलों के साथ भी काम कर चुके हैं और अलग अलग विचारधाराओं के नेताओं से उनके व्यक्तिगत संबंध अच्छे माने जाते हैं। इसी अनुभव और प्रभाव के कारण आज भी वे महाराष्ट्र की राजनीति में सत्ता के समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि शरद पवार अपनी पार्टी को किस दिशा में ले जाते हैं। यदि वे विपक्षी गठबंधन में बने रहते हैं तो महाराष्ट्र की राजनीति का मौजूदा संतुलन कायम रह सकता है। लेकिन यदि वे किसी नए राजनीतिक समझौते की ओर बढ़ते हैं तो इसका असर केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि संसद में भी सरकार के संख्याबल और राष्ट्रीय राजनीति पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। फिलहाल इतना तय है कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े विधेयकों को पारित कराने की कोशिशों ने शरद पवार और उनकी पार्टी को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 22:39:00 +0530</pubDate>
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                <title>कुसंगति त्यागें धर्मबुद्धि जागे जीवन बने उज्ज्वल और संस्कारित</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मनुष्य का जीवन संगति से निर्मित होता है। जैसा वातावरण मिलता है वैसा ही मनुष्य का स्वभाव बनता जाता है। प्राचीन नीतिकारों ने स्पष्ट कहा है कि अच्छे और बुरे लोगों का प्रभाव मन पर अवश्य पड़ता है। आम और नीम के उदाहरण से यह बात समझाई गई है कि यदि दोनों के मूल एक साथ जुड़े हों तो मीठा आम भी कड़वाहट ग्रहण कर लेता है। यही स्थिति मनुष्य जीवन में भी देखी जाती है। कुसंगति का प्रभाव धीरे धीरे व्यक्ति के विचारों और आचरण को बदल देता है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि मनुष्य अपनी संगति को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174765/give-up-bad-company-awaken-your-religious-mind-let-your"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/hindi-divas.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मनुष्य का जीवन संगति से निर्मित होता है। जैसा वातावरण मिलता है वैसा ही मनुष्य का स्वभाव बनता जाता है। प्राचीन नीतिकारों ने स्पष्ट कहा है कि अच्छे और बुरे लोगों का प्रभाव मन पर अवश्य पड़ता है। आम और नीम के उदाहरण से यह बात समझाई गई है कि यदि दोनों के मूल एक साथ जुड़े हों तो मीठा आम भी कड़वाहट ग्रहण कर लेता है। यही स्थिति मनुष्य जीवन में भी देखी जाती है। कुसंगति का प्रभाव धीरे धीरे व्यक्ति के विचारों और आचरण को बदल देता है। इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि मनुष्य अपनी संगति को लेकर सजग रहे और सदैव उत्तम मार्ग का चयन करे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यह प्रश्न स्वाभाविक है कि बुरे लोगों का प्रभाव जल्दी क्यों पड़ता है और अच्छे लोगों का प्रभाव उतनी तीव्रता से क्यों नहीं पड़ता। इसका कारण मनुष्य की प्रवृत्ति में छिपा हुआ है। बुराई आकर्षक प्रतीत होती है और वह सरल मार्ग का भ्रम देती है। जबकि अच्छाई में अनुशासन और संयम की आवश्यकता होती है। सज्जन का हृदय कोमल होता है इसलिए वह दूसरों के प्रभाव में जल्दी आ सकता है जबकि दुर्जन कठोर होता है और अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता। यही कारण है कि सज्जन व्यक्ति को विशेष सावधानी रखनी चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अविवेक है। बाहरी शत्रु उतना नुकसान नहीं पहुंचाता जितना कि गलत निर्णय और गलत संगति पहुंचा देती है। परिवार में भी यदि माता पिता विवेकशील नहीं हैं तो वे अपनी संतान को सही दिशा नहीं दे पाते। आज के समय में यह देखा जा रहा है कि माता पिता अपने बच्चों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने पर तो ध्यान देते हैं लेकिन उनके नैतिक और आध्यात्मिक विकास की ओर उतना ध्यान नहीं देते। परिणामस्वरूप बच्चे भटक जाते हैं और जीवन के सही मार्ग से दूर हो जाते हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">संस्कारों का निर्माण बचपन से ही होता है। बालक का मन अत्यंत कोमल होता है। वह जैसा देखता है वैसा ही सीखता है। इसलिए यह आवश्यक है कि उसे अच्छा वातावरण दिया जाए। आज के युग में मनोरंजन के साधनों ने बच्चों के मन पर गहरा प्रभाव डाला है। यदि इन साधनों का उपयोग सावधानी से नहीं किया गया तो यह बच्चों को गलत दिशा में ले जा सकते हैं। इसलिए माता पिता का यह कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों के व्यवहार पर ध्यान दें और उन्हें सही मार्ग दिखाएं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक प्रेरक प्रसंग इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति जो स्वयं सुन नहीं सकता था वह प्रतिदिन अपने बच्चों को लेकर संतों के प्रवचन में जाता था। जब लोगों ने उससे पूछा कि उसे तो कुछ सुनाई नहीं देता फिर वह क्यों आता है तो उसने उत्तर दिया कि वह अपने बच्चों के संस्कारों के लिए आता है। उसका मानना था कि यदि बच्चे अच्छे संस्कारों से युक्त होंगे तो वे जीवन में सही निर्णय लेंगे और धन का सदुपयोग करेंगे। यह दृष्टिकोण हर माता पिता के लिए प्रेरणादायक है। परंपराओं का संरक्षण भी अत्यंत आवश्यक है। यदि हम अपनी अच्छी परंपराओं को नहीं बचाएंगे तो समाज में नैतिकता का पतन हो जाएगा। नई पीढ़ी को आधुनिकता के साथ साथ संस्कारों का भी ज्ञान होना चाहिए। केवल भौतिक उन्नति से जीवन सफल नहीं होता। नैतिक मूल्यों और धर्मबुद्धि के बिना जीवन अधूरा रह जाता है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में बुराइयों का प्रभाव बढ़ता हुआ दिखाई देता है लेकिन यह सत्य है कि अंततः विजय सत्य की ही होती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि असत्य और अधर्म अधिक समय तक टिक नहीं सकते। इसलिए हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है बल्कि सजग रहकर समाज में जागरूकता फैलानी चाहिए। संगति का प्रभाव इतना गहरा होता है कि वह मनुष्य के जीवन की दिशा बदल सकता है। यदि व्यक्ति बुरे लोगों के संपर्क में रहता है तो वह धीरे धीरे उनके जैसा बनने लगता है। प्रारंभ में यह प्रभाव छोटा होता है लेकिन समय के साथ यह गहरा हो जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपने मित्रों और परिचितों का चयन सोच समझकर करें।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक हास्य प्रसंग के माध्यम से भी यह समझाया गया है कि बुरी आदतें धीरे धीरे विकसित होती हैं। प्रारंभ में वे छोटी लगती हैं लेकिन बाद में वे गंभीर रूप ले लेती हैं। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति को गलत आदत लग जाए तो उसे छोड़ना कठिन हो जाता है। इसलिए शुरुआत में ही सावधानी बरतनी चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">एक अन्य उदाहरण में बताया गया है कि एक व्यक्ति ने शेर का पालन किया। वह उसे शाकाहारी बनाना चाहता था लेकिन अंततः शेर ने अपने स्वभाव को नहीं छोड़ा। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि स्वभाव और संगति का प्रभाव कितना गहरा होता है। इसलिए हमें यह समझना चाहिए कि बुरे तत्वों के साथ रहकर अच्छा बने रहना अत्यंत कठिन है।महापुरुषों ने हमेशा कुसंगति से दूर रहने की शिक्षा दी है। उन्होंने कहा है कि बुरे मित्र से अच्छा है कि व्यक्ति अकेला रहे। काजल की कोठरी में जाने से दाग लगना निश्चित है। इसलिए हमें अपने जीवन को पवित्र बनाए रखने के लिए बुरी संगति से बचना चाहिए।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान है। यदि हम इसे अच्छे कार्यों में लगाते हैं तो हमारे भीतर सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है। लेकिन यदि हम इसे व्यर्थ में गंवाते हैं तो यह हमें गलत दिशा में ले जा सकता है। खाली मन में नकारात्मक विचार जल्दी प्रवेश करते हैं इसलिए हमें सदैव व्यस्त और जागरूक रहना चाहिए।आत्मावलोकन भी अत्यंत आवश्यक है। यदि हम प्रतिदिन अपने कार्यों और विचारों का विश्लेषण करें तो हम अपनी गलतियों को पहचान सकते हैं और उन्हें सुधार सकते हैं। जो व्यक्ति स्वयं के प्रति सजग होता है वह कभी भी बुराई के प्रभाव में नहीं आता। अंततः यह कहा जा सकता है कि कुसंगति से बचना और सद्गुणों को अपनाना ही जीवन की सफलता का मूल मंत्र है। हमें स्वयं भी अच्छे मार्ग पर चलना चाहिए और आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बनना चाहिए। जब हम अपने जीवन को प्रकाशमय बनाएंगे तभी समाज और राष्ट्र का कल्याण संभव होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 18:19:55 +0530</pubDate>
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