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                <title>Security Forces India - Swatantra Prabhat</title>
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                <title>मुख्यधारा की ओर लौटते कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक बार फिर बड़ी सफलता मिली है। राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मंगलवार को भाकपा (माओवादी) के 16 सक्रिय नक्सलियों ने हथियारों और 1,562 गोलियों के साथ झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें संगठन के कई महत्वपूर्ण कमांडर और दस्ता सदस्य शामिल हैं। यह केवल 16 लोगों का आत्मसमर्पण नहीं है बल्कि माओवादी संगठन की कमजोर होती पकड़ और मुख्यधारा की ओर बढ़ते विश्वास का</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184267/steps-back-towards-mainstream"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-07/1200-675-27246097-thumbnail-16x9-naxal-aspera.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को एक बार फिर बड़ी सफलता मिली है। राज्य के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मंगलवार को भाकपा (माओवादी) के 16 सक्रिय नक्सलियों ने हथियारों और 1,562 गोलियों के साथ झारखंड पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें संगठन के कई महत्वपूर्ण कमांडर और दस्ता सदस्य शामिल हैं। यह केवल 16 लोगों का आत्मसमर्पण नहीं है बल्कि माओवादी संगठन की कमजोर होती पकड़ और मुख्यधारा की ओर बढ़ते विश्वास का संकेत भी है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आत्मसमर्पण करने वालों में एक रीजनल कमेटी सदस्य, दो सब-जोनल कमेटी सदस्य, तीन एरिया कमेटी सदस्य, छह पार्टी सदस्य तथा चार दस्ता सदस्य शामिल हैं। इन सभी ने पुलिस महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक के समक्ष हथियार डालकर हिंसा का रास्ता छोड़ने की घोषणा की। पुलिस के अनुसार अधिकांश नक्सली पश्चिमी सिंहभूम के कोल्हान और सारंडा क्षेत्र में सक्रिय थे जबकि दो सदस्य लातेहार क्षेत्र में सक्रिय रहे। यह सभी माओवादी संगठन के शीर्ष नेताओं मिसिर बेसरा उर्फ सागर  तथा केंद्रीय कमेटी सदस्य असीम मंडल के नेटवर्क से जुड़े हुए थे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड पुलिस का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में नक्सल विरोधी अभियानों ने संगठन की कमर तोड़ दी है। लगातार हो रही मुठभेड़ों, गिरफ्तारी और विकास कार्यों के कारण संगठन का जनाधार कमजोर हुआ है। दूसरी ओर संगठन के भीतर शोषण, संसाधनों की कमी, सुरक्षा बलों का बढ़ता दबाव और भविष्य की अनिश्चितता ने भी कई नक्सलियों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया है। सरकार की पुनर्वास नीति उन्हें सम्मानजनक जीवन और रोजगार का अवसर उपलब्ध करा रही है, जिससे उनका भरोसा बढ़ा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को राज्य सरकार की नीति के तहत आर्थिक सहायता, आवास, कौशल विकास प्रशिक्षण, रोजगार के अवसर तथा समाज की मुख्यधारा में पुनर्वास की सुविधा दी जाएगी। गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को छोड़कर अन्य मामलों में कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप राहत भी दी जाती है। यही कारण है कि अब कई नक्सली संगठन छोड़कर सामान्य जीवन अपनाने का निर्णय ले रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 में अब तक 93 नक्सलियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इसी अवधि में 45 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है जबकि सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ों में 22 नक्सली मारे गए हैं। ताजा आत्मसमर्पण के बाद इस वर्ष मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों की संख्या बढ़कर 61 हो गई है। यह दर्शाता है कि सरकार की रणनीति केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है बल्कि पुनर्वास के माध्यम से स्थायी समाधान की दिशा में भी आगे बढ़ रही है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">यदि पिछले दो वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी स्पष्ट होती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा विभिन्न राज्यों की रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2025 और वर्ष 2026 के दौरान देशभर में लगभग 1,100 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा का रास्ता चुना है। इनमें सबसे अधिक आत्मसमर्पण छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा और तेलंगाना में हुए हैं। अकेले झारखंड में भी पिछले दो वर्षों के दौरान सौ से अधिक नक्सली हथियार छोड़ चुके हैं। यह संख्या बताती है कि माओवादी संगठन के भीतर लगातार असंतोष बढ़ रहा है और उसकी भर्ती तथा संचालन क्षमता पहले की तुलना में काफी कमजोर हुई है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वर्ष 2025 में घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से वामपंथी उग्रवाद का प्रभाव लगभग समाप्त कर दिया जाएगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने संयुक्त अभियान चलाए। आधुनिक तकनीक, ड्रोन, बेहतर खुफिया तंत्र, विशेष बलों की तैनाती, सड़कों का निर्माण, मोबाइल नेटवर्क का विस्तार और विकास योजनाओं को तेजी से लागू किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जिन इलाकों में कभी माओवादी संगठन का मजबूत प्रभाव था वहां अब सरकारी योजनाएं पहुंच रही हैं और स्थानीय लोगों का विश्वास बढ़ रहा है।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल हथियारों से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए सामाजिक और आर्थिक विकास भी उतना ही आवश्यक है। जिन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, पेयजल और रोजगार की सुविधाएं पहुंची हैं वहां नक्सलवाद स्वतः कमजोर पड़ा है। आदिवासी युवाओं को रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और स्वरोजगार के अवसर मिलने से वे हिंसा के रास्ते से दूर हो रहे हैं। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में पूर्व नक्सली सामान्य जीवन अपनाकर खेती, व्यवसाय, नौकरी और अन्य कार्यों से जुड़ रहे हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र तथा झारखंड के कुछ वन क्षेत्रों में माओवादी संगठन की सीमित मौजूदगी बनी हुई है। संगठन के शीर्ष नेता अभी भी नए सदस्यों की भर्ती और गतिविधियों को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। इसलिए सुरक्षा बलों की सतर्कता और विकास कार्यों की निरंतरता दोनों आवश्यक हैं।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">झारखंड में हुए इस ताजा आत्मसमर्पण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि हिंसा का रास्ता अंततः विनाश की ओर ले जाता है जबकि लोकतंत्र और विकास का रास्ता सम्मानजनक जीवन प्रदान करता है। जो लोग कभी बंदूक के बल पर व्यवस्था बदलने का सपना देखते थे, वे आज समाज की मुख्यधारा में लौटकर नए जीवन की शुरुआत करना चाहते हैं। यह परिवर्तन केवल सरकार की सफलता नहीं बल्कि उन परिवारों की भी जीत है जो वर्षों से अपने बच्चों को हिंसा से दूर देखना चाहते थे।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;">नक्सलवाद के खिलाफ अभियान की वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब बंदूक की जगह शिक्षा होगी, बारूद की जगह विकास होगा और भय की जगह विश्वास का वातावरण बनेगा। झारखंड में लगातार बढ़ते आत्मसमर्पण इस दिशा में सकारात्मक संकेत हैं। यदि सुरक्षा अभियान, पुनर्वास नीति और विकास कार्य इसी गति से आगे बढ़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की पहचान हिंसा से नहीं बल्कि विकास, शिक्षा और समृद्धि से होगी। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत और देश के लिए सबसे सकारात्मक संदेश होगा।</div><div style="text-align:justify;"><br /></div><div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div><div class="yj6qo" style="text-align:justify;"><br /></div><div class="adL" style="text-align:justify;"><br /></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 21:45:24 +0530</pubDate>
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                <title>दिवंगत हवलदार प्रेमचंद्र पाण्डेय को गमजदा माहौल में दी गई अंतिम विदाई </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज, प्रतापगढ़।</strong> पहलगाम में सीआरपीएफ में तैनात हवलदार रहे प्रेमचन्द्र पाण्डेय का शनिवार को गमजदा माहौल में अन्तिम संस्कार हुआ। शुक्रवार की रात करीब दो बजे सेना के वाहन से बलिदानी प्रेमचन्द्र का शव पैतृक गांव चमरूपुर शुक्लान पहुंचा। तिरंगे में बलिदानी का शव देख परिजन बिलख पड़े। बलिदानी को अंतिम विदाई देने के लिए प्रयागराज तथा लखनऊ के केन्द्रीय सुरक्षा बल के जवान भी पहुंचे। नेतृत्वकर्ता कमलेश कुमार सिंह व सर्वजीत सिंह ने पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित किया। वहीं पुलिस की टुकड़ी ने बलिदानी को सशस्त्र विदाई गॉड ऑफ ऑनर पेश किया।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">दिवंगत प्रेमचंद्र के अंतिम दर्शन को</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/177251/late-havildar-premchandra-pandey-was-given-a-final-farewell-in"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/img-20260425-wa0089.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>लालगंज, प्रतापगढ़।</strong> पहलगाम में सीआरपीएफ में तैनात हवलदार रहे प्रेमचन्द्र पाण्डेय का शनिवार को गमजदा माहौल में अन्तिम संस्कार हुआ। शुक्रवार की रात करीब दो बजे सेना के वाहन से बलिदानी प्रेमचन्द्र का शव पैतृक गांव चमरूपुर शुक्लान पहुंचा। तिरंगे में बलिदानी का शव देख परिजन बिलख पड़े। बलिदानी को अंतिम विदाई देने के लिए प्रयागराज तथा लखनऊ के केन्द्रीय सुरक्षा बल के जवान भी पहुंचे। नेतृत्वकर्ता कमलेश कुमार सिंह व सर्वजीत सिंह ने पार्थिव शरीर पर पुष्पचक्र अर्पित किया। वहीं पुलिस की टुकड़ी ने बलिदानी को सशस्त्र विदाई गॉड ऑफ ऑनर पेश किया।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">दिवंगत प्रेमचंद्र के अंतिम दर्शन को लेकर गांव तथा आसपास से भी भारी भीड़ जुटी दिखी। पार्थिव शरीर को अंतिम संस्कार के लिए घर से श्रृंगवेरपुर घाट के लिए ले जाते समय ग्रामीणों ने भारत माता का जयघोष लगाया। बलिदानी के सम्मान में बाजार में चौराहे पर प्रतिष्ठान भी बंद दिखे। बड़े भाई महेश पाण्डेय ने प्रयागराज के श्रृंगवेरपुर घाट पर दिवंगत प्रेमचन्द्र पाण्डेय को मुखाग्नि दी। क्षेत्रीय विधायक जीतलाल पटेल ने भी जवान के असमय निधन पर संवेदना प्रकट की है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>आपका शहर</category>
                                            <category>पूर्वांचल-पूर्वी उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 18:17:20 +0530</pubDate>
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                <title>नक्सलवाद के अंत की ओर बढ़ता भारत सुरक्षा विकास और विश्वास की नई विजयगाथा</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">भारत ने लंबे समय तक जिस आंतरिक चुनौती का सामना किया वह नक्सलवाद के रूप में देश के अनेक हिस्सों में फैली रही। यह समस्या केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं थी बल्कि इसने सामाजिक आर्थिक और मानवीय जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया। दशकों तक आदिवासी क्षेत्रों में भय असुरक्षा और पिछड़ापन बना रहा। गांवों में विकास की रफ्तार थम गई और लोगों का भरोसा व्यवस्था से डगमगाने लगा। आज जब देश नक्सलवाद के अंत की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका है तब यह आवश्यक हो जाता है कि इस परिवर्तन के पीछे की नीति संकल्प और</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174668/india-moving-towards-the-end-of-naxalism-a-new-victory"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1926804-10.webp" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">भारत ने लंबे समय तक जिस आंतरिक चुनौती का सामना किया वह नक्सलवाद के रूप में देश के अनेक हिस्सों में फैली रही। यह समस्या केवल कानून व्यवस्था तक सीमित नहीं थी बल्कि इसने सामाजिक आर्थिक और मानवीय जीवन को भी गहराई से प्रभावित किया। दशकों तक आदिवासी क्षेत्रों में भय असुरक्षा और पिछड़ापन बना रहा। गांवों में विकास की रफ्तार थम गई और लोगों का भरोसा व्यवस्था से डगमगाने लगा। आज जब देश नक्सलवाद के अंत की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा चुका है तब यह आवश्यक हो जाता है कि इस परिवर्तन के पीछे की नीति संकल्प और प्रयासों को समझा जाए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गृह मंत्रालय के नेतृत्व में बीते वर्षों में जो रणनीति अपनाई गई वह बहुआयामी रही। केवल सुरक्षा बलों की तैनाती तक सीमित न रहकर सरकार ने विकास और विश्वास दोनों को साथ लेकर चलने का प्रयास किया। यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में कभी बंदूक की आवाज गूंजती थी वहां आज स्कूल खुल रहे हैं सड़कें बन रही हैं और जीवन सामान्य हो रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया बल्कि इसके पीछे वर्षों की योजनाबद्ध मेहनत और स्पष्ट नीति रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नक्सलवाद की जड़ें अक्सर गरीबी और पिछड़ेपन से जोड़कर देखी जाती रही हैं। लेकिन वास्तविकता इससे अधिक जटिल रही है। कई ऐसे क्षेत्र भी थे जहां आर्थिक स्थिति कमजोर थी फिर भी वहां नक्सलवाद नहीं पनपा। इसका अर्थ यह है कि नक्सलवाद केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि एक वैचारिक और रणनीतिक चुनौती भी था। वामपंथी उग्रवाद ने आदिवासी समाज को अपने प्रभाव में लेकर उन्हें मुख्यधारा से दूर करने का प्रयास किया। स्कूलों को जलाना विकास कार्यों को रोकना और भय का वातावरण बनाना इस रणनीति का हिस्सा रहा।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">गृह मंत्रालय ने इस सच्चाई को समझते हुए अपनी नीति तैयार की। सुरक्षा बलों को आधुनिक संसाधनों से लैस किया गया। खुफिया तंत्र को मजबूत बनाया गया और स्थानीय पुलिस को सशक्त किया गया। इसके साथ ही आत्मसमर्पण की नीति को प्रभावी ढंग से लागू किया गया जिससे बड़ी संख्या में नक्सली मुख्यधारा में लौटे। यह केवल सैन्य सफलता नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्वास का भी उदाहरण है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बस्तर जैसे क्षेत्रों में जो परिवर्तन देखने को मिला वह इस नीति की सफलता का प्रमाण है। जहां कभी प्रशासन की पहुंच सीमित थी वहां आज सरकारी योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू हो रही हैं। राशन की दुकानों से लेकर स्वास्थ्य केंद्र तक लोगों को सुविधाएं मिल रही हैं। आधार और राशन कार्ड के माध्यम से लाभ सीधे लोगों तक पहुंच रहा है। इससे लोगों का विश्वास बढ़ा है और वे हिंसा से दूर होकर विकास की राह पर चलने लगे हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इसके विपरीत यदि पिछले दशकों की स्थिति पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि लंबे समय तक इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया गया। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना रहा। सड़कें नहीं बनीं स्कूल नहीं खुले और स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंचीं। इस शून्य का लाभ उठाकर उग्रवादी संगठनों ने अपनी पकड़ मजबूत की। लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि व्यवस्था उनके खिलाफ है और हथियार उठाना ही एकमात्र रास्ता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह भी देखा गया कि उस समय नक्सलवाद के खिलाफ स्पष्ट और कठोर नीति का अभाव था। कई बार राजनीतिक इच्छाशक्ति कमजोर दिखाई दी और समस्या को टालने का प्रयास किया गया। इससे नक्सलवाद का विस्तार हुआ और वह कई राज्यों तक फैल गया। देश के एक बड़े भूभाग में इसका प्रभाव देखा गया जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा उत्पन्न हुआ।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान समय में स्थिति बदल चुकी है। गृह मंत्रालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि हिंसा का रास्ता अपनाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया कि जो लोग भटक गए हैं उन्हें वापस लाने का अवसर मिले। इस संतुलित दृष्टिकोण ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है और हिंसा की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है।</div>
<div style="text-align:justify;">सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब आदिवासी समाज स्वयं इस बदलाव का भागीदार बन रहा है। वे समझ चुके हैं कि विकास और शांति ही उनके भविष्य का आधार है। सरकार द्वारा चलाए जा रहे शिक्षा स्वास्थ्य और रोजगार के कार्यक्रमों ने उन्हें नई दिशा दी है। युवा पीढ़ी अब हथियार नहीं बल्कि शिक्षा और रोजगार को अपना लक्ष्य बना रही है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">नक्सलवाद के अंत की यह यात्रा केवल सरकार की उपलब्धि नहीं बल्कि पूरे समाज की जीत है। इसमें सुरक्षा बलों का साहस प्रशासन की प्रतिबद्धता और आम नागरिकों का सहयोग सभी शामिल हैं। यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि सही नीति और दृढ़ संकल्प के साथ कार्य किया जाए तो सबसे जटिल समस्याओं का समाधान भी संभव है।आज जब देश इस चुनौती से लगभग मुक्त होने की ओर बढ़ रहा है तब यह आवश्यक है कि इस उपलब्धि को बनाए रखा जाए। विकास की गति को निरंतर बनाए रखना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी क्षेत्र फिर से पिछड़ापन और असुरक्षा का शिकार न बने। यही सच्चे अर्थों में नक्सलवाद के अंत की स्थायी गारंटी होगी।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत ने एक लंबी और कठिन लड़ाई में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। गृह मंत्रालय के नेतृत्व में अपनाई गई रणनीति ने यह सिद्ध कर दिया है कि सुरक्षा और विकास साथ साथ चल सकते हैं। यह केवल एक समस्या का समाधान नहीं बल्कि नए भारत की दिशा का संकेत है जहां हर नागरिक को समान अवसर और सुरक्षित जीवन का अधिकार प्राप्त है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 18:30:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>नक्सलवाद की समाप्ति के बाद भी बहुत कुछ करना होगा</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">काफी पहले   केंद्र सरकार  ने  घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा। मार्च 2026 की  अवधि से  एक दिन    पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बड़ी घोषणा की । नक्सलवाद पर चर्चा के दौरान गृह मंत्री ने  कहा कि  देश में नक्सलवाद अब लगभग समाप्त हो चुका है।  आदिवासी इलाकों में असली न्याय पहुंचा है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव अचानक नहीं आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि </span>2014 <span lang="hi" xml:lang="hi">के बाद केंद्र सरकार की सख्त नीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं के कारण संभव हुआ है। उन्होंने कहा कि सरकार  नक्सल</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174666/a-lot-needs-to-be-done-even-after-the-end"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/b40843a0-3641-11f0-8519-3b5a01ebe413.jpg.webp" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">अशोक मधुप</span></strong></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">काफी पहले   केंद्र सरकार  ने  घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा। मार्च 2026 की  अवधि से  एक दिन    पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बड़ी घोषणा की । नक्सलवाद पर चर्चा के दौरान गृह मंत्री ने  कहा कि  देश में नक्सलवाद अब लगभग समाप्त हो चुका है।  आदिवासी इलाकों में असली न्याय पहुंचा है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव अचानक नहीं आया</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि </span>2014 <span lang="hi" xml:lang="hi">के बाद केंद्र सरकार की सख्त नीति</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं के कारण संभव हुआ है। उन्होंने कहा कि सरकार  नक्सल प्रभावित क्षेत्र में तेजी से विकास करा  रही है। शिक्षा के लिए स्कूल और उपचार के लिए  वहां अस्पताल खुल रहे हैं। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अमित शाह ने कहा कि नक्सलवाद की जड़ें खत्म हो रही हैं और आदिवासियों की आवाज अब संसद तक पहुंची है। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने समस्या को बढ़ने दिया। मोदी सरकार के फैसलों से हालात बदले हैं। उन्होंने कहा कि नक्सल विचारधारा आदिवासियों को गुमराह करती है और अब देश नक्सलवाद मुक्त बनने की ओर बढ़ रहा है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने साफ कहा कि सरकार ने नक्सलियों से बातचीत नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि उन्हें खत्म कर विकास को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि जो हथियार उठाएगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उसे कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने दावा किया कि नक्सलियों का पूरा केंद्रीय नेतृत्व</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पोलित ब्यूरो और कमेटी अब खत्म हो चुकी है। काफी मारे गए</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">  बहुतों </span><span lang="hi" xml:lang="hi"> ने सरेंडर किया । कुछ अभी फरार हैं। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शाह ने कहा कि देश अब नक्सल मुक्त होने की स्थिति में पहुंच चुका है। उन्होंने बताया कि कई बड़े ऑपरेशन जैसे बुढ़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">थंडरस्टॉर्म और ब्लैक फॉरेस्ट चलाए गए।  इनमें भारी मात्रा में हथियार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईईडी फैक्ट्री और अनाज बरामद हुआ। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तेलंगाना और ओडिशा के बड़े इलाके अब नक्सल प्रभाव से बाहर आ चुके हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय पुलिस की भूमिका को उन्होंने अहम बताया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">केंद्रीय  गृहमंत्री ने  बताया  कि  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">आजादी के समय देश संसाधनों की कमी और विकास की चुनौतियों से जूझ रहा था। कई दूर-दराज के इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सड़कों और सुविधाओं का अभाव था। ऐसे हालात में कुछ संगठनों ने इन कमजोरियों का फायदा उठाया। जहां राज्य की पकड़ कम थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हीं इलाकों को रेड कॉरिडोर बनाया गया। भोले-भाले आदिवासियों को भेदभाव और शोषण के नाम पर भड़काया गया और उनके हाथों में हथियार थमा दिए गए। हकीकत यह है कि इन क्षेत्रों में योजनाबद्ध भेदभाव नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विकास की कमी थी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका इस्तेमाल कर हिंसा को बढ़ावा दिया गया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शाह ने बताया कि केंद्र सरकार ने ऑल एजेंसी अप्रोच अपनाई</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें सीएपीएफ</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाया गया। फंडिंग और स्पोर्ट सिस्टम पर प्रहार किया गया। सरेंडर नीति लागू की गई।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसमें आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद और पुनर्वास दिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार ने हर गांव तक अपनी पहुंच बनाई</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">इससे नक्सलवाद कमजोर हुआ।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने  दावा किया   कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास हुआ। हजारों किलोमीटर सड़कें बनीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मोबाइल टावर लगाए गए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बैंक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">एटीएम और डाकघर खोले गए। शिक्षा के लिए एकलव्य स्कूल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">आईटीआई और कौशल केंद्र बनाए गए। उन्होंने कहा कि विकास ही नक्सलवाद खत्म करने का सबसे बड़ा कारण बना।</span><br /><span lang="hi" xml:lang="hi"></span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">शाह ने कहा कि नक्सलवाद गरीबी से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि विचारधारा से पैदा हुआ। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा लोकतंत्र में विश्वास नहीं करती और बंदूक के जरिए सत्ता चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों को बरगलाकर उनके हाथ में हथियार दिए गए और विकास को रोका गया। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गृह मंत्री ने कहा कि सरकार आगे भी सख्ती और विकास दोनों पर काम जारी रखेगी। उन्होंने आदिवासी समाज को भरोसा दिलाया कि उनकी सुरक्षा और विकास सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि अब देश बंदूक से नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">संविधान से चलेगा और यही असली जीत है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">गृह मंत्री के अनुसार</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिस "रेड कॉरिडोर" का विस्तार कभी पशुपति से तिरुपति तक माना जाता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वह अब सिमटकर केवल कुछ जिलों तक रह गया है। 2014 में जहाँ 126 जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित थे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वहीं 2025-26 तक यह संख्या घटकर मात्र एक अंक में रह गई है। छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो कभी नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अब वह सुरक्षा बलों के नियंत्रण में है और वहां विकास की किरणें पहुँच रही हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार के इन दावों की पुष्टि जमीनी आंकड़ों से भी होती है। पिछले कुछ वर्षों में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 70  प्रतिशत  से अधिक की कमी आई है। सुरक्षा बलों की शहादत के आंकड़ों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। "ऑपरेशन कगार" और "ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट" जैसे लक्षित अभियानों के माध्यम से सुरक्षा बलों ने नक्सली नेतृत्व की कमर तोड़ दी है। 2025 के दौरान ही 300 से अधिक नक्सली मारे गए ।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इनमें कई शीर्ष कमांडर शामिल थे। इसके साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">हजारों की संख्या में कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> यह समर्पण इस बात का प्रतीक है कि अब इस विचारधारा का आकर्षण खत्म हो रहा है।  इतना सब होने के बावजूद ,</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इन सफलताओं के बावजूद नक्सलवाद की चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। </span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक विषमता है। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जैसे घने वन क्षेत्र आज भी सुरक्षा बलों के लिए कठिन परीक्षा बने हुए हैं। नक्सलियों ने अपने पैर पीछे जरूर खींचे हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन वे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वे अक्सर घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों का लाभ उठाकर छापामार हमले करने की ताक में रहते हैं। इसके अलावा</span>, "<span lang="hi" xml:lang="hi">अर्बन नक्सलिज्म" या वैचारिक उग्रवाद एक नई चुनौती बनकर उभरा है। शहरों में बैठे कुछ बौद्धिक समूह नक्सलियों को वैचारिक और रसद सहायता प्रदान करते हैं</span><span lang="hi" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इससे इस समस्या की जड़ें गहरी बनी रहती हैं। जब तक इन वैचारिक और वित्तीय नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक उग्रवाद के पुनर्जीवित होने का खतरा बना रहेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती स्थानीय आदिवासियों के बीच विश्वास की बहाली है। दशकों से विकास की मुख्यधारा से कटे होने के कारण</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">कई क्षेत्रों में ग्रामीण अब भी सुरक्षा बलों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। नक्सली अक्सर इस अविश्वास का फायदा उठाते हैं और ग्रामीणों को ढाल के रूप में उपयोग करते हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय जनता के बीच के इस "गवर्नेंस वैक्यूम" को भरना एक लंबी प्रक्रिया है। केवल सड़कों या मोबाइल टावरों का निर्माण पर्याप्त नहीं है</span>; <span lang="hi" xml:lang="hi">लोगों को यह महसूस कराना होगा कि सरकार उनकी संस्कृति और अधिकारों की रक्षक है। इसके साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पड़ोसी राज्यों के बीच समन्वय की कमी भी कई बार बाधा बनती है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि नक्सली एक राज्य में दबाव बढ़ने पर दूसरे राज्य की सीमा में शरण ले लेते हैं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">विकास के मोर्चे पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार को "नियत नेल्लानार" (आपका अच्छा गांव) जैसी योजनाओं को और विस्तार देना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जो अंतिम छोर तक बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने पर केंद्रित हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण सबसे प्रभावी हथियार है। जब आदिवासियों के बच्चों के पास स्कूल होंगे और उनके युवाओं के पास रोजगार के अवसर होंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी। कौशल विकास केंद्रों के माध्यम से स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना नक्सली विचारधारा के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">वन अधिकारों (</span><span lang="hi" xml:lang="hi">फोरेस्ट राइट  एक्ट</span>) <span lang="hi" xml:lang="hi">का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा  ताकि  आदिवासियों को अपनी जमीन पर मालिकाना हक का अहसास हो और वे उग्रवाद के बहकावे में न आएं।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">मान्यता है कि </span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन केवल बंदूकों के दम पर संभव नहीं है</span><span lang="hi" xml:lang="hi">। वास्तव में ऐसा भी  नही हैं। कभी श्रीलंका में लिट्टे   बहुत मजबूत संगठन था।   उसके  लड़ाके बेमिसाल थे। श्रीलंका के साथ भारतवर्ष को भी  वह प्रभावित कर रहा था। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस पर भारतीय प्रधानमंत्री</span> <a title="राजीव गांधी" href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%80"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजीव गांधी</span></a> (1991), <span lang="hi" xml:lang="hi">श्रीलंकाई राष्ट्रपति</span> <a title="प्रेमदासा रनसिंघे (पृष्ठ मौजूद नहीं है)" href="https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%AE%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BE_%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%98%E0%A5%87?action=edit&amp;redlink=1"><span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेमदासा रनसिंघे</span></a> (1993) <span lang="hi" xml:lang="hi">सहित कई लोगों  की हत्या का आरोप है। श्रीलंका सरकार  से  इस संगठन को खत्म करने का  निर्णय  लिया। एक झटके में 2009 में लिट्टे  पूरी तरह खत्म हो  गया। न श्रीलंका   सरकार ने उसके लड़ाकों को फुसलाया।  न समर्पण के लिए कहा। बंदूक के बल पर लिट्टे को खत्म कर दिया।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"> <span lang="hi" xml:lang="hi">भारत  सरकार   तो नक्सलवाद को खत्म करने के लिए इन्हें समझाने  और आत्म समर्पण  के लिए  प्रेरित कर रही है। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सरकार को अपनी आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को और अधिक उदार और प्रभावी बनाना चाहिए</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">ताकि भटक चुके युवा बिना किसी डर के मुख्यधारा में लौट सकें। </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इस सबके लिए तकनीकी और खुफिया तंत्र को भी मजबूत करना होगा। आधुनिक तकनीक का उपयोग करके नक्सली गतिविधियों पर नजर रखना और उन्हें समय रहते रोकना संभव है। इसके अलावा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि नक्सलवाद कई राज्यों में फैला हुआ है। इससे निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों की जरूरत होती है। मजबूत इच्छा शक्ति की भी  आवश्यक्ता  है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 18:25:16 +0530</pubDate>
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