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                <title>वैश्विक अस्थिरता - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>वैश्विक अस्थिरता RSS Feed</description>
                
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                <title>आ अब लौट चलें</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/180373/come-lets-go-back-now"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/img-20250331-wa016315.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कभी भारत से विदेश जाना सफलता का पर्याय माना जाता था। इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और तकनीकी विशेषज्ञ अपने सपनों को साकार करने के लिए अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप की ओर निकल पड़ते थे। बेहतर वेतन, आधुनिक जीवनशैली, अनुसंधान के अवसर और सामाजिक सुरक्षा ने लाखों भारतीय युवाओं को आकर्षित किया। लेकिन आज विश्व की बदलती परिस्थितियां एक नया प्रश्न खड़ा कर रही हैं,क्या अब वह समय आ गया है जब विदेशों में बसे भारतीय पेशेवर "आ अब लौट चलें की व्यथा तथा कथा की पीड़ा से पीड़ित है? वैश्विक युद्ध के चलते अब भारतीय प्रवासी पैसे वालों की जान को खतरा मंडराने लगा और विदेशी शासको के पराई पान के व्यवहार से परेशान होकर वापस घर लौटने की मानसिकता बन चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व पिछले कुछ वर्षों से युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, सांस्कृतिक तनाव और कठोर होती आव्रजन नीतियों के दौर से गुजर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व में बढ़ते संघर्ष, अमेरिका और चीन के बीच आर्थिक प्रतिस्पर्धा तथा पश्चिमी देशों में बढ़ती राष्ट्रवादी राजनीति ने विदेशी नागरिकों के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है। विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों के सामने वीजा, स्थायी निवास और रोजगार सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। अनेक देशों में स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता देने की मांग तेज हुई है, जिसके कारण प्रवासी समुदाय स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगा है। हाल के वर्षों में अमेरिका की एच-1बी वीजा नीतियों में बदलाव और बढ़ती अनिश्चितताओं ने हजारों भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों को भविष्य के प्रति चिंतित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय मूल के लाखों पेशेवर विदेशों में रहते हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार विश्वभर में लगभग 3.5 करोड़ भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं, जो दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय माना जाता है।  इनमें बड़ी संख्या डॉक्टरों, इंजीनियरों, आईटी विशेषज्ञों, वित्तीय सलाहकारों और शोधकर्ताओं की है। केवल भारतीय छात्रों की बात करें तो वर्ष 2024 तक 13 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में अध्ययन कर रहे थे। विदेशों में रहने वाले भारतीयों की चमकदार तस्वीर अक्सर दिखाई जाती है, किंतु उसके पीछे छिपी मानसिक और सामाजिक पीड़ा कम चर्चा में आती है।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक सफलता के बावजूद सांस्कृतिक अकेलापन, परिवार से दूरी, बुजुर्ग माता-पिता की चिंता, बच्चों की पहचान का संकट तथा नस्लीय भेदभाव के अनुभव अनेक प्रवासी भारतीयों को भीतर से विचलित करते हैं। पश्चिमी देशों में जीवन की बढ़ती लागत ने भी स्थिति कठिन बना दी है। ऊंचे किराए, महंगी स्वास्थ्य सेवाएं, बच्चों की शिक्षा का खर्च और नौकरी की असुरक्षा ने उस आकर्षण को कमजोर किया है जो कभी विदेशों को अवसरों की स्वर्णभूमि बनाता था। अनेक भारतीय पेशेवर स्वीकार करते हैं कि आर्थिक समृद्धि के बावजूद भावनात्मक संतोष की कमी उन्हें लगातार परेशान करती रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने भी इस विषय पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं। भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने भारतीय प्रवासी समुदाय को "ब्रेन ड्रेन" नहीं बल्कि "ब्रेन बैंक" बताया है। उनका मानना है कि प्रतिभाएं जहां अवसर मिलते हैं वहां जाती हैं, किंतु वे अनुभव, पूंजी, तकनीक और वैश्विक दृष्टि के रूप में अपने देश को भी समृद्ध करती हैं।  यह विचार आज और अधिक प्रासंगिक है क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर अब विदेशों से लौटकर भारत में स्टार्टअप, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में योगदान दे रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में भी परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप संस्कृति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष अनुसंधान और वैश्विक क्षमता केंद्रों के विस्तार ने रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत अब केवल प्रतिभा निर्यातक देश नहीं रह गया है, बल्कि प्रतिभाओं को आकर्षित करने वाला देश भी बनने लगा है। कई भर्ती एजेंसियों ने बताया है कि विदेशों में कार्यरत अनुभवी भारतीय पेशेवरों की वापसी की प्रवृत्ति पिछले वर्षों की तुलना में बढ़ी है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भी सच है कि भारत को अभी बहुत कार्य करना बाकी है। अनुसंधान एवं विकास पर खर्च, शहरी अवसंरचना, प्रशासनिक पारदर्शिता, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक भारत वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार के लिए विश्वस्तरीय वातावरण नहीं बनाएगा, तब तक प्रतिभा पलायन पूरी तरह नहीं रुकेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">परिस्थितियों का संकेत स्पष्ट है कि दुनिया का भू-राजनीतिक वातावरण तेजी से बदल रहा है। विदेशी धरती पर बसे भारतीय पेशेवर अब केवल अधिक वेतन नहीं, बल्कि जीवन की स्थिरता, सामाजिक अपनत्व और भावनात्मक सुरक्षा को भी महत्व देने लगे हैं। वे महसूस कर रहे हैं कि अपने देश में संघर्ष करना पराए देश में असुरक्षा के साथ जीने से कहीं अधिक संतोषजनक हो सकता है। माता-पिता की वृद्ध आंखें, अपनी भाषा की मिठास, अपने त्योहारों की खुशबू और अपनी मिट्टी का अपनापन किसी भी मुद्रा में नहीं खरीदा जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भारत उन लाखों प्रतिभाशाली प्रवासी भारतीयों को पुकार रहा है जिन्होंने अपनी मेहनत से विश्व के बड़े संस्थानों को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। यदि वही ज्ञान, अनुभव और नवाचार भारत की धरती पर लगे तो विकास की नई इबारत लिखी जा सकती है। यह केवल भावनात्मक आह्वान नहीं बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता भी है। वैश्विक अनिश्चितताओं के इस दौर में अनेक भारतीय पेशेवरों के मन में एक ही स्वर गूंज रहा है,विदेशों की चमक बहुत देख ली, अब अपने देश की धड़कनों को महसूस करने का समय है। सचमुच, यह समय कह रहा है,"आ अब लौट चलें।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 31 May 2026 18:37:59 +0530</pubDate>
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                <title>डोनाल्ड ट्रंप अपनी नीतियों से ही घिरे, अमेरिकी संसद और इजरायल ट्रंप के नियंत्रण से बाहर</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">ईरान को लेकर बढ़ते युद्धपरक माहौल मे डोनाल्ड ट्रंप आक्रामक नीतियाँ स्वयं अमेरिका के भीतर गहरे राजनीतिक और सामाजिक विरोध को जन्म दे रही हैं। जहा अमेरिकी संसद के अनेक सांसद इस आशंका को लेकर मुखर हैं कि एक और बड़े युद्ध में उलझना न केवल आर्थिक रूप से भारी पड़ेगा बल्कि अमेरिका को दीर्घकालिक सैन्य दलदल में धकेल सकता है, वहीं अमेरिकी जनता के इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों से सीख लेते हुए नए संघर्ष के प्रति उत्साहित नहीं है बल्कि सशंकित और विरोधी रुख में दिखाई दे रही है अमेरिका की लगभग 90 लाख जनता इसके विरोध में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174664/donald-trump-surrounded-by-his-own-policies-us-parliament-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/american-president-donald-trump-bbc-apologises-.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ईरान को लेकर बढ़ते युद्धपरक माहौल मे डोनाल्ड ट्रंप आक्रामक नीतियाँ स्वयं अमेरिका के भीतर गहरे राजनीतिक और सामाजिक विरोध को जन्म दे रही हैं। जहा अमेरिकी संसद के अनेक सांसद इस आशंका को लेकर मुखर हैं कि एक और बड़े युद्ध में उलझना न केवल आर्थिक रूप से भारी पड़ेगा बल्कि अमेरिका को दीर्घकालिक सैन्य दलदल में धकेल सकता है, वहीं अमेरिकी जनता के इराक और अफगानिस्तान के अनुभवों से सीख लेते हुए नए संघर्ष के प्रति उत्साहित नहीं है बल्कि सशंकित और विरोधी रुख में दिखाई दे रही है अमेरिका की लगभग 90 लाख जनता इसके विरोध में अलग-अलग शहरों में ट्रंप की नीतियों का खुलकर विरोध कर रही है। परिणाम स्वरूप ट्रंप का आत्मविश्वास अब धीरे-धीरे डगमगाने लगा है और ट्रंप अपने बौद्धिक तथा युद्ध की नीतियों को लागू करने में घबराने लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">घरेलू स्तर पर बढ़ती महंगाई, ऊर्जा संकट और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच युद्ध की संभावनाएँ ट्रंप प्रशासन को अपेक्षाकृत अलग-थलग करती नजर आ रही हैं।दूसरी ओर मध्य पूर्व में इजरायल डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के नियंत्रण से बाहर हो गया है इजरायल की स्थिति भी बहुस्तरीय दबावों से घिरी हुई है जहाँ बेंजामिन नेतनाहू की सरकार को एक तरफ सुरक्षा बनाए रखने की चुनौती है तो दूसरी तरफ लगातार सैन्य अभियानों के कारण सैनिकों की थकान, रिजर्व बलों पर बढ़ती निर्भरता और युद्ध की लंबी अवधि से उपजा मानसिक तनाव एक गंभीर चिंता बन चुका है। कई विश्लेषण यह संकेत देते हैं कि निरंतर युद्ध जैसी परिस्थितियों ने इजराइली सैनिकों की मनोबल और कार्यक्षमता दोनों को प्रभावित किया है जिससे भविष्य के अभियानों की गति और प्रभावशीलता पर असर पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं ईरान अपनी रणनीति के तहत प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए क्षेत्रीय सहयोगियों, प्रॉक्सी समूहों और सामरिक दबाव के माध्यम से संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। ईरान को अब हुति समूह का प्रत्यक्ष लाभ मिलना भी शुरू हो गया यह समूह लगातार इसराइल पर अलग-अलग तरीके से हमले करने लगा है। जिससे संघर्ष एक बहु-स्तरीय और अप्रत्यक्ष युद्ध का रूप लेता जा रहा है। यह स्थिति खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाने के साथ-साथ वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों के लिए भी खतरा उत्पन्न कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य वैश्विक संस्थाएँ शांति की अपील तो कर रही हैं लेकिन उनका प्रभाव सीमित होता जा रहा है जिससे कूटनीतिक प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे हैं। इस पूरे परिदृश्य में अमेरिका का आंतरिक विरोध, इजराइल की सैन्य थकान, ईरान की रणनीतिक सक्रियता और वैश्विक शक्तियों की संतुलनकारी भूमिका मिलकर एक ऐसे जटिल भू-राजनीतिक संकट को जन्म दे रही हैं जहाँ किसी भी छोटी घटना से व्यापक युद्ध भड़कने की आशंका बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि यह टकराव नियंत्रित नहीं हुआ तो यह केवल क्षेत्रीय संघर्ष तक सीमित न रहकर वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और सुरक्षा व्यवस्था के व्यापक पुनर्संतुलन का कारण बन सकता है और यदि युद्ध परमाणु युद्ध में बदल जाता है तो वैश्विक स्थिति और भी गंभीर हो जाएगी उसके परिणाम स्वरूप पूरी दुनिया में मानवता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। आगामी युद्ध यदि परमाणु युद्ध में परिणत होता है तो यह युद्ध पिछले दो विश्व युद्ध और परमाणु युद्ध से ज्यादा भयानक होगा इसमें पूरे विश्व को नई मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है एवं पूरे विश्व में हाहाकार होने की संभावना बलवती हो गई है ।<br /><br /><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 18:21:12 +0530</pubDate>
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