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                <title>Cyber Threat - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Cyber Threat RSS Feed</description>
                
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                <title>करोड़ों की ठगी, करोड़ों का खर्च और फिर भी नाकाफी रिकवरी; डिजिटल युग की सबसे बड़ी चुनौती बनता साइबर अपराध*</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="gs">
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<div>डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां तकनीक ने लोगों का जीवन आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधियों ने भी इसी तकनीक को अपने अवैध कारोबार का सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, यूपीआई, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने आम नागरिकों की सुविधाएं तो बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ ही साइबर ठगी के मामलों में भी विस्फोटक वृद्धि देखने को मिल रही है। राजस्थान से सामने आए हालिया आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को उजागर करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट और नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार</div></div></div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181068/fraud-worth-crores-expenditure-of-crores-and-still-inadequate-recovery"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/41.jpg" alt=""></a><br /><div class="gs">
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<div>डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां तकनीक ने लोगों का जीवन आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधियों ने भी इसी तकनीक को अपने अवैध कारोबार का सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। ऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, यूपीआई, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग ने आम नागरिकों की सुविधाएं तो बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ ही साइबर ठगी के मामलों में भी विस्फोटक वृद्धि देखने को मिल रही है। राजस्थान से सामने आए हालिया आंकड़े इस खतरे की गंभीरता को उजागर करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट और नेशनल साइबर क्राइम पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार पिछले एक वर्ष में राजस्थान में 77 हजार से अधिक लोग साइबर ठगी का शिकार हुए और ठगों ने लगभग 354 करोड़ रुपए की रकम हड़प ली। चिंताजनक बात यह है कि इस भारी-भरकम ठगी में से केवल 39 करोड़ रुपए ही रिकवर किए जा सके हैं, जबकि साइबर सुरक्षा और साइबर थानों के संचालन पर राज्य सरकार का सालाना खर्च 102 करोड़ रुपए से अधिक है।</div>
<div>यह स्थिति केवल राजस्थान तक सीमित नहीं है। देश के लगभग सभी राज्यों में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच जितनी तेजी से बढ़ी है, उससे कहीं अधिक तेजी से साइबर अपराधियों के तौर-तरीके विकसित हुए हैं। आज अपराधी किसी बैंक डकैती या चोरी के बजाय मोबाइल फोन और लैपटॉप के जरिए हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों को निशाना बना रहे हैं। वे नकली निवेश योजनाओं, फर्जी कस्टमर केयर, ऑनलाइन शॉपिंग, डिजिटल अरेस्ट, लॉटरी, नौकरी, टास्क फ्रॉड और क्यूआर कोड स्कैनिंग जैसे अनेक तरीकों से लोगों को जाल में फंसा रहे हैं।</div>
<div>राजस्थान के आंकड़े बताते हैं कि हर घंटे लगभग दस लोग साइबर ठगी का शिकार हो रहे हैं। यह केवल आंकड़ा नहीं बल्कि समाज के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती है। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्होंने वर्षों की मेहनत से अपनी बचत जमा की थी। कई मामलों में लोगों की जीवनभर की कमाई कुछ ही मिनटों में उनके खातों से गायब हो गई। पीड़ितों में युवा, व्यापारी, नौकरीपेशा वर्ग, महिलाएं और बुजुर्ग सभी शामिल हैं। विशेष रूप से 25 से 40 वर्ष आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक निशाना बन रहे हैं, क्योंकि यही वर्ग डिजिटल सेवाओं का सबसे ज्यादा उपयोग करता है।</div>
<div>साइबर अपराध का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अपराधी लगातार नए-नए तरीके अपनाते रहते हैं। जैसे ही पुलिस और बैंकिंग संस्थाएं किसी एक तरीके पर नियंत्रण करने का प्रयास करती हैं, ठग कोई नया तरीका खोज लेते हैं। हाल के वर्षों में डिजिटल अरेस्ट, इन्वेस्टमेंट फ्रॉड और फर्जी शेयर मार्केट निवेश योजनाओं के जरिए करोड़ों रुपए की ठगी सामने आई है। अपराधी स्वयं को पुलिस अधिकारी, सीबीआई अधिकारी, बैंक कर्मचारी या सरकारी एजेंसी का प्रतिनिधि बताकर लोगों को डराते हैं और फिर उनसे रकम ट्रांसफर करा लेते हैं।</div>
<div>सवाल यह भी उठता है कि जब साइबर थानों और साइबर सुरक्षा तंत्र पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं, तब रिकवरी की दर इतनी कम क्यों है। राजस्थान में 354 करोड़ रुपए की ठगी के मुकाबले केवल 39 करोड़ रुपए की रिकवरी होना व्यवस्था की सीमाओं को दर्शाता है। इसका एक कारण यह है कि ठग रकम को तुरंत कई फर्जी खातों में ट्रांसफर कर देते हैं। इन खातों को म्यूल अकाउंट कहा जाता है। रकम कई राज्यों और कई बार विदेशों तक पहुंच जाती है, जिससे उसे ट्रेस करना और वापस लाना बेहद कठिन हो जाता है। इसके अलावा साइबर अपराधों की जांच में तकनीकी विशेषज्ञता, आधुनिक उपकरण और अंतरराज्यीय समन्वय की आवश्यकता होती है, जिसकी कमी कई बार जांच को प्रभावित करती है।</div>
<div>बैंकों की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक प्रभावित ग्राहकों में सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े बैंक शामिल हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि बैंक सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, लेकिन यह जरूर दर्शाता है कि ग्राहकों को जागरूक बनाने और संदिग्ध लेनदेन पर त्वरित कार्रवाई की दिशा में अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। बैंकिंग प्रणाली में सुरक्षा के अनेक स्तर मौजूद हैं, फिर भी यदि ग्राहक स्वयं सतर्क नहीं रहेगा तो अपराधी किसी न किसी तरीके से उसे भ्रमित कर सकते हैं।</div>
<div>आज साइबर सुरक्षा केवल पुलिस या बैंक की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। यह प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी बन चुकी है। अधिकांश मामलों में ठग लोगों की तकनीकी कमजोरी का नहीं बल्कि उनकी भावनाओं, लालच, डर या जल्दबाजी का फायदा उठाते हैं। कोई व्यक्ति यदि अनजान लिंक पर क्लिक करता है, ओटीपी साझा करता है, स्क्रीन शेयरिंग एप डाउनलोड करता है या फर्जी निवेश योजना में अधिक मुनाफे के लालच में पैसा लगाता है, तो वह स्वयं जोखिम बढ़ा देता है। इसलिए जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है।</div>
<div>सरकार और पुलिस प्रशासन भी लगातार लोगों को जागरूक करने के प्रयास कर रहे हैं। साइबर हेल्पलाइन 1930 इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। विशेषज्ञों का मानना है कि साइबर ठगी होने के बाद पहला एक घंटा सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि पीड़ित तुरंत हेल्पलाइन या साइबर पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराए तो रकम को फ्रीज कराने और रिकवरी की संभावना काफी बढ़ जाती है। दुर्भाग्यवश कई लोग शर्म, घबराहट या जानकारी के अभाव में शिकायत करने में देर कर देते हैं, जिससे अपराधियों को रकम निकालने का पर्याप्त समय मिल जाता है।</div>
<div>देश में डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है। सरकार कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा दे रही है और करोड़ों लोग रोजाना ऑनलाइन भुगतान कर रहे हैं। ऐसे में साइबर सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय बनाना होगा। केवल नए साइबर थाने खोलना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित मानव संसाधन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली और बैंकिंग संस्थाओं के साथ बेहतर समन्वय भी जरूरी होगा। साथ ही स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने होंगे ताकि लोग साइबर अपराधियों के जाल में फंसने से बच सकें।</div>
<div>वर्तमान समय में साइबर अपराध किसी महामारी से कम नहीं है। यह अपराध बिना हथियार, बिना हिंसा और बिना किसी भौतिक उपस्थिति के लोगों को आर्थिक रूप से तबाह कर रहा है। राजस्थान के आंकड़े इस बात की चेतावनी हैं कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, पुलिस, बैंक, तकनीकी संस्थाएं और आम नागरिक मिलकर इस चुनौती का सामना करें। डिजिटल क्रांति तभी सफल मानी जाएगी जब लोगों का धन और उनका विश्वास दोनों सुरक्षित रहेंगे। अन्यथा साइबर ठगों का यह बढ़ता साम्राज्य आम जनता की मेहनत की कमाई को इसी तरह निगलता रहेगा और सुरक्षा तंत्र पर सवाल लगातार खड़े होते रहेंगे।</div>
<div>          *कांतिलाल मांडोत*</div>
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                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:31:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Abhinav Shukla]]></dc:creator>
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                <title>क्या वाकई इंटरनेट को युद्ध से खतरा है ?</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के डिजिटल युग में जब हम अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन पर एक स्पर्श करते हैं और दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी क्षण भर में हमारे सामने आ जाती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारे मन में यह धारणा प्रबल होने लगती है कि इंटरनेट एक अदृश्य और वायरलेस शक्ति है जो हवा या बादलों के माध्यम से तैर रही है। </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्लाउड</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द के बढ़ते प्रयोग ने इस भ्रम को और गहरा कर दिया है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हमें लगता है कि हमारा डेटा कहीं अंतरिक्ष में सुरक्षित तरीके से तैर रहा है। लेकिन जब भू-राजनीतिक तनाव</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174662/is-the-internet-really-threatened-by-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/hindi-divas19.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;" align="right"><strong><span lang="hi" xml:lang="hi">महेन्द्र तिवारी</span></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के डिजिटल युग में जब हम अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन पर एक स्पर्श करते हैं और दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी क्षण भर में हमारे सामने आ जाती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो हमारे मन में यह धारणा प्रबल होने लगती है कि इंटरनेट एक अदृश्य और वायरलेस शक्ति है जो हवा या बादलों के माध्यम से तैर रही है। </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्लाउड</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शब्द के बढ़ते प्रयोग ने इस भ्रम को और गहरा कर दिया है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे हमें लगता है कि हमारा डेटा कहीं अंतरिक्ष में सुरक्षित तरीके से तैर रहा है। लेकिन जब भू-राजनीतिक तनाव बढ़ते हैं और युद्ध की बातें सामने आती हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या वाकई इस अदृश्य और व्यापक नेटवर्क को युद्ध से खतरा है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">? </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इसका सीधा और स्पष्ट उत्तर है- हाँ</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इंटरनेट को युद्ध से सबसे अधिक और संगीन खतरा है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और यह खतरा किसी काल्पनिक साइबर फिल्म से कहीं अधिक वास्तविक और भयावह है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वास्तविकता इस आभासी धारणा के बिल्कुल विपरीत और आश्चर्यजनक रूप से भौतिक है। हमारी संपूर्ण वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">संचार तंत्र और यहां तक कि हमारी सामाजिक और सैन्य सुरक्षा भी समुद्र की अगाध गहराइयों में बिछे उन फाइबर ऑप्टिक केबल्स के एक जटिल जाल पर टिकी है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिन्हें </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंडर-सी केबल्स</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कहा जाता है। दुनिया भर में फैले लगभग पांच सौ से अधिक ऐसे केबल्स का नेटवर्क ही वह अदृश्य जीवन रेखा है जो महाद्वीपों को एक दूसरे से जोड़ती है और वैश्विक इंटरनेट डेटा ट्रैफिक के नब्बे प्रतिशत से अधिक हिस्से का वहन करती है। आम धारणा के विपरीत</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उपग्रह वैश्विक डेटा का केवल एक से तीन प्रतिशत हिस्सा ही संभाल पाते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि वे धीमी गति और अधिक लेटेंसी के साथ काम करते हैं। फाइबर ऑप्टिक केबल्स प्रकाश की गति से डेटा स्थानांतरित करती हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो उन्हें आधुनिक सभ्यता के लिए अपरिहार्य बनाती हैं। लेकिन यही तकनीकी उपलब्धि आज एक बहुत बड़ी रणनीतिक चुनौती और कमजोरी बनकर उभरी है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इन केबल्स की महत्ता और उनके द्वारा नियंत्रित होने वाले डेटा की मात्रा का विश्लेषण करें</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो हम पाएंगे कि आधुनिक सभ्यता का कोई भी कोना इनसे अछूता नहीं है। बैंकों के लेन-देन से लेकर शेयर बाजार की हलचल तक</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और रक्षा प्रणालियों के गुप्त संचार से लेकर आम नागरिकों के वीडियो कॉल तक</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सब कुछ इन्हीं गहरे समुद्री मार्गों से होकर गुजरता है। एशिया</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यूरोप और अमेरिका जैसे बड़े महाद्वीपों के बीच होने वाला व्यापार और कूटनीतिक विनिमय पूरी तरह से इन केबल्स की अखंडता पर निर्भर है। जब कोई युद्ध छिड़ता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो सबसे पहले शत्रु देश की अर्थव्यवस्था और संचार तंत्र को चकनाचूर करने की कोशिश की जाती है। इसी निर्भरता ने एक ऐसा </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">एकल बिंदु विफलता</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उत्पन्न कर दिया है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे नष्ट करना किसी भी शत्रु देश के लिए पूरी दुनिया को घुटनों पर लाने का सबसे आसान और सस्ता तरीका हो सकता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान में जिस तरह से वैश्विक तनाव बढ़ रहा है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उसने इन केबल्स की सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समुद्र के तल पर भी लड़े जाएंगे। इन केबल्स को नुकसान पहुंचाना आज किसी भी आधुनिक सेना के लिए </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">हाइब्रिड वॉरफेयर</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">का एक प्रमुख हिस्सा बन चुका है। कल्पना कीजिए कि यदि किसी संघर्ष के दौरान इन केबल्स को सुनियोजित तरीके से समुद्री बम या माइन ब्लास्ट के जरिए उड़ा दिया जाए या विशेष पनडुब्बियों के माध्यम से काट दिया जाए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो परिणाम कितने विनाशकारी होंगे। इंटरनेट के बंद होने का मतलब केवल सोशल मीडिया का रुकना नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि इसका सीधा अर्थ है कि वैश्विक बैंकिंग प्रणाली ठप हो जाएगी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे खरबों डॉलर का नुकसान मिनटों में हो सकता है। एटीएम काम करना बंद कर देंगे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन रुक जाएंगे और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए किए जाने वाले संचार के सभी माध्यम मृत हो जाएंगे। इससे भी भयावह यह है कि किसी देश की सैन्य और सुरक्षा एजेंसियां</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो गुप्त सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए इन सुरक्षित नेटवर्कों का उपयोग करती हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वे एक पल में अंधी और बहरी हो सकती हैं। यह स्थिति न केवल आर्थिक अराजकता पैदा करेगी</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता को गंभीर खतरे में डाल देगी।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस खतरे की गंभीरता को समझने के लिए हमें इतिहास और हालिया घटनाओं की ओर देखना होगा। वर्ष 2024 में लाल सागर में हुई घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। वहां समुद्र के नीचे बिछी चार प्रमुख केबल्स को नुकसान पहुंचा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसका सीधा असर वैश्विक इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्पीड पर पड़ा। उस समय इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह सामान्य करने में लगभग अस्सी दिन का समय लगा। यह घटना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि समुद्र के नीचे स्थित ये ढांचे कितने असुरक्षित हैं। भले ही ये केबल्स स्टील की परतों और प्लास्टिक के आवरण से सुरक्षित की जाती हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन समुद्र की विशालता और वहां तक पहुंचने की मानवीय सीमाओं के कारण इनकी निगरानी करना लगभग असंभव है। केवल मानवीय हमले ही नहीं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि प्राकृतिक आपदाएं जैसे समुद्री भूकंप</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">सुनामी या जहाज के लंगर के टकराने से भी ये केबल्स अक्सर क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। लेकिन जब कोई क्षति युद्ध के दौरान जानबूझकर</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">किसी रणनीतिक लाभ के लिए पहुंचाई जाती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह पूरे विश्व के लिए एक सुरक्षा संकट बन जाती है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">अंडर-सी केबल्स की मरम्मत करना अपने आप में एक अत्यंत कठिन</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">खर्चीला और समय लेने वाला कार्य है। ये केबल्स समुद्र के तल में हजारों मीटर की गहराई पर स्थित होती हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां दबाव इतना अधिक होता है कि कोई भी सामान्य गोताखोर वहां तक नहीं पहुंच सकता। जब कोई केबल खराब होती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसे ठीक करने के लिए विशेष केबल-रिपेयर जहाजों की आवश्यकता होती है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिनकी संख्या दुनिया भर में बहुत सीमित है। इन जहाजों को पहले खराबी के सटीक स्थान का पता लगाना होता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो कि मीलों लंबी केबल में सुई खोजने जैसा कठिन कार्य है। एक बार स्थान मिल जाने के बाद</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रोबोटिक उपकरणों या विशेष हुक के जरिए केबल को समुद्र की सतह पर लाया जाता है। वहां तकनीशियन फाइबर के उन सूक्ष्म रेशों को जोड़ते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो बाल से भी पतले होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में हफ्तों या कभी-कभी महीनों लग जाते हैं। यदि यह क्षेत्र किसी युद्धग्रस्त समुद्री सीमा में आता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो मरम्मत का कार्य लगभग नामुमकिन हो जाता है। यही कारण है कि यदि किसी बड़े पैमाने पर ऐसा हमला किसी युद्ध के दौरान हो</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो दुनिया का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय के लिए डिजिटल अंधेरे में चला जाएगा।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस भौतिक नुकसान के साथ-साथ</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">युद्ध का एक और बहुत खतरनाक पहलू है जो सीधे इंटरनेट को निशाना बनाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसे हम </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">साइबर वॉरफेयर</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">कहते हैं। आधुनिक युद्धों में साइबर हमले पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ उतनी ही ताकत से इस्तेमाल होते हैं। इसमें डीडॉस (</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">DDoS) </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अटैक</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मैलवेयर</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">रैंसमवेयर और डेटा चोरी के जरिए इंटरनेट</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">नेटवर्क और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर को अंदर से तबाह किया जाता है। हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध में हजारों साइबर हमले हुए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिसमें मैलवेयर का इस्तेमाल करके बिजली ग्रिड</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बैंकिंग प्रणाली और संचार नेटवर्क को ध्वस्त करने की कोशिश की गई। इसी तरह</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य पूर्व और एशिया में हालिया भू-राजनीतिक तनावों के दौरान लाखों साइबर अटैक दर्ज किए गए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिनका लक्ष्य रेलवे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बैंकिंग और सरकारी साइट्स को ठप करना था। जब किसी देश का इंटरनेट कनेक्टिविटी चार प्रतिशत तक गिर जाता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसका असर आम नागरिकों से लेकर सेना तक पर पड़ता है। यह एक ऐसा हथियार है जिसे चलाने के लिए किसी सीमा पर सैनिकों को तैनात करने की जरूरत नहीं होती</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">; </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक कुशल हैकर कमरे में बैठकर भी किसी देश की अर्थव्यवस्था को पैरालाइज कर सकता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आजकल </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">डेटा संप्रभुता</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">और </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">डिजिटल राष्ट्रवाद</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">की बातें खूब होती हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन जब तक हमारे डेटा का भौतिक और आभासी मार्ग असुरक्षित है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">ये बातें अधूरी ही रहेंगी। दुनिया के अधिकांश अंडर-सी केबल्स का स्वामित्व कुछ बड़ी टेक कंपनियों या फिर अंतरराष्ट्रीय टेलीकॉम कंसोर्टियम के पास है। यह निजी स्वामित्व सुरक्षा की एक और परत को जटिल बना देता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">क्योंकि इन निजी कंपनियों के पास किसी राष्ट्र-राज्य द्वारा समर्थित सैन्य हमले से इन केबल्स की रक्षा करने की क्षमता नहीं है। वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि बड़ी शक्तियां अपनी समुद्री क्षमताओं को बढ़ा रही हैं ताकि वे समुद्र के नीचे की गतिविधियों पर नजर रख सकें। ऐसी पनडुब्बियों का विकास किया जा रहा है जो केबल्स से डेटा को चोरी-छिपे टैप कर सकें या उन्हें नुकसान पहुंचा सकें। वैश्विक तनाव बढ़ने के साथ-साथ यह डर भी सच हो रहा है कि कोई भी बड़ी शक्ति इन केबल्स को ब्लैकमेल के हथियार के रूप में उपयोग कर सकती है। यदि कोई देश यह धमकी देता है कि वह किसी विशेष क्षेत्र की इंटरनेट केबल्स को काट देगा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो वह बिना एक भी गोली चलाए उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस खतरे से निपटने के लिए दुनिया भर में वैकल्पिक रास्तों पर विचार किया जा रहा है। सैटेलाइट इंटरनेट</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जैसे कि स्टारलिंक या अन्य प्रोजेक्ट</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">एक उम्मीद की किरण के रूप में देखे जा रहे हैं। ये उपग्रह सीधे अंतरिक्ष से डेटा प्रदान करते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे समुद्री केबल्स की आवश्यकता कम हो सकती है। लेकिन फिलहाल</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">इनकी क्षमता और लागत फाइबर केबल्स के मुकाबले बहुत कम और महंगी है। उपग्रह इंटरनेट अभी नब्बे प्रतिशत वैश्विक ट्रैफिक का बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं है। इसके अलावा</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अंतरिक्ष में मौजूद इन उपग्रहों को भी नष्ट किया जा सकता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो सुरक्षा की एक नई चुनौती पेश करता है। इसलिए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्तमान में समुद्र के नीचे बिछा यह जाल ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति और सबसे बड़ी कमजोरी बना हुआ है।</span></p>
<p style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निष्कर्षतः</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">समुद्र के नीचे बिछी ये फाइबर ऑप्टिक केबल्स और उन पर आधारित डिजिटल नेटवर्क आधुनिक विश्व की वह अदृश्य रीढ़ हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जिस पर पूरी मानवता की प्रगति टिकी है। युद्ध इंटरनेट के लिए सबसे बड़ा खतरा इसलिए है क्योंकि यह न केवल इसके भौतिक आधार को नष्ट कर सकता है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि साइबर हमलों के माध्यम से इसके आभासी अस्तित्व को भी ध्वस्त कर सकता है। इनकी सुरक्षा केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह एक वैश्विक कूटनीतिक और सामरिक अनिवार्यता है। यदि हम अपने डिजिटल भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी संधियों और सुरक्षा प्रोटोकॉल की आवश्यकता है जो इन केबल्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को युद्ध के लक्ष्यों से बाहर रख सकें। भविष्य में किसी भी देश की वास्तविक ताकत इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उसके पास कितनी परमाणु मिसाइलें हैं</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि वह अपने डेटा के भौतिक और आभासी मार्गों की रक्षा करने में कितना सक्षम है। जब तक हम समुद्र की गहराई और साइबर स्पेस में छिपे इस खतरे को नहीं समझेंगे</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक हमारा </span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">'</span><span lang="hi" xml:lang="hi">वायरलेस</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">' </span><span lang="hi" xml:lang="hi">होने का सपना एक ऐसे कमजोर धागे से बंधा रहेगा जो किसी भी युद्ध की एक चिंगारी से जलकर राख हो सकता है और आधुनिक सभ्यता को सदियों पीछे धकेल सकता है। इसलिए</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">यह समय है कि हम बादलों की ओर देखना बंद करें और समुद्र के तल की ओर ध्यान दें</span><span lang="en-us" xml:lang="en-us">, </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जहां हमारी वास्तविक और सबसे असुरक्षित दुनिया बिछी हुई है।</span></p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 18:15:53 +0530</pubDate>
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