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                <title>नैतिक जिम्मेदारी - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>नैतिक जिम्मेदारी RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>‘मैं इस्तीफा नहीं दूंगी’:क्या यह  ब्यान संवैधानिक है या लोकतांत्रिक मर्यादाओं का अतिक्रमण?”</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
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<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र में राजनेताओं द्वारा दिये गये ब्यान केवल शब्द या अभिव्यक्ति नहीं होते, वे व्यवस्था की दिशा भी तय करते हैं और राजनेताओं का आचरण। जब माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसा वरिष्ठ नेतृत्व विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी और स्वयं के हार के बाद यह वक्तव्य देता है कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह एक साधारण राजनीतिक वक्तव्य नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिकता, नैतिकता और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गहन बहस का विषय बन जाता है।</div>
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<div style="text-align:justify;">भारत का शासन तंत्र संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है और संविधान द्वारा संचालित। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की वैधता विधानसभा</div></div></div></div></div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/178321/%E2%80%98i-will-not-resign%E2%80%99is-this-statement-constitutional-or-a-violation"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-05/hq720.jpg" alt=""></a><br /><div class="ii gt">
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<div style="text-align:justify;"><strong>लेखक:प्रो.(डा.) मनमोहन प्रकाश </strong></div>
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<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारतीय लोकतंत्र में राजनेताओं द्वारा दिये गये ब्यान केवल शब्द या अभिव्यक्ति नहीं होते, वे व्यवस्था की दिशा भी तय करते हैं और राजनेताओं का आचरण। जब माननीय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसा वरिष्ठ नेतृत्व विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी और स्वयं के हार के बाद यह वक्तव्य देता है कि “मैं इस्तीफा नहीं दूंगी”, तो यह एक साधारण राजनीतिक वक्तव्य नहीं रह जाता, बल्कि संवैधानिकता, नैतिकता और लोकतांत्रिक परंपराओं पर गहन बहस का विषय बन जाता है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">भारत का शासन तंत्र संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है और संविधान द्वारा संचालित। राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री की वैधता विधानसभा में बहुमत से निर्धारित होती है।यदि किसी दल या गठबंधन के पास बहुमत नहीं है, तो वह सरकार बनाने का नैतिक और संवैधानिक अधिकार खो देता है।ऐसी स्थिति में या तो वैकल्पिक बहुमत सिद्ध किया जाता है या पद छोड़ना पड़ता है।इस दृष्टि से “बहुमत के बिना इस्तीफा न देने” का कथन या यूं कहें बहुमत वाले दल के लिए सक्ता हस्तांतरण हेतु पद न  छोड़ने जैसे वक्तव्य संवैधानिक भावना के विपरीत प्रतीत होते हैं। भारत में इस तरह का ब्यान शायद अपने आप में पहला है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">संविधान केवल प्रावधानों का दस्तावेज नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता का भी आधार है।डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि संविधान की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे लागू करने वाले लोग कितनी ईमानदारी से उसका पालन करते हैं।ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है,क्या इस तरह के ब्यान देने  की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?क्या यह जनादेश का अपमान नहीं है?</div>
<div style="text-align:justify;">ममता दीदी पर मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान महामहिम राष्ट्रपति के प्रदेश आगमन पर उन्हें प्रोटोकॉल के अनुरूप सम्मान न देना, केन्द्रीय जांच एजेंसियों को सहयोग न करना, जांच में व्यवधान उत्पन्न करना,सघन मतदाता जांच का विरोध करना, चुनाव आयोग के अधिकारियों के कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करना, समुदाय विशेष को लाभ पहुंचाना जैसे बहुत सारे आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं। इनमें कितने आरोप संवैधानिक रूप से सही है या नहीं यह न्यायलय का तय करना का विषय है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे प्रकरण का सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू विपक्षी दलों की ममता दीदी के इस्तीफा न देने वाले ब्यान पर प्रतिक्रिया न आना  है।जहाँ एक ओर समय-समय पर कई विपक्षी दल बार-बार यह आरोप लगाते रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के शासन में “संविधान खतरे में है”, वहीं दूसरी ओर ममता दीदी के इस स्पष्ट बयान पर न तो विपक्षी दलों द्वारा अपेक्षित विरोध किया और न ही कोई  समझाइश दी गई अपितु 100 सीटों की चोरी के आरोप का समर्थन कर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न खड़े कर दिए, जबकि चुनाव में धांधली हुई या नहीं इसको तय करने के लिए न्यायालय, और उसकी शरण में जाना चाहिए यदि किसी प्रकार की आशंका है। चुनाव आयोग की हिंसा रहित निष्पक्ष चुनाव कराने के श्रम पर पानी फेरने से बचना चाहिए।ऐसा मौन समर्थन क्या भारतीय संविधान को खतरे में नहीं डालता? वास्तव में यह विरोधाभास कई सवाल खड़े करता है:क्या संविधान की चिंता केवल राजनीतिक सुविधा का विषय है?क्या संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का पैमाना दलगत आधार पर बदल जाता है?यदि एक ओर “संविधान खतरे में” का नरेटिव गढ़ा जाए और दूसरी ओर ऐसे बयानों पर चुप्पी साध ली जाए, तो क्या यह उस नरेटिव की विश्वसनीयता को कमजोर नहीं करता ?</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लोकतंत्र केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं, बल्कि सिद्धांतों की निरंतरता का नाम है।जब राजनीतिक दल अपने विरोधियों के लिए एक मानक और अपने सहयोगियों के लिए दूसरा मानक अपनाते हैं तो इससे लोकतांत्रिक विमर्श का स्तर गिरता है।इस संदर्भ में यह स्पष्ट होता है कि:संविधान की रक्षा का प्रश्न चयनात्मक नहीं हो सकता;लोकतांत्रिक मूल्यों की कसौटी सभी पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">मेरा ऐसा मानना है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति से उठा यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है।“बहुमत हासिल न करने पर भी मैं इस्तीफा नहीं दूंगी” जैसा कथन-संवैधानिक रूप से संदिग्ध और लोकतांत्रिक दृष्टि से अनुपयुक्त प्रतीत होता है।</div>
<div style="text-align:justify;">इसके साथ ही विपक्ष की चुप्पी यह संकेत देती है कि भारतीय राजनीति में सिद्धांतों की बजाय सुविधा का प्रभाव बढ़ रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि-सत्ता या विपक्ष में कोई भी बैठे,सबके लिए संविधान सर्वोपरि रहे, और जनादेश का सम्मान अनिवार्य।</div>
</div>
<div class="yj6qo" style="text-align:justify;"> </div>
<div class="adL" style="text-align:justify;"> </div>
</div>
</div>
</div>
<div class="hq gt" style="text-align:justify;"></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 May 2026 16:54:36 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>तेलंगाना का क्रांतिकारी कदम: बुजुर्गों के सम्मान और सुरक्षा का नया युग</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता के प्रति संवेदनशीलता अब कानून की ताकत से जुड़ गई है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi">  </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तेलंगाना सरकार ने ‘पैरेंटल सपोर्ट बिल-</span>2026’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि वृद्ध माता-पिता को अकेला और बेसहारा छोड़ना अब महंगी कीमत चुकाने जैसा अपराध होगा। यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समाज में नैतिक चेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक जिम्मेदारी और सम्मान की पुनर्स्थापना का साहसिक संदेश है। अब कोई भी अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकता—यदि कोई अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके वेतन से </span>15 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत या अधिकतम </span>10,000 <span lang="hi" xml:lang="hi">रुपये काटकर सीधे माता-पिता के बैंक खाते में जमा किए</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174544/telanganas-revolutionary-step-a-new-era-of-respect-and-protection"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(1)7.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता के प्रति संवेदनशीलता अब कानून की ताकत से जुड़ गई है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तेलंगाना सरकार ने ‘पैरेंटल सपोर्ट बिल-</span>2026’ <span lang="hi" xml:lang="hi">के जरिए स्पष्ट कर दिया है कि वृद्ध माता-पिता को अकेला और बेसहारा छोड़ना अब महंगी कीमत चुकाने जैसा अपराध होगा। यह केवल कानूनी प्रावधान नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समाज में नैतिक चेतना</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">पारिवारिक जिम्मेदारी और सम्मान की पुनर्स्थापना का साहसिक संदेश है। अब कोई भी अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकता—यदि कोई अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहता है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो उसके वेतन से </span>15 <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रतिशत या अधिकतम </span>10,000 <span lang="hi" xml:lang="hi">रुपये काटकर सीधे माता-पिता के बैंक खाते में जमा किए जाएंगे। यह प्रावधान सरकारी कर्मचारियों</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजी क्षेत्र के कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों—विधायकों और सांसदों—सभी पर समान रूप से लागू होगा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिससे कानून का प्रभाव हर वर्ग में समान रूप से महसूस होगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी और व्यक्तिगत स्वार्थ ने अक्सर माता-पिता को केवल बोझ जैसा महसूस करा दिया है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">शहरों की चमक-दमक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नौकरी की प्रतिस्पर्धा और आधुनिक जीवनशैली ने पारिवारिक रिश्तों की जड़ों को कमजोर कर दिया है। ऐसे दौर में तेलंगाना का यह कानून युवाओं के लिए सख्त चेतावनी की तरह है कि माता-पिता की उपेक्षा अब महंगी पड़ेगी। अब माता-पिता की लिखित शिकायत पर जिला स्तर पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित होगी और हर महीने कटौती की गई राशि सीधे उनके खाते में नियमित रूप से पहुंचेगी। यह कदम केवल आर्थिक दबाव नहीं बल्कि भावनात्मक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी की गहन याद दिलाने वाला है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">इस बिल की सबसे बड़ी ताकत शिकायत निपटारे की सरल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निष्पक्ष और समयबद्ध प्रक्रिया है। वृद्ध माता-पिता को केवल जिला कलेक्टर के समक्ष लिखित आवेदन देना पर्याप्त होगा। कलेक्टर दोनों पक्षों को सुनने के बाद अधिकतम </span>60 <span lang="hi" xml:lang="hi">दिनों के अंदर मामले का निपटारा करेगा और यदि उपेक्षा सिद्ध हुई तो वेतन कटौती का आदेश जारी करेगा। यदि कलेक्टर समय पर निर्णय नहीं ले पाता या कोई पक्ष असंतुष्ट हो तो अपील के लिए सीनियर सिटीजन कमीशन गठित किया जाएगा। इससे लंबी अदालती प्रक्रिया से मुक्ति मिलेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बुजुर्गों को तुरंत आर्थिक सुरक्षा प्राप्त होगी और उनकी गरिमा व आत्मसम्मान बरकरार रहेगा।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेलंगाना सरकार ने इस बिल के जरिए न केवल कानूनी दंड और आर्थिक प्रावधान तय किए हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समाज में एक नई नैतिक चेतना और पारिवारिक संस्कृति को भी प्रोत्साहित किया है। यह कानून समाज में पारिवारिक जिम्मेदारी की नई चेतना जगाता है। साथ ही</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">यह सुनिश्चित करता है कि बच्चों के व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और व्यस्त जीवनशैली के बावजूद माता-पिता की देखभाल प्राथमिकता बनी रहे। सरकारी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">निजी और नेतृत्वकारी सभी वर्गों में समान जिम्मेदारी तय कर समाज में पारिवारिक मूल्यों और नैतिकता की गहरी समझ विकसित होती है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">भारतीय संस्कृति में माता-पिता हमेशा से सर्वोच्च स्थान पर रहे हैं और उन्हें देवता का दर्जा प्राप्त रहा है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">उन्होंने जीवन भर कठोर परिश्रम किया और अपने बच्चों के भविष्य को संवारने में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी। लेकिन आज की तेज़ भागती जिंदगी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने इन अमूल्य मूल्यों को कमजोर कर दिया है। तेलंगाना सरकार ने इस विधेयक के जरिए सांस्कृतिक और पारिवारिक मूल्यों को कानूनी मजबूती दी है। अब हर कर्मचारी के लिए यह अनिवार्य होगा कि वह अपने वेतन का एक निश्चित हिस्सा माता-पिता की देखभाल और सम्मान के लिए सुरक्षित रखे। इस प्रकार यह कानून आर्थिक सहायता के साथ-साथ पारिवारिक मूल्यों को भी मजबूत करता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">जनप्रतिनिधियों को इस बिल के दायरे में लाना समाज और नेतृत्व की सच्ची जवाबदेही का प्रतीक है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">जो नेता समाज और राष्ट्र का मार्गदर्शन करते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उन्हें सबसे पहले अपने घर में माता-पिता के प्रति कर्तव्य निभाना चाहिए। जब विधायक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सांसद और अन्य जनप्रतिनिधि स्वयं इस कानून का पालन करेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तो आम नागरिक भी स्वतः प्रेरित होंगे और परिवारिक जिम्मेदारी को गंभीरता से समझेंगे। यह कदम केवल व्यक्तिगत पालन को सुनिश्चित नहीं करता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि नेतृत्व की जवाबदेही को मज़बूत बनाकर पूरे समाज में नैतिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिम्मेदारी और पारिवारिक मूल्य की गहरी भावना पैदा करता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को इस कानून में शामिल करना इसे पूरी तरह क्रांतिकारी और समाज परिवर्तनकारी बनाता है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">पहले केवल सरकारी क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित रहता था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लेकिन अब पूरे समाज में समान कानूनी मानक लागू होंगे। माता-पिता की उपेक्षा अब व्यक्तिगत या पारिवारिक मामला नहीं रहेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि इसे सीधे कानून का उल्लंघन माना जाएगा। यह कदम स्पष्ट संदेश देता है कि बुजुर्गों की उपेक्षा अब बर्दाश्त नहीं होगी। हर व्यक्ति को अपने माता-पिता की देखभाल</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मान और सुरक्षा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। इससे पूरे समाज में बुजुर्गों की उपेक्षा अस्वीकार्य हो जाएगी।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">तेलंगाना का यह साहसिक और दूरदर्शी निर्णय पूरे देश के लिए प्रेरणा और उदाहरण बन चुका है।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">अन्य राज्यों को भी तुरंत इस विधेयक को अपनाना चाहिए ताकि बुजुर्गों की पीड़ा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उपेक्षा और हतोत्साह को रोका जा सके। जब तक माता-पिता सुरक्षित</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सम्मानित और पूरी देखभाल में नहीं रहेंगे</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तब तक समाज का वास्तविक</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">स्थिर और समग्र विकास अधूरा रहेगा। यह कानून केवल सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी नहीं बनाता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि यह नैतिकता</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">परिवारिक संस्कार और विकास के बीच सशक्त संतुलन स्थापित करने का शक्तिशाली संदेश भी देता है।</span></p><p class="MsoNormal" style="text-align:justify;"><span lang="hi" xml:lang="hi">माता-पिता की सेवा और सम्मान जीवन की परम प्राथमिकता और सर्वोच्च संस्कार हैं।</span><span lang="hi" xml:lang="hi"> </span><span lang="hi" xml:lang="hi">तेलंगाना सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समाज की असली शक्ति परिवार की मजबूत नींव में ही निहित है। इस बिल से न केवल बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान लौटेगी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि पूरे समाज में पारिवारिक बंधन भी फिर से प्रगाढ़ और अटूट होंगे। राष्ट्र की सच्ची गरिमा उसके बुजुर्गों के सम्मान और सुरक्षा में झलकती है। आइए हम सब मिलकर इस ऐतिहासिक पहल का गर्व से समर्थन करें और अपने माता-पिता को वह सच्चा सम्मान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सुरक्षा और प्यार लौटाएं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जिसके वे वास्तविक हकदार हैं। तेलंगाना का यह साहसिक और दूरदर्शी कदम केवल कानून नहीं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बल्कि समाज में नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की अनोखी मिसाल भी है।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 18:28:40 +0530</pubDate>
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