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                <title>Prayagraj High Court news - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>Prayagraj High Court news RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा का इस्तीफा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है. इससे पहले उनके आवास पर कथित तौर पर कैश मिलने को लेकर हुए विवाद के बाद, उनका दिल्ली हाई कोर्ट से वापस इलाहाबाद तबादला कर दिया गया था. उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को शपथ ली थी और फिलहाल उनके खिलाफ आरोपों के संबंध में एक आंतरिक जाँच चल रही है.</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175799/resignation-of-allahabad-high-court-judge-yashwant-verma"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/prayagraj-news_v_jpg--442x260-4g.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया है. इससे पहले उनके आवास पर कथित तौर पर कैश मिलने को लेकर हुए विवाद के बाद, उनका दिल्ली हाई कोर्ट से वापस इलाहाबाद तबादला कर दिया गया था. उन्होंने 5 अप्रैल 2025 को शपथ ली थी और फिलहाल उनके खिलाफ आरोपों के संबंध में एक आंतरिक जाँच चल रही है.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 22:57:34 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटियों पर सेक्स रैकेट चलाने का झूठा आरोप लगाने वाले व्यक्ति को फटकारा</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की। हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।</p>
<p style="text-align:justify;">स पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175787/allahabad-high-court-reprimands-the-man-who-falsely-accused-his"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/allahabad-high-court1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार को व्यक्ति की क्रिमिनल रिट याचिका खारिज की। इस व्यक्ति ने कानपुर नगर में चल रहे कथित सेक्स रैकेट में शामिल लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की। हालांकि, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपनी पत्नी और बेटी के अश्लील वीडियो ऑनलाइन अपलोड किए जाने पर चिंता जताई, लेकिन बाद की सुनवाई में उसने अपने परिवार के सदस्यों पर अनैतिकता का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ अपमानजनक और झूठे आरोप लगाए।</p>
<p style="text-align:justify;">स पर कड़ा रुख अपनाते हुए जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की बेंच ने याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई। बेंच ने कहा कि अपनी ही पत्नी और बेटी के खिलाफ उसके दावे "पूरी तरह से झूठे" हैं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता "खुद को दूसरों से ज़्यादा पवित्र समझने की मानसिकता" (Holier-Than-Thou Syndrome) से ग्रस्त है और खुद को "समाज की सभी अनैतिकताओं के खिलाफ लड़ने वाला योद्धा" समझता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका असल में पारिवारिक विवाद से जुड़ी थी। अपने ही परिवार पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप लगाना पारिवारिक मामले को कोर्ट के सामने रखने का "सबसे घिनौना" तरीका है। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता द्वारा डिजिटल फॉर्मेट में दी गई कई वीडियो फाइलों और स्क्रीनशॉट की प्रामाणिकता की जांच करने के लिए पुलिस ने उन्हें IIT कानपुर के C3iHub को सौंप दिया। हालांकि, IIT कानपुर की रिपोर्ट से पता चला कि याचिकाकर्ता द्वारा दी गई तस्वीरों और बरामद वीडियो में दिख रहे चेहरों में कोई मेल नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">फोरेंसिक जांच से यह भी पता चला कि बरामद मीडिया फाइलें लगभग 10-12 साल पुरानी थीं। रिपोर्ट में कहा गया कि "उपलब्ध डिजिटल सबूत इस निष्कर्ष का समर्थन करते हैं कि पहचान गलत या भ्रामक तरीके से जोड़ी गई।"इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए बेंच ने विशेष रूप से यह टिप्पणी की: "IIT कानपुर की उपरोक्त रिपोर्ट से हमें यह मानने का आधार मिलता है कि याचिकाकर्ता ने अपने परिवार पर सेक्स रैकेट आदि में शामिल होने के जो बेबुनियाद आरोप लगाए हैं, जिन्हें वेबसाइटों पर दिखाया गया, वे पूरी तरह से झूठे हैं।"</p>
<p style="text-align:justify;">बेंच ने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता लगातार अपने ही अहंकार में डूबा हुआ है। उसके परिवार पर सेक्स रैकेट में शामिल होने के जो बेबुनियाद आरोप उसने लगाए, वे बेहद आपत्तिजनक हैं—जिनमें से कुछ तो रिकॉर्ड से हटाए जाने योग्य हैं अतः, इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कि इन खोखले आरोपों के आधार पर पुलिस को किसी भी प्रकार के सेक्स रैकेट की जाँच करने का निर्देश जारी करने का कोई आधार नहीं है, याचिका खारिज कर दी गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 22:38:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मृत व्यक्ति के खिलाफ अपील दाखिल करने पर फटकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार की अपील खारिज की</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर लापरवाही का मामला सामने आने पर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने उस अपील को खारिज किया, जो सरकार ने ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दाखिल की थी, जिसकी पहले ही मृत्यु हो चुकी है और उसके कानूनी वारिसों को पक्षकार भी नहीं बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि राज्य की ओर से अपील दाखिल करने में घोर लापरवाही बरती गई और केवल यह कहकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता कि अपील दाखिल करने की अनुमति देर से मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने टिप्पणी की, “राज्य की ओर से मृत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175325/allahabad-high-court-reprimanded-for-filing-appeal-against-dead-person"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/1200-675-23912190-thumbnail-16x9-image18.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर लापरवाही का मामला सामने आने पर उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने उस अपील को खारिज किया, जो सरकार ने ऐसे व्यक्ति के खिलाफ दाखिल की थी, जिसकी पहले ही मृत्यु हो चुकी है और उसके कानूनी वारिसों को पक्षकार भी नहीं बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि राज्य की ओर से अपील दाखिल करने में घोर लापरवाही बरती गई और केवल यह कहकर देरी को माफ नहीं किया जा सकता कि अपील दाखिल करने की अनुमति देर से मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने टिप्पणी की, “राज्य की ओर से मृत प्रतिवादी के खिलाफ अपील दाखिल की गई और तीन साल से अधिक समय तक उसके कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया, जबकि इसकी जानकारी थी। इसके लिए कोई उचित कारण नहीं है, क्योंकि वारिसों को शामिल करने के लिए किसी उच्च अधिकारी की अनुमति आवश्यक नहीं होती।”</p>
<p style="text-align:justify;">मामला भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 54 के तहत दायर अपील से जुड़ा है, जिसमें राज्य सरकार ने मुआवजा कम करने की मांग की थी। यह अपील 1516 दिनों की देरी से दाखिल की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार का तर्क था कि वर्ष 2018 में पारित आदेश के खिलाफ अपील की अनुमति 2022 में मिली, जिसके बाद अपील दाखिल की गई। साथ ही यह भी कहा गया कि 2025 में वाद समाप्ति के आवेदन आने के बाद ही उन्हें प्रतिवादी की मृत्यु की जानकारी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिवादी के वारिसों की ओर से बताया गया कि उन्होंने पहले ही कार्यान्वयन कार्यवाही में हलफनामा देकर मृत्यु की जानकारी दी थी और वहां वारिसों को प्रतिस्थापित भी किया जा चुका था। इसके बावजूद राज्य ने हाईकोर्ट में उन्हें पक्षकार नहीं बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार का तर्क था कि वर्ष 2018 में पारित आदेश के खिलाफ अपील की अनुमति 2022 में मिली, जिसके बाद अपील दाखिल की गई। साथ ही यह भी कहा गया कि 2025 में वाद समाप्ति के आवेदन आने के बाद ही उन्हें प्रतिवादी की मृत्यु की जानकारी हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिवादी के वारिसों की ओर से बताया गया कि उन्होंने पहले ही कार्यान्वयन कार्यवाही में हलफनामा देकर मृत्यु की जानकारी दी थी और वहां वारिसों को प्रतिस्थापित भी किया जा चुका था। इसके बावजूद राज्य ने हाईकोर्ट में उन्हें पक्षकार नहीं बनाया।</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य को प्रतिवादी की मृत्यु की जानकारी होने के बावजूद उसने आवश्यक कदम नहीं उठाए। अदालत ने कहा कि ऐसे में अपील मृत व्यक्ति के खिलाफ दायर होने के कारण कानूनी रूप से शून्य (नॉन-एस्ट) है।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने स्पष्ट किया, “यदि अपील दाखिल होने के बाद मृत्यु होती तो प्रतिस्थापन का आवेदन किया जा सकता था। हालांकि, यहां अपील ही मृत व्यक्ति के खिलाफ दायर की गई, जो कानूनन मान्य नहीं है।” इसी आधार पर अदालत ने देरी माफी आवेदन, प्रतिस्थापन आवेदन और अपील सभी खारिज की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 20:17:07 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>हाईकोर्ट का आदेश- वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से कोर्ट में उपस्थित हों न्यायिक मजिस्ट्रेट</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>प्रयागराज के झूंसी थाना क्षेत्र निवासी याची ने 2023 से लंबित चेक बाउंस से जुड़े मामले के शीघ्र निस्तारण की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। 10 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से परिवाद के निस्तारण में हो रही देरी का स्पष्टीकरण मांगा गया था। इस पर अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। </p>
<p style="text-align:justify;">ईकोर्ट के कार्यालय की ओर से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज को इस संबंध में औपचारिक पत्र भी भेजा गया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट की ओर से अनुपालन की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। कोर्ट ने संबंधित अदालत के</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174644/high-courts-order-judicial-magistrate-should-appear-in-the-court"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court9.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज। </strong>प्रयागराज के झूंसी थाना क्षेत्र निवासी याची ने 2023 से लंबित चेक बाउंस से जुड़े मामले के शीघ्र निस्तारण की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। 10 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से परिवाद के निस्तारण में हो रही देरी का स्पष्टीकरण मांगा गया था। इस पर अब तक कोई जवाब प्राप्त नहीं हुआ है। </p>
<p style="text-align:justify;">ईकोर्ट के कार्यालय की ओर से मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज को इस संबंध में औपचारिक पत्र भी भेजा गया था, लेकिन ट्रायल कोर्ट की ओर से अनुपालन की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। कोर्ट ने संबंधित अदालत के पीठासीन अधिकारी को वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कार्यालय को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि पिछला और वर्तमान आदेश संबंधित अधिकारी तक समय पर पहुंच जाए ताकि आवश्यक अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 22:13:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसी एक का ही धर्म सच्चा है, ये कहना ग़लत है</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मऊ से जुड़े एक पादरी की याचिका पर आईपीसी की धारा 295A से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में याचिका को खारिज करते हुए तल्ख टिप्पणी की है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पादरी को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का यह दावा करना गलत है कि उसका ही धर्म सच्चा है क्योंकि ऐसा करना अन्य धर्मों का अपमान करने जैसा है.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य IPC की धारा 295-A के तहत आते है जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और गलत</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174510/it-is-wrong-to-say-that-only-one-religion-is"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court7.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मऊ से जुड़े एक पादरी की याचिका पर आईपीसी की धारा 295A से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए अपने महत्वपूर्ण फैसले में याचिका को खारिज करते हुए तल्ख टिप्पणी की है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पादरी को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का यह दावा करना गलत है कि उसका ही धर्म सच्चा है क्योंकि ऐसा करना अन्य धर्मों का अपमान करने जैसा है.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य IPC की धारा 295-A के तहत आते है जो धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जानबूझकर और गलत इरादे से किए गए कामों पर रोक लगाता है.कोर्ट ने आवेदक पादरी की बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दाखिल अर्जी को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह आदेश आवेदक को कानून के हिसाब से मौजूद उपाय का फायदा उठाने से नहीं रोकेगा. यह आदेश जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की सिंगल बेंच ने रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा उर्फ़ फ़ादर विनीत विंसेंट परेश की याचिका को खारिज करते हुए दिया है.</p>
<p style="text-align:justify;">मामले के अनुसार आवेदक पादरी ने अपने खिलाफ चार सितंबर 2023 को मऊ के मुहम्मदाबाद थाने में दर्ज आईपीसी की धारा 295A के तहत एफआईआर के बाद मऊ कोर्ट द्वारा 19 फरवरी 2024 की चार्जशीट और 18 मई 2024 के संज्ञान आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. आवेदक पादरी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से याचिका के माध्यम से अपने खिलाफ दाखिल चार्जशीट, संज्ञान आदेश और मऊ कोर्ट में चल रही संपूर्ण कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी.</p>
<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान आवेदक पादरी के वकील ने यह तर्क दिया कि आवेदक को इस मामले में पक्ष संख्या दो द्वारा केवल परेशान करने के उद्देश्य से झूठा फंसाया गया है. क्योंकि आवेदक ने समाज के वंचित वर्ग का अवैध रूप से धर्म परिवर्तन कराने या अन्य धर्मों के विरुद्ध बोलने जैसा कोई भी कथित अपराध कभी नहीं किया है.</p>
<p style="text-align:justify;">आवेदक के वकील ने यह भी तर्क दिया कि जांच के दौरान संबंधित जांच अधिकारी ने पहले ही यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि आवेदक द्वारा कोई भी अवैध धर्म परिवर्तन कभी नहीं किया गया है. जहां तक अन्य धर्मों की आलोचना करने के आरोप का संबंध है आवेदक के वकील ने यह पेश किया कि FIR के विवरण को पढ़ने पर आवेदक के विरुद्ध IPC की धारा 295-A के तहत कोई मामला नहीं बनता है.</p>
<p style="text-align:justify;">आवेदक के वकील ने आगे दलील दी कि आवेदक को कथित अपराध से जोड़ने के लिए उसके विरुद्ध शायद ही कोई साक्ष्य मौजूद है. आवेदक के वकील ने कहा कि निष्पक्ष जांच किए बिना संबंधित जांच अधिकारी ने आवेदक के विरुद्ध आरोप पत्र (chargesheet) प्रस्तुत कर दिया जिस पर संबंधित कोर्ट ने बिना अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग किए आरोप पत्र के आधार पर अपराध का संज्ञान ले लिया जो कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है. और इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए.</p>
<p style="text-align:justify;"> वहीं राज्य सरकार ने आवेदक पादरी की याचिका का विरोध करते हुए यह तर्क दिया कि आवेदक की ओर से जो दलीलें उठाई जा रही है वे तथ्यों के विवादित प्रश्नों से संबंधित है और उनमें साक्ष्यों के मूल्यांकन की आवश्यकता होगी. यह पेश किया गया है कि संज्ञान लेते समय केवल प्रथम दृष्ट्या मामला ही देखा जाना होता है और संबंधित न्यायालय से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह कोई 'मिनी ट्रायल' करे.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि इस मामले में केवल एक ही प्रश्न उठता है वह यह कि क्या FIR के विवरण के माध्यम से आवेदक पर लगाया गया कृत्य, IPC की धारा 295-A में वर्णित अपराध के दायरे में आता है अथवा नहीं.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा कि आईपीसी की धारा 295A जो जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्यों से संबंधित है जिनका उद्देश्य किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान करके उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करना होता है. धारा 295A में अगर कोई ऐसा करने का प्रयास करता है तो उसे किसी भी प्रकार के कारावास से दंडित किया जाएगा जिसकी अवधि तीन वर्ष तक हो सकती है या फिर जुर्माना लगाया जा सकता है या दोनों हो सकते है.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 22:10:22 +0530</pubDate>
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                <title>'शादीशुदा पुरुष का बालिग के साथ लिव-इन में रहना जुर्म नहीं', इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी पर लगाई रोक</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बड़ा और साफ फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर कोई शादीशुदा आदमी किसी बालिग महिला के साथ उसकी मर्जी से लिव-इन में रहता है, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट का कहना है कि नैतिकता क्या कहती है और कानून क्या कहता है, ये दोनों बातें अलग हैं. अगर कोई कानून नहीं टूटा है, तो सिर्फ सामाजिक सोच के आधार पर किसी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. कोर्ट ने अगले आदेश तक  याचिकाकर्ता जोड़े की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए पुलिस को उन्हें</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174507/it-is-not-a-crime-for-a-married-man-to"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court6.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ब्यूरो प्रयागराज- </strong>इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बड़ा और साफ फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर कोई शादीशुदा आदमी किसी बालिग महिला के साथ उसकी मर्जी से लिव-इन में रहता है, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट का कहना है कि नैतिकता क्या कहती है और कानून क्या कहता है, ये दोनों बातें अलग हैं. अगर कोई कानून नहीं टूटा है, तो सिर्फ सामाजिक सोच के आधार पर किसी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. कोर्ट ने अगले आदेश तक  याचिकाकर्ता जोड़े की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए पुलिस को उन्हें सुरक्षा देने का आदेश दिया है.</p>
<p style="text-align:justify;">यह आदेश जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिविजन बेंच ने याचिकाकर्ता अनामिका और नेत्रपाल की क्रिमिनल रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है. कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया गया है कि उन्हें गिरफ्तार न किया जाए.</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही, कोर्ट ने महिला (अनामिका) के घरवालों को भी कड़ी चेतावनी दी है. परिवार का कोई भी सदस्य इस जोड़े को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएगा. वे न तो उनके घर में घुसेंगे और न ही फोन, मैसेज या किसी तीसरे बंदे के जरिए उनसे संपर्क करने की कोशिश करेंगे.</p>
<p style="text-align:justify;">सुरक्षा के मामले में कोर्ट ने शाहजहांपुर के पुलिस कप्तान (SP) को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया है. कोर्ट ने कहा कि जोड़े की हिफाजत करना पुलिस का फर्ज है. इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में 'शक्ति वाहिनी' वाले केस में पहले ही साफ नियम बनाए हुए हैं.</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया  है कि वो इस आदेश की सूचना पुलिस अधीक्षक, शाहजहांपुर और थाना प्रभारी पुलिस थाना जैतीपुर को दोनों को ही मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, शाहजहांपुर के माध्यम से अगले 24 घंटों के अंदर भेज दें. अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को होगी.</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 22:05:34 +0530</pubDate>
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                <title>‘साधु-संतों को परेशान करता है…’आशुतोष ब्रह्मचारी को लेकर कृष्ण जन्मभूमि के याचिकाकर्ता ने उठाए सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य स्वामी मुकुंदानंद गिरी को बड़ी राहत दी है। कथित यौन उत्पीड़न और पोक्सो एक्ट के मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका को कोर्ट ने मंजूर कर लिया है। इससे सनातन हिंदू समाज में खुशी की लहर दौड़ गई है। कोर्ट ने दोनों पर लगे आरोपों पर गंभीर सवाल उठाए और सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने यह आदेश दिया। अब दोनों को गिरफ्तारी से तुरंत राहत मिल गई है। कोर्ट ने उन्हें जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश भी दिया है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174316/%E2%80%98he-harasses-the-saints-and-sages%E2%80%A6%E2%80%99-petitioner-from-krishna-janmabhoomi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/allahabad-high-court5.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हाईकोर्ट ने ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य स्वामी मुकुंदानंद गिरी को बड़ी राहत दी है। कथित यौन उत्पीड़न और पोक्सो एक्ट के मामले में उनकी अग्रिम जमानत याचिका को कोर्ट ने मंजूर कर लिया है। इससे सनातन हिंदू समाज में खुशी की लहर दौड़ गई है। कोर्ट ने दोनों पर लगे आरोपों पर गंभीर सवाल उठाए और सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने यह आदेश दिया। अब दोनों को गिरफ्तारी से तुरंत राहत मिल गई है। कोर्ट ने उन्हें जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश भी दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस फैसले के बाद सनातन धर्म के अनुयायियों में खुशी देखी जा रही है। श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर मामले के मुख्य याचिकाकर्ता दिनेश फलाहारी महाराज ने कहा कि माननीय प्रयागराज हाईकोर्ट का यह फैसला बहुत सही है। उन्होंने न्यायालय को धन्यवाद दिया और कहा कि अदालत हमेशा सबूतों के आधार पर फैसला लेती है। फलाहारी महाराज ने जोर देकर कहा कि यह केस फर्जी लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आशुतोष पांडे शामली जनपद का 25,000 रुपये का इनामी हिस्ट्रीशीटर रहा है। उस पर गौ हत्या का भी आरोप लग चुका है। ऐसे व्यक्ति द्वारा लगाए गए आरोपों पर गंभीर संदेह है। दिनेश फलाहारी महाराज ने आगे कहा कि आशुतोष ब्रह्मचारी ने शंकराचार्य जी पर फर्जी केस लगाया है। यह व्यक्ति कई आपराधिक मामलों में शामिल रहा है। उन्होंने प्रदेश सरकार से मांग की कि आशुतोष पांडे के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>Featured</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 21:02:50 +0530</pubDate>
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