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                <title>वैश्विक सुरक्षा - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>वैश्विक सुरक्षा RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>ईरान में संचार अंधकार का दौर सत्ता, संघर्ष और समाज के बीच टूटता संवाद</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहे तनाव और टकराव के बीच ईरान में एक और गंभीर स्थिति सामने आई है, जहां संचार व्यवस्था का ठप हो जाना अब एक नए संकट के रूप में उभर रहा है। पिछले सैंतीस दिनों से देश में संचार सेवाओं पर लगा प्रतिबंध न केवल आम नागरिकों के दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि यह शासन, सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच गहरे संघर्ष को भी उजागर करता है। यह स्थिति केवल तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक, सामाजिक और रणनीतिक कारणों का जटिल मिश्रण छिपा हुआ है।</div>
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<div style="text-align:justify;">ईरान में यह संचार बंदी</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175278/a-period-of-communication-darkness-in-iran-power-struggle-and"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/w-1280,h-720,imgid-01kep1676n5285ef2knf893wsf,imgname-iran-internet-kill-switch-cold-war-protests-blackout-explained-06-1768118492373.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">मध्य पूर्व में चल रहे तनाव और टकराव के बीच ईरान में एक और गंभीर स्थिति सामने आई है, जहां संचार व्यवस्था का ठप हो जाना अब एक नए संकट के रूप में उभर रहा है। पिछले सैंतीस दिनों से देश में संचार सेवाओं पर लगा प्रतिबंध न केवल आम नागरिकों के दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहा है, बल्कि यह शासन, सुरक्षा और स्वतंत्रता के बीच गहरे संघर्ष को भी उजागर करता है। यह स्थिति केवल तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक, सामाजिक और रणनीतिक कारणों का जटिल मिश्रण छिपा हुआ है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान में यह संचार बंदी ऐसे समय में लागू की गई है, जब देश बाहरी हमलों और आंतरिक अस्थिरता दोनों का सामना कर रहा है। अमेरिका और इजराइल के साथ बढ़ते टकराव ने वहां की सरकार को सुरक्षा के नाम पर कठोर कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। सरकार का मानना है कि संचार माध्यमों के जरिए अफवाहें, गलत सूचनाएं और विरोध को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है। इसलिए संचार सेवाओं को सीमित या पूरी तरह बंद करना एक रणनीतिक निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">लेकिन इस निर्णय का प्रभाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा असर आम नागरिकों पर पड़ा है, जो अपने परिवार, मित्रों और बाहरी दुनिया से कट चुके हैं। व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और अन्य आवश्यक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। छोटे व्यापारी, छात्र और पेशेवर लोग सबसे अधिक संकट का सामना कर रहे हैं, क्योंकि उनके कामकाज का बड़ा हिस्सा संचार पर निर्भर करता है। ऐसे में यह संचार बंदी एक प्रकार से सामाजिक और आर्थिक जीवन को ठहराव की स्थिति में ले आई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस स्थिति का एक और पहलू अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है। जब संचार माध्यम बंद हो जाते हैं, तो लोगों की आवाज भी सीमित हो जाती है। वे अपनी समस्याएं, विचार और विरोध खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते। इससे समाज में असंतोष और निराशा बढ़ने की संभावना रहती है। इतिहास गवाह है कि जब लोगों की आवाज दबाई जाती है, तो वह किसी न किसी रूप में और अधिक तीव्रता के साथ सामने आती है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस स्थिति को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। विभिन्न मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इस तरह की लंबी संचार बंदी नागरिक अधिकारों का उल्लंघन है। हालांकि, ईरान सरकार का तर्क है कि यह कदम अस्थायी है और देश की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। लेकिन सैंतीस दिनों का लंबा समय इस अस्थायी उपाय को एक स्थायी संकट का रूप देता जा रहा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इस पूरे घटनाक्रम को यदि व्यापक संदर्भ में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि संचार आज केवल सूचना का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह शक्ति और नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। जो इसे नियंत्रित करता है, वह समाज की दिशा और गति को भी प्रभावित कर सकता है। ईरान में हो रही यह घटना इसी बात का उदाहरण है कि कैसे तकनीक का उपयोग और दुरुपयोग दोनों संभव हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहां एक ओर देशों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सूचना का प्रवाह भी एक युद्ध का रूप ले चुका है। इस सूचना युद्ध में सच्चाई और भ्रम के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है। ऐसे में किसी देश द्वारा संचार को पूरी तरह बंद करना एक तरह से इस युद्ध से बचने का प्रयास भी हो सकता है, लेकिन इसके परिणाम दूरगामी और जटिल होते हैं।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">ईरान की स्थिति यह भी दर्शाती है कि आधुनिक समाज में संचार का महत्व कितना अधिक हो गया है। आज के समय में यह केवल सुविधा नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। इसके बिना जीवन की कल्पना करना भी कठिन है। इसलिए जब इसे अचानक छीन लिया जाता है, तो इसका प्रभाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी होता है।आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ईरान इस स्थिति से कैसे बाहर निकलता है। क्या सरकार संचार सेवाओं को बहाल करेगी या यह प्रतिबंध और लंबा खिंचेगा, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा। अंतरराष्ट्रीय दबाव, आंतरिक हालात और सुरक्षा की स्थिति इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">अंततः, यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि तकनीक और सत्ता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। जहां एक ओर सुरक्षा आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो इसका खामियाजा समाज को भुगतना पड़ता है। ईरान में जारी यह संचार अंधकार केवल एक देश की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक चेतावनी है कि आधुनिक युग में सूचना और संचार कितने महत्वपूर्ण हो चुके हैं। इसे नियंत्रित करने के प्रयास हमेशा विवाद और असंतोष को जन्म देते हैं। इसलिए आवश्यक है कि इस दिशा में संतुलित और जिम्मेदार दृष्टिकोण अपनाया जाए, ताकि सुरक्षा और स्वतंत्रता दोनों का सम्मान बना रहे।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;"><strong>कांतिलाल मांडोत</strong></div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 18:36:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक स्थिति और परमाणु युद्ध के खतरे</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक स्थिति को लेकर समय-समय पर वैश्विक बहस जरूर उठती रही है, डोनाल्ड ट्रंप ईरान के युद्ध में अपनी प्रारंभिक पराजय और इजरायल द्वारा अमेरिका को इस्तेमाल किए जाने की परिस्थितियों की अफवाह से थोड़े मानसिक रूप से विचलित हो गए हैं उन्होंने कुछ अपने महत्वपूर्ण विभागों के  के प्रमुखों को भी पद से हटा दिया है जो अमेरिका प्रशासन में गंभीर स्थिति को दर्शाता है। उनके द्वारा  प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गये वक्तव्य उनकी निराशा तथा हताशा को इंगित कर रहा है। ऐसी स्थिति में डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध को लेकर परमाणु</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/175274/donald-trumps-mental-condition-and-the-dangers-of-nuclear-war"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-04/getty_6842799de6-1749186973.webp" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मानसिक स्थिति को लेकर समय-समय पर वैश्विक बहस जरूर उठती रही है, डोनाल्ड ट्रंप ईरान के युद्ध में अपनी प्रारंभिक पराजय और इजरायल द्वारा अमेरिका को इस्तेमाल किए जाने की परिस्थितियों की अफवाह से थोड़े मानसिक रूप से विचलित हो गए हैं उन्होंने कुछ अपने महत्वपूर्ण विभागों के  के प्रमुखों को भी पद से हटा दिया है जो अमेरिका प्रशासन में गंभीर स्थिति को दर्शाता है। उनके द्वारा  प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गये वक्तव्य उनकी निराशा तथा हताशा को इंगित कर रहा है। ऐसी स्थिति में डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ युद्ध को लेकर परमाणु बम गिराने जैसे कठोर कदम भी उठा सकते हैं यह उन्होंने हालिया बयान में कहा भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन किसी भी निर्वाचित नेता के मानसिक संतुलन पर ठोस चिकित्सीय प्रमाण के बिना निष्कर्ष निकालना न केवल अनुचित है बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जटिलताओं को और भी जटिल बना देना है, इसलिए आवश्यक है कि हम भावनात्मक धारणाओं के बजाय तथ्यों और रणनीतिक यथार्थ के आधार पर इस पूरे परिदृश्य को समझें, विशेषकर जब बात अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच संभावित युद्ध और परमाणु टकराव की हो।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सही है कि पश्चिम एशिया लंबे समय से अस्थिरता का केंद्र रहा है और यहां की किसी भी सैन्य कार्रवाई का प्रभाव वैश्विक शांति पर पड़ता है, लेकिन यह दावा कि ईरान के पास निश्चित रूप से 440 किलो यूरेनियम है जिससे 11 परमाणु बम तुरंत बनाए जा सकते हैं, इस प्रकार के आंकड़े आमतौर पर खुफिया और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुमान होते हैं, जिनकी पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं की जा सकती, हालांकि यह भी सच है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम वर्षों से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है और इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी लगातार उसकी निगरानी करती रही है,  सार्वजनिक तौर पर यह दावा किया जाना  कि ईरान ने अमेरिकी एफ-15 विमानों को मार गिराया, इस तरह की घटनाओं की पुष्टि विश्वसनीय वैश्विक रक्षा स्रोतों से होना आवश्यक होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि युद्ध के समय सूचना तंत्र का युद्ध भी उतना ही सक्रिय होता है जितना वास्तविक युद्ध, वास्तविकता यह है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य ताकत का टकराव नहीं बल्कि तकनीकी, कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक रणनीतियों का मिश्रण होता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति विश्व में सबसे ताकतवर और सक्षम मानी जाती है, वहीं ईरान ने भी असममित युद्ध  की रणनीति अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत की है, जिसमें मिसाइल तकनीक, ड्रोन युद्ध और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों का उपयोग शामिल है, ऐसे में यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो यह किसी एक पक्ष की त्वरित जीत के बजाय लंबे गतिरोध में बदल सकता है, जहां तक डोनाल्ड ट्रंप के बयानों का सवाल है, यह सर्वविदित है कि उनकी राजनीतिक शैली आक्रामक और अप्रत्याशित रही है, वे कई बार अपने वक्तव्यों में बदलाव करते रहे हैं, जिसे उनके समर्थक रणनीतिक लचीलापन कहते हैं जबकि आलोचक इसे अस्थिरता का संकेत मानते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय संबंधों में केवल एक व्यक्ति की मानसिक स्थिति से निर्णय नहीं लिए जाते, बल्कि उसके पीछे पूरी संस्थागत संरचना, सलाहकार तंत्र और रक्षा नीति का ढांचा काम करता है, अमेरिका जैसे देश में राष्ट्रपति के पास परमाणु हथियारों का नियंत्रण अवश्य होता है, लेकिन उसके उपयोग के लिए कई स्तरों की सुरक्षा और निर्णय प्रक्रिया भी मौजूद होती है, इसलिए यह आशंका कि कोई नेता अचानक मानसिक असंतुलन में परमाणु युद्ध छेड़ देगा, व्यावहारिक रूप से अत्यंत जटिल और नियंत्रित प्रक्रिया से गुजरती है, फिर भी यह खतरा पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता क्योंकि इतिहास गवाह है कि गलत आकलन और अहंकारपूर्ण निर्णय बड़े युद्धों का कारण बने हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उदाहरण के लिए द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम विस्फोट ने मानवता को परमाणु विनाश की भयावहता दिखाई थी। लेकिन उस समय और आज की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है क्योंकि आज के परमाणु हथियार कहीं अधिक शक्तिशाली और विनाशकारी हैं। आधुनिक परमाणु युद्ध केवल दो शहरों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह पूरे ग्रह के पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर सकता है, जिससे न्यूक्लियर विंटर जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जिसमें सूरज की रोशनी तक पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाएगी और वैश्विक खाद्य संकट पैदा हो जाएगा, इस संदर्भ में “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़” जैसे सामरिक मार्ग का महत्व भी अत्यधिक बढ़ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह विश्व के तेल आपूर्ति का प्रमुख रास्ता है, यदि इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है, तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और विकासशील देशों पर इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव पड़ेगा, वर्तमान परिदृश्य में यह कहना अधिक उचित होगा कि अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच तनाव एक बहुस्तरीय शक्ति संघर्ष का परिणाम है। जिसमें सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ कूटनीतिक दबाव, आर्थिक प्रतिबंध और क्षेत्रीय राजनीति भी शामिल है, इस संघर्ष को केवल “जीत” या “हार” के नजरिए से नहीं देखा जा सकता क्योंकि इसका हर परिणाम वैश्विक अस्थिरता को बढ़ाता है, जहां तक ट्रंप की भूमिका का सवाल है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी छवि एक ऐसे नेता की रही है जो पारंपरिक कूटनीति से हटकर निर्णय लेते हैं, वे कई बार जोखिमपूर्ण बयानबाजी करते हैं जिससे तनाव बढ़ सकता है, लेकिन साथ ही वे अचानक बातचीत की दिशा भी पकड़ सकते हैं, इसलिए उन्हें पूरी तरह “मानसिक रूप से असंतुलित” कहना एक राजनीतिक आकलन हो सकता है, न कि वस्तुनिष्ठ सत्य, असली चिंता इस पूरे परिदृश्य में यह है कि यदि किसी भी पक्ष ने गलत आकलन कर लिया या प्रतिक्रिया में अति कर दी तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है, और तब परमाणु हथियारों का उपयोग भले ही अंतिम विकल्प के रूप में हो, उसका परिणाम पूरी मानवता के लिए विनाशकारी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए आज की आवश्यकता यह है कि वैश्विक शक्तियां संयम बरतें, संवाद को प्राथमिकता दें और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर दें, क्योंकि युद्ध चाहे किसी भी कारण से हो, उसका अंत केवल विनाश और मानव पीड़ा में ही होता है, और परमाणु युद्ध की स्थिति में यह पीड़ा अकल्पनीय स्तर तक पहुंच सकती है, इसलिए इस विषय को भावनात्मक उत्तेजना के बजाय गंभीर, संतुलित और तथ्यपरक दृष्टिकोण से समझना ही सबसे उचित मार्ग है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>संजीव ठाकुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 18:26:26 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>खुद की गलतियों से आतंकवाद का सबसे बड़ा गढ़ बना  पाकिस्तान </title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व भर में पाकिस्तान सबसे बड़ा आतंकवाद का गढ़ बन गया है। पाकिस्तान की खुद की कमर आज उस आतंकवाद ने तोड़ दी है जिसे कभी शह देकर उसने ही पाला पोसा था। इस बात की पुष्टि ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स कर रहा है, जिसमें पहली बार पाकिस्तान शीर्ष स्थान पर पहुंचा है। साल 2025 में आतंकवाद से जुड़ी मौतों के मामले में 6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।</div>
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<div style="text-align:justify;">इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (आईईपी) द्वारा जारी ग्लोबल टैररिज्म इंडैक्स 2026 के अनुसार, पिछले साल पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं में 1,139 मौतें दर्ज की गईं, जो</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174224/pakistan-became-the-biggest-stronghold-of-terrorism-due-to-its"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/images-(2)2.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>मनोज कुमार अग्रवाल </strong></div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">विश्व भर में पाकिस्तान सबसे बड़ा आतंकवाद का गढ़ बन गया है। पाकिस्तान की खुद की कमर आज उस आतंकवाद ने तोड़ दी है जिसे कभी शह देकर उसने ही पाला पोसा था। इस बात की पुष्टि ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स कर रहा है, जिसमें पहली बार पाकिस्तान शीर्ष स्थान पर पहुंचा है। साल 2025 में आतंकवाद से जुड़ी मौतों के मामले में 6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (आईईपी) द्वारा जारी ग्लोबल टैररिज्म इंडैक्स 2026 के अनुसार, पिछले साल पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं में 1,139 मौतें दर्ज की गईं, जो वहां की बिगड़ती सुरक्षा स्थिति को दिखाती हैं। ग्लोबल टैररिज्म इंडैक्स 2026 में 163 देशों में आतंकवाद के असर का आकलन किया गया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान का अपने पड़ोसी देशों, खासकर अफगानिस्तान के साथ तनावपूर्ण संबंध हैं। इसके अलावा प्रतिबंधित तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) की तरफ से बढ़ती हिंसा ने पाकिस्तान के लिए सुरक्षा जोखिमों को बढ़ा दिया है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान में आतंकी हमलों में मौत की संख्या भी चौंकाने वाली है। रिपोर्ट से पता चलता है कि पाकिस्तान में आतंकवाद से होने वाली मौतें अब 2013 के बाद से अपने सबसे ऊंचे स्तर पर हैं। 2025 में देश में आतंकवाद से 1,139 मौतें और 1,045 घटनाएं दर्ज की गई थी। इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस की रिपोर्ट में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) को पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है। कहा गया है कि टीटीपी ने पाकिस्तान के भीतर सबसे खतरनाक आतंकी समूह के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">यह वैश्विक स्तर पर तीसरा सबसे खतरनाक आतंकी समूह है। आईईपी के आंकड़ों से पता चलता है कि 2009 के बाद से पाकिस्तान में कुल हमलों में टीटीपी के हमलों का हिस्सा 67 प्रतिशत से ज्यादा रहा है, और पाकिस्तान में होने वाले हमलों के लिए यह दूसरे सबसे सक्रिय समूह, बीएलए के मुकाबले पांच गुना ज्यादा जिम्मेदार है। खास बात यह है कि दुनिया के 4 सबसे खतरनाक समूहों में टीटीपी ही एकमात्र ऐसा संगठन था जिसकी गतिविधियों में पिछले साल बढ़ोतरी देखी गई। 2025 में टीटीपी की मारक क्षमता में भारी बढ़ोतरी हुई। आतंकवादी घटनाओं की संख्या 24 प्रतिशत बढ़कर 595 हमलों तक पहुंच गई। ये हमले मुख्य रूप से अफगानिस्तान की सीमा के पास खैबर पख्तूनख्वा इलाके में हुए, जिनमें 637 लोगों की मौत हुई-यह आंकड़ा 2011 के बाद से सबसे ज्यादा है।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">रिपोर्ट बताती है कि 6000 से 6500 टीटीपी लड़ाके अफगानिस्तान के अंदर से काम कर रहे हैं और वहीं से पाकिस्तान में हमले कर रहे हैं। करीब 85% हमले अफगान सीमा के 10 से 50 किलोमीटर के दायरे में होते हैं।पाकिस्तान के कबायली इलाकों को लंबे समय तक ऐसे समूहों का सुरक्षित ठिकाना माना जाता रहा है। यहां से तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, अल-कायदा और बाद में टीटीपी जैसे संगठन मजबूत हुए। 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद टीटीपी को और सुरक्षित ठिकाना मिल गया। पाकिस्तान ने अफगान सरकार से कार्रवाई की मांग की, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।एक नकारात्मक सोच रखने वाला और कट्टरपंथी राह पर चलने वाला पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन व संरक्षण देने वाला पाकिस्तान आज खुद आतंकवाद का शिकार है।</div>
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<div style="text-align:justify;">एक रिपोर्ट के अनुसार हालांकि, कुल हमलों की संख्या में थोड़ी कमी आई, लेकिन 2025 लगातार छठा साल रहा जब आतंकवाद से मौतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके अलावा, देश में बंधक बनाने की घटनाओं में भी भारी उछाल देखा गया। 2024 में 101 के मुकाबले 2025 में 655 लोग बंधक बनाए गए। यह वृद्धि मुख्य रूप से जाफर एक्सप्रेस हमले के कारण हुई, जिसमें 442 लोगों को बंधक बनाया गया था।बता दें कि आतंरिक सुरक्षा की स्थिति खासकर खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में सबसे ज्यादा खराब है, जहां 2025 में कुल आतंकी हमलों का 74 प्रतिशत और मौतों का 67 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया।</div>
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<div style="text-align:justify;">वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान अब बुर्किना फ़ासो, नाइजीरिया, नाइजर और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के साथ उन पांच देशों में शामिल है, जहां दुनियाभर की लगभग 70 फीसदी आतंकी मौतें होती हैं। यह ताजा रैंकिंग 2025 में दूसरे स्थान पर रहने के बाद आई है, जो पाकिस्तान में लगातार बिगड़ती सुरक्षा स्थिति की पुष्टि करती है।2021 में जब काबुल में तालिबान ने सत्ता संभाली तो पाकिस्तान की एस्टेब्लिशमेंट मिठाइयां बांट रही थी. उन्हें लगा था कि उनका स्ट्रैटेजिक डेप्थ का सपना पूरा हो गया. लेकिन पासा पूरी तरह पलट गया. अफगानिस्तान में आतंकी घटनाओं और मौतों में 95% की भारी गिरावट आई. आज वहां की सड़कों पर होने वाले धमाके कम हुए हैं और तालिबान ने ऐसे समूहों पर नकेल कसी है। </div>
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<div style="text-align:justify;">आपको बता दें जनरल आसिम मुनीर के कार्यकाल में पाकिस्तान आतंकवाद का नया एक्सपोर्ट-इंपोर्ट हब बन चुका है. पाकिस्तान की सेना और खुफिया एजेंसी जिस तालिबान को अपना एसेट मानती थी, उसी से जुड़ा टीटीपी अब खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में पाकिस्तानी फौज का शिकार कर रही है. मुनीर साहब राजनीति और इमरान खान को दबाने में इतने व्यस्त रहे कि सीमाओं की सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता उनके हाथ से निकल गई.</div>
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<div style="text-align:justify;">सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से अस्थिर पाकिस्तान आज भी उत्पन्न हुई स्थिति पर आत्मचिंतन करने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान जब से अस्तित्व में आया तभी से भारत विरुद्ध नीति उसकी राजनीति का केंद्र बिन्दु रही है पाकिस्तान की नकारात्मक नीतियों का ही परिणाम है कि पहले बांग्लादेश अस्तित्व में आया और आज बलूचिस्तान अलग होने के लिए संघर्ष कर रहा है। भारत विरुद्ध आतंकियों का इस्तेमाल करने वाला पाकिस्तान आज आतंकवाद केंद्र भी है और आतंकवाद पीड़ित भी है। पाकिस्तान अगर सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक स्थिरता चाहता है तो उसे आतंकियों को समर्थन व संरक्षण देना बंद करना होगा और सकारात्मक सोच अपनाकर अपने भविष्य को संवारने के लिए कार्य करना होगा।</div>
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<div style="text-align:justify;">पाकिस्तान के आंतरिक राजनीतिक हालात जगजाहिर हैं, शरीफ सरकार एक कठपुतली सरकार से अधिक कुछ नहीं।सेना प्रमुख मुनीर के हाथों में पाकिस्तान की बागडोर सिमट रही है अमेरिका मुनीर को तवज्जो देकर अपने हित साधने की जुगत कर रहा है। मुनीर जिहादियों का इस्तेमाल भारत विरुद्ध तो कर ही रहे हैं। पाकिस्तान के भीतर आतंकियों को आज भी पाकिस्तानी सेना के प्रमुख मुनीर समर्थन दे रहे हैं। इसी कारण पाकिस्तान में आतंकवाद भी और उस कारण जान माल का नुकसान भी बढ़ रहा है। विश्व में आतंकवाद के कारण होने वाली सबसे अधिक मौतों के कारण शीर्ष पर पाकिस्तान के होने का मुख्य कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था के इतर पाकिस्तानी में लगातार सेना प्रमुख का हस्तक्षेप बना रहना है।पाकिस्तान की बुनियाद ही घृणा विद्वेष और सांप्रदायिक कट्टरता की जमीन पर रखी गई है यही उसके लिए भारी पड़ रही है।</div>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
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                <pubDate>Thu, 26 Mar 2026 18:23:25 +0530</pubDate>
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