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                <title>नई शिक्षा नीति - Swatantra Prabhat</title>
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                <description>नई शिक्षा नीति RSS Feed</description>
                
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                <title>शिक्षा को लौटानी होगी मानवीय संवेदना</title>
                                    <description><![CDATA[<p style="text-align:justify;">भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ऐसी दोहरी चुनौती का सामना कर रही है जिसमें एक ओर वैश्विक स्तर पर प्रतिभाशाली युवाओं का निर्माण करने की आकांक्षा है, तो दूसरी ओर प्रवेश परीक्षाओं, कोचिंग उद्योग और अंकों की अंधी प्रतिस्पर्धा ने शिक्षा के मूल उद्देश्य को सीमित कर दिया है। हाल के वर्षों में प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा अनियमितताओं, मानसिक तनाव, छात्र आत्महत्याओं और महंगी कोचिंग व्यवस्था ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि संपूर्ण शैक्षिक दर्शन पर पुनर्विचार आवश्यक है। यह तथ्य है कि भारत ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, प्रशासन</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/184838/human-sensitivity-must-be-returned-to-education"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-08/1001020091.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत की शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से ऐसी दोहरी चुनौती का सामना कर रही है जिसमें एक ओर वैश्विक स्तर पर प्रतिभाशाली युवाओं का निर्माण करने की आकांक्षा है, तो दूसरी ओर प्रवेश परीक्षाओं, कोचिंग उद्योग और अंकों की अंधी प्रतिस्पर्धा ने शिक्षा के मूल उद्देश्य को सीमित कर दिया है। हाल के वर्षों में प्रश्नपत्र लीक, परीक्षा अनियमितताओं, मानसिक तनाव, छात्र आत्महत्याओं और महंगी कोचिंग व्यवस्था ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि संपूर्ण शैक्षिक दर्शन पर पुनर्विचार आवश्यक है। यह तथ्य है कि भारत ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, प्रशासन और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में विश्वस्तरीय प्रतिभाएँ दी हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि इन सफलताओं के पीछे लाखों ऐसे विद्यार्थी भी हैं जो संसाधनों की कमी, असमान अवसरों और अत्यधिक प्रतिस्पर्धा के कारण अपनी वास्तविक क्षमता तक पहुँच ही नहीं पाते। इसलिए अब शिक्षा को केवल चयन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता के विकास की प्रक्रिया के रूप में देखने की आवश्यकता है।<br /><br />यह मान लेना कि तीन या चार घंटे की एक परीक्षा किसी विद्यार्थी की बुद्धिमत्ता, रचनात्मकता, नैतिकता, नेतृत्व क्षमता और जीवन कौशल का अंतिम प्रमाण बन सकती है, आधुनिक शिक्षा विज्ञान की दृष्टि से भी सीमित सोच है। परीक्षा आवश्यक है, किंतु उसे शिक्षा का पर्याय बना देना सबसे बड़ी भूल रही है। आज अनेक विद्यार्थी विश्लेषणात्मक सोच, नवाचार, कला, खेल, सामाजिक नेतृत्व, संवाद कौशल और व्यावहारिक दक्षताओं में उत्कृष्ट होते हुए भी केवल इसलिए पीछे रह जाते हैं क्योंकि वे एक विशेष प्रकार की प्रतियोगी परीक्षा के अनुरूप स्वयं को ढाल नहीं पाते। दूसरी ओर रटने की संस्कृति और अनुमान आधारित तैयारी को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था कई बार वास्तविक प्रतिभा की अपेक्षा परीक्षा तकनीक में दक्ष विद्यार्थियों को आगे ले आती है। तथ्य और मत के बीच अंतर स्पष्ट रखना आवश्यक है। तथ्य यह है कि अधिकांश प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश अभी भी प्रतियोगी परीक्षाओं पर आधारित है। मत यह है कि भविष्य में इन परीक्षाओं के साथ बहुआयामी मूल्यांकन को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए ताकि चयन अधिक न्यायपूर्ण बन सके।<br /><br />कोचिंग उद्योग का विस्तार भी इसी असंतुलित व्यवस्था का परिणाम है। जब विद्यालयों की शिक्षा प्रवेश परीक्षाओं की आवश्यकताओं से अलग दिखाई देने लगती है, तब अभिभावक अतिरिक्त संसाधनों की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होते हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा एक सामाजिक अधिकार से अधिक आर्थिक क्षमता का विषय बन जाती है। छोटे नगरों और ग्रामीण क्षेत्रों के अनेक परिवार अपने बच्चों की तैयारी के लिए ऋण लेते हैं, बचत समाप्त कर देते हैं अथवा अन्य आवश्यकताओं में कटौती करते हैं। महानगरों के अतिरिक्त कोटा, प्रयागराज, पटना, सीकर, हैदराबाद, दिल्ली और अन्य शिक्षा केंद्रों में विकसित कोचिंग संस्कृति ने अवसर तो दिए हैं, किंतु साथ ही मानसिक दबाव और सामाजिक असमानता को भी बढ़ाया है। यह कहना उचित नहीं होगा कि प्रत्येक कोचिंग संस्थान नकारात्मक भूमिका निभाता है, क्योंकि अनेक संस्थान गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराते हैं। किंतु जब किसी व्यवस्था की सफलता विद्यालयों से अधिक कोचिंग संस्थानों पर निर्भर होने लगे, तब यह शिक्षा तंत्र के लिए गंभीर संकेत माना जाना चाहिए।<br /><br />विद्यालयों की भूमिका को पुनर्स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि विद्यालयों में प्रयोगशाला आधारित शिक्षण, परियोजना कार्य, भाषा दक्षता, तार्किक चिंतन, अनुसंधान प्रवृत्ति, कला, खेल, सामुदायिक सेवा और डिजिटल साक्षरता को समान महत्व दिया जाए तो विद्यार्थियों का समग्र विकास संभव होगा। प्रवेश प्रक्रिया में विद्यालयी उपलब्धियों, सत्यापित परियोजनाओं, सामाजिक सहभागिता, इंटर्नशिप, शोध अभिरुचि तथा साक्षात्कार जैसे तत्वों का संतुलित समावेश किया जा सकता है। इससे केवल स्मरण शक्ति नहीं, बल्कि समस्या समाधान क्षमता, नेतृत्व, सहयोग, नैतिक उत्तरदायित्व और व्यावहारिक समझ का भी मूल्यांकन संभव होगा। हालांकि इसके साथ पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट मानदंड, प्रशिक्षित मूल्यांकनकर्ता और डिजिटल सत्यापन प्रणाली अनिवार्य होगी।<br /><br />परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता भी समान रूप से महत्वपूर्ण है। प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं ने विद्यार्थियों के विश्वास को गहरा आघात पहुँचाया है। ऐसी घटनाएँ केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के सिद्धांत पर भी प्रश्नचिह्न लगाती हैं। सुरक्षित डिजिटल प्रश्नपत्र प्रबंधन, बहुस्तरीय एन्क्रिप्शन, सीमित अभिगम, परीक्षा केंद्रों का नियमित ऑडिट, स्वतंत्र निगरानी तंत्र, तकनीकी सुरक्षा, उत्तर पुस्तिकाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण तथा दोषियों के विरुद्ध त्वरित दंडात्मक कार्रवाई जैसी व्यवस्थाएँ अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुकी हैं। साथ ही परीक्षा कैलेंडर को पूरे वर्ष में संतुलित ढंग से वितरित किया जाए ताकि किसी एक परीक्षा पर अत्यधिक दबाव न बने और विद्यार्थियों को तैयारी के लिए पर्याप्त अवसर मिल सकें।<br /><br />राष्ट्रीय स्तर की एक समान परीक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर विमर्श आवश्यक है। विशाल भौगोलिक, भाषाई, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता वाले देश में एक ही मॉडल सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से उपयुक्त हो, यह मान लेना व्यावहारिक नहीं है। विभिन्न विषयों की प्रकृति भी अलग होती है। चिकित्सा, अभियांत्रिकी, विधि, कला, सामाजिक विज्ञान और डिजाइन जैसे क्षेत्रों के लिए समान मूल्यांकन पद्धति अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकती। इसलिए राष्ट्रीय मानकों के साथ संस्थानों को सीमित शैक्षणिक स्वायत्तता देना अधिक संतुलित विकल्प हो सकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और संबंधित व्यावसायिक निकायों के दिशा-निर्देशों के भीतर संस्थानों को अपने विषयानुकूल अतिरिक्त मूल्यांकन विकसित करने की अनुमति मिलने से चयन प्रक्रिया अधिक सार्थक बन सकती है।<br /><br />अभिभावकों की भूमिका भी इस परिवर्तन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनेक बार सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण कुछ चुनिंदा व्यवसायों को ही सफलता का पर्याय मान लिया जाता है। इससे विद्यार्थी अपनी वास्तविक रुचि और क्षमता की उपेक्षा करने लगते हैं। व्यवस्थित करियर परामर्श, मनोवैज्ञानिक सहयोग, योग्यता परीक्षण और उद्योग जगत से संवाद की व्यवस्था विद्यालय स्तर से ही विकसित की जानी चाहिए। यदि कोई विद्यार्थी कृषि प्रौद्योगिकी, पर्यावरण विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, शिक्षण, डिजाइन, लोक प्रशासन, उद्यमिता, साहित्य, खेल या संगीत में उत्कृष्ट भविष्य देखता है, तो उसे उसी दिशा में आगे बढ़ने का सम्मानजनक अवसर मिलना चाहिए। विविध करियर विकल्पों की सामाजिक स्वीकृति बढ़े बिना परीक्षा का दबाव कम नहीं होगा।<br /><br />नई शिक्षा नीति ने बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और लचीले शिक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए हैं। किंतु किसी भी नीति की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। पर्याप्त वित्तीय निवेश, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, स्थानीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री, डिजिटल अवसंरचना और ग्रामीण क्षेत्रों तक समान संसाधनों की उपलब्धता के बिना अपेक्षित परिवर्तन संभव नहीं होगा। शिक्षा सुधार को केवल नीति दस्तावेजों तक सीमित रखने के बजाय उसे विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के दैनिक शैक्षणिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा।<br /><br />अंततः शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उत्तरदायी, संवेदनशील, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले और लोकतांत्रिक मूल्यों से युक्त नागरिक तैयार करना है। जब व्यवस्था विद्यार्थियों को भय, ऋण, तनाव और निरंतर तुलना से मुक्त कर उनकी जिज्ञासा, रचनात्मकता और मानवीय गरिमा को केंद्र में रखेगी, तभी वास्तविक परिवर्तन दिखाई देगा। तथ्य यह है कि प्रतियोगिता आधुनिक समाज का हिस्सा रहेगी। किंतु यह मत अधिक दूरदर्शी प्रतीत होता है कि प्रतियोगिता का आधार केवल अंक नहीं, बल्कि क्षमता, चरित्र, कौशल, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व होना चाहिए। भारत यदि ज्ञान आधारित वैश्विक नेतृत्व का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है, तो उसे ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करना होगा जिसमें प्रत्येक विद्यार्थी स्वयं को केवल परीक्षार्थी नहीं, बल्कि संभावनाओं से परिपूर्ण नागरिक के रूप में देख सके। तभी शिक्षा सचमुच मानवीय बनेगी और राष्ट्र की प्रगति का सबसे विश्वसनीय आधार भी।<br /><br /><strong>अवनीश कुमार गुप्ता</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 21:52:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat UP]]></dc:creator>
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                <title>मोदी सरकार में वो समस्याएं जो अभी तक नहीं सुधरीं</title>
                                    <description><![CDATA[<blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/181929/those-problems-which-have-not-been-improved-yet-in-modi"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-06/images-(2).jpeg" alt=""></a><br /><blockquote class="format1"><strong>राजीव शुक्ल-संपादक </strong></blockquote>
<p style="text-align:justify;">इस बात में कोई दो राय नहीं है कि 2014 के बाद से अब तक भारत ने काफी तरक्की की है लेकिन इसमें यह भी है कि अभी तक बहुत सी ऐसी समस्याएं हैं जिनमें सुधार होना बाकी है। 2014 से 2026 तक 12 साल की सत्ता में मोदी सरकार ने योजनाओं, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और वैश्विक छवि पर काम किया। लेकिन कुछ संरचनात्मक समस्याएं ऐसी हैं जो चुनावी नारों और सरकारी रिपोर्टों के बावजूद ज़मीन पर बनी हुई हैं। ये समस्याएं आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीधे जुड़ती हैं। इसमें सबसे पहले आती है बेरोज़गारी और अनौपचारिक क्षेत्र की अस्थिरता।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकार ने बहुत प्रयास किए हैं लेकिन अभी कई प्रयास करने वाकी हैं। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि बेरोज़गारी दर 2017 के मुकाबले घटी है। लेकिन हकीकत में समस्या की प्रकृति बदली है। गुणवत्तापूर्ण रोज़गार की कमी भारतीयों को खल रही है। हर साल 1.2 करोड़ युवा श्रम बाजार में आते हैं, लेकिन प्राइवेट सेक्टर में वेतन बढ़ोतरी धीमी है। आईटी और स्टार्टअप में छंटनी ने मिडिल क्लास की चिंता बढ़ाई है। अनौपचारिक क्षेत्र पर असर: नोटबंदी, GST और कोविड के बाद छोटे दुकानदार, ठेले वाले और दिहाड़ी मजदूर पूरी तरह उभर नहीं पाए। CMIE और NSSO के सर्वे बताते हैं कि स्वरोज़गार बढ़ा है, लेकिन ये ज़्यादातर मजबूरी का स्वरोज़गार है। कृषि संकट और किसान की आय के लिए बहुत समय से बात चल रही है लेकिन अभी तक इस पर कोई ठोस नीति नहीं बन सकी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />2016 में सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। 2026 तक वो लक्ष्य पूरा नहीं हुआ। MSP की सीमित पहुंच : सिर्फ गेहूं-धान के किसान ही MSP का फायदा ले पाते हैं। दाल, तिलहन, फल-सब्जी वाले किसान मंडी के भाव पर निर्भर हैं। कर्ज और जलवायु जोखिम: को लेकर किसान हमेशा से परेशान रहा है। फसल बीमा योजना ने कुछ राहत दी, लेकिन अतिवृष्टि, सूखा और आवारा पशु की समस्या बनी हुई है। तीन कृषि कानूनों के विरोध के बाद सरकार बैकफुट पर आ गई और बड़े कृषि सुधार रुके हुए हैं।<br />              शिक्षा और स्वास्थ्य में गुणवत्ता का अंतर</p>
<p style="text-align:justify;"><br />शिक्षा: NEP 2020 ने ढांचा बदला, लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, ड्रॉपआउट रेट और लर्निंग आउटकम अब भी कमजोर हैं। ASER रिपोर्ट लगातार बताती है कि कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाता। इसी तरह स्वास्थ्य: आयुष्मान भारत ने कवरेज बढ़ाया, लेकिन ग्रामीण इलाकों में डॉक्टर, नर्स और दवाओं की कमी है। निजी अस्पताल महंगे हैं, और आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च भारत में अब भी GDP का 50% से ज्यादा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />महंगाई का मध्यम वर्ग पर दबाव बहुत बढ़ता जा रहा है। तेल, सब्जी, दाल और किराये की कीमतों में उछाल ने मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया। सरकार ने टैक्स स्लैब बदले, लेकिन प्रत्यक्ष कर का बोझ अब भी वेतनभोगी वर्ग पर ज्यादा है।  <br />कोर महंगाई भले नियंत्रण में रही हो, लेकिन खाद्य महंगाई 2022-2024 में दो बार 10% पार कर गई। RBI के बार-बार रेपो रेट बढ़ाने से EMI बढ़ी और घर खरीदना मुश्किल हुआ। नौकरशाही और भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हो रहीं हैं। DBT और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने बिचौलियों को कम किया, लेकिन ज़मीन-रजिस्ट्री, पुलिस, म्यूनिसिपल सर्विस में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ। विपक्ष का आरोप है कि ED, CBI जैसी एजेंसियों का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ा है। वहीं सरकार कहती है कि भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हो रही है। नतीजा ये है कि आम आदमी का भरोसा सिस्टम पर आंशिक ही बहाल हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;"><br />सामाजिक ध्रुवीकरण और संवाद की कमी पिछले 12 साल में धार्मिक और क्षेत्रीय मुद्दे राष्ट्रीय बहस में हावी रहे। इससे विकास और रोज़गार जैसे मुद्दे कई बार बैकसीट पर चले गए। मीडिया और सिविल सोसाइटी का स्पेस सिकुड़ने की शिकायत विपक्ष और पत्रकार संगठनों से आती रही है। सरकार का पक्ष है कि फेक न्यूज़ और अस्थिरता रोकने के लिए नियम जरूरी हैं। राज्य-केंद्र संबंध और संघीय ढांचा<br />GST लागू होने के बाद राज्यों को मुआवज़ा देने का वादा 2022 में खत्म हो गया। अब कई राज्य कहते हैं कि उनका फिस्कल स्पेस सिकुड़ गया है।  केंद्रीय योजनाओं के नाम पर राज्यों की भूमिका सीमित हो गई है, जिससे संघीय संतुलन पर सवाल उठते हैं।  सुधार हुआ, पर असमान गति से मोदी सरकार ने बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल ट्रांजैक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर में ठोस काम किया है। उज्ज्वला, जनधन, सड़क, रेल और UPI इसका उदाहरण हैं। लेकिन रोज़गार की गुणवत्ता, कृषि आय, शिक्षा-स्वास्थ्य की ग्राउंड लेवल क्वालिटी, और महंगाई जैसी समस्याएं अभी भी सिस्टम की कमज़ोरी दिखाती हैं। 2026 तक सरकार की सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ प्रोडक्टिविटी और प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को भी तेज़ करे, ताकि ये समस्याएं चुनावी मुद्दे बनकर न रह जाएं बल्कि हल हों।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वतंत्र विचार</category>
                                            <category>संपादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 17:33:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Swatantra Prabhat]]></dc:creator>
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                <title>परिषदीय विद्यालयों में नवारंभ उत्सव का हुआ आयोजन</title>
                                    <description><![CDATA[<div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर -</strong> विकास  खण्ड  उस्का बाजार के परिषदीय विद्यालयों में बुधवार को भव्य 'नवारंभ उत्सव' का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नव-प्रवेशित बच्चों, विशेषकर 'बालवाटिका' और कक्षा-1 के छात्रों का विद्यालय में आत्मीय स्वागत करना और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना रहा।पीएम श्री कंपोजिट विद्यालय परसा खुर्द मेंकार्यक्रम के मुख्य अतिथि खंड शिक्षा अधिकारी ओम प्रकाश मिश्र ने छात्र-छात्राओं को नि:शुल्क स्टेशनरी और पाठ्य सामग्री वितरित की।</div>
<div style="text-align:justify;">  </div>
<div style="text-align:justify;">बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए बीईओ ने कहा कि शासन की मंशा के अनुरूप स्कूलों में बच्चों को आनंदमय और सुरक्षित वातावरण प्रदान करना हमारी प्राथमिकता है। उन्होंने अभिभावकों</div>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.swatantraprabhat.com/article/174189/navarambha-utsav-organized-in-council-schools"><img src="https://www.swatantraprabhat.com/media/400/2026-03/1774450078692.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;"><strong>सिद्धार्थनगर -</strong> विकास  खण्ड  उस्का बाजार के परिषदीय विद्यालयों में बुधवार को भव्य 'नवारंभ उत्सव' का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नव-प्रवेशित बच्चों, विशेषकर 'बालवाटिका' और कक्षा-1 के छात्रों का विद्यालय में आत्मीय स्वागत करना और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना रहा।पीएम श्री कंपोजिट विद्यालय परसा खुर्द मेंकार्यक्रम के मुख्य अतिथि खंड शिक्षा अधिकारी ओम प्रकाश मिश्र ने छात्र-छात्राओं को नि:शुल्क स्टेशनरी और पाठ्य सामग्री वितरित की।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए बीईओ ने कहा कि शासन की मंशा के अनुरूप स्कूलों में बच्चों को आनंदमय और सुरक्षित वातावरण प्रदान करना हमारी प्राथमिकता है। उन्होंने अभिभावकों से भी अपील की कि वे अपने बच्चों का नामांकन सरकारी स्कूलों में कराएं और उन्हें नियमित विद्यालय भेजें। विद्यालय परिसर को रंग-बिरंगे चार्ट, गुब्बारों और फूलों से सजाया गया था ताकि बच्चे पहले ही दिन स्कूल के प्रति आकर्षित हों।</div>
<div style="text-align:justify;"> </div>
<div style="text-align:justify;">प्राथमिक विद्यालय मरवटियामाफ़ी में ग्राम प्रधान प्रतिनिधि पवन रस्तोगी की मौजूदगी में 3 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों का 'बालवाटिका' के तहत नामांकन कर उनका तिलक लगाकर स्वागत किया गया।शिक्षकों ने अभिभावकों को नई शिक्षा नीति और विद्यालय में उपलब्ध आधुनिक सुविधाओं के बारे में जानकारी दी। विद्यालय परिवार ने संकल्प लिया कि वे इस सत्र में बच्चों के सर्वांगीण विकास और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए निरंतर प्रयास करेंगे। इस दौरान विद्यालयों के स्टाफ व आंगनबाड़ी कार्यकर्ता उपस्थित रहे।</div>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 20:27:06 +0530</pubDate>
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